राष्ट्र के विकास में सत्यमेव जयते और श्रमेव जयते दोनों का होना आवश्यक है। दिवस विशेष आधारित चिंतन पद्धतियों की परंपरा भारत की संस्कृति का हिस्सा नहीं है । यही कारण है कि वर्तमान संदर्भों के अनेक आंदोलनों जैसे नारीवादी आंदोलनों,श्रमिक आंदोलनों,आदि के जनक के रूप में सर्वमान्य पश्चिमी देशों से ज्यादा व्यापक , प्रभावी कदम भारतीयता का हिस्सा रहे हैं । यह अलग बात है कि इस तरफ सार्थक और तथ्यात्मक संवाद कम हुए हैं ।
भारत में “कर्मिका दिनचारणे”, कर्मिका दिनोत्सवम, “उझाईपलार दिनम” और “थोझीलाली दिनम” के रूप में जाने जाने वाले “अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस”,की जड़ें वर्ष 1886 में शिकागो के "हे-मार्केट "दंगों से जुड़ी हैं। कार्य के घंटे पुनर्निर्धारण करने की मांग से शुरू यह संघर्ष पुलिस और श्रमिक प्रदर्शनकारियों के बीच हुए एक हिंसक टकराव में बदल गया जिसमें अनेक प्राण अपने हकों के लिए लड़ते हुए पुलिस की बेरहमी का शिकार हुए। इस घटना ने पूरे विश्व को, श्रमिकों के अधिकारों पर चिंतन के लिए बाध्य किया और विश्व के प्रत्येक देश ने खासकर औपनिवेशिक सत्ताओं से शासित राष्ट्रों ने तो और भी मुखरता से श्रमिकों के विषयों को उठाना शुरू किया । इस आंदोलन के तीन साल बाद 1889 में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन की बैठक हुई। जिसमें तय हुआ कि हर मजदूर से केवल दिन के 8 घंटे ही काम लिया जाएगा। इस सम्मेलन में ही 1 मई को मजदूर दिवस मनाने का प्रस्ताव भी रखा गया।
भारत के संदर्भ में देखे तो इस घटना से पूर्व ही श्रमिकों के हितार्थ कदम उठने शुरू हो चुके थे । समाज-सुधारक, शशिपद बनर्जी ने कलकत्ता में वर्ष 1870 में एक मजदूर क्लब स्थापित किया , और मजदूरों को शिक्षित करने के लिए वर्ष 1874 में ‘भारत श्रमजीवी’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया । मजदूर संघर्ष के इतिहास में वर्ष 1877 में नागपुर के एंप्रेस मिल्स में हुई हड़ताल का जिक्र प्रासंगिक है । यह भी एक सर्वविदित तथ्य है कि वर्ष 1882 और 1890 के बीच बंबई और मद्रास में लगभग 20 से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हड़तालें दर्ज की गई थीं।
वर्ष 1878 में सोराबजी शपूर्जी बंगाली ने मजदूरों को कार्य की बेहतर दशाएँ उपलब्ध कराने के लिए बंबई की विधान परिषद् में एक विधेयक रखने का प्रयास भी किया। यह ध्यातव्य है कि तब तक शिकागो की घटना नहीं हुई थी । वर्ष 1880 के दशक में द्वारकानाथ गांगुली ने चाय बागानों के दास-श्रमिकों जैसी दशाओं के विरुद्ध आंदोलन चलाया। बंबई में इसी नारायण मेघाजी लोखंडे, ने ‘दीनबंधु’ नामक एक अंग्रेजी-मराठी साप्ताहिक पत्रिका द्वारा वर्ष 1884 में श्रम के घंटों में कमी की माँग के लिए मजदूरों की सभाओं का आयोजन किया । भारत में यह सब उसी स्वाभाविक चिंतन प्रक्रिया का हिस्सा था जिसका अंतिम लक्ष्य अंत्योदय है ।
आजादी के आंदोलन में श्रमिक वर्गों का योगदान और श्रमिक संघों (ट्रेड यूनियन) की भूमिका जगजाहिर है। औपनिवेशिक शासन और विदेशी एवं भारतीय पूँजीपतियों के शोषण का सामना करते मजदूर वर्ग को आरंभ में नरमपंथी आंदोलनकारियों से भी सक्रिय सहयोग नहीं मिला। "देश के सारे प्रांतों में मजदूरों के सारे संगठनों के कार्यों को समन्वित करने और आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मसलों पर भारतीय मजदूर के हितों को प्रश्रय देने के लिए" वर्ष 1920 में बंबई में एन.एम. जोशी, लाला लाजपतराय, जोसेफ बप्तिस्ता और दीवान चमनलाल के प्रयास से ‘आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ (ए.आई.टी.यू.सी) की स्थापना भारतीय मजदूर संघ के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना थी । वस्तूतः इसके बाद ही विभिन्न श्रमिक संघों (ट्रेड यूनियनों) विभिन्न विचारधाराओं की पोषक बनकर सामने आई । स्वतंत्रता के बाद तो देश में श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले श्रमिक संघों में कई गुना वृद्धि हुई । मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले देश में इन संघों की बहुलता ने मज़दूर वर्ग को खंडित करने का ही ज्यादा कार्य किया । निजी स्वार्थों की बलिवेदी पर मज़दूर वर्ग के मुद्दे भेंट चढ़ गए।
आजाद भारत में आज भी लगभग 90 फीसदी मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं जिनको अभी भी सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं । इन्हीं को लक्षित करते हुए संगठित व असंगठित क्षेत्र में लगभग 50 करोड़ से ज्यादा श्रमिकों को प्रभावित करने वाले विभिन्न श्रम कानूनों को अब सिर्फ चार संहिताओं में समाहित कर सरल करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया गया है । इससे श्रमिकों को सम्मान, सुरक्षा और अच्छी सेहत प्राप्त होगी। वेतन संहिता, 2019, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता, 2020 के निर्माण के पीछे वर्ष 2002 में द्वितीय राष्ट्रीय श्रम आयोग रिपोर्ट की अनुशंसाएं भी है जिसमें विभिन्न कानूनों को 4 या 5 संहिताओं में बदलने की अनुशंसा की गई। उपरोक्त श्रम संहिताओं में वैधानिक न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिकों की स्वास्थ्य देखभाल के संदर्भ में प्रयास किए गए हैं । इन संहिताओं के सकारात्मक बिंदुओं की प्राप्ति आपको हर जगह हो सकती है लेकिन इनकी कुछ कमियों की तरफ इंगित करते हुए अनेक सामाजिक संगठनों,ट्रेड यूनियनों, और बुद्धिजीवी वर्ग के असंतोष वाले कुछ प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान देना अपरिहार्य है।
सबसे बड़ा असंतोष श्रमिक संघों (ट्रेड यूनियंस)द्वारा अपने बातों को प्रभावी ढंग से रखने और दबाव बनाने के लिए
प्रयुक्त हड़ताल की पद्धति से संबंधित है । नई संहिता में यह प्रावधान है कि ट्रेड यूनियन और दबाव समूहों को वैध हड़ताल के लिए न्यूनतम 60 दिनों की पूर्वसूचना देनी होगी जो इससे पहले 14 दिन निर्धारित थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह श्रमिक संघों की प्रचलित प्रभावी पद्धतियों पर प्रहार ही है। बदले नियमों के अनुसार श्रम कानूनों का अनुपालन करने के लिए ऐसे नियोक्ता, बाध्य होंगे जिनके यहां 300 या 300 से अधिक लोग कार्यरत है । पहले यह सीमा 100 थी । ऐसे में ऐसे संस्थान जहां कार्यरत लोगों की संख्या 100 से कम है वहां श्रम कानूनों का क्या होगा यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने है। नौकरी से अवसान के संदर्भ में भी अपीलीय ट्रिब्यूनल प्राधिकरण के अंतिम फैसले को नई नियमों के तहत केंद्र सरकार बदल सकती है । यह बदलाव एक तरह से शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत के विपक्ष में दिखता है ।
सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020, में सामाजिक सुरक्षा कोष का दायरा बढ़ाया गया है। सामाजिक सुरक्षा पात्रता के लिए ,सरकार, नियमों को व्यक्ति की आय और कार्यरत उद्योग के आकार के आधार पर निर्धारण करेगी, ऐसे में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है । संशोधित नियम, इस दृष्टि से सार्वजनिक सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम के विपक्ष में ही दिखता है । खानपान की व्यवस्था से लेकर सॉफ्टवेयर विकास तक, हर चीज में प्रति घंटा या अंशकालिक नौकरियों में लगे गिग श्रमिकों और व्यक्तियों या संगठनों को सीधे ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करके विशिष्ट सेवाएँ प्रदान करने वाले प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स जैसे उबेर ड्राइवर, ज़ोमैटो डिलीवरी एजेंट आदि को भी सामाजिक सुरक्षा कोष में शामिल तो किया गया है लेकिन किसको असंगठित क्षेत्र का, गिग या प्लेटफार्म क्षेत्र का माना जायेगा इन परिभाषाओ में अभी भी स्पष्टता की मांग है।
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति सहिंता विधेयक, 2020 यह नियमन करता है कि सुरक्षा के प्रावधान वहां लागू होंगे जहां न्यूनतम 20 लोग (विद्युत उपभोग) और 40 लोग ( गैर विद्युत उपभोग) कार्यरत हों । सुरक्षा एक ऐसा विषय है जिसका प्रभाव व्यापक और दूरगामी होता है । ऐसे में सुरक्षा स्वास्थ्य और कार्यरत दशाओं के भी प्रावधानो के क्रियान्वयन के लिए न्यूनतम अपेक्षित संख्या का दायरा होना भविष्य में चुनौती पेश कर सकता है ।
भारतीय संविधान के तहत श्रम विषय को समवर्ती सूची में रखा गया है और इसलिये केंद्र और राज्य दोनों सरकारें (केंद्र के लिये आरक्षित कुछ मामलों को छोड़कर) इस विषय पर विधि बना सकती हैं।एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड, आयुष्मान भारत, श्रमिक पोर्टल , आदि विभिन्न पहलें आज सक्रियता से कार्य कर रही हैं। अतः ऐसे में संहिताओं के ऐसे प्रसंग जिनपर विरोध है सार्थक संवादों का सृजन कर और राज्य सरकारों को प्रोत्साहित कर श्रम कानूनों के ध्येय को पाया जा सकता है।