सोमवार, 26 सितंबर 2022

वक्त की मांग : पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सामाजिक राजनीतिक चिंतन और दर्शन पर परिचर्चा

भारतीय इतिहास की तथाकथित मानक पुस्तकों में , शिक्षा की नीतियों में और पाठ्यक्रम निर्धारण में  राष्ट्रवादी इतिहासकारों को  एक लंबे समय तक जगह नहीं दी गई और यही कारण रहा कि हमारे अतीत के तारों को औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था की पाठ्य पुस्तकों, मार्क्सवादी इतिहासकारों के इतिहास लेखन और सत्ताधारियों के कृपापात्रों द्वारा आकार दिया गया । यह इस देश का दुर्भाग्य है कि उपरोक्त मानसिकता से ग्रसित लोगों ने भारत की न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया बल्कि एक ऐसी व्यवस्था को भी जन्म दिया जहां हम अपने अतीत की विरासत को भुला बैठे । जहां हम अपने  आदर्श व प्रेरणादायी व्यक्तित्वों को भुला बैठे । हमने नि:संदेह कुछ प्रेरक व्यक्तित्वों को पढ़ा जरूर परंतु ऐसे व्यक्तित्वों की एक लंबी फेहरिस्त अभी भी शोध का विषय है । 


एकात्म मानवतावाद के प्रवर्तक पंडित दीनदयाल उपाध्याय भी ऐसे ही व्यक्तित्वों के केंद्र बिंदु हैं जिनके विचारों,लेखन,विकास के मॉडलों और यहां तक की राजनैतिक, व्यक्तिगत  जीवन के संघर्षों पर चर्चा तक नहीं हुईं । एक लेखक, एक राजनीतिज्ञ,एक पत्रकार, एक दार्शनिक और स्वयंसेवक दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म आश्विन कृष्णा त्रयोदशी संवत् 1973 विक्रमी तदानुसार दिनांक 25 सितंबर 1916 को बृजभूमी पर उत्तर भारतीय निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था  । मैट्रिक और इंटर  कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण करने के बाद बीए और प्रशासनिक सेवा में चयनित मेधावी दीना ( बचपन का नाम ) 1937 में संघ को समर्पित हो गए।  1967 में कालीकट अधिवेशन में उपाध्याय जी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। मात्र 43 दिन के जनसंघ के अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान ही 10-11 फरवरी, 1968 की रात्रि में मुगलसराय स्टेशन पर उनकी हत्या कर दी गई। 



जिस भारत के सपने को मन मस्तिष्क में बैठाकर स्वाधीनता का संग्राम लड़ा गया, वह भारत आजादी के बाद भारतीय चिंतन धारा,भारतीय संस्कृति से विलग पाश्चात्य का अनुगामी बनता जा रहा था । भारत इंडिया बनने की कोशिश में था जिससे भारतीयता के विषय में सोच शिथिल होने लगी । देश के कानून और प्रशासन की आधारशिला औपनिवेशिक ढर्रे पर स्थापित कर  भारत को इंडिया से विस्थापित करने के मॉडल का  समर्थन पंडित जी  ने कभी नहीं  किया । ऐसे में दीनदयाल जी के विचारों ने भारतीय संस्कृति, भारतीय शिक्षा और आर्थिक व्यवस्था, राष्ट्रीय अखंडता , राष्ट्रीय भाषा आदि  मौलिक विचारों के साथ-साथ मानवीय गरिमा , मानवीय मूल्यों और अंत्योदय जैसी संकल्पनाएं प्रदान की । पंडित जी द्वारा पाञ्चजन्य पत्रिका में प्रकाशित विभिन्न लेखों, उनकी  विभिन्न सभाओं , संघ के कार्यक्रमों ,उनके लिखित साहित्य   और अपने लोगों को लिखे गए पत्रों में विस्तार से उनके दर्शन के उस चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर सकते हैं जिसकी कड़ियां सांख्य दर्शन से होकर व्यक्ति के निजी जीवन तक जुड़ती हैं । 


आर्थिक विपन्नता से प्रताड़ित जन के लिए  समुचित रूप से भोजन,पानी,आवास,शिक्षा उपलब्ध कराना अंत्योदय है। इस अंत्योदय के विकास के केंद्र में मानव और उसमें भी अंतिम पंक्ति में खड़े मानव की प्रसन्नता है। परिवार, समाज,जाति ,राष्ट्र ,विश्व और ब्रह्मांड, सब के सब मानव से जुड़ी इकाइयां हैं जो  चार स्तंभों पर टिकी है- शरीर,मन,बुद्धि व आत्मा। इनमें से किसी एक की भी अवहेलना शेष तीनों को निष्फल कर देती हैं।अतः किसी भी देश का विकास मॉडल  व्यक्ति केंद्रित होना चाहिए। अंत्योदय इस एकात्म मानव दर्शन की व्यावहारिक परिणीति का जरिया है।एकात्म मानव-दर्शन राष्ट्रत्व के दो पारिभाषित लक्षणों को पुनर्जीवित करता है जिन्हें ''चिति '' (राष्ट्र की आत्मा) और ''विराट'' (वह शक्ति जो राष्ट्र को ऊर्जा प्रदान करता है) कहते हैं। 



राष्ट्रीय संविधान के निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत दुरूह और विस्तार को धारण किए हुए थी । संविधान के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए भी दीनदयाल उपाध्याय जी ने संघात्मक संविधान, लोक- कल्याणकारी राज्य विषयक प्रावधानों एवम स्थानीय स्वशासन आदि विषयों पर खुलकर आलोचना की और न सिर्फ आलोचना की बल्कि उनके समाधान भी प्रदान किए । 


कश्मीर के तत्कालीन हालातों  और शेख अब्दुल्ला की पूर्व मंशाओं को भांपकर सरकार को चेताते हुए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी विभिन्न पत्रों , संपर्कों द्वारा सतर्क करने की कोशिश उपाध्याय जी द्वारा की गई किंतु उनकी बातों पर गौर नहीं किया गया ।  वस्तुतः वर्तमान सरकार द्वारा धारा 370 को हटाकर कश्मीर समस्या का जो हल निकाला गया है उसकी आधारभूमि दीनदयाल उपाध्याय जी ने ही शुरू की थी । 


विभाजन की विभीषिका पर भी दीनदयाल उपाध्याय जी के अंतरमन ने रुदन किया है । एक कार्यक्रम में उन्होंने विचार प्रकट किए कि -

"दिल्ली में हमारे नेता कुमकुम तिलक लगा रहे थे जबकि पंजाब में हमारी माता और बहनों की मांग का सिंदूर पुछ रहा था …वंदे मातरम का जयघोष करके हम माता के वे  हाथ काट चुके थे जिनसे वह हमें आशीर्वाद देती।  दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा फैलाकर स्वतंत्रता की घोषणा की गई किंतु रावी के जिस तट पर स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा दोहराई गई थी वह हमसे छिन चुका था । "


पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी  वाजपेयी जी ने जिस अंत्योदय की अवधारणा को कार्यरूप प्रदान किया; वर्तमान सरकार ने लोकतंत्र के अंतिम पायदान में खड़े निस्वार्थ भाव से सेवारथ नागरिकों को नागरिक सम्मान देकर उसी अंत्योदय को आगे बढ़ाया है । दीनदयाल जी के अंत्योदय की ही प्रेरणा वर्तमान सरकार की पहल जैसी योजनाएं हैं । न सिर्फ वर्तमान सरकार ने बल्कि पूर्व में भी दीनदयाल जी के इस अंत्योदय से प्रभावित विभिन्न योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन को हम पाते हैं ।   ‘भारत  विकास की यात्रा ग्रामों से शुरू हो’ कि अवधारणा को ग्रामीण आजीविका मिशन, प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना आदि जैसी योजनाओं द्वारा आज सफलतापूर्वक क्रियान्वित किया जा रहा है । 


योजनाओं के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियां भी है उससे इंकार नहीं किया जा सकता । उन चुनौतियों पर चर्चा होनी आवश्यक हैं और उससे भी आवश्यक समाधान पर चर्चा।  पंडित दीन दयाल जी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनसंघ  के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए संघ के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में अपने विभिन्न विचारों को रखा । इन सभाओं में देश की विभिन्न समस्याओं पर समाधान की श्रृंखलाबद्ध कड़ियों को हम देख सकते हैं ।   पांचजन्य और युगदेश पत्रिका के तत्कालीन अंकों में इनके विचारों को देखा जा सकता है । 


स्वाधीनता संग्राम में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर चुके अगणित अनजान वीरों के नामों तक आम जनमानस की पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से  आजादी के अमृत महोत्सव की पूर्वपीठिका वर्तमान सरकार द्वारा रची गई है । 


दीन दयाल जी के जन्मदिवस पर हम संकल्पित हो कि पंडित जी के  साथ न्याय कर सकें, उन परिस्थितियों को, दबे संकेतों को सामने  ला पाएं , उन   स्वतंत्रता सेनानियों को सामान्य जन के बीच ला पाएं जो गुमनाम रह गए  और ऐसे व्यक्तित्वों के   दर्शन,लेखनी और राजनीति के आदर्शों पर  हम कायम रह सकें । हम संकल्पित हों कि सम्मिलित प्रयासों से देश के इतिहास, पाठ्य पुस्तकों और सांस्कृतिक मंचों  में उन व्यक्तित्वों को भी स्थान दे पाएं जिन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए जीवन लगा दिया है ताकि भारत का भविष्य अपने इतिहास के गौरवपूर्ण  व्यक्तित्वों से प्रेरणा ग्रहण कर सकें  ।


लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी  एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।

शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

“माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या”




 

“माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या” सूत्र वाक्य को भारतीय संस्कृति अपने में समेटे हुए है | भारतीय वैदिक ग्रन्थों की परंपरा से लेकर वर्तमान भारत की हाइड्रोजन नीति तक अंतिम उद्देश्य के रूप में समता का वह धरातल है जहां चर- अचर अवयव एक साथ बिना एक दूसरे को नुकसान पहुंचाए जीवन चक्र में अपना सहयोग देते हैं | औद्योगिक क्रांति के बाद जलवायुवी समस्याओं की शुरूवात का प्रस्थान बिंदु ओज़ोन क्षरण के रूप में हमें देखने को मिलता है | संभवतः यही वह बिन्दु भी है जहां विश्व के सभी देश मिलकर अपनी मानवीय भूलों को सुधारने का प्रण करते हैं | हालांकि ओजोन क्षरण से शुरू प्रकृति का यह कहर आज जलवायु परिवर्तन, विपरीत एवं विकराल मौसमी दशाओं और ग्लोबल वार्मिंग तक जा पहुंचा है | इन सब दशाओं के बीच भारत द्वारा किए जा रहे प्रयास प्रशंसनीय हैं फिर चाहे वो और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन फेज आउट मैनेजमेंट प्लान से संबन्धित हों या अंतर्राष्ट्रीय सौर ऊर्जा समझौते से संबन्धित या फिर कूलिंग एक्शन योजना से संबन्धित हों । 

    

ओजोन परत के ह्रास के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाने और इसे संरक्षित करने, संरक्षण हेतु किए गए प्रयासों पर चर्चा एवं भविष्य की कार्ययोजनाओं के गठन आदि मंतव्यों को दृष्टिगत रखते हुए 16 सितम्बर 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल संधि हस्ताक्षरित हुई | संयुक्त राष्ट्रसंघ की सामान्य सभा ( जनरल असेंबली ) द्वारा वर्ष 1994 में 16 सितम्बर के दिन को अंतर्राष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस के रूप में घोषित किया | ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए हस्ताक्षरित यह अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि विश्व की सबसे सफलतम संधियों में से एक मानी जाती है |  


1992 से ही भारत मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के विभिन्न दिशानिर्देशों को चरणबद्ध तरीके से कार्यान्वित कर रहा है। भारत ने क्लोरोफ्लोरोकार्बन, कार्बन टेट्राक्लोराइड, हैलोन्स को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया है। वर्तमान में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के त्वरित कार्यक्रम के अनुसार हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जा रहा है। हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन फेज आउट मैनेजमेंट प्लान (HPMP) स्टेज- I को 2012 से 2016 तक सफलतापूर्वक लागू किया गया है और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन फेज आउट मैनेजमेंट प्लान (HPMP) स्टेज- II वर्तमान में 2017 से लागू किया जा रहा है और 2023 तक पूरा हो जाएगा यह उम्मीद की जा सकती है | 

भारत में ओजोन क्षयकारी रसायनों में से एक सबसे शक्तिशाली एचसीएफसी- 141बी को भी पूर्ण तरीके से समाप्त करके विकासशील देशों के सम्मुख एक उदाहरण पेश किया है भारत सरकार ने हाल ही में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अगले चरण किगाली संशोधन की पुष्टि करने का निर्णय लिया है जो एक बार फिर वैश्विक समुदाय के लिए जलवायु और पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है |


आज विश्व के प्रायः सभी देशों द्वारा ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्सर्जन में कमी हेतु नीतिगत फैसले लिए जा रहे हैं | इनके प्रतिस्थापन से भी नई समस्याओं को हम जन्म लेते देख रहे हैं | कई क्षेत्रों जैसे रेफ्रिजरेशन और एयर कंडीशनिंग अनुप्रयोगों में ओडीएस के विकल्प के रूप में फ्लोरिनेटेड गैसों (एफ-गैसों) जैसे हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (एचएफसी), पेराफ्लूरोकार्बन (पीएफसी) और सल्फर हेक्साफ्लोराइड (एसएफ 6 ) को पेश किया गया है। ये गैसें ओजोन परत को तो नष्ट नहीं करती हैं, परंतु जलवायु परिवर्तन में ग्रीनहाउस गैसों के रूप में योगदान करती हैं। कुछ एफ –गैसों में ग्रीनहाउस प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड की समान मात्रा की तुलना में 23 000 गुना अधिक शक्तिशाली होता है। 1990 के दशक से एफ-गैसों का उपयोग और वातावरण में उनकी उपस्थिति में वृद्धि हुई है। हमें वैश्विक स्तर पर इस तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि ओज़ोन परत के संरक्षण

के कदम हमें विपरीत स्थितियों में न डाल दें |


आज जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण , ग्लोबल वार्मिंग और ओजोन संरक्षण के मामलों को अलग अलग करके नहीं देखा जा सकता है | इसी लिए नवीनीकरणीय स्रोतों से प्राप्त हाइड्रोजन, ग्रीन हाइड्रोजन की तरफ बढ़ते हमारे कदमों को भी वर्तमान शोधों के आधार पर हमें आगे बढ़ाना चाहिए | भारत की वर्तमान हाइड्रोजन नीति के अनुसार हमने वर्ष 2030 तक 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन बढ़ाना है | भारतवर्ष की ऊर्जा जरूरतों और वर्तमान जलवायवी दशाओं को देखते हुए ईधन के रूप में हाइड्रोजन के उपयोग संबंधी ऐसी सकारात्मक पहलें उत्साहवर्धक हैं | हालांकि अभी भी उच्च लागत, तकनीक एवं आधारभूत अवसंरचना की न्यूनता, हाइड्रोजन ऊर्जा परिवहन में नुकसान आदि चुनौतियाँ बरकरार हैं जिस तरफ समन्वित होके प्रयास करने की आवश्यकता है | तेल रिफ़ाइनरीयों, स्टील सेक्टर में भी अनवीनीकर्णीय ऊर्जा से प्राप्त ग्रे-हाइड्रोजन के स्थान पर ग्रीन-हाइड्रोजन को प्रतिस्थापित करने की तरफ हमको कदम बढ़ाने की आवश्यकता है | इलेक्ट्रिक वाहनों की संकल्पना को जिस तरह भारत ने अपने विभिन्न नीतिगत फैसलों में समावेशित किया है वैसे ही कदम इस संदर्भ में भी लिए जाने चाहिए तभी सच्चे अर्थों में हमारी संस्कृति के बीज वाक्यों को अमलीजामा पहनाने में हम सफल होंगे |    

लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।

मंगलवार, 13 सितंबर 2022

अपनी भाषा ,अपना देश

 



कह दो दुनियावालों से गांधी अंग्रेजी भूल चुका है ”... आजादी के बाद बीबीसी में दिए गए वक्तव्य में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा कहे ये शब्द आजादी के बाद गांधी जी के मानस पुत्रों ने विस्मृत कर दिए | गांधी जी के संदेशों को पूरे भारत में प्रचारित-प्रसारित किया गया लेकिन राष्ट्रपिता की हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने की इच्छा राजनीतिक गलियारों तक सीमित रह गयी | आजाद भारत में अपने ही लोगों में हिंदी भाषा गुलाम बनकर रह गयी | आजादी के बाद राजभाषा हिंदी के विकास के लिए और राष्ट्रभाषा बनाने के लिए जो प्रयास होने चाहिए थे वो प्रयास राजनीति की भेंट चढ़ गए ।



हिंदी हमारी अस्मिता की प्रतीक है | हिन्दी 150 वर्षों के औपनिवेशक शासन के विरोध में उदयमान भारत को स्वाधीनता दिलाने में अपना प्राणोत्सर्ग करने वाले उन करोड़ों व्यक्तित्वों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का माध्यम है जिन्होंने हिंदी को ही स्वाधीनता आन्दोलन की भाषा बनाया था | यह भी सत्य है कि हमारे दैनिक जीवन में अंग्रेजी पिछले दरवाजे से बहुत पहले ही घुसपैठ कर चुकी है | आज कई उदाहरण ऐसे देखे जा सकते हैं जहाँ समाज का एक तबका अंग्रेजी की इन्द्रधनुषीय सीढी इसलिए चढ़ता है कि उसको अंग्रेजी को अंगीकार करने में अपना सामाजिक स्टेटस बढता हुआ दिखाई देता है| यदि यह तबका हिंदी के महत्व को अपने स्टेटस से जोड़ने की कोशिश करे तो वह समझ जाएगा कि हिंदी भाषा एक पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है जिसमें जैसा उच्चारण है वैसा ही लिखा जाता है | ढाई से तीन लाख शब्दों के भण्डार को हिंदी भाषा अपने में समेटे हुए है | विश्वभाषा होते हुए भी आज हिंदी भाषा हीन भावना से ग्रसित है | आज विश्व के सभी देशों में हिंदी बोली जाती है | हिंदी में प्रकाशित होने वाली पत्र पत्रिकाओं की संख्या सर्वाधिक है | 


अंग्रेज कवि स्पेंडर ने कहा था– दुनिया की सबसे समृद्ध भाषा होते हुए भी भारत के लोग अंग्रेजी के पीछे क्यों पड़े हैं ? इसका एक जवाब था– रोजगार | भूमंडलीकरण के बाद हवाहवाई बातों का जो दौर चला उसमे एक प्रमुख हवाहवाई बात थी रोजगार के लिए अंग्रेजी की आवश्यकता और कहीं न कहीं इसके लिए पाश्चात्य देशों की वह सोच काम कर रही थी जिन्हें यहाँ आकर व्यापार करना था | उन्होंने अपनी सुविधानुसार देश की सोच को बदलने का प्रयास किया | भूमंडलीकरण के इतने साल बाद भी इस अंग्रेजी ने वास्तव में क्या हमको रोजगार दिया ? क्या किसान को मजदूर में तब्दील होने से रोक पाया ? क्या अंग्रेजी का वह स्तर वास्तव में हम पा पाए जिसके लिए हमने इतनी मेहनत की । हां यह जरूर है इसने इस देश के भीतर इंडिया और भारत दो वर्गों की स्थापना करने में जरूर योगदान दिया । देखिये, बात स्पष्ट है पूर्वाग्रह के आधार पर बातें करने का जमाना लद गया है और शायद भारत सरकार द्वारा प्रकाशित आर्थिक सर्वेक्षण भी इसकी ही एक बानगी प्रस्तुत करता है, इसमें उल्लेखित है कि वर्तमान भारत को दो भागों में देखा जा सकता है | प्रथम ऐसे राज्य जहाँ विकास का उच्च स्तर प्राप्त किया जा चूका है लेकिन जहाँ युवा जनसंख्या तेजी से कम हो रही है | इन राज्यों में तमिलनाडु,कर्नाटक,बंगाल आदि शामिल हैं | वहीँ दूसरे वो राज्य जहाँ विकास का अभी पदार्पण हुआ है और जहाँ की अधिकाँश जनसँख्या युवा है | यह हिंदी के लिए एक अच्छा संकेत है क्योंकि हिंदी भाषी राज्य दूसरी श्रेणी में आते हैं | 


आज भारत में आने वाला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रायः दक्कन क्षेत्र तक प्राथमिकता पाता है | ऐसे में बदलते भारत के तस्वीर हिंदी भाषी राज्यों पर निर्भर करेगी, इसमें कोई दो मत नहीं | ध्यातव्य है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का नाममात्र इन हिंदी भाषी राज्यों में आता है लेकिन जिस तरह की जनसांख्यकी लाभ इन राज्यों को भविष्य में मिलने वाला है ऐसे में हिंदी भाषा को व्यापार की भाषा के रूप में अपनाकर ये राज्य समावेशी विकास की अवधारणा में खरे उतर सकते हैं | 


अगर हम विदेश की भाषा अंग्रेजी से इतने प्रेरित है, तो क्यों हम चीन, जापान जैसे विकसित और अत्यंत संपन्न देशों से प्रेरणा नहीं लेते हैं? जहाँ लोग केवल और केवल अपनी भाषा में बात करते हैं, कार्य करते हैं जरूरत पड़ने पर अनुवादकों का उपयोग करते हैं और किसी भी मामले में किसी अन्य देश से अपने आपको पिछड़ा महसूस नहीं करते| इन देशों में ना केवल लोग बल्कि इनके जन प्रतिनिधि भी विश्व के किसी भी मंच से अपनी भाषा में ही बात करते हैं तथा अन्य देशों से संवाद करते हैं| अन्य देशों से चीन, जापान में जाकर रोजगार पाने वाले लोगों के लिए इन देशों की भाषा सीखना अनिवार्य होता है, क्यूंकि वे लोग अंगेजी को बैसाखी बनाकर नहीं जी रहे हैं| जिसे इन देशों से व्यापार, व्यवसाय या अन्य सम्बन्ध रखने हों, वो स्वयं द्विभाषक व्यक्तियों या अन्य यंत्रों के माध्यम से इनकी भाषा समझकर अपना अर्थ सिद्ध करते हैं| आज भारत विश्व पटल पर निवेश और व्यापार के प्रयोजन से अत्यंत महत्वपूर्ण देश बन चुका है| गुणवत्ता, मूल्य, और उपलब्धता का संगम जब हिंदी भाषा के साथ होगा और यदि हम भी यही सोच और नीति अपनाएंगे तो हम ना केवल अपने देश बल्कि अन्य देशों के लोगों को भी हिन्दी सीखने, समझने के लिए बाध्य कर सकते हैं|


यदि अभी से विधि सम्बन्धी दस्तावेजों, पाठ्य पुस्तकों,तकनीकी पुस्तकों, विज्ञान की पुस्तकों के अनुवाद से लेकर पुस्तकों की उपलब्धता की तरफ प्रयास करें तो आने वाले 5-10 वर्षों में हम उस स्थिति में पहुंच पाएंगे जहां व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता अनुसार कम से कम अध्ययन की सुविधा हेतु स्वतंत्त्रापूर्वक भाषा का चयन कर सकेगा । विगत वर्षों में तकनीकी शिक्षा,अभियांत्रिकी शिक्षा को भी हिंदी में प्रदान करने के उद्देश्य से अखिल भारत स्तर पर कुछ अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) महाविद्यालयों में हिंदी माध्यम में पढ़ाई करवाने की प्रशंसनीय पहल की जा रही है । हमें सम्मिलित रूप से यह प्रयास करने चाहिए कि देश की विभिन्न भाषाओं को हम रोजगार की भाषा बना पाएं और अनुवादकों के लिए भी उस जगह का सृजन करें जो जगह आज विकसित देशों में, स्वाभिमानी देशों में देखने को मिलती हैं ।


भारत की विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के समृद्ध साहित्य, समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए हिंदी भाषा एक कड़ी का काम कर सकती है । संगम साहित्य से लेकर असम के संत शंकरदेव वाणी को सामने लाने में हिंदी भाषा महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है और इस हेतु हमें प्रयासरत भी होना चाहिए तभी अपनी भाषा- अपना देश के सिद्धांत को हम वास्तविकता में अनुभव करने में सक्षम होंगे ।


लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।

सोमवार, 12 सितंबर 2022

इफ यू कांट कन्वींस दैन कन्फ्यूज्

 

जय प्रकाश पांडेय 




अवार्ड वापसी गैंग, मॉब लिंचिंग,कलबुर्गी सरीखे विद्वानों की हत्या, गोकशी, नागरिकता अधिनियम, धारा 370 , रोहिंग्या विवाद और कृषि विधेयक इन सभी घटनाओं के आलोक में वर्ष 2014 से अभी तक के भारत को देखेंगे तो हम पाएंगे देश में संसद को छोड़कर हर जगह जनता को बरगलाने का, असमंजस में डालने का माहौल तैयार किया जा रहा है । संसद में विपक्ष के पास यह स्थिति पैदा करने के लिए जनादेश नहीं है और स्वस्थ विमर्श तो विपक्ष की सोच से भी परे है। ऐसे में माहौल के निर्माणकर्ताओं का चरित्र और व्यक्तित्व दोनों धीरे धीरे बाहर आ रहा है । गत दिनों पूर्व हुई कुछ गिरफ्तारियों को भी इन अफवाहों के सृजनकर्ता की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है । ऐसे माहौल के सृजनकर्ताओं ने मानों मन में ठाना है कि इफ यू कांट कन्वींस दैन कन्फ्यूज् ( यदि आप भरोसे में नही ले सकते तो असमंजस में डाल दें) और देश के नागरिक अपने जीवन की आपाधापी के बाद इन्हीं विषयों में विमर्श में लगे हैं जबकि यह ऐसा दशक होने जा रहा है जो भारत के गौरवमयी इतिहास और स्वर्णिम भविष्य को विश्वमंच में स्थापित करता दिख रहा है । खाली खजानों के बाद भी देश में हो रहे अनगिनत विकास के कार्यों को प्रिंट मीडिया और सोशल साइट्स में विरले ही जगह मिली है । मिर्च मसालेदार आधे अधूरे तथ्यों को ही खबर बनाने की होड़ ने भारत को नुकसान पहुंचाया है जिस पर विवेचना अत्यंत आवश्यक है। 


 वर्ष 2014 के बाद विभिन्न राष्ट्रीय पुरस्कारों से लेकर प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कारों में समाज के आखिरी छोर में खड़े निस्वार्थ , कर्तव्यबद्धता से कार्य करते अनसुने नाम,अनदेखे चेहरों जैसी पहचान इन विगत 8 वर्षों में दी गई क्या वह आजाद भारत के नागरिकों को कभी इतने व्यापक ढंग से मिली थी ? क्या अंत्योदय की अवधारणा का जो जमीनी खाका वर्तमान सरकार ने प्रस्तुत किया वह इससे पहले कभी हुआ था ?


 वर्ष 2014 के बाद देश के शीर्ष नेतृत्व ने निर्णयों को मजबूती और दृढ़ता से लेने का जो क्रम विकसित किया , उसकी उपस्थिति का एहसास भारतवासियों ने ही नहीं बल्कि विदेशों के जनसमुदाय ने भी किया है । आज भारत ने विश्व के अन्य प्रमुख देशों के सामने भी खुद को सशक्तता के साथ स्थापित किया है लेकिन राजनीतिक अखाड़े ने भारत में आए बदलाव पर विमर्शों को मौन कर दिया क्योंकि भले ही सरकार भारतीय जनता पार्टी की हो अभी भी ऐसी कई दीमकें प्रणाली में विद्यमान हैं जो प्रजातंत्र की सफलता में बाधक हैं। ये वहीं दीमकें हैं जिन्होंने न समय पर आतंकवाद के निस्तारण के लिए प्रायोगिक योजनाएं बनाई न ही समय से प्रतियोगी परीक्षाएं करवाई । न ही जहां प्रतियोगी परीक्षाएं करवाई वहां पर्चे लीक होने की संभावना रखी । न ही पूर्वोत्तर में विकास का कार्य किया न ही लक्षद्वीप में पर्यटन संभावनाओं को खोज । कोशिशें अब ऐसे दीमकों से बचने की होने चाहिए 


भारत का लोकतंत्र अंतिम छोर में विकास और उत्थान के लिए संकल्पित जीवन अर्पण करने वाले व्यक्तियों को राष्ट्रपति के रूप में स्थापित करते हुए आगे बढ़ रहा है ।  


मुझे अच्छे से याद है वर्ष 2014 के जनवरी के ठंड के दिन थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट्स फैकल्टी में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के नीचे खड़े होकर प्राध्यापक, रिसर्च स्कॉलर, भविष्य के अस्थाई सहायक प्राध्यापक नरेंद्र दामोदरदास मोदी नामक शख्स को गुजरात नरसंहार का करता घोषित कर रहे थे । इस बात से बेखबर की प्रोपेगेंडा की ताबूत में अंतिम कील ठोकने यही नरेंद्र दामोदरदास मोदी आ रहा है जिसे पूरे भारतीय जनमानस ने अपना सर्वाधिक लोकप्रिय नेता चुनकर 2014 में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित किया न सिर्फ स्थापित किया बल्कि उसके कार्यों और संकल्पों को दृष्टिगत करते हुए 2019 में पुनः जनादेश दिया । मानवतावाद के छद्म प्रहरीयों द्वारा मानवता के आलोक में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री न बनाए जाने देने की अपील बस भीड़ की अपील बन गई । 


आदरणीय नरेंद्र मोदी ही नहीं,अमित शाह, योगी आदित्यनाथ तथा अन्य राष्ट्रवादी नेताओं की छवि को धूमिल करने का सुनियोजित प्रयास किया गया। इस प्रयास में सूचना के सभी तंत्र संलग्न रहे । यह पूरी प्रक्रिया पूर्व निर्धारित योजना से चलती । पहले मानव हत्यारे,और मानवीय संवेदनाओं को स्पर्श करने वाले नाम घोषित किये जाते और फिर पूरे देश में नकारात्मकता का और डर का माहौल तैयार किया जाता । इन बातों को भोले भाले आम लोग और छात्र सच मानते । उनके परम आदरणीयों द्वारा जो हाथों में तख्ती लेकर यह प्रोपोगैंडा चलाया गया । दिल्ली विश्वविद्यालय में एनडीटीएफ ( दक्षिणपंथी ) के अग्रिम पंक्तियों के प्राध्यापकों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर प्राध्यापक भी अपनी विचारधारा अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त नहीं कर सकते थे ,मजबूरी थी 12 सालों से शोषणकारी तंत्र का भाग जो बन गए थे । मजबूरी थी और मजबूरी तो क्या-क्या करा देती है फिर यह तो स्थाई नौकरी से जुड़ा मसला था। लेकिन एनडीटीएफ के अग्रिम पंक्ति के उपरोक्त प्राध्यापकों ने जरूर एक स्वस्थ विमर्श को आकार दिया और ऐसे में स्वामी विवेकानंद की स्मारक के नीचे उपरोक्त जमावड़े के समानांतर ही नारों और विरोधों की आवाजें बुलंद होने लगी जो विकास के विजन पर बात कर रही थी । 


गुजरता दंगों का जिक्र होना और गोधरा ट्रेन को विषय से ही हटा देना , गुजरात की समृद्धता के ऐतिहासिक आधार खोजना और तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने की कोशिशों को ऐसे नारों और विमर्शों से कुछ विराम मिला । ठंड के उन दिनों में कुछेक लोग इन तथाकथिक समाज सुधारकों से प्रश्न पूछने का साहस भी करते थे यह वो लोग थे जो जानते थे कि तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर विचारधाराओं को कुचलने और निरीह जनता को भ्रामक स्थिति में डालने के लिए यह सब किया जा रहा है । वैसे भी अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद यह निरीह वर्ग भी अनजाने में ही राजनीतिक विचारों का वाहक बन गया था । सॉफ्ट टारगेट की इस नीति को कमोबेश पूरे भारत में पैदा करने का प्रयत्न किया गया लेकिन पूर्ववर्ती सत्ताधारी कांग्रेस को पता था उनका जमीनी आधार कुछ नहीं रहा है और युवाओं के अंदर एक नये शख्स का नाम घर कर चुका है और वह है नरेंद्र मोदी । इन युवाओं की चर्चा के केंद्र में गुजरात मॉडल, कॉमनवेल्थ घोटाले कॉल घोटाला,कश्मीर से आतंकवाद और विकास मुख्य विषय थे।  

 

वर्ष 2014 से अभी तक राष्ट्रीय नीतियों के मामलों पर विपक्ष को आप दुष्प्रचार में ज्यादा लगा हुआ पाते हैं । इसी दुष्प्रचार के तहत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रति वैचारिक वैमनस्य के बीज आम छात्रों के बीच भरने भरने शुरू हुए । मसलन बंगाल हिंसा और केरल में स्वयंसेवकों की हत्या करने वाली सरकारों के हिमायती और अवसरों पर अपनी सुविधा से मुंह खोलने वाले प्राध्यापकों,लेखकों और बुद्धिजीवीयों द्वारा आजादी के आंदोलन और अतिवादियों के साथ संघ के तार जोड़ने की कोशिश हुई । सब बिना तथ्यों,और प्रमाणों के । संघ के विचारों को मनमाफिक इन मीडिया चैनलों ने परोसा और एक बड़ा वर्ग इस साजिश को समझ नहीं पाया । इसी वैचारिक अधीनता के साथ विश्विद्यालय में शिक्षा का प्रचार प्रसार होता था । 



मीडिया चैनलों, पत्र पत्रिकाओं में चयनित आधार पर पत्रकारिता का कार्य होता रहा और तमाम विषयों को छोड़ दिया जाता जो अन्य राज्यों में हो रही हों फिर चाहे वह केरल में बेरहमी से मारे जा रहे स्वयंसेवकों के संबंध में हो या गुड़गांव , मुंबई में लाउडस्पीकरों के संबंध में या मॉब लांचिंग ,या फिर बंगाल,यूपी या दिल्ली दंगों में हुई हिंसा। 


देश के गृह मंत्री श्री अमित शाह भी इससे अछूते नहीं रहे । उनके लिए तो आम जनता के सम्मुख नकारात्मकता का वह अंबार लगाया गया जो तब ध्वस्त हुआ जब गृहमंत्री ने वर्ष 2017 में संसद में अपनी बातों को रखना शुरू किया । जिस तार्किकता और दृढ़ता से राष्ट्रीय महत्व के सभी विषयों पर उन्होंने स्टैंड लिया है वह काबिले तारीफ है । योगी आदित्यनाथ के संदर्भ में भी ऐसे दुष्प्रचारों को जो हवा दी गई वह भी तब स्पष्ट हुई जब स्वयं गोरखधाम के मुस्लिम समुदाय ने योगी आदित्यनाथ के समर्थन में वास्तविक तथ्यों को रखना शुरू किया ।


इस तरह दुस्प्रचारों के दौर से निकलकर, अफवाहों के बाजार से हम धीरे धीरे बाहर आ रहे हैं लेकिन सिस्टम को खोखला बनाने वाली दीमकों का चिन्हीकरण आवश्यक है । वर्ष 2014 से अभी तक के भारत के स्वर्णमयी यात्रा को प्रत्येक नागरिक ने अपने स्वतंत्र इंद्रियों से ग्रहण करना होगा। कश्मीर समस्या हल, नागरिकता अधिनियम,नोटबंदी,जीएसटी,आतंक निरोधी अधिनियम,और असामाजिक तत्वों से निपटान करती यह सरकार दृढ़ता के उस स्तर को दिखाती है जो लोकतंत्र का आधार है । जनतंत्र में सामाजिक जागरूकता लाना भी आदर्श नागरिक का कर्तव्य है और ऐसी सामाजिक जागरूकता राजनैतिक जागरूकता का मार्ग प्रशस्त करेगी वो दिन दूर नहीं ।


जय प्रकाश , सामाजिक कार्यकर्ता,और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं । वर्तमान में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं । इससे पूर्व बैंक अधिकारी एवं पूर्व महासचिव, किरोड़ीमल महाविद्यालय -दिल्ली विश्वविद्यालय रहे हैं ।

अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

  युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र   की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है   । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोल...