भारतीय इतिहास की तथाकथित मानक पुस्तकों में , शिक्षा की नीतियों में और पाठ्यक्रम निर्धारण में राष्ट्रवादी इतिहासकारों को एक लंबे समय तक जगह नहीं दी गई और यही कारण रहा कि हमारे अतीत के तारों को औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था की पाठ्य पुस्तकों, मार्क्सवादी इतिहासकारों के इतिहास लेखन और सत्ताधारियों के कृपापात्रों द्वारा आकार दिया गया । यह इस देश का दुर्भाग्य है कि उपरोक्त मानसिकता से ग्रसित लोगों ने भारत की न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया बल्कि एक ऐसी व्यवस्था को भी जन्म दिया जहां हम अपने अतीत की विरासत को भुला बैठे । जहां हम अपने आदर्श व प्रेरणादायी व्यक्तित्वों को भुला बैठे । हमने नि:संदेह कुछ प्रेरक व्यक्तित्वों को पढ़ा जरूर परंतु ऐसे व्यक्तित्वों की एक लंबी फेहरिस्त अभी भी शोध का विषय है ।
एकात्म मानवतावाद के प्रवर्तक पंडित दीनदयाल उपाध्याय भी ऐसे ही व्यक्तित्वों के केंद्र बिंदु हैं जिनके विचारों,लेखन,विकास के मॉडलों और यहां तक की राजनैतिक, व्यक्तिगत जीवन के संघर्षों पर चर्चा तक नहीं हुईं । एक लेखक, एक राजनीतिज्ञ,एक पत्रकार, एक दार्शनिक और स्वयंसेवक दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म आश्विन कृष्णा त्रयोदशी संवत् 1973 विक्रमी तदानुसार दिनांक 25 सितंबर 1916 को बृजभूमी पर उत्तर भारतीय निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था । मैट्रिक और इंटर कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण करने के बाद बीए और प्रशासनिक सेवा में चयनित मेधावी दीना ( बचपन का नाम ) 1937 में संघ को समर्पित हो गए। 1967 में कालीकट अधिवेशन में उपाध्याय जी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। मात्र 43 दिन के जनसंघ के अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान ही 10-11 फरवरी, 1968 की रात्रि में मुगलसराय स्टेशन पर उनकी हत्या कर दी गई।
जिस भारत के सपने को मन मस्तिष्क में बैठाकर स्वाधीनता का संग्राम लड़ा गया, वह भारत आजादी के बाद भारतीय चिंतन धारा,भारतीय संस्कृति से विलग पाश्चात्य का अनुगामी बनता जा रहा था । भारत इंडिया बनने की कोशिश में था जिससे भारतीयता के विषय में सोच शिथिल होने लगी । देश के कानून और प्रशासन की आधारशिला औपनिवेशिक ढर्रे पर स्थापित कर भारत को इंडिया से विस्थापित करने के मॉडल का समर्थन पंडित जी ने कभी नहीं किया । ऐसे में दीनदयाल जी के विचारों ने भारतीय संस्कृति, भारतीय शिक्षा और आर्थिक व्यवस्था, राष्ट्रीय अखंडता , राष्ट्रीय भाषा आदि मौलिक विचारों के साथ-साथ मानवीय गरिमा , मानवीय मूल्यों और अंत्योदय जैसी संकल्पनाएं प्रदान की । पंडित जी द्वारा पाञ्चजन्य पत्रिका में प्रकाशित विभिन्न लेखों, उनकी विभिन्न सभाओं , संघ के कार्यक्रमों ,उनके लिखित साहित्य और अपने लोगों को लिखे गए पत्रों में विस्तार से उनके दर्शन के उस चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर सकते हैं जिसकी कड़ियां सांख्य दर्शन से होकर व्यक्ति के निजी जीवन तक जुड़ती हैं ।
आर्थिक विपन्नता से प्रताड़ित जन के लिए समुचित रूप से भोजन,पानी,आवास,शिक्षा उपलब्ध कराना अंत्योदय है। इस अंत्योदय के विकास के केंद्र में मानव और उसमें भी अंतिम पंक्ति में खड़े मानव की प्रसन्नता है। परिवार, समाज,जाति ,राष्ट्र ,विश्व और ब्रह्मांड, सब के सब मानव से जुड़ी इकाइयां हैं जो चार स्तंभों पर टिकी है- शरीर,मन,बुद्धि व आत्मा। इनमें से किसी एक की भी अवहेलना शेष तीनों को निष्फल कर देती हैं।अतः किसी भी देश का विकास मॉडल व्यक्ति केंद्रित होना चाहिए। अंत्योदय इस एकात्म मानव दर्शन की व्यावहारिक परिणीति का जरिया है।एकात्म मानव-दर्शन राष्ट्रत्व के दो पारिभाषित लक्षणों को पुनर्जीवित करता है जिन्हें ''चिति '' (राष्ट्र की आत्मा) और ''विराट'' (वह शक्ति जो राष्ट्र को ऊर्जा प्रदान करता है) कहते हैं।
राष्ट्रीय संविधान के निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत दुरूह और विस्तार को धारण किए हुए थी । संविधान के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए भी दीनदयाल उपाध्याय जी ने संघात्मक संविधान, लोक- कल्याणकारी राज्य विषयक प्रावधानों एवम स्थानीय स्वशासन आदि विषयों पर खुलकर आलोचना की और न सिर्फ आलोचना की बल्कि उनके समाधान भी प्रदान किए ।
कश्मीर के तत्कालीन हालातों और शेख अब्दुल्ला की पूर्व मंशाओं को भांपकर सरकार को चेताते हुए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी विभिन्न पत्रों , संपर्कों द्वारा सतर्क करने की कोशिश उपाध्याय जी द्वारा की गई किंतु उनकी बातों पर गौर नहीं किया गया । वस्तुतः वर्तमान सरकार द्वारा धारा 370 को हटाकर कश्मीर समस्या का जो हल निकाला गया है उसकी आधारभूमि दीनदयाल उपाध्याय जी ने ही शुरू की थी ।
विभाजन की विभीषिका पर भी दीनदयाल उपाध्याय जी के अंतरमन ने रुदन किया है । एक कार्यक्रम में उन्होंने विचार प्रकट किए कि -
"दिल्ली में हमारे नेता कुमकुम तिलक लगा रहे थे जबकि पंजाब में हमारी माता और बहनों की मांग का सिंदूर पुछ रहा था …वंदे मातरम का जयघोष करके हम माता के वे हाथ काट चुके थे जिनसे वह हमें आशीर्वाद देती। दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा फैलाकर स्वतंत्रता की घोषणा की गई किंतु रावी के जिस तट पर स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा दोहराई गई थी वह हमसे छिन चुका था । "
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने जिस अंत्योदय की अवधारणा को कार्यरूप प्रदान किया; वर्तमान सरकार ने लोकतंत्र के अंतिम पायदान में खड़े निस्वार्थ भाव से सेवारथ नागरिकों को नागरिक सम्मान देकर उसी अंत्योदय को आगे बढ़ाया है । दीनदयाल जी के अंत्योदय की ही प्रेरणा वर्तमान सरकार की पहल जैसी योजनाएं हैं । न सिर्फ वर्तमान सरकार ने बल्कि पूर्व में भी दीनदयाल जी के इस अंत्योदय से प्रभावित विभिन्न योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन को हम पाते हैं । ‘भारत विकास की यात्रा ग्रामों से शुरू हो’ कि अवधारणा को ग्रामीण आजीविका मिशन, प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना आदि जैसी योजनाओं द्वारा आज सफलतापूर्वक क्रियान्वित किया जा रहा है ।
योजनाओं के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियां भी है उससे इंकार नहीं किया जा सकता । उन चुनौतियों पर चर्चा होनी आवश्यक हैं और उससे भी आवश्यक समाधान पर चर्चा। पंडित दीन दयाल जी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनसंघ के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए संघ के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में अपने विभिन्न विचारों को रखा । इन सभाओं में देश की विभिन्न समस्याओं पर समाधान की श्रृंखलाबद्ध कड़ियों को हम देख सकते हैं । पांचजन्य और युगदेश पत्रिका के तत्कालीन अंकों में इनके विचारों को देखा जा सकता है ।
स्वाधीनता संग्राम में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर चुके अगणित अनजान वीरों के नामों तक आम जनमानस की पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से आजादी के अमृत महोत्सव की पूर्वपीठिका वर्तमान सरकार द्वारा रची गई है ।
दीन दयाल जी के जन्मदिवस पर हम संकल्पित हो कि पंडित जी के साथ न्याय कर सकें, उन परिस्थितियों को, दबे संकेतों को सामने ला पाएं , उन स्वतंत्रता सेनानियों को सामान्य जन के बीच ला पाएं जो गुमनाम रह गए और ऐसे व्यक्तित्वों के दर्शन,लेखनी और राजनीति के आदर्शों पर हम कायम रह सकें । हम संकल्पित हों कि सम्मिलित प्रयासों से देश के इतिहास, पाठ्य पुस्तकों और सांस्कृतिक मंचों में उन व्यक्तित्वों को भी स्थान दे पाएं जिन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए जीवन लगा दिया है ताकि भारत का भविष्य अपने इतिहास के गौरवपूर्ण व्यक्तित्वों से प्रेरणा ग्रहण कर सकें ।
लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।