पिछले कुछ दिनों में जिस तरह भारत में रेप कल्चर की अवधारणा घर करते दिखी है उसने झकझोर कर रख दिया है। महिलाएं तमाम परिस्थितियों का मुकाबला कर विकास के पथ पर ज्यों ज्यों आगे आ रही हैं, त्यों त्यों बलात्कार की यह घटनाएँ उनको मानसिक रूप से पीछे धकेल रही हैं। भारत की जनसंख्या में महिलाओं का 48.46 प्रतिशत योगदान है। महिलाओं की साक्षरता दर 65 प्रतिशत है। वियना कन्वेंशन और महिलाओं के अधिकार से सम्बंधित बीजिंग सम्मलेन जैसी तमाम सन्धियों को हस्ताक्षरित करने के बाद भी स्थितियां और ज़्यादा बदतर हो रही हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2008 से 2012 के बीच स्त्रियों के साथ अत्याचार के मामलों में 24.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
भारत में प्रत्येक
घंटे में तीन महिलाओ के साथ बालात्कार हो
रहा है।हर 76 मिनट में एक बच्ची का बलात्कार हो रहा है. संविधान में उनसे जुड़े
तमाम अनुच्छेद आज झूठे साबित हो रहे हैं। राज्य द्वारा जनता को सुरक्षा प्रदान
करने की अवधारणाएं खोखली साबित हो रही हैं। जिस समाज में प्रकृति का स्वास्थ्य, महिलाओं
व बच्चों की सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम नहीं हैं, क्या वो समाज प्रगतिशील कहलाने का अधिकारी है? क्या ऐसे समाज, ऐसी संस्कृति को ढोते हुए हम जगतगुरु बनकर दुनिया को
राह दिखाने का दम भर सकते हैं? क्या यहाँ के नीति नियंता
और बुद्धिजीवी, आम जनता की भांति इन घटनाओं के आदि हो चुके हैं या चाय की
चुस्कियों के साथ भूलने की आदत डाल बैठे हैं? बचपन में अक्सर माँ कहती थी – ‘वो दिन हवा हुए जब फज़ल फाख्ता उड़ाते
थे, एक घर में दुःख होता था, सारे शहर वाले मातम मनाते थे’। आज ये पंक्तियाँ बिलकुल सच्ची साबित
हो रही हैं.
आज भारत की न्यायिक
व्यवस्था शिथिल हो रही है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में आज न्याय खुद एक बड़ा प्रश्नचिह्न
है। बलात्कार जैसे अमानवीये कार्य करने वालों को सज़ा का डर ही नहीं है। लम्बी
न्यायिक प्रक्रिया, बेल पर बाहर आ जाने की
प्रवृति ,पीड़ित पक्ष हेतु पुनर्वास
की नीति न होने से ये घटनाएं विभत्स रूप में सामने आ रही हैं। 16 दिसम्बर की घटना
के बाद फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की बात उठी। जस्टिस वर्मा ने भी अपनी रिपोर्ट में ऐसी
व्यस्था की अनुशंसा की थी। लेकिन सवाल है कि दस लाख की जनता पर हमारे यहाँ मात्र 10.7 जज हैं। क्या ऐसे में
फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट कुछ कर पाएंगे? सबसे पहले इस अनुपात को बदलने की ज़रुरत है, जिसकी
अनुशंसा विधि आयोग ने भी की है। सुरक्षा की ज़िम्मेदारी जिन पुलिसकर्मियों की है वर्तमान
में उनका अनुपात प्रति 1 लाख पर महज़ 174 है। क्या सुरक्षा की दृष्टि से यह संख्या नाकाफ़ी
नहीं? वो भी ‘बुदांयू’ प्रकरण के बाद, जब जनता का पुलिस से भरोसा ही उठने लगा हो।
कहावत है- ‘लोहे का स्वाद लोहार से मत पुछो, उस
घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है’। लेकिन उसके लिए भी महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण
आवश्यक है . वर्तमान लोकसभा में महिलाओ का
प्रतिनिधित्व ज़रूर बढ़ा है, उन्हें कैबिनेट में प्रमुख स्थान भी दिया गया है, लेकिन
पुरूष समाज का पूर्णतः समर्थन उन्हें मिला हो इसका दावा नहीं किया जा सकता.
इसके लिए सामाजिक बदलाव की कवायद शुरू करनी होगी।है
कई ऐसी मामले हैं जहा तो बलात्कार की शिकार महिलाओ को मार दिया जाता है लेकिन
क्योंकि मीडिया का वहा तक संपर्क नही स्थापित हो पता अतः ऐसे मुद्दे सामने नही आ
पाते.बहुत से ऐसे भी मामले हैं जहा बलात्कार की शिकार महिलाओ द्वारा कोई रिपोर्ट
नहीं लिखाई जाती.सामाजिक लोक लाज के भय से और कभी डर के आतंक से यह स्थिति दिखती
है. मीडिया द्वारा भी उन्ही बालात्कार की घटनाओ का जिक्र होता है जिसमे अमानवीयता
की हदे पार हो गयी हों.जबकि बालात्कार खुद में ही सभी मानवीयता के बिन्दुओ को पीछे
छोड़ देता है...४ स्कूल पड़ने वाली दलित छात्राओ का उच्च जाती और प्रभुत्व वाले लोगो
द्वारा बलात्कार किया जाता है और न्याय की गुहार करते करते परिजन जंतर मंतर में १
महीने से ज्यादा प्रदर्सन करते हैं लेकिन
तब भी न्याय के नाम पर महज़ खानापूर्ती कर दी जाती है.सामाजिक तौर पर विभेदीकरणकी
नीति की सुरुआत अपने ही घर से होती है.इस और हमने प्रयास करने होंगे.
समाज में महिलाओ की गरिमा को बनाने हेतु समाज से
संवादधर्मिता जरूरी है.महिलाओ की स्थितियों के लिए सामाजिक आर्थिक राजनेतिक सभी
उपाय अपनाने होंगे.धार्मिक संस्थान इसमें बड़ी सहभागिता निभा सकते हैं. बलात्कार की
वर्तमान घटनाओ से ये साफ़ है के केवेल
अशिक्षित ही इस हेतु जिम्मेदार नहीं हैं. शिक्षितों का भी
एक बड़ा तबका जाती के दंभ में,सम्पनता के दंभ में,मानसिक विकृति के चलते ऐसे काम कर
रहा है. आज हमें नैतिक मूल्याधारित शिक्षा व्यवस्था की ज़रूरत है। पाठ्यपुस्तकों
में महिला सम्मान से जुड़ी बातों को बचपन से ही
शिक्षा का आवश्यक अंग बनाना होगा। सरकार को भी स्वयं सहायता समूह और गैर
सरकारी संगठनों आदि को प्रोत्साहन देना होगा। पुलिस चौकियों में महिला पुलिस की
संख्या और महिला थानेदारों की संख्या बढ़ाए जाने की जरुरत है। महिलाओं को आत्मरक्षा
के उपाय सीखने होंगें.सरकार द्वारा भी इस ओर किये जा रहे प्रयासों को बढाने की
जरुरत है.ग्रामीण इलाकों में महिलाओ के लिए शौचालयों की व्यवस्था बेहद जरूरी है
ताकि रात को भी सोंच हेतु खुले में न जाना पड़े.स्ट्रीट लाइट्स की सुविधा को
ग्रामीण इलाकों के साथ साथ शहरी इलाकों में भी अनिवार्य रूप से प्रदान करने की
व्यस्था होनी चाहिये.
इस समस्या
के समाधान के लिए कोई और नहीं आएगा। यह हमारी उपजायी है, हमारी समस्या है, हमें ही मिलकर दूर करनी होगी।
‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते देवता तत्र’ वाली हमारी संस्कृति में इन घटनाओं के
समावेश ने हम सब के सामने कुछ सवाल खड़े कर दिए हैं। इन प्रश्नों का निराकरण करना
सिर्फ सरकार की ही नहीं हम सब की जिम्मेदारी है. स्वामी विवेकानंद ने कहा था –जब
तक महिलाओ की स्थितियों में सुधार नहीं होगा विश्व के कल्याण की कोई सम्भावना नहीं
है...स्वामी विवेकानन्द के इन विचार्रों को ही आधार बनाकर समानता और न्याय के साथ
सतत समावेशी विकास का हमारा स्वप्न साकार होगा.
जय पाण्डेय