बुधवार, 14 दिसंबर 2022

मानवाधिकार की चर्चाओं के बीच सैन्य बलों के मानवाधिकार

 

क्या आप को फिदायीन हमले में शहीद राजेंद्र सिंह का नाम याद है ? क्या आपको जुलाई 2018 में ही कश्मीर घाटी में छुट्टी पर घर गए 4 सुरक्षाकर्मियों की आतंकवादियों द्वारा कायरतापूर्ण हत्या याद है ?क्या आपको वर्ष 2017 में कश्मीर के सोपिया में लेफ्टिनेंट उमर फय्याज के विवाह समारोह से कत्लेआम का दृश्य याद है ? यदि आपका जवाब नकारात्मक में है तब फिर देश के सैनिकों के मानवाधिकारों पर हम सबको दृष्टि करने की आवश्यकता है ।

मानव अधिकार और सेना इन दोनों में संबंध स्थापित करने की यदि हम कोशिश करें तो हमको सेना के द्वारा मानवधिकार हनन की तमाम खबरें, एफआईआर के कलेवर में या केस के रूप में मिल जाते है वही शहीद राजेंद्र सिंह जैसे शख्स फिदायिनो के द्वारा मार दिया जाता है पर तमाम विमर्श मौन हो जाते है | और सेवा नियमावली से बंधे हमारे सैन्य बल अपने मानव अधिकारों को खोते नजर आते हैं ।

स्टोन पेल्टर्स के खिलाफ दर्ज मुकदमों का वापस लिया जाना देश के सैन्य बलों के ऊपर एक तमाचा होता है जो लोक लुभावन राजनीति को सैन्य बलों से ऊपर घोषित करता है । ऐसे कदम सैन्य बलों के मनोबल को तोड़ने का काम करते हैं । हाल ही में ब्रिटिश सेना द्वारा अपने सैनिकों को उनके कार्यरत क्षेत्र में भी मानवाधिकार प्रदत्त किए गए हैं । कॉम्बैट इम्यूनिटी का भी अधिकार ब्रिटिश संसद ने अपने सैन्य बलों को दिया है । चीन, इजरायल,आदि देशों ने अपने यहाँ सेनाओं में कार्यरत सैनिकों के मानवाधिकारों को समझते हुए पत्थर फेंकने वाले आम सिविलियन के खिलाफ फायर आर्म्स उपयोग करने की अनुशंसा की हैं ।

 संविधान का अनुच्छेद 33 मौलिक अधिकारों के अपवाद के रूप में दिखता है । अनुच्छेद 33 के तहत प्रदत्त अधिकारों का उल्लेख यहां महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी अनुच्छेद के कारण हमारे सैन्य बलों की आवाजें हम तक नहीं पहुंच पाती । अनुच्छेद 33 अपने आप में किसी भी अधिकार को समाप्त नहीं करता है; इसकी प्रयोज्यता संसदीय विधान पर निर्भर करती है। अनुच्छेद 33 संसद को यह अधिकार देता है कि वह सशस्त्र बलों , अर्ध-सैनिक बलों , पुलिस बलों, खुफिया एजेंसी एवं अन्य के मूल अधिकार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकें।ऐसा इसलिए ताकि उनके कर्तव्यों का उचित पालन और उनमें अनुशासन बना रहना सुनिश्चित रहे। इसी व्यवस्था का इस्तेमाल करते हुए संसद ने सैन्य अधिनियम 1950, नौसेना अधिनियम 1950, वायु सेना अधिनियम 1950, सीमा सुरक्षा बल अधिनियम आदि बनाए है।

इस बात पर कोई दो राय नहीं देश की संप्रभुता और सीमाओं की रक्षक सैन्य सेवाओं को अनुशासन और कार्यदक्ष होना चाहिए लेकिन हाल ही में तमाम केसों में तथा आर्म्ड फोर्सेज के ट्रिब्यूनलों से प्राप्त निर्णयों को देखकर यह कहा जा सकता है कि न्याय का सिद्धांत इन देश सेवा में लगे सैन्य बलों से अभी दूर है । हमारे पास कोई ऐसी प्रणाली नही है जिससे सैन्य बलों के अंदर असुरक्षा, हताशा और अस्तित्ववादी प्रवृति को पहचान कर उसे कम किया जा सके ।अतः ऐसे में आवश्यकता है ऐसे अधिकारों को प्रदत्त करने की जिनसे उनके अनुशासन में फर्क आए बिना उनके मानव अधिकार भी संरक्षित किए जा सके ।

एक सैनिक इस स्थिति से भलीभांति परिचित होता है कि देश की सुरक्षा के लिए सीमा पर आने वाले प्रत्येक गोली को उसने अपने सीने में लेके भी देश की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है लेकिन वह इस स्थिति से परिचित नहीं होता है कि वांछित उपकरणों, तकनीक आधारित युद्ध प्रणालियों के बिना युद्ध में उसे शहीदी हासिल हो सकती है । यह शहीदी केवल युद्ध में ही नहीं बल्कि स्टोन पेल्टर्स द्वारा, खराब जीपीएस आधारित उपकरणों और गैर बुलेटप्रूफ वर्दी एवम पथरीले पहाड़ी रास्तों में पुराने वाहनों से भी प्राप्त हो सकती है ।वह इस स्थिति से परिचित नहीं होता कि मैम साहबों के प्यारे टॉमी की मॉर्निंग वॉक भी उसे ड्यूटी के रूप में हासिल हो सकती है । और इस प्रकार की स्थितियों को मानवाधिकारों के आलोक में देखने से एक नए विमर्श की तरफ हम लोग आगे बढ़ सकते हैं इसमें दो राय नहीं ।

भारत में यह भी देखने को मिलता है कि देश की सम्प्रभुता के लिए खतरा बनते चरमपंथियों द्वारा स्थानीय नागरिको को बरगलाकर लालच देकर या मानसिक प्रताड़नाओं द्वारा हमारी सेनाओं पर प्रायोजित हमले कराये जाते हैं । कभी कभी यह हमले किसी आतंकवादी को बचाने के लिए ढाल का काम करते है तो कभी कभी यह हमले हमारे सैनिको को मौत के मुँह में धकेलते है । नक्सलबाड़ी क्षेत्रों में कई बार राज्य प्रशासन और केंद्रीय सेनाओं के ईगो,अधिकार क्षेत्र की लड़ाई में या तो हमारे जवान शहीद होते हैं या फिर इतने प्रयास से की गई रेकीयां असफल हो जाती हैं ऐसे में इन स्थितियों से यदि किसी सैनिक की शारीरिक,मानसिक,स्थिति प्रतिकूलित होती है तो उसे मानव अधिकारों के पैरोकार देख नहीं पाते । अर्धदली या सहायक वाली अवधारणा को भी इसी गरिमामय जीवन जीने के अधिकार के आलोक में हमें देखना होगा ताकि हम समझ पाएं कि मैम साहबों के लिए गाड़ी के दरवाजे खोलते और साहबों के कुत्तों को घुमाने ले जाते सैन्य बलों के गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार की किस प्रकार धज्जियां उड़ रही हैं।

वर्ष 2014 के बाद देश में जिस तरह सैन्य सेनाओं के आधुनिकीकरण की तरफ , सैन्य बलों के मानवाधिकारों की तरफ कदम बढ़े हैं वैसे में यह एक सुखद अनुभूति है कि ऊपर बताई गई काल्पनिक स्थितियों से वर्तमान में हमारा जूझना कम हुआ है वरना वर्ष 1962 से 2010 तक के भारत को हम सबने देखा है और जिया है । अत्याधुनिक हथियारों, नई तकनीकों और समुचित प्रशिक्षणों और संयुक्त अभ्यासों से विश्व की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में भारत ने भी अपना स्थान बनाया हैं।

विगत वर्षों में तीनों सेनाओं, खासकर थल सेना में आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। कुछ परेशान करने वाली घटनाएं भी हुई हैं जिनमें सैनिकों ने अपने अधिकारियों के खिलाफ शारीरिक बल का प्रयोग किया है या आदेशों का पालन करने से इनकार कर दिया है। कुछ घटनाओं में उन्होंने अपने अधिकारी के लिए “बैटमैन” या “अर्दली” की गरिमापूर्ण भूमिका में काम करने से इनकार कर दिया है। कुछ लोगों ने अपने वरिष्ठों और संगठन के खिलाफ अपनी राय और शिकायतों को प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया का फायदा उठाया है । यह प्रवृत्ति परेशान करने वाली है। स्थानांतरण, प्रोमोशन, पोस्टिंग आदि विषयों में भी पारदर्शिता की कमी देखी जा सकती है ।

 आज सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों में निहित अधिकारों से, जिसमें भारत एक पक्ष है,सैन्य बलों के सदस्यों को वंचित किया जा सकता है, भले ही उनके अनुशासन या कर्तव्य के प्रदर्शन पर कोई प्रभाव न पड़े और खासकर तब जब कोई प्रणाली ही न हो यह बताने के लिए कि अनुशासन और कर्तव्य पर प्रदर्शन पर प्रभाव कितना और कैसे पड़ेगा ।

पीपीएस बेदी मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के पच्चीस साल बाद, संसद ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण अधिनियम को पासकर सशस्त्र बल न्यायाधिकरण की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया । वर्ष 2009 में गठित यह ट्रिब्यूनल हालांकि अभी भी कई सुधारों के आग्रह के साथ कार्यरत है ।

वस्तुतः लोकतंत्र की अवधारणा संविधान से अपनी शक्ति को सृजित करती है । सैन्य बलों के सदस्यों के मानवाधिकार संबंधी मामलों पर तभी सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे जब देश की संसद में अनुच्छेद 33 के संबध में विस्तृत परिचर्चा हो और सेवा नियमावली के उन प्रावधानों को भी बदला जाए जो गरिमा पूर्ण जीवन जीने के अधिकार से वंचित करते हैं ।

लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।


रविवार, 27 नवंबर 2022

ग्रामीण भारत,और सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग

 

 

भारत के सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों का देश की आर्थिकी में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है । आजादी के पहले से लेकर, वर्ष 2008 की  आर्थिक मंदियों  के दौर से गुजरते हुए , नोटबंदी और कोरोना काल की स्थितियों में भी सरकारी तंत्र के समर्थन के साथ,भारत की जीडीपी में लगभग 30 प्रतिशत का योगदान देते इन उद्योगों ने  समय समय पर  भारत के जनमानस को आर्थिक उतार चढ़ावों की ऊष्मा को महसूस नहीं होने दिया है । आजादी के बाद एक बहुत लंबी बहसों का सिलसिला इन सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों के विकास और संरक्षण  के लिए चला लेकिन भारी उद्योगों को ही प्राथमिकता देने के विजन के साथ आगे बढ़ते भारत को यह समझने में बहुत देर लगी की भारत के ग्रामों से ही भारत का विकास संभव है और इन भारत के ग्रामों के विकास हेतु सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों के विषय में सोचा जाना आवश्यक है ।

 भारत के सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग भारत के बड़े उद्योगों के लिए आधारभूत इकाई का कार्य कर सकते हैं इस विषय पर सोच के साथ  नीतिगत योजना बनाने में हमें लंबा वक्त लग गया।  इस संदर्भ में विगत वर्षों से किए जा रहे प्रयासों और उनके अनुभवों पर चर्चा अत्यंत आवश्यक हो जाती है। विनिर्माण क्षेत्र के जीडीपी में 25 प्रतिशत योगदान के साथ पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को एमएसएमई क्षेत्र के विकास के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता।

 

पैकेज्ड खाद्य पदार्थ, फल,सब्जी उत्पादन,दुग्ध,मत्स्य उद्योग,मुर्गी पालन,पशुपालन, रेस्टोरेंट क्षेत्र और फर्नीचर,कॉस्मेटिक, सैलून, खादी,इलेक्ट्रॉनिक्स  आदि लगभग  6000 से अधिक उत्पाद एमएसएमई क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं । इस क्षेत्र का देश के निर्यात में लगभग  50 प्रतिशत और रोजगार प्रदान करने में 45 प्रतिशत योगदान है।  भारत की जीडीपी में लगभग 30 प्रतिशत का सहयोग यह क्षेत्र देता है । जर्मनी में देश की जीडीपी में यह क्षेत्र 55 प्रतिशत और चीन में 60 प्रतिशत योगदान देता है ।ऐसे में इस क्षेत्र की महत्ता और देश के लिए इस क्षेत्र की आवश्यकता को समझा जा सकता है।

 

 गत वर्ष के बजट सत्र में संसद में लिखित उत्तर में यह बताया गया है कि एमएसएमई क्षेत्र में 43,37,444 लोगों ने  वित्तीय वर्ष 2020 में  रोजगार प्राप्त किया है । वर्ष 2021 में रोजगार प्राप्त करने वालों की संख्या में 106 प्रतिशत की वृद्धि हुई और वर्ष 2021 में 89,53,149 लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ  हालंकि इस विषय में भी अलग अलग राय है कि थोक विक्रेताओं और फुटकर विक्रेताओं का भी सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग में समावेशन इन आंकड़ों में बढ़ोतरी का कारण है ।

 

 सिडबी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री सिवासुब्रमनियन रामन के अनुसार  वर्तमान में भारत में लगभग 90 लाख सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग कार्यरत हैं  जिसमें से केवल 15 लाख ही जीएसटी के अंतर्गत सम्मिलित हैं । शेष को भी संस्थागत रूप से वित्तीय एवं आधारभूत संरचना सहायता के लिए उद्यम पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करके उद्यम संख्या लेनी अनिवार्य है।  ऐसे में वित्तीय जागरूकता वह सशक्त माध्यम है जिससे इस ध्येय की प्राप्ति हो सकती है ।

 

सरकार द्वारा अन्य प्रयासों के अलावा सूक्ष्म,लघु और मध्यम व्यापार लोन हेतु वर्ष 2018 में 59 मिनट योजना शुरू की गई। जिसमें एमएसएमई क्षेत्र के  उद्योगों की स्थापना विषयक प्रस्तावों के लिए कोई  व्यक्ति एक करोड़ तक के ऋण को एक से दो सप्ताह में  प्राप्त कर सकते हैं  । कच्चे माल की उपलब्धता विदेशों से भी भलीभांति हों इस संदर्भ में वैश्विक स्तर पर प्रयास किए गए हैं ।एमएसएमई क्षेत्र मार्केट विकास कार्यक्रमों के तहत अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों, व्यापार मेलों और रोडशोज आदि के द्वारा संचालित एक इकोसिस्टम विकसित करने की कोशिश सरकार द्वारा की गई है।

मुद्रा लोन, स्वरोजगार क्रेडिट कार्ड, कृषि और हैंडीक्राफ्ट्स के क्षेत्र में नाबार्ड द्वारा प्रदान किए जा रहे समर्थन यकीन मानिए कम से कम मानसिक धरातल पर आपको  सक्रिय कर देने के लिए काफी हैं।

 

एमएसएमई भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ है।  विनिर्माण निष्पादन में लगभग 45 प्रतिशत का सहयोग देते इस क्षेत्र ने भारत में कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार प्रदान किए हैं। 59 मिनट लोन स्कीम के तहत अस्वीकृत ऋणों की संख्या स्वीकृत ऋणों से काफी ज्यादा है । भारत में किसी भी ऋण की सुविधा इतनी सरल है ही नहीं जितनी वह दिखाई देती है ऐसे में दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों का इन तमाम सरकारी प्रयासों से विलग हो जाना स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त एनपीए का दंश झेल रहे हमारे सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों के समक्ष भी ऋण आवंटन की व्यवहारिक समस्या है ऐसे में कैसे एमएसएमई क्षेत्र में सुधार किए जा सकते हैं यह प्रश्न हमारे सामने है।  जीएसटी के बाद उत्पन्न परिस्थितियों में हमारे इन उद्योगों के सामने विदेशों से सस्ते दाम में आयातित सामग्रियों ने भी चुनौतियां पेश की हैं।

 

 सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय की 2021-2022 रिपोर्ट में उल्लेखित आंकड़ों अनुसार भारत के कुल क्षेत्र के सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों में से लगभग 51 प्रतिशत इकाइयां ग्रामीण भारत में हैं लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि ग्रामीण और पहाड़ी अंचल का एमएसएमई   क्षेत्र  आज उत्पादन और सप्लाई चेन में अनियमितता , तकनीकी जागरूकता की कमी, प्रशिक्षण , औद्योगिक प्रशिक्षण और प्रबंधन की दक्षता में कमी से जूझ रहा है। वित्तीय समर्थन में कमी  और सीमित संसाधनों के बावजूद आज भी यह हमारी महत्वपूर्ण परिसंप्पतियां हैं जिनपर भारत का स्वर्णिम भविष्य निर्भर करेगा ।

 

पहाड़ी और ग्रामीण भारत में वित्तीय जागरूकता की कमी आज इस क्षेत्र के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती है । टियर 2 और टियर 3 शहरों में वित्तीय जागरूकता महज एक दो दिनों के प्रचार तक सीमित रह गई है।  वित्तीय जागरूकता न होने के कारण ग्रामीण भारत के व्यवसायियों द्वारा बहुत सीमित स्तर पर योजनाओं का लाभ उठाया जाता है । सीमित वित्तीय जानकारियों के अभाव ने भ्रष्टाचार को भी पनपने का मौका दिया है। जहां भी प्रदेश सरकारों ने वित्तीय जागरूकता को अपने राज्य में अच्छे से प्रसारित किया है वहां के सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग  क्षेत्र अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।   

आधारभूत संरचना और व्यवसाय के आरंभिक स्तर के लिए ऋण की व्यवस्था आज भी प्रमुख चुनौती है ।अभी भी ग्रामीण और पहाड़ी अंचल में सुगमता से ऋण उपलब्ध होना टेडी खीर है।  सरकार की विभिन्न नीतियों के क्रियान्वयन से कार्य बोझ तले दबे बैंक कर्मियों से ऐसे में मार्गदर्शन की उम्मीद शायद ही की जा सकती है ।

 

 बाधित विद्युत आपूर्ति, संग्रहण और वेयरहाउस सुविधाओं की कमी,परिवहन के साधनों की कमी और संचार के माध्यम और इंटरनेट की सीमित उपलब्धता ने पहाड़ी राज्यों और ग्रामीण भारत के एमएसएमई के सामने नई चुनौतियां पेश की हैं। सरकार की परिभाषा बदलने के बाद से बड़े उद्योगों से लगातार मिलती चुनतियों और मार्केट सेंटरों की अनुपलब्धता ने भी ग्रामीण भारत के और पहाड़ी अंचल के एमएसएमई क्षेत्र में कार्यरत लोगों को प्रभावित किया है। इस क्षेत्र के लिए  एक स्वतंत्र नियामक  और व्यापार करने में सुगमता आज  अपरिहार्य है। 

  आज हमें आवश्यकता है कि ग्रामीण भारत  और पहाड़ी अंचल के उद्यमी कृषि और कृषि से संबद्ध उद्योगों की तरफ भी कदम आगे बढ़ाए ऐसे में वित्तीय जागरूकता के अभियान को विकेंद्रीकृत करते हुए हमें अधिकाधिक प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है ।भारत का स्वर्णिम भविष्य भारत के गांवों में बसता है और सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग  क्षेत्र को यदि वांछित समर्थन हम दे पाएं तो भारत के   स्वर्णिम भविष्य का मार्ग प्रशस्त होगा इसमें कोई दो राय नहीं ।

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

बाड़ी मडुवा खायेंगे,उत्तराखंड बनाएंगे ।

 


देवभूमि उत्तराखंड , एक ऐसा प्रदेश जिसके निर्माण के पीछे के सपने को समझना चाहें तो हिमालय की गोद में बसे पहाड़ी राज्य की संकल्पना सामने आती है जिसके जन जंगल जमीन पर पहाड़ी समाज के लोगों का प्रभुत्व है लेकिन यह संकल्पना महज कोरी कल्पना रह गई है । देहरादून और पड़ोसी मैदानी इलाकों के साथ मिलाकर स्थापित यह पहाड़ी कम,ज्यादा शहरी राज्य आज पहाड़ी राज्य की संकल्पना की सिद्धि पर प्रश्न खड़ा जरूर करता हैं । पहाड़ी राज्य की इस कोरी कल्पना के लिए केंद्र में दशकों तक सत्ता में रही पार्टियां तो वहीं राजनैतिक प्रतिबद्धता की कमी से भरे हमारे जनप्रतिनिधि जिम्मेदार रहे। सन 1938 में श्रीनगर के विशेष अधिवेशन और सन 1938 में दिल्ली में ही श्रीदेवसुमन द्वारा गढ़देश सेवा संघ की स्थापना के साथ ही उत्तराखंड राज्य के पृथकता संबंधी विचारों को बल मिला। मुगलकालीन समय में मुगलाई संस्कृति से कोसों दूर रहने और स्थानीय शासकों के सानिध्य में आगे बढ़ने वाली उत्तराखंडी संस्कृति और पहाड़ी क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि के सपनों के साथ उत्तरप्रदेश से 9 नवंबर 2000 को यह राज्य एक लंबी लड़ाई और बलिदानों की लंबी श्रृंखलाओ के बाद अलग होता है।

आज हमारे साथ ही बने छत्तीसगढ़ और झारखंड दोनों से मजबूत स्थिति में हम हैं। खनिज प्रदेश होने के बाद भी इन दोनों प्रदेशों की प्रति व्यक्ति आय उत्तराखंड से कम है। सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स में भी उत्तराखंड आगे बढ़ रहा है।

ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स मामले में उतराखंड की रैंक लगातार सुधरी है । नीति आयोग के समावेशी विकास लक्ष्य इंडिया इंडेक्स में हमने शीर्षस्थ 5 में स्थान बनाया हैं ।

उत्तरप्रदेश से अलग होने के क्रम में वर्ष 2001- 2002 में लगभग 1061.03 करोड़ रुपए के शुद्ध ऋण से हम लोग दबे हुए थे । आज हमारी प्रति व्यक्ति आय एक लाख 96 हजार के आसपास हो चुकी है। आज हमारा सकल राज्य घरेलू उत्पाद वर्ष 2022 -2023 के लिए 2,76,677 करोड़ रूपये होने का अनुमान है। उद्योग सेक्टर के बाद सर्विस सेक्टर की तरफ से हमारी जीडीपी का सर्वाधिक हिस्सा आता है। यहां यह ध्यात्व्य तथ्य है कि महाराष्ट्र की जीडीपी में इंडस्ट्री या उद्योगों का योगदान महज 10 प्रतिशत है और कृषि का लगभग 51 प्रतिशत । इस तथ्य के आलोक में हमने अपनी कृषि आर्थिकी की ओर और मजबूत कदम बढ़ाने की आवश्यकता है । पड़ोसी राज्य हिमांचल के सार्वजनिक यातायात (ट्रांसपोर्ट) और लॉजिस्टिक्स मॉडल पर अध्ययन कर हमें भी कार्य करना चाहिए । हिमांचल सरकार ने अपने यहां पर्यटन के अलावा स्थानीय उत्पादों के उत्पादन,संग्रहण और मार्केट लिंकिंग और कृषि के सीमा विस्तार में वृद्धि सरीखी अभूतपूर्व पहले की हैं, उत्तराखंड के भी अनाज, दालें और स्थानीय उत्पाद जैसे मडुए, भट्ट, झंगौर, माल्टा, अखरोट, भांग के रेशे, नीबू,काला घी आदि को भी उद्यान विभागों की सक्रीयता से बढ़ाया जा सकता है । मोटे अनाज की जिस आवश्यकता को संयुक्त राष्ट्र आज घोषित कर रहा है, मडुए के रूप में विश्व को हम एक बड़ी सौगात दे सकते हैं। हिमाचल के राजनैतिक नेतृत्व ने संगठित होकर बंदरों,को जिस प्रकार वर्मन घोषित किया वैसे स्टैंड आज उत्तराखंडवासियों के लिए लेने की आवश्यकता है।

उत्तराखंड राज्य सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में पद संभालते ही लाचार व्यवस्था से वर्तमान मुख्यमंत्री को भी गुजरना पड़ा होगा इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती । कोरोना समय की त्रासदी से शुरू मुख्यमंत्री का सफर आज पेपर लीक प्रकरणों से उत्पन्न स्थितियों तक जा पहुचा है । इस दौर में अनेक सकारात्मक उपलब्धियां भी हमें प्राप्त हुई हैं लेकिन लीक प्रकरणों ने अतीत की अनियमितताओं को तो दिखाया ही है साथ ही इस और भी इशारा किया है कि न जाने कितने ऐसे कृत्य सत्ता के गढ़जोड़ के साथ नाक के नीचे से किए जाते हैं। इन्हीं सबके बीच विधानसभा सचिवालय की समूह नियुक्तियों में बैकडोर एंट्री से संबंधित मामलों से आज का उत्तराखंड जूझ रहा है ।

 नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन और समान नागरिक संहिता की दिशा में पूरे भारत में प्रथम राज्य के रूप में स्थापित होकर तो वहीं हिंदी माध्यम से इंजिनियरिंग करने और अब चिकित्सा क्षेत्र में भी हिंदी माध्यम को बढ़ावा देने वाली पहलों से चर्चा का केंद्र बने उत्तराखंड राज्य के कदम स्वागत योग्य हैं, लेकिन जरूरत इस बात की भी है कि वर्तमान इंजीनियरिंग कॉलेज और मेडिकल कॉलेजों की अन्य आधरभूत अवसंरचना का भी विकास करें । स्टार्टअप और स्टैंड अप इकोसिस्टम के लिए जरूरी है द्वाराहाट,पौड़ी,पंतनगर,रुड़की और अन्य इंजीनियरिंग कॉलेज तक में अवसंरचनात्मक विकास की । जरूरी यह भी है सीमांत क्षेत्रों में खोलें गए इंजीनियरिंग कॉलेजों की वैधता पर स्पष्टता हो ।

अभी भी मुख्यमंत्री स्व-रोजगार योजना के क्रियान्वयन में राष्ट्रीयकृत बैंकों की संदिग्ध भूमिका आम जनमानस को परेशान किए हुए है । जिला स्तर के सर्वोच्च अधिकारी द्वारा चयनित अभ्यर्थियों को भी ऋण उपलब्ध नहीं हो पाना इस ध्येय की प्राप्ति में आने वाली क्रियान्वयन संबंधी बाधाएं हैं । अभी भी पहाड़ी अंचल गुलदारों के आतंक से जूझ रहा है जहां अनुदानों से प्राप्त सोलर लाइटें चोरी हुई बैटरीयों की राह तकती हैं। अभी भी प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के दायरे से बाहर रह गए कई गांवों को सड़क से जोड़े जाना आवश्यक है ताकि नवजात बच्चे को जन्म देते हुए किसी प्रसूता की जिंदगी न जाए।

 आज मेडिकल सीट्स वृद्धि के लिए और मेडिकल सीट्स में डोमिसाइल की परिभाषा में राज्य के निवासियों को प्राथमिकता दिए जाने वाले पक्ष तो वहीं हवाई सेवा के लिए संयुक्त आवाजों के भी स्वर अब सांस्कृतिक उत्सवों की थाप में धीमे हो चुके हैं । मुक्त विश्वविद्यालयों के परिणाम आज समय पर नहीं आ रहे और बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में अर्हता न होने से बाहर होते जा रहे हैं । प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रदेश के युवाओं को अग्निवीर योजना से एक बहुत बड़ा झटका महसूस हुआ है, रही सही कसर प्रदेश सरकार के खाली होते खज़ानों और हाल ही में प्रकाशित जिसमें उत्तराखंड को सबसे अंतिम पायदान पर रखा गया है ।

दरअसल उत्तराखंड की मूल लड़ाई पहाड़ी राज्यों के अस्तित्व की है । यह लड़ाई औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ सक्रियता से लड़ने वाले और आजादी के बाद मुख्यधारा से विलग चारे के लिए खाइयों से जूझती और शराबबंदी के लिए मुखरित होती मातृशक्ति की आवाजों की है । यह लड़ाई जन,जंगल,जमीन और जानवरों की है । यह लड़ाई बदलते पिकनिक स्पोटों के बीच सांस्कृतिक और प्राकृतिक संरक्षण की है। यह लड़ाई स्पष्ट भू कानून नीति और इनर लाइन परमिट की है। और इनको समझने के क्रम में 22 वर्षों में हमने देश को विशेष सौगात के रूप में 10 मुख्यमंत्री दिए हैं । आज राजनैतिक क्षरणता के उस बिंदु पर हम पहुंच गए हैं जहां योजनाएं महज घोषणाओं तक सीमित रह गई है और हम राजनैतिक स्थिरता ही नहीं बना पाए हैं।

लेकिन ऐसा नहीं है कि घने अंधकार में , उजाले के स्रोत कहीं नहीं हैं ।

 उत्तराखंड के नव निर्माण तभी संभव है जब हम लोग पहले उत्तराखंडी बनें और शेष सब बाद में । जब हम लोग अपनी सांस्कृतिक चेतना के वाहक बनें और चाय की प्याली के साथ अपने राज्य की असफलताओं पर चर्चा छोड़कर उत्तराखंड के विकास में हमारा क्या योगदान हो सकता है इसपर मंथन करें, उत्तराखंड दिवस की सच्चे अर्थों में सिद्धि तभी होगी।

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2022

समावेशी पर्यटन के लिए चुनौतियां

 

 

जय प्रकाश पाण्डेय

भारत में विगत वर्षों में धार्मिक पर्यटन स्थलों के सर्किट निर्माण संबंधी ऐतिहासिक कार्य हुए हैं । भारतीय सामासिक सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता के वाहक इन स्थलों को जहां मैदानी इलाकों में ट्रेन और सड़क प्रणाली से जोड़ने का प्रयास किया गया है वहीं उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों में आल वेदर रोड और चार धाम परियोजनाओं से इन्हें अमलीजामा पहनाया जा रहा है और अब इन्हीं सब से एक कदम आगे बढ़ाकर रोप- वे प्रोजेक्टों को अनुशंसाएं दी जा रही हैं । यह एक तरफ जहां सुविधा, साधन युक्त पर्यटन की तरफ बढ़ते कदम हैं तो वहीं दूसरी तरफ धार्मिक स्थलों के साथ पर्यटन को जोड़ने की दिशा में एक प्रयास भी ।

भारत में श्रद्धालुओं का एक बड़ा वर्ग अभी भी आर्थिक स्थिति से परमार्थ पाने की आकांक्षा रखता हैं। बड़े बड़े अनुष्ठान, दान पुण्य का आग्रही यह वर्ग ही सुविधाओं के साथ मॉडर्न साधनों की भी चाह रखता है । यही वर्ग है जिसके लिए धार्मिक पर्यटन की अधिकांश वर्तमान योजनाएं बनती हैं क्योंकि सामान्य श्रद्धालु तो आज भी अंतिम मौके तक पैदल ही अपना रास्ता तय करना चाहते हैं । विशेष परिस्थितियों में भी हैली सेवाओं की जगह पालकी व्यवस्था को चुनते ये सामान्य श्रद्धालु भलीभांति धार्मिक स्थलों पर बढ़ते दबाव को महसूस करते हैं । धार्मिक पर्यटन की योजनाओं के गठन के समय इनके अनुभव महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं ।

हाल ही में भारत के प्रसिद्ध देवघर मंदिर के रोपवे में हुई घटना के बाद भी , पहाड़ी राज्यों की भौगोलिक स्थितियों और पर्यावरणविदो की सलाहों और विरोधों के स्वर को तिलांजलि देकर रोप- वे जैसे संवेदनशील संपर्क के साधन ग्लेशियरों से घिरे मंदिरों के नजदीक विकसित किये जाने संबंधी कदम कितने सफल होंगे इसका उत्तर समय देगा लेकिन दिव्यांगों और बुजुर्गों को इससे सस्ता सुलभ वैकल्पिक मार्ग भी मिलेगा जो अभी नदारद था। एक समय था जब उम्र के अंतिम चतुर्थांश में ऋषिकेश से पैदल यात्रा केदारनाथ तक के लिए शुरू होती थी जिसमें अनुभव,भावना,श्रद्धा और ईश्वरीय प्रेम के साहचर्य को अनुभूत किया जा सकता था । कहा जाता है कि उस समय शिवत्व की खोज के लिए चार धाम जाने वाले श्रद्धालुओं द्वारा पहले ही पिंड दान हरिद्वार में कर दिया जाता था ।

आज वी -लॉगिंग की दुनिया में केदारनाथ,बद्रीनाथ जैसे धार्मिक केंद्र प्री- वेडिंग शूट से लेकर हनीमून और सप्ताहांत में चिल करने के स्पॉट के रूप में बदलते जा रहे हैं। बहुत आश्चर्य नहीं होगा यदि आने वाले २० वर्षों में ये स्पॉट प्रॉपर्टी इन्वेस्टमेंट के लिए भी आकर्षक हो जायें ।

यह अत्यंत विचारणीय तथ्य है कि हैली सेवाओं ने आर्थिक रूप से सशक्त मनुष्य को धार्मिक यात्राओं को उम्र, समय, ईश्वरीय बुलावे जैसी मान्यताओं से अलग इंस्टाग्राम,फेसबुक में रील आदि बनाने तक सीमित कर दिया है । वहीं इन्हीं जगहों के नजदीक आबादी का एक बड़ा वर्ग अभी भी हैली सेवाओं के विस्तार हेतु और दशकों से सुन रहे हवाई पट्टी में विमानों के उतरने की राह देख रहा है ।

राज्य सरकारों द्वारा किए जा रहे प्रयासों के बावजूद धार्मिक यात्राओं के लिए आने वाले असीमित श्रद्धालुओं ने पर्यावरणीय धारणीयता को भी प्रभावित किया है इसमें कोई शक नहीं है। पर्यावरणीय पारिस्थितिकी दबाव से नासमझ आत्मकेंद्रित पढ़े लिखे भारतीय नागरिकों की पर्यावरणीय चिंता को धार्मिक केंद्रों में पोलोथीन,प्लास्टिक और बोतलों के बढ़ते ढेरों से समझा जा सकता है । क्या श्रद्धालुओं की सुविधा के नाम पर धार्मिक जगहों को पिकनिक स्पॉटो में बदला जाना चाहिए ? क्या धार्मिक पर्यटन स्थलों के विकास के नाम पर पारिस्थितिकी संतुलन से समझौता किया जा सकता है ? क्या बढ़ती हैली सेवाओं की घटनाओं के बीच हैली सेवाओं से हमारे स्थापित धामों के दर्शन कर रहे श्रद्धालुओं में एक उम्र की सीमा लागू की जा सकती है? क्या पर्यटन का दबाव झेल रहे हिमालय क्षेत्र में दैनिक आधार पर पर्यटकों की संख्या सीमित कर देनी चाहिए आधारित ये सब प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हैं? जाहिर है संविधान से चलने वाले इस देश में उपरोक्त बातें आपको संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों और विशेषकर अबाधित रूप से देश के अंदर चलने फिरने में बाधक लगें लेकिन सच यह है कि हिमालयी राज्यों में पर्यटन के दबाव को अब महसूस किया जाने लगा है और उसी संविधान के अपवादों का भी उपयोग करने का यह सही वक्त है । सच यह भी है केदारनाथ,बद्रीनाथ जैसे धामों में आने वाले आर्थिक रूप से समृद्ध श्रद्धालुओं का एक बड़ा धड़ा अब वह भी है जिनको धार्मिक स्थलों और पर्यटन के बीच अंतर नहीं मालूम है । आए दिन गंगा मैया की लहरों में पर्यटकों की शराब की बोतलों के साथ वायरल होते वीडियोज इस बात की गवाही देते हैं ।

पर्यटन का एक दूसरा विकास मॉडल भी हैं जहां आप आधारभूत सुविधाओं की व्यवस्था पैदल मार्ग में करते हैं । भारतीय संस्कृति की चिरंतन काल से सहयोगी रही ये पैदल यात्राएं सांस्कृतिक एकता के साथ साथ एक दूसरे को समझने का मौका भी देती थी । महज झील झरनों तक नहीं बल्कि पूर्णता के साथ उस स्थान को देखने का नजरिया देती थी । कितना अच्छा होता वह दृश्य जब धार्मिक यात्रा करने आ रहे हमारे पर्यटकों के लिए मजबूत स्थाई ट्रांसिट कैंपों की व्यवस्था होती । भोजन, पानी और चिकित्सा की समुचित व्यवस्था होती । ऐसा नहीं है की वर्तमान में ये सुविधाएं नहीं है लेकिन केंद्र के समर्थन से प्राप्त अनुदानों को इस तरफ खर्च किया जाए तो श्रद्धालुओं के लिए वास्तविक रूप से हम जमीन पर प्रभावी रूप से कुछ करने में सक्षम रहेंगे ।

रोप -वे प्रोजेक्टों की तकनीकी कुशलता को बढ़ाकर और एक तय मानकों के क्रियान्वयन से दिव्यांगों, बूढ़े बुजुर्गों को फायदा मिलेगा इसमें कोई शक नहीं है लेकिन धर्म अपनी केंद्रीय धुरी से न उतर जाए, धार्मिक स्थल नाचने गाने के पिकनिक स्पॉट न बन जाएं और हिमालयी राज्य डेस्टिनेशन वैडिंग का साधन मात्र न बन जाएं अतीत के अनुभवों से हमें इस तरफ भी सशक्त कदम बढ़ाए होंगे ।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल महाविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व महासचिव तथा पूर्व बैंक अधिकारी हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।


शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

*हिमालयी राज्यों में बढ़ता आपदा का संकट*


बीते दिनों जब पूरा विश्व अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण दिवस ( 13 अक्टूबर) को मना रहा था उसी से 3 दिन पहले उत्तराखंड के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में जनमानस अत्यधिक बारिश के कारण होने वाले भूस्खलन, गिरते पहाड़ ,पत्थरों और इनके कारण बंद होने की स्थिति में पहुंची सड़कों से संघर्ष कर रहा था । न केवल उत्तराखंड बल्कि विगत वर्षों के कुछ अनुभव हमें पूरे हिमालयी राज्यों में मौसमी दशाओं के बदलते ट्रेंड और उससे आने वाली आपदाओं को हमारे सामने रखते हैं , और यह स्थिति कमोबेश अनेक वर्षों से जारी है । 


अत्यधिक वर्षा के कारण उत्तराखंड,हिमाचल के साथ साथ पूर्वोत्तर के राज्यों को भी इस स्थिति का सामना करना पड़ा है । विगत वर्ष राष्ट्रीय राजमार्ग-6 जोकि मणिपुर,मिजोरम,त्रिपुरा,और दक्षिणी असम को जोड़ता है 

काफी दिनों तक मुख्यधारा से कटा रहा । रोंटी ग्लेशियर से अलग हुए बर्फ खंड से उत्पन्न बाढ़ की स्थिति ने 70 से ज्यादा लोगों की जिंदगी उत्तराखंड में ली । किन्नौर जिले में भूस्खलन से हुई जनहानि भी इसी कड़ी में एक और उदाहरण है । लोकसभा में एक प्रश्न के प्रतिउत्तर के आधार पर देखें तो इस वर्ष 2021-2022 जुलाई माह तक प्राकृतिक आपदाओं से 1098 जिंदगियों को हमने खोया है । यह स्थिति हिमालयी राज्यों तक ही सीमित न रहकर उत्तरप्रदेश,कर्नाटक,राजस्थान आदि राज्यों तक है ,सभी इससे प्रभावित रहे हैं । अभी हमारे दिमाग से चक्रवात गुलाब, चक्रवात शाहीन और चक्रवात यास आदि से हुए मिलियनों के नुकसान की स्मृति मिटी नहीं हैं कि फिर से हम प्राकृतिक आपदाओं से जूझने लगे हैं। कर्नाटक,महाराष्ट्र और तमिलनाडु में जन्मी परिस्थितियों ने हमें हमारे बाढ़ प्रबंधन और प्राकृतिक आपदा के प्रबंधन संबंधी मॉडलों पर विचार करने को बाध्य किया है। 


जन,जंगल,जमीन और जानवर को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारणों की लंबी फेहरिस्त में मानवीय क्रियाकलापों और उसमें भी विशेषतः इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास (अवसंरचनात्मक विकास) के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी महत्ती भूमिका हमें देखने को मिल रही है । सड़क विस्तार परियोजनांओ से लेकर पर्यटन स्थलों के ऊपर जनसांख्यकीय आधिक्य , पनबिजली योजनाओं तक और जंगलों के जलने से लेकर कंक्रीट के विस्तार ने 

क्षेत्रों में पारिस्थितिकी संवेदनशीलतता को प्रभावित किया है। मौजूद चेतावनियों की अनदेखी भी इस संदर्भ में की गई है ।  


 जिन पर्यावरणविदों को हम विकास का विरोधी घोषित करते हैं उनके द्वारा दी गई संकल्पनाएं आज सही साबित होते दिख रही हैं। हिमालयी राज्यों में देश की ऊर्जा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाए जा रहे बांधों के निर्माण से होने वाले नुकसानों और फायदों के विषय में विस्तृत और विश्वसनीय सूचनाओं का विस्तार आम जन तक सुलभ होने पर ही तुलनात्मक अध्ययन किया जाना संभव है ।  


प्राकृतिक आपदाओं में बाढ़,भूकंप,और भूस्खलन,जंगलों की आग की समस्या का सामना करते ये हिमालयी पहाड़ी राज्य आज एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और सामाजिक सहयोग से कोशिशें तो कर रहे हैं लेकिन पूर्व चेतावनी प्रणाली को और भी तकनीक सम्मत करने की आज आवश्यकता है । साथ ही राज्य सरकारों द्वारा लैंडस्लाइड की संभावना वाले इलाकों में स्थाई मजबूत टनलों के आधार से सीधे खाई में भू पदार्थ जाएं ऐसी व्यवस्था के साथ कदम तेजी से बढ़ाए जाने की आवश्यकता है । आपदा के मानचित्र में पहले से संकेतित स्थलों में आपदा आने के बाद वांछित सामग्रियों जैसे फंसे पर्यटकों, वाहनों, यात्रियों के लिए आवश्यक सामग्रियों के संग्रहण संबधी क्रियान्वयन स्थानीय जनता और पंचायतों के सहयोग से किया जा सकता है । ये प्रयास जान माल की हानि को कम करने में अवश्य सक्षम होंगे । आपदा से पहले , आपदा के दौरान और आपदा के बाद इन तीन विषयों की समझ, योजनाओं के क्रियान्वयन और राज्य की नई नीतियों में इनका स्थान हो तो परिणाम सकारात्मक आयेंगे;इसमें कोई दो राय नहीं।  


13 अक्टूबर को मनाए गए ,वर्ष 2022 के अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण दिवस की थीम पूर्व चेतावनी प्रणाली और सूचनाओं तक पहुंच के आग्रह के साथ हमारे सामने थी । देश के पास मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली के सकारात्मक परिणाम हमने विगत वर्षों में बाढ़,चक्रवात आदि घटनाओं के दौरान कुशल आपदा प्रबंधन के रूप में देखें है जिसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों में भी सराहना मिली है । सेंदई फ्रेमवर्क के अंतर्गत घोषित लक्ष्यों को ध्यान कर पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति को पांच साल के भीतर प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली द्वारा संरक्षित किया जाने की योजना की तरफ बढ़ते संयुक्त राष्ट्र के प्रावधान कब भारत के हिमालयी राज्यों के अंतिम छोर में संघर्षरत व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन लाएंगे यह देखना दिलचस्प होगा।  



 उम्मीद है भूमंडलीय ऊष्मीकरण (ग्लोबल वार्मिंग)अंधाधुंध वृक्षों की कटाई, मिट्टी का क्षरण, प्रदूषण, हमारे वजूद को खतरे में डाल रहे विषयों के साथ केंद्रित होकर आपदाओं को कम करने के सार्थक प्रयासों पर चर्चा जमीन पर भी क्रियान्वित होकर हमारे सामने आएगी। प्राकृतिक आपदाएं रोकी नहीं जा सकती हैं। मगर ठोस प्रबंधन व तकनीकी प्रयोगों से आपदा न्यूनीकरण के प्रयास किए जा सकते हैं। आपदा में जान-माल की क्षति के साथ ही आपदा का पहाड़ उन पर टूटता है जिनकी जान तो बच जाती है, किंतु वो अपने घर, जीविका गंवा देते हैं। मुआवजों को राह तकती आंखें भी तभी सुकून पाएंगी जब किन घटनाओं को प्राकृतिक आपदा माना जायेगा इस पर गहन मंथन के बाद मापदंडों को स्पष्ट बनाया जाए। इन पहाड़ी राज्यों में पीड़ितों के विस्थापन, पुनर्वास व जीवन-यापन के लिए अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता है जिसे अनुच्छेद २१ के तहत जीवन के अधिकार में भी सम्मिलित किया गया है।


जय प्रकाश पाण्डेय 

लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।

शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

भारतीय वायुसेना के विमर्श

 


संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न शांति अभियानों से लेकर पड़ोसी राज्य बांग्लादेश की आजादी तक और विदेशों में फंसे हमारे भारतीयों को उनके घरों तक ऑपरेशन गंगा ,ऑपरेशन राहत जैसे विभिन्न अभियानों आदि द्वारा वापिस लाने से लेकर पड़ोसी राज्यों नेपाल,

श्रीलंका आदि को संकट में रशद सामग्री पहुंचाने तक भारतीय वायु सेना का एक लंबा गौरवमयी इतिहास रहा है । 90 वर्षों के इस गौरवमयी इतिहास में भारतीय संप्रभुता की रक्षा करते हुए भारतीय वायु सेना ने देश की बाहरी चुनौतियों को मुंहतोड़ जवाब दिया है । 



°नभः स्पृशं दीप्तम ध्येय वाक्य के साथ भारतीय वायु सेना 8 अक्टूबर 1932 के दिन रॉयल भारतीय वायु सेना के नाम से अपना कार्य शुरू करती है । द्वितीय विश्वयुद्ध, भारत पाक युद्ध, ऑपरेशन विजय, ऑपरेशन कैक्टस लिली, ऑपरेशन मेघदूत, कारगिल युद्ध और हाल ही में 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक आदि अनेक घटनाएं भारतीय वायु सेना को विश्व की मजबूत वायु सेना के रूप में स्थापित करती हैं । 


वर्तमान बदलते भू- राजनैतिक परिदृश्यों पर गौर करें तो हम पाते हैं परंपरागत सैन्य युद्धों की जगह अब वायु सेना आधारित युद्ध लेते जा रहे हैं । मिसाइलों के बढ़ते फ़्लीट ने वायु सेनाओं की आवश्यकताओं और महत्ता को व्यापक रूप से हमारे सामने रखा है। सैन्य टुकड़ियों के पहुंचने से पहले उनके लिए वायु सेनाओं द्वारा मार्ग क्लियर करवाने की बात हो या फिर भारी बमबारी की, आधुनिक तकनीकी रूप से सशक्त देश ही अपनी संप्रभुता की रक्षा के साथ साथ विश्व के सम्मुख अपना दबदबा रख पाएंगे इसमें कोई दो राय नहीं है । आज जब विश्व के देश अपनी वायु सेनाओं को आधुनिक तकनीकों से लैस और मजबूत करते जा रहे हैं वहीं भारत भी अपनी सेनाओं को आधुनिकता और तकनीक से सशक्त बनाता जा रहा है । विगत वर्षों में भारतीय सेनाओं को प्राप्त ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, अपाचे हेलीकॉप्टर, फ्रांस से खरीदे गए राफेल हेलीकॉप्टर आदि अनेक रक्षा समझौते इसी बात को पुष्ट करते हैं । 


न केवल आयात द्वारा बल्कि आत्मनिर्भर भारत की पृष्ठभूमि में भी हमारे देश की कंपनियों द्वारा वायु सेनाओं को मजबूती प्रदान की जा रही है । हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड द्वारा स्वदेशी तकनीक आधारित बनाए गए तेजस हेलीकॉप्टर का निर्माण इसी का उत्कर्ष है । डीआरडीओ को पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित करने हेतु 11000 करोड़ रूपये आवंटन करना साथ ही वर्ष 2022 -2023 के लिए भारत सरकार द्वारा रक्षा मंत्रालय को 5.25 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं , जो कि पिछले वर्ष के आवंटन से 10 प्रतिशत अधिक है । साथ ही कैबिनेट ने पिछले वर्ष भारतीय वायु सेना के लिए 56 सी-295एमडब्ल्यू परिवहन विमान की खरीद को भी मंजूरी दी हैं । स्वदेश आधारित तकनीकी उपकरणों के निर्माण में अवसंरचनात्मक गतिरोधों के चलते विलंब होना संभव है परंतु आत्मनिर्भरता के शुरूवाती चरणों में यह भी स्वाभाविक ही माना जायेगा । गत दिनों पूर्व हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा देश में विकसित हल्के लड़ाकू हेलिकॉप्टर भी वायुसेना का हिस्सा बन गए। ऊंचे और दुर्गम क्षेत्रों की जंग में वायु सेना की क्षमता और भी ज्यादा बढ़ाते ये हेलीकॉप्टर वायु सेना के आत्मविश्वास के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं। कुछ माह पूर्व आत्मनिर्भर भारत की इसी संकल्पना को आगे बढ़ाते हुए रक्षा मंत्रालय द्वारा भारत डायनामिक्स लिमिटेड के साथ अस्त्र एमके-1 दृष्टिगत रेंज से बाहर के मिसाइल को खरीदने के समझौते पर हस्ताक्षर हुए ।  


21 सदी के भारत को युद्ध की स्थिति में 1970 के उपकरणों से जीत नहीं मिल सकती यह बात तय है । यही कारण है कि सेनाओं के आधुनिकीकरण की बात समय समय पर उठती है । सेनाओं के आधुनिकीकरण की तरफ बढ़ते भारत के कदम एचएएल तेजस दसौल्ट रफेल, सुखोई, जैगुआर, मिग 29, मिराज,सुखोई सु -30 से आगे बढ़कर एचएएल तेजस मार्क 1A,मिराज- 2000, मिग 21, मिग 24, दसाल्ट रफेल के साथ साथ एमएमआरसीए 2.2 , एमडब्ल्यूएफ ,ओरसीए, एएमसीए (पांचवी जेनरेशन ) संबंधी समझौतों तक आज पहुंच चुके हैं । 




भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती हैं आजादी के बाद 90 के दशक से सेवा में लगे विदेशी वायुयानों का प्रबंधन, उसका अनुरक्षण और वांछित स्पेयर पार्ट की उपलब्धता सुनिश्चित करना । इसी संदर्भ में आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को लागू करने का प्रयास किया गया है। आज भारत की खरीद प्रणाली में सुधार के संबंध में कैग द्वारा भी अनुशंसाएं दी गई हैं । मसलन भारत की किसी खरीद को पूरा होने में 8 से 10 वर्षों तक का समय लगता है जिससे वायु सेना की क्षमताएं भी प्रभावित होती हैं । धन, समय और आवश्यकताओं के नजर से यह देरी प्रतिकूल होती है यह निष्कर्ष स्वाभाविक रूप से निकाला जा सकता है। 


वस्तुतः आजादी के बाद से ही भारत ने अलग अलग देशों के युद्ध वायुयानों की खरीद भारत के लिए की है । इसमें कई ऐसे वायुयान हैं जिनकी उत्पादन इकाईयां ही आज बंद हो चुकी हैं । कई वायुयानों का उत्पादन ही बंद हो चुका है ऐसे में अतिरिक्त पार्ट की आवश्यकता और तकनीकी अनुपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन जाती है । हाल ही में हमारे मिग विमान और मिराज के अनुरक्षण के लिए हमें फ्रांस से उनके उपयोग किए गए सेकंड हैंड वायुयान खरीदने की आवश्यकता हुई ऐसे में खरीद की वर्तमान समय सीमा को देखते हुए खरीद के साथ ही उनकी प्रतिस्थापना के प्रस्ताव भी साथ ही सरकारी तंत्र में आगे बढ़ जाने चाहिए।  


हमें आज स्क्वॉड्रन् , पायलटों और अन्य प्रभागों की संख्या में अपेक्षित वृद्धि करने की आवश्यकता है । कई ऐसे मामले आया हैं जहां सेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर जाबांज प्राइवेट एयरलाइंस के साथ कार्य कर रहे हैं। अतः ऐसे में आवश्यकता है वेतनमान और अन्य सुविधाओं को बढ़ाए जाने की ताकि युवाओं और अनुभवी जाबांजों के मनोबल में कोई कमी न आए । इग्नू, आदि दूरस्थ शिक्षा के माध्यमों तक इन जाबांजों की पहुंच बढ़ाए जाना एक अच्छा कदम सिद्ध होगा।  


हमें आवश्यकता है आज तजिकिस्तान सरीखे हमारे बेस बढ़ाने की ताकि विपरीत परिस्थितियों में भी हम उच्च प्रदर्शन कर पाएं । मलक्का जलसंधि क्षेत्र, चीन और विशेषकर हिंद महासागर के संदर्भ में विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है । आर्टिफिशियल इंटीलीजेंस से युक्त नवोन्मेषों के लिए , युवा मस्तिष्कों को आकर्षित किया जाना चाहिए । इस संदर्भ में पर्याप्त फंड की व्यवस्था,उसका नियमन और अनुसंधान में वह फंड लगे, ऐसे व्यवस्था की जानी अपेक्षित है ।  


जय प्रकाश पाण्डेय 

लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।


सोमवार, 26 सितंबर 2022

वक्त की मांग : पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सामाजिक राजनीतिक चिंतन और दर्शन पर परिचर्चा

भारतीय इतिहास की तथाकथित मानक पुस्तकों में , शिक्षा की नीतियों में और पाठ्यक्रम निर्धारण में  राष्ट्रवादी इतिहासकारों को  एक लंबे समय तक जगह नहीं दी गई और यही कारण रहा कि हमारे अतीत के तारों को औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था की पाठ्य पुस्तकों, मार्क्सवादी इतिहासकारों के इतिहास लेखन और सत्ताधारियों के कृपापात्रों द्वारा आकार दिया गया । यह इस देश का दुर्भाग्य है कि उपरोक्त मानसिकता से ग्रसित लोगों ने भारत की न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया बल्कि एक ऐसी व्यवस्था को भी जन्म दिया जहां हम अपने अतीत की विरासत को भुला बैठे । जहां हम अपने  आदर्श व प्रेरणादायी व्यक्तित्वों को भुला बैठे । हमने नि:संदेह कुछ प्रेरक व्यक्तित्वों को पढ़ा जरूर परंतु ऐसे व्यक्तित्वों की एक लंबी फेहरिस्त अभी भी शोध का विषय है । 


एकात्म मानवतावाद के प्रवर्तक पंडित दीनदयाल उपाध्याय भी ऐसे ही व्यक्तित्वों के केंद्र बिंदु हैं जिनके विचारों,लेखन,विकास के मॉडलों और यहां तक की राजनैतिक, व्यक्तिगत  जीवन के संघर्षों पर चर्चा तक नहीं हुईं । एक लेखक, एक राजनीतिज्ञ,एक पत्रकार, एक दार्शनिक और स्वयंसेवक दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म आश्विन कृष्णा त्रयोदशी संवत् 1973 विक्रमी तदानुसार दिनांक 25 सितंबर 1916 को बृजभूमी पर उत्तर भारतीय निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था  । मैट्रिक और इंटर  कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण करने के बाद बीए और प्रशासनिक सेवा में चयनित मेधावी दीना ( बचपन का नाम ) 1937 में संघ को समर्पित हो गए।  1967 में कालीकट अधिवेशन में उपाध्याय जी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। मात्र 43 दिन के जनसंघ के अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान ही 10-11 फरवरी, 1968 की रात्रि में मुगलसराय स्टेशन पर उनकी हत्या कर दी गई। 



जिस भारत के सपने को मन मस्तिष्क में बैठाकर स्वाधीनता का संग्राम लड़ा गया, वह भारत आजादी के बाद भारतीय चिंतन धारा,भारतीय संस्कृति से विलग पाश्चात्य का अनुगामी बनता जा रहा था । भारत इंडिया बनने की कोशिश में था जिससे भारतीयता के विषय में सोच शिथिल होने लगी । देश के कानून और प्रशासन की आधारशिला औपनिवेशिक ढर्रे पर स्थापित कर  भारत को इंडिया से विस्थापित करने के मॉडल का  समर्थन पंडित जी  ने कभी नहीं  किया । ऐसे में दीनदयाल जी के विचारों ने भारतीय संस्कृति, भारतीय शिक्षा और आर्थिक व्यवस्था, राष्ट्रीय अखंडता , राष्ट्रीय भाषा आदि  मौलिक विचारों के साथ-साथ मानवीय गरिमा , मानवीय मूल्यों और अंत्योदय जैसी संकल्पनाएं प्रदान की । पंडित जी द्वारा पाञ्चजन्य पत्रिका में प्रकाशित विभिन्न लेखों, उनकी  विभिन्न सभाओं , संघ के कार्यक्रमों ,उनके लिखित साहित्य   और अपने लोगों को लिखे गए पत्रों में विस्तार से उनके दर्शन के उस चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर सकते हैं जिसकी कड़ियां सांख्य दर्शन से होकर व्यक्ति के निजी जीवन तक जुड़ती हैं । 


आर्थिक विपन्नता से प्रताड़ित जन के लिए  समुचित रूप से भोजन,पानी,आवास,शिक्षा उपलब्ध कराना अंत्योदय है। इस अंत्योदय के विकास के केंद्र में मानव और उसमें भी अंतिम पंक्ति में खड़े मानव की प्रसन्नता है। परिवार, समाज,जाति ,राष्ट्र ,विश्व और ब्रह्मांड, सब के सब मानव से जुड़ी इकाइयां हैं जो  चार स्तंभों पर टिकी है- शरीर,मन,बुद्धि व आत्मा। इनमें से किसी एक की भी अवहेलना शेष तीनों को निष्फल कर देती हैं।अतः किसी भी देश का विकास मॉडल  व्यक्ति केंद्रित होना चाहिए। अंत्योदय इस एकात्म मानव दर्शन की व्यावहारिक परिणीति का जरिया है।एकात्म मानव-दर्शन राष्ट्रत्व के दो पारिभाषित लक्षणों को पुनर्जीवित करता है जिन्हें ''चिति '' (राष्ट्र की आत्मा) और ''विराट'' (वह शक्ति जो राष्ट्र को ऊर्जा प्रदान करता है) कहते हैं। 



राष्ट्रीय संविधान के निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत दुरूह और विस्तार को धारण किए हुए थी । संविधान के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए भी दीनदयाल उपाध्याय जी ने संघात्मक संविधान, लोक- कल्याणकारी राज्य विषयक प्रावधानों एवम स्थानीय स्वशासन आदि विषयों पर खुलकर आलोचना की और न सिर्फ आलोचना की बल्कि उनके समाधान भी प्रदान किए । 


कश्मीर के तत्कालीन हालातों  और शेख अब्दुल्ला की पूर्व मंशाओं को भांपकर सरकार को चेताते हुए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी विभिन्न पत्रों , संपर्कों द्वारा सतर्क करने की कोशिश उपाध्याय जी द्वारा की गई किंतु उनकी बातों पर गौर नहीं किया गया ।  वस्तुतः वर्तमान सरकार द्वारा धारा 370 को हटाकर कश्मीर समस्या का जो हल निकाला गया है उसकी आधारभूमि दीनदयाल उपाध्याय जी ने ही शुरू की थी । 


विभाजन की विभीषिका पर भी दीनदयाल उपाध्याय जी के अंतरमन ने रुदन किया है । एक कार्यक्रम में उन्होंने विचार प्रकट किए कि -

"दिल्ली में हमारे नेता कुमकुम तिलक लगा रहे थे जबकि पंजाब में हमारी माता और बहनों की मांग का सिंदूर पुछ रहा था …वंदे मातरम का जयघोष करके हम माता के वे  हाथ काट चुके थे जिनसे वह हमें आशीर्वाद देती।  दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा फैलाकर स्वतंत्रता की घोषणा की गई किंतु रावी के जिस तट पर स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा दोहराई गई थी वह हमसे छिन चुका था । "


पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी  वाजपेयी जी ने जिस अंत्योदय की अवधारणा को कार्यरूप प्रदान किया; वर्तमान सरकार ने लोकतंत्र के अंतिम पायदान में खड़े निस्वार्थ भाव से सेवारथ नागरिकों को नागरिक सम्मान देकर उसी अंत्योदय को आगे बढ़ाया है । दीनदयाल जी के अंत्योदय की ही प्रेरणा वर्तमान सरकार की पहल जैसी योजनाएं हैं । न सिर्फ वर्तमान सरकार ने बल्कि पूर्व में भी दीनदयाल जी के इस अंत्योदय से प्रभावित विभिन्न योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन को हम पाते हैं ।   ‘भारत  विकास की यात्रा ग्रामों से शुरू हो’ कि अवधारणा को ग्रामीण आजीविका मिशन, प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना आदि जैसी योजनाओं द्वारा आज सफलतापूर्वक क्रियान्वित किया जा रहा है । 


योजनाओं के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियां भी है उससे इंकार नहीं किया जा सकता । उन चुनौतियों पर चर्चा होनी आवश्यक हैं और उससे भी आवश्यक समाधान पर चर्चा।  पंडित दीन दयाल जी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनसंघ  के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए संघ के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में अपने विभिन्न विचारों को रखा । इन सभाओं में देश की विभिन्न समस्याओं पर समाधान की श्रृंखलाबद्ध कड़ियों को हम देख सकते हैं ।   पांचजन्य और युगदेश पत्रिका के तत्कालीन अंकों में इनके विचारों को देखा जा सकता है । 


स्वाधीनता संग्राम में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर चुके अगणित अनजान वीरों के नामों तक आम जनमानस की पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से  आजादी के अमृत महोत्सव की पूर्वपीठिका वर्तमान सरकार द्वारा रची गई है । 


दीन दयाल जी के जन्मदिवस पर हम संकल्पित हो कि पंडित जी के  साथ न्याय कर सकें, उन परिस्थितियों को, दबे संकेतों को सामने  ला पाएं , उन   स्वतंत्रता सेनानियों को सामान्य जन के बीच ला पाएं जो गुमनाम रह गए  और ऐसे व्यक्तित्वों के   दर्शन,लेखनी और राजनीति के आदर्शों पर  हम कायम रह सकें । हम संकल्पित हों कि सम्मिलित प्रयासों से देश के इतिहास, पाठ्य पुस्तकों और सांस्कृतिक मंचों  में उन व्यक्तित्वों को भी स्थान दे पाएं जिन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए जीवन लगा दिया है ताकि भारत का भविष्य अपने इतिहास के गौरवपूर्ण  व्यक्तित्वों से प्रेरणा ग्रहण कर सकें  ।


लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी  एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।

शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

“माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या”




 

“माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या” सूत्र वाक्य को भारतीय संस्कृति अपने में समेटे हुए है | भारतीय वैदिक ग्रन्थों की परंपरा से लेकर वर्तमान भारत की हाइड्रोजन नीति तक अंतिम उद्देश्य के रूप में समता का वह धरातल है जहां चर- अचर अवयव एक साथ बिना एक दूसरे को नुकसान पहुंचाए जीवन चक्र में अपना सहयोग देते हैं | औद्योगिक क्रांति के बाद जलवायुवी समस्याओं की शुरूवात का प्रस्थान बिंदु ओज़ोन क्षरण के रूप में हमें देखने को मिलता है | संभवतः यही वह बिन्दु भी है जहां विश्व के सभी देश मिलकर अपनी मानवीय भूलों को सुधारने का प्रण करते हैं | हालांकि ओजोन क्षरण से शुरू प्रकृति का यह कहर आज जलवायु परिवर्तन, विपरीत एवं विकराल मौसमी दशाओं और ग्लोबल वार्मिंग तक जा पहुंचा है | इन सब दशाओं के बीच भारत द्वारा किए जा रहे प्रयास प्रशंसनीय हैं फिर चाहे वो और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन फेज आउट मैनेजमेंट प्लान से संबन्धित हों या अंतर्राष्ट्रीय सौर ऊर्जा समझौते से संबन्धित या फिर कूलिंग एक्शन योजना से संबन्धित हों । 

    

ओजोन परत के ह्रास के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाने और इसे संरक्षित करने, संरक्षण हेतु किए गए प्रयासों पर चर्चा एवं भविष्य की कार्ययोजनाओं के गठन आदि मंतव्यों को दृष्टिगत रखते हुए 16 सितम्बर 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल संधि हस्ताक्षरित हुई | संयुक्त राष्ट्रसंघ की सामान्य सभा ( जनरल असेंबली ) द्वारा वर्ष 1994 में 16 सितम्बर के दिन को अंतर्राष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस के रूप में घोषित किया | ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए हस्ताक्षरित यह अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि विश्व की सबसे सफलतम संधियों में से एक मानी जाती है |  


1992 से ही भारत मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के विभिन्न दिशानिर्देशों को चरणबद्ध तरीके से कार्यान्वित कर रहा है। भारत ने क्लोरोफ्लोरोकार्बन, कार्बन टेट्राक्लोराइड, हैलोन्स को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया है। वर्तमान में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के त्वरित कार्यक्रम के अनुसार हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जा रहा है। हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन फेज आउट मैनेजमेंट प्लान (HPMP) स्टेज- I को 2012 से 2016 तक सफलतापूर्वक लागू किया गया है और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन फेज आउट मैनेजमेंट प्लान (HPMP) स्टेज- II वर्तमान में 2017 से लागू किया जा रहा है और 2023 तक पूरा हो जाएगा यह उम्मीद की जा सकती है | 

भारत में ओजोन क्षयकारी रसायनों में से एक सबसे शक्तिशाली एचसीएफसी- 141बी को भी पूर्ण तरीके से समाप्त करके विकासशील देशों के सम्मुख एक उदाहरण पेश किया है भारत सरकार ने हाल ही में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अगले चरण किगाली संशोधन की पुष्टि करने का निर्णय लिया है जो एक बार फिर वैश्विक समुदाय के लिए जलवायु और पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है |


आज विश्व के प्रायः सभी देशों द्वारा ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्सर्जन में कमी हेतु नीतिगत फैसले लिए जा रहे हैं | इनके प्रतिस्थापन से भी नई समस्याओं को हम जन्म लेते देख रहे हैं | कई क्षेत्रों जैसे रेफ्रिजरेशन और एयर कंडीशनिंग अनुप्रयोगों में ओडीएस के विकल्प के रूप में फ्लोरिनेटेड गैसों (एफ-गैसों) जैसे हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (एचएफसी), पेराफ्लूरोकार्बन (पीएफसी) और सल्फर हेक्साफ्लोराइड (एसएफ 6 ) को पेश किया गया है। ये गैसें ओजोन परत को तो नष्ट नहीं करती हैं, परंतु जलवायु परिवर्तन में ग्रीनहाउस गैसों के रूप में योगदान करती हैं। कुछ एफ –गैसों में ग्रीनहाउस प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड की समान मात्रा की तुलना में 23 000 गुना अधिक शक्तिशाली होता है। 1990 के दशक से एफ-गैसों का उपयोग और वातावरण में उनकी उपस्थिति में वृद्धि हुई है। हमें वैश्विक स्तर पर इस तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि ओज़ोन परत के संरक्षण

के कदम हमें विपरीत स्थितियों में न डाल दें |


आज जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण , ग्लोबल वार्मिंग और ओजोन संरक्षण के मामलों को अलग अलग करके नहीं देखा जा सकता है | इसी लिए नवीनीकरणीय स्रोतों से प्राप्त हाइड्रोजन, ग्रीन हाइड्रोजन की तरफ बढ़ते हमारे कदमों को भी वर्तमान शोधों के आधार पर हमें आगे बढ़ाना चाहिए | भारत की वर्तमान हाइड्रोजन नीति के अनुसार हमने वर्ष 2030 तक 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन बढ़ाना है | भारतवर्ष की ऊर्जा जरूरतों और वर्तमान जलवायवी दशाओं को देखते हुए ईधन के रूप में हाइड्रोजन के उपयोग संबंधी ऐसी सकारात्मक पहलें उत्साहवर्धक हैं | हालांकि अभी भी उच्च लागत, तकनीक एवं आधारभूत अवसंरचना की न्यूनता, हाइड्रोजन ऊर्जा परिवहन में नुकसान आदि चुनौतियाँ बरकरार हैं जिस तरफ समन्वित होके प्रयास करने की आवश्यकता है | तेल रिफ़ाइनरीयों, स्टील सेक्टर में भी अनवीनीकर्णीय ऊर्जा से प्राप्त ग्रे-हाइड्रोजन के स्थान पर ग्रीन-हाइड्रोजन को प्रतिस्थापित करने की तरफ हमको कदम बढ़ाने की आवश्यकता है | इलेक्ट्रिक वाहनों की संकल्पना को जिस तरह भारत ने अपने विभिन्न नीतिगत फैसलों में समावेशित किया है वैसे ही कदम इस संदर्भ में भी लिए जाने चाहिए तभी सच्चे अर्थों में हमारी संस्कृति के बीज वाक्यों को अमलीजामा पहनाने में हम सफल होंगे |    

लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।

मंगलवार, 13 सितंबर 2022

अपनी भाषा ,अपना देश

 



कह दो दुनियावालों से गांधी अंग्रेजी भूल चुका है ”... आजादी के बाद बीबीसी में दिए गए वक्तव्य में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा कहे ये शब्द आजादी के बाद गांधी जी के मानस पुत्रों ने विस्मृत कर दिए | गांधी जी के संदेशों को पूरे भारत में प्रचारित-प्रसारित किया गया लेकिन राष्ट्रपिता की हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने की इच्छा राजनीतिक गलियारों तक सीमित रह गयी | आजाद भारत में अपने ही लोगों में हिंदी भाषा गुलाम बनकर रह गयी | आजादी के बाद राजभाषा हिंदी के विकास के लिए और राष्ट्रभाषा बनाने के लिए जो प्रयास होने चाहिए थे वो प्रयास राजनीति की भेंट चढ़ गए ।



हिंदी हमारी अस्मिता की प्रतीक है | हिन्दी 150 वर्षों के औपनिवेशक शासन के विरोध में उदयमान भारत को स्वाधीनता दिलाने में अपना प्राणोत्सर्ग करने वाले उन करोड़ों व्यक्तित्वों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का माध्यम है जिन्होंने हिंदी को ही स्वाधीनता आन्दोलन की भाषा बनाया था | यह भी सत्य है कि हमारे दैनिक जीवन में अंग्रेजी पिछले दरवाजे से बहुत पहले ही घुसपैठ कर चुकी है | आज कई उदाहरण ऐसे देखे जा सकते हैं जहाँ समाज का एक तबका अंग्रेजी की इन्द्रधनुषीय सीढी इसलिए चढ़ता है कि उसको अंग्रेजी को अंगीकार करने में अपना सामाजिक स्टेटस बढता हुआ दिखाई देता है| यदि यह तबका हिंदी के महत्व को अपने स्टेटस से जोड़ने की कोशिश करे तो वह समझ जाएगा कि हिंदी भाषा एक पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है जिसमें जैसा उच्चारण है वैसा ही लिखा जाता है | ढाई से तीन लाख शब्दों के भण्डार को हिंदी भाषा अपने में समेटे हुए है | विश्वभाषा होते हुए भी आज हिंदी भाषा हीन भावना से ग्रसित है | आज विश्व के सभी देशों में हिंदी बोली जाती है | हिंदी में प्रकाशित होने वाली पत्र पत्रिकाओं की संख्या सर्वाधिक है | 


अंग्रेज कवि स्पेंडर ने कहा था– दुनिया की सबसे समृद्ध भाषा होते हुए भी भारत के लोग अंग्रेजी के पीछे क्यों पड़े हैं ? इसका एक जवाब था– रोजगार | भूमंडलीकरण के बाद हवाहवाई बातों का जो दौर चला उसमे एक प्रमुख हवाहवाई बात थी रोजगार के लिए अंग्रेजी की आवश्यकता और कहीं न कहीं इसके लिए पाश्चात्य देशों की वह सोच काम कर रही थी जिन्हें यहाँ आकर व्यापार करना था | उन्होंने अपनी सुविधानुसार देश की सोच को बदलने का प्रयास किया | भूमंडलीकरण के इतने साल बाद भी इस अंग्रेजी ने वास्तव में क्या हमको रोजगार दिया ? क्या किसान को मजदूर में तब्दील होने से रोक पाया ? क्या अंग्रेजी का वह स्तर वास्तव में हम पा पाए जिसके लिए हमने इतनी मेहनत की । हां यह जरूर है इसने इस देश के भीतर इंडिया और भारत दो वर्गों की स्थापना करने में जरूर योगदान दिया । देखिये, बात स्पष्ट है पूर्वाग्रह के आधार पर बातें करने का जमाना लद गया है और शायद भारत सरकार द्वारा प्रकाशित आर्थिक सर्वेक्षण भी इसकी ही एक बानगी प्रस्तुत करता है, इसमें उल्लेखित है कि वर्तमान भारत को दो भागों में देखा जा सकता है | प्रथम ऐसे राज्य जहाँ विकास का उच्च स्तर प्राप्त किया जा चूका है लेकिन जहाँ युवा जनसंख्या तेजी से कम हो रही है | इन राज्यों में तमिलनाडु,कर्नाटक,बंगाल आदि शामिल हैं | वहीँ दूसरे वो राज्य जहाँ विकास का अभी पदार्पण हुआ है और जहाँ की अधिकाँश जनसँख्या युवा है | यह हिंदी के लिए एक अच्छा संकेत है क्योंकि हिंदी भाषी राज्य दूसरी श्रेणी में आते हैं | 


आज भारत में आने वाला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रायः दक्कन क्षेत्र तक प्राथमिकता पाता है | ऐसे में बदलते भारत के तस्वीर हिंदी भाषी राज्यों पर निर्भर करेगी, इसमें कोई दो मत नहीं | ध्यातव्य है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का नाममात्र इन हिंदी भाषी राज्यों में आता है लेकिन जिस तरह की जनसांख्यकी लाभ इन राज्यों को भविष्य में मिलने वाला है ऐसे में हिंदी भाषा को व्यापार की भाषा के रूप में अपनाकर ये राज्य समावेशी विकास की अवधारणा में खरे उतर सकते हैं | 


अगर हम विदेश की भाषा अंग्रेजी से इतने प्रेरित है, तो क्यों हम चीन, जापान जैसे विकसित और अत्यंत संपन्न देशों से प्रेरणा नहीं लेते हैं? जहाँ लोग केवल और केवल अपनी भाषा में बात करते हैं, कार्य करते हैं जरूरत पड़ने पर अनुवादकों का उपयोग करते हैं और किसी भी मामले में किसी अन्य देश से अपने आपको पिछड़ा महसूस नहीं करते| इन देशों में ना केवल लोग बल्कि इनके जन प्रतिनिधि भी विश्व के किसी भी मंच से अपनी भाषा में ही बात करते हैं तथा अन्य देशों से संवाद करते हैं| अन्य देशों से चीन, जापान में जाकर रोजगार पाने वाले लोगों के लिए इन देशों की भाषा सीखना अनिवार्य होता है, क्यूंकि वे लोग अंगेजी को बैसाखी बनाकर नहीं जी रहे हैं| जिसे इन देशों से व्यापार, व्यवसाय या अन्य सम्बन्ध रखने हों, वो स्वयं द्विभाषक व्यक्तियों या अन्य यंत्रों के माध्यम से इनकी भाषा समझकर अपना अर्थ सिद्ध करते हैं| आज भारत विश्व पटल पर निवेश और व्यापार के प्रयोजन से अत्यंत महत्वपूर्ण देश बन चुका है| गुणवत्ता, मूल्य, और उपलब्धता का संगम जब हिंदी भाषा के साथ होगा और यदि हम भी यही सोच और नीति अपनाएंगे तो हम ना केवल अपने देश बल्कि अन्य देशों के लोगों को भी हिन्दी सीखने, समझने के लिए बाध्य कर सकते हैं|


यदि अभी से विधि सम्बन्धी दस्तावेजों, पाठ्य पुस्तकों,तकनीकी पुस्तकों, विज्ञान की पुस्तकों के अनुवाद से लेकर पुस्तकों की उपलब्धता की तरफ प्रयास करें तो आने वाले 5-10 वर्षों में हम उस स्थिति में पहुंच पाएंगे जहां व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता अनुसार कम से कम अध्ययन की सुविधा हेतु स्वतंत्त्रापूर्वक भाषा का चयन कर सकेगा । विगत वर्षों में तकनीकी शिक्षा,अभियांत्रिकी शिक्षा को भी हिंदी में प्रदान करने के उद्देश्य से अखिल भारत स्तर पर कुछ अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) महाविद्यालयों में हिंदी माध्यम में पढ़ाई करवाने की प्रशंसनीय पहल की जा रही है । हमें सम्मिलित रूप से यह प्रयास करने चाहिए कि देश की विभिन्न भाषाओं को हम रोजगार की भाषा बना पाएं और अनुवादकों के लिए भी उस जगह का सृजन करें जो जगह आज विकसित देशों में, स्वाभिमानी देशों में देखने को मिलती हैं ।


भारत की विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के समृद्ध साहित्य, समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए हिंदी भाषा एक कड़ी का काम कर सकती है । संगम साहित्य से लेकर असम के संत शंकरदेव वाणी को सामने लाने में हिंदी भाषा महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है और इस हेतु हमें प्रयासरत भी होना चाहिए तभी अपनी भाषा- अपना देश के सिद्धांत को हम वास्तविकता में अनुभव करने में सक्षम होंगे ।


लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।

सोमवार, 12 सितंबर 2022

इफ यू कांट कन्वींस दैन कन्फ्यूज्

 

जय प्रकाश पांडेय 




अवार्ड वापसी गैंग, मॉब लिंचिंग,कलबुर्गी सरीखे विद्वानों की हत्या, गोकशी, नागरिकता अधिनियम, धारा 370 , रोहिंग्या विवाद और कृषि विधेयक इन सभी घटनाओं के आलोक में वर्ष 2014 से अभी तक के भारत को देखेंगे तो हम पाएंगे देश में संसद को छोड़कर हर जगह जनता को बरगलाने का, असमंजस में डालने का माहौल तैयार किया जा रहा है । संसद में विपक्ष के पास यह स्थिति पैदा करने के लिए जनादेश नहीं है और स्वस्थ विमर्श तो विपक्ष की सोच से भी परे है। ऐसे में माहौल के निर्माणकर्ताओं का चरित्र और व्यक्तित्व दोनों धीरे धीरे बाहर आ रहा है । गत दिनों पूर्व हुई कुछ गिरफ्तारियों को भी इन अफवाहों के सृजनकर्ता की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है । ऐसे माहौल के सृजनकर्ताओं ने मानों मन में ठाना है कि इफ यू कांट कन्वींस दैन कन्फ्यूज् ( यदि आप भरोसे में नही ले सकते तो असमंजस में डाल दें) और देश के नागरिक अपने जीवन की आपाधापी के बाद इन्हीं विषयों में विमर्श में लगे हैं जबकि यह ऐसा दशक होने जा रहा है जो भारत के गौरवमयी इतिहास और स्वर्णिम भविष्य को विश्वमंच में स्थापित करता दिख रहा है । खाली खजानों के बाद भी देश में हो रहे अनगिनत विकास के कार्यों को प्रिंट मीडिया और सोशल साइट्स में विरले ही जगह मिली है । मिर्च मसालेदार आधे अधूरे तथ्यों को ही खबर बनाने की होड़ ने भारत को नुकसान पहुंचाया है जिस पर विवेचना अत्यंत आवश्यक है। 


 वर्ष 2014 के बाद विभिन्न राष्ट्रीय पुरस्कारों से लेकर प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कारों में समाज के आखिरी छोर में खड़े निस्वार्थ , कर्तव्यबद्धता से कार्य करते अनसुने नाम,अनदेखे चेहरों जैसी पहचान इन विगत 8 वर्षों में दी गई क्या वह आजाद भारत के नागरिकों को कभी इतने व्यापक ढंग से मिली थी ? क्या अंत्योदय की अवधारणा का जो जमीनी खाका वर्तमान सरकार ने प्रस्तुत किया वह इससे पहले कभी हुआ था ?


 वर्ष 2014 के बाद देश के शीर्ष नेतृत्व ने निर्णयों को मजबूती और दृढ़ता से लेने का जो क्रम विकसित किया , उसकी उपस्थिति का एहसास भारतवासियों ने ही नहीं बल्कि विदेशों के जनसमुदाय ने भी किया है । आज भारत ने विश्व के अन्य प्रमुख देशों के सामने भी खुद को सशक्तता के साथ स्थापित किया है लेकिन राजनीतिक अखाड़े ने भारत में आए बदलाव पर विमर्शों को मौन कर दिया क्योंकि भले ही सरकार भारतीय जनता पार्टी की हो अभी भी ऐसी कई दीमकें प्रणाली में विद्यमान हैं जो प्रजातंत्र की सफलता में बाधक हैं। ये वहीं दीमकें हैं जिन्होंने न समय पर आतंकवाद के निस्तारण के लिए प्रायोगिक योजनाएं बनाई न ही समय से प्रतियोगी परीक्षाएं करवाई । न ही जहां प्रतियोगी परीक्षाएं करवाई वहां पर्चे लीक होने की संभावना रखी । न ही पूर्वोत्तर में विकास का कार्य किया न ही लक्षद्वीप में पर्यटन संभावनाओं को खोज । कोशिशें अब ऐसे दीमकों से बचने की होने चाहिए 


भारत का लोकतंत्र अंतिम छोर में विकास और उत्थान के लिए संकल्पित जीवन अर्पण करने वाले व्यक्तियों को राष्ट्रपति के रूप में स्थापित करते हुए आगे बढ़ रहा है ।  


मुझे अच्छे से याद है वर्ष 2014 के जनवरी के ठंड के दिन थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट्स फैकल्टी में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के नीचे खड़े होकर प्राध्यापक, रिसर्च स्कॉलर, भविष्य के अस्थाई सहायक प्राध्यापक नरेंद्र दामोदरदास मोदी नामक शख्स को गुजरात नरसंहार का करता घोषित कर रहे थे । इस बात से बेखबर की प्रोपेगेंडा की ताबूत में अंतिम कील ठोकने यही नरेंद्र दामोदरदास मोदी आ रहा है जिसे पूरे भारतीय जनमानस ने अपना सर्वाधिक लोकप्रिय नेता चुनकर 2014 में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित किया न सिर्फ स्थापित किया बल्कि उसके कार्यों और संकल्पों को दृष्टिगत करते हुए 2019 में पुनः जनादेश दिया । मानवतावाद के छद्म प्रहरीयों द्वारा मानवता के आलोक में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री न बनाए जाने देने की अपील बस भीड़ की अपील बन गई । 


आदरणीय नरेंद्र मोदी ही नहीं,अमित शाह, योगी आदित्यनाथ तथा अन्य राष्ट्रवादी नेताओं की छवि को धूमिल करने का सुनियोजित प्रयास किया गया। इस प्रयास में सूचना के सभी तंत्र संलग्न रहे । यह पूरी प्रक्रिया पूर्व निर्धारित योजना से चलती । पहले मानव हत्यारे,और मानवीय संवेदनाओं को स्पर्श करने वाले नाम घोषित किये जाते और फिर पूरे देश में नकारात्मकता का और डर का माहौल तैयार किया जाता । इन बातों को भोले भाले आम लोग और छात्र सच मानते । उनके परम आदरणीयों द्वारा जो हाथों में तख्ती लेकर यह प्रोपोगैंडा चलाया गया । दिल्ली विश्वविद्यालय में एनडीटीएफ ( दक्षिणपंथी ) के अग्रिम पंक्तियों के प्राध्यापकों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर प्राध्यापक भी अपनी विचारधारा अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त नहीं कर सकते थे ,मजबूरी थी 12 सालों से शोषणकारी तंत्र का भाग जो बन गए थे । मजबूरी थी और मजबूरी तो क्या-क्या करा देती है फिर यह तो स्थाई नौकरी से जुड़ा मसला था। लेकिन एनडीटीएफ के अग्रिम पंक्ति के उपरोक्त प्राध्यापकों ने जरूर एक स्वस्थ विमर्श को आकार दिया और ऐसे में स्वामी विवेकानंद की स्मारक के नीचे उपरोक्त जमावड़े के समानांतर ही नारों और विरोधों की आवाजें बुलंद होने लगी जो विकास के विजन पर बात कर रही थी । 


गुजरता दंगों का जिक्र होना और गोधरा ट्रेन को विषय से ही हटा देना , गुजरात की समृद्धता के ऐतिहासिक आधार खोजना और तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने की कोशिशों को ऐसे नारों और विमर्शों से कुछ विराम मिला । ठंड के उन दिनों में कुछेक लोग इन तथाकथिक समाज सुधारकों से प्रश्न पूछने का साहस भी करते थे यह वो लोग थे जो जानते थे कि तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर विचारधाराओं को कुचलने और निरीह जनता को भ्रामक स्थिति में डालने के लिए यह सब किया जा रहा है । वैसे भी अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद यह निरीह वर्ग भी अनजाने में ही राजनीतिक विचारों का वाहक बन गया था । सॉफ्ट टारगेट की इस नीति को कमोबेश पूरे भारत में पैदा करने का प्रयत्न किया गया लेकिन पूर्ववर्ती सत्ताधारी कांग्रेस को पता था उनका जमीनी आधार कुछ नहीं रहा है और युवाओं के अंदर एक नये शख्स का नाम घर कर चुका है और वह है नरेंद्र मोदी । इन युवाओं की चर्चा के केंद्र में गुजरात मॉडल, कॉमनवेल्थ घोटाले कॉल घोटाला,कश्मीर से आतंकवाद और विकास मुख्य विषय थे।  

 

वर्ष 2014 से अभी तक राष्ट्रीय नीतियों के मामलों पर विपक्ष को आप दुष्प्रचार में ज्यादा लगा हुआ पाते हैं । इसी दुष्प्रचार के तहत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रति वैचारिक वैमनस्य के बीज आम छात्रों के बीच भरने भरने शुरू हुए । मसलन बंगाल हिंसा और केरल में स्वयंसेवकों की हत्या करने वाली सरकारों के हिमायती और अवसरों पर अपनी सुविधा से मुंह खोलने वाले प्राध्यापकों,लेखकों और बुद्धिजीवीयों द्वारा आजादी के आंदोलन और अतिवादियों के साथ संघ के तार जोड़ने की कोशिश हुई । सब बिना तथ्यों,और प्रमाणों के । संघ के विचारों को मनमाफिक इन मीडिया चैनलों ने परोसा और एक बड़ा वर्ग इस साजिश को समझ नहीं पाया । इसी वैचारिक अधीनता के साथ विश्विद्यालय में शिक्षा का प्रचार प्रसार होता था । 



मीडिया चैनलों, पत्र पत्रिकाओं में चयनित आधार पर पत्रकारिता का कार्य होता रहा और तमाम विषयों को छोड़ दिया जाता जो अन्य राज्यों में हो रही हों फिर चाहे वह केरल में बेरहमी से मारे जा रहे स्वयंसेवकों के संबंध में हो या गुड़गांव , मुंबई में लाउडस्पीकरों के संबंध में या मॉब लांचिंग ,या फिर बंगाल,यूपी या दिल्ली दंगों में हुई हिंसा। 


देश के गृह मंत्री श्री अमित शाह भी इससे अछूते नहीं रहे । उनके लिए तो आम जनता के सम्मुख नकारात्मकता का वह अंबार लगाया गया जो तब ध्वस्त हुआ जब गृहमंत्री ने वर्ष 2017 में संसद में अपनी बातों को रखना शुरू किया । जिस तार्किकता और दृढ़ता से राष्ट्रीय महत्व के सभी विषयों पर उन्होंने स्टैंड लिया है वह काबिले तारीफ है । योगी आदित्यनाथ के संदर्भ में भी ऐसे दुष्प्रचारों को जो हवा दी गई वह भी तब स्पष्ट हुई जब स्वयं गोरखधाम के मुस्लिम समुदाय ने योगी आदित्यनाथ के समर्थन में वास्तविक तथ्यों को रखना शुरू किया ।


इस तरह दुस्प्रचारों के दौर से निकलकर, अफवाहों के बाजार से हम धीरे धीरे बाहर आ रहे हैं लेकिन सिस्टम को खोखला बनाने वाली दीमकों का चिन्हीकरण आवश्यक है । वर्ष 2014 से अभी तक के भारत के स्वर्णमयी यात्रा को प्रत्येक नागरिक ने अपने स्वतंत्र इंद्रियों से ग्रहण करना होगा। कश्मीर समस्या हल, नागरिकता अधिनियम,नोटबंदी,जीएसटी,आतंक निरोधी अधिनियम,और असामाजिक तत्वों से निपटान करती यह सरकार दृढ़ता के उस स्तर को दिखाती है जो लोकतंत्र का आधार है । जनतंत्र में सामाजिक जागरूकता लाना भी आदर्श नागरिक का कर्तव्य है और ऐसी सामाजिक जागरूकता राजनैतिक जागरूकता का मार्ग प्रशस्त करेगी वो दिन दूर नहीं ।


जय प्रकाश , सामाजिक कार्यकर्ता,और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं । वर्तमान में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं । इससे पूर्व बैंक अधिकारी एवं पूर्व महासचिव, किरोड़ीमल महाविद्यालय -दिल्ली विश्वविद्यालय रहे हैं ।

रविवार, 28 अगस्त 2022

अफवाहों से भरे बीते 8 वर्ष

 

जय प्रकाश पाण्डेय 


प्रोपेगेंडा' भारतीय राजनीति की वर्तमान आधारशिला बनता जा रहा है और भारतीय राजनीति अफवाहों के कलेवर में सड़कों में लग रहे जाम और नारों के बीच आगे बढ़ रही है जबकि भारत का लोकतंत्र अंतिम छोर में विकास और उत्थान के लिए संकल्पित जीवन अर्पण करने वाले व्यक्तियों को राष्ट्रपति के रूप में स्थापित करते हुए आगे बढ़ रहा है । दोनों के बीच बुनियादी फर्क साफ है । भारत का विपक्ष आज महज अफवाहों के ब्रांड अंबेडसर के रूप में स्थापित होते जा रहे हैं और सत्ता पक्ष लोकतंत्र को उसके गंतव्य तक पहुंचाने वाले साधन के रूप में । 



आज वर्ष 2022 में पहुंचकर , अतीत के 8 सालों को देखते हैं और भ्रष्टाचारियों,अर्बन नक्सलियों और असामाजिक तत्वों की खबरों को देखते हैं तो समझ आता है क्यों एक पूरा कुनबा इस विचारधारा को हराने के पीछे लग गया । विदेशी फंडिंग प्राप्त एनजीओ की कार्यशैली के नियमन संबंधी कानून हों ,भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कार्यवाही हो या फिर नक्सल प्रभावित राज्यों में अमन के साथ विकास के उपाय या फिर राष्ट्र विकास के कार्य , जिनके सरोकार प्रभावित होने वाले थे, अग्रिम पंक्ति में खड़े नारेबाज और आलोचक यही थे । शायद ये प्राध्यापकों, बुद्धिजीवियों, भ्रष्ट नेताओं का वर्ग इतना दूरगामी था कि इनको पता था देश में भारतीय जनता पार्टी के शासन का अर्थ । आज फेसबुकिया क्रांति करते ये लोग अभी भी पाए जाते हैं और अपनी असफल योजनाओं, प्रशासनिक अक्षमताओं को छुपाने में अनवरत रूप से संलग्न हैं । 



सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुख्यधारा के सभी मीडिया चैनलों ने वर्ष 2013 के उत्तरार्ध से ही जिसका प्रमुखता से मीडिया ट्रायल किया और प्रबुद्ध विचारकों ने जिसके विपक्ष में कहानियां,उपन्यास लिख डाले , बड़े बड़े शायरों ने शेर बना डाले ऐसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विशेष जांच दल द्वारा क्लीन चिट दी गई थी । उसके विपक्ष में दायर याचिका को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभी हाल में खारिज कर दिया गया है लेकिन जिस फर्जीवाड़े और नकारात्मकता का माहौल तथाकथित मुख्यधारा के चैनलों,बुद्धिजीवियों,विपक्ष के नेताओं द्वारा पहले बनाया गया था उसकी क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती । 

आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही नहीं,देश के गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा अन्य राष्ट्रवादी नेताओं की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया गया। इस प्रयास में सूचना के सभी तंत्र संलग्न रहे । यह पूरी प्रक्रिया पूर्व निर्धारित योजना से चलती । पहले मानव हत्यारे,और मानवीय संवेदनाओं को स्पर्श करने वाले नाम घोषित किये जाते और फिर पूरे देश में नकारात्मकता का और डर का माहौल तैयार किया जाता ।  


देश के गृह मंत्री श्री अमित शाह के लिए तो आम जनता के सम्मुख नकारात्मकता का वह अंबार लगाया गया जो तब ध्वस्त हुआ जब गृहमंत्री ने वर्ष 2017 में संसद में अपनी बातों को रखना शुरू किया । जिस तार्किकता, स्पष्टता और दृढ़ता से राष्ट्रीय महत्व के सभी विषयों पर उन्होंने स्टैंड लिया है वह काबिले तारीफ है । 


 उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के संदर्भ में भी ऐसे दुष्प्रचारों को जो हवा दी गई वह भी तब स्पष्ट हुई जब स्वयं गोरखधाम के मुस्लिम समुदाय ने योगी आदित्यनाथ के समर्थन में वास्तविक तथ्यों को रखना शुरू किया ।


यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि क्योंकि नागरिकों को यह समझना होगा कानूनी लंबित वादों के संबंध में मीडिया ट्रायल और तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा बयान, विचार तो दिए जा सकते हैं लेकिन कानूनी प्रक्रिया में फंसे व्यक्ति के सामने कानूनी प्रक्रिया का हवाला देना ही विकल्प बचता है क्योंकि यह कानूनी और संवैधानिक बाध्यता बन जाती है । इसी का फायदा पत्रकारिता से लेकर विश्विद्यालयों के प्राध्यापकों ने जमकर उठाया । और मानवीयता के उस क्षरण बिंदु पर लाके खड़ा किया जहां अफवाहों,मनगढ़ंत तथ्यों के आधार पर मीडिया ट्रायल किया जाने लगा ।



वर्ष 2013 के उत्तरार्ध से अभी तक राष्ट्रीय नीतियों के मामलों पर विपक्ष को आप दुष्प्रचार में ज्यादा लगा हुआ पाते हैं । इसी दुष्प्रचार के तहत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रति वैचारिक वैमनस्य के बीज आम छात्रों और आम जनमानस के बीच भरने शुरू हुए । मसलन बंगाल हिंसा और केरल में स्वयंसेवकों की हत्या करने वाली सरकारों के हिमायती और अवसरों पर अपनी सुविधा से मुंह खोलने वाले प्राध्यापकों,लेखकों और बुद्धिजीवीयों द्वारा आजादी के आंदोलन और अतिवादियों के साथ संघ के तार जोड़ने की कोशिश हुई । सब बिना तथ्यों,और प्रमाणों के । संघ के विचारों को मनमाफिक इन मीडिया चैनलों ने परोसा और एक बड़ा वर्ग इस साजिश को समझ नहीं पाया । 


अवार्ड वापसी गैंग, मॉब लिंचिंग,कलबुर्गी सरीखे विद्वानों की हत्या, गोकशी, नागरिकता अधिनियम, धारा 370 , रोहिंग्या विवाद और कृषि विधेयक इन सभी घटनाओं के आलोक में वर्ष 2014 से अभी तक के भारत को देखेंगे तो हम पाएंगे देश में संसद को छोड़कर हर जगह जनता को बरगलाने का, विरोध का और अधूरी जानकारियों को फैलाने का माहौल तैयार किया जा रहा है । 


संसद में यह स्थिति पैदा करने के लिए विपक्ष के पास जनादेश नहीं है और स्वस्थ विमर्श तो विपक्ष की सोच से परे है। ऐसे में माहौल के निर्माणकर्ताओं का चरित्र और व्यक्तित्व दोनों धीरे धीरे बाहर आ रहा है । गत दिनों पूर्व हुई कुछ गिरफ्तारियों को भी इन अफवाहों के सृजनकर्ता की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है । ऐसे माहौल के सृजनकर्ताओं ने मानों मन में ठाना है कि इफ यू कांट कन्वींस दैन कन्फ्यूज् ( यदि आप भरोसे में नही ले सकते तो असमंजस में डाल दें) और देश के नागरिक अपने जीवन की आपाधापी के बाद इन्हीं विषयों में विमर्श में लगे हैं जबकि यह ऐसा दशक होने जा रहा है जो भारत के गौरवमयी इतिहास और स्वर्णिम भविष्य को विश्वमंच में स्थापित करता दिख रहा है। । शेष बचे विमर्श को संसद में बैठे विपक्ष के वकील सांसद पूरा कर देते हैं जिनको तोड़ने मरोड़ने और जोड़ने की विशेषज्ञता होती है । खाली खजानों के बाद भी देश में हो रहे अनगिनत विकास के कार्यों को प्रिंट मीडिया और सोशल साइट्स में विरले ही जगह मिली है । मिर्च मसालेदार आधे अधूरे तथ्यों को ही खबर बनाने की होड़ ने भारत को नुकसान पहुंचाया है जिस पर विवेचना अत्यंत आवश्यक है। 


भारत ने विश्व के अन्य प्रमुख देशों के सामने भी खुद को सशक्तता के साथ आज स्थापित किया है लेकिन राजनीतिक अखाड़े ने भारत में आए बदलाव पर विमर्शों को मौन कर दिया क्योंकि भले ही सरकार भारतीय जनता पार्टी की हो अभी भी ऐसी कई दीमकें प्रणाली में विद्यमान हैं जो प्रजातंत्र की सफलता में बाधक हैं। ये वहीं दीमकें हैं जिन्होंने न समय पर आतंकवाद के निस्तारण के लिए प्रायोगिक योजनाएं बनाई न ही समय से प्रतियोगी परीक्षाएं करवाई । न ही सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास कार्य किया न ही लक्षद्वीप सरीखे संभावनाओं के द्वारों में पर्यटन संभावनाओं को खोज की । न ही नक्सलवाद को नियंत्रित करने के लिए नीतियां बनाई और न ही पूर्वोत्तर भारत को मुख्यधारा में लाने के प्रयास किए । कोशिशें अब ऐसे दीमकों से बचने की होने चाहिए ।



इस तरह दुस्प्रचारों के दौर से निकलकर, अफवाहों के बाजार से हम धीरे धीरे बाहर आ रहे हैं लेकिन सिस्टम को खोखला बनाने वाली दीमकों का चिन्हीकरण आवश्यक है । वर्ष 2014 से अभी तक के भारत के स्वर्णमयी यात्रा को प्रत्येक नागरिक ने अपने स्वतंत्र इंद्रियों से ग्रहण करना होगा। 


दरअसल अफवाहें, दुष्प्रचार अपने साथ सत्य को दबाए रखते हैं और हम यह तब समझ पाते हैं जब ऐसी अफवाहें और दुष्प्रचार अपना कारनामा कर चुकी होती हैं । 

आज देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और स्वयं आदरणीय सर संघचालक जी द्वारा भी इन अफवाहों को विभिन्न माध्यमों से नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है और सकारात्मकता की तरफ समाज को ले जाने के प्रयास किए गए हैं लेकिन फेसबुकिया क्रांतिकारियों को इन विचारों को सुनने समझने और देखने की फुरसत नहीं ।

कश्मीर समस्या हल, नागरिकता अधिनियम,नोटबंदी,जीएसटी,आतंक निरोधी अधिनियम,और असामाजिक तत्वों से निपटान करती यह सरकार दृढ़ता के उस स्तर को दिखाती है जो लोकतंत्र का आधार है । जनतंत्र में सामाजिक जागरूकता लाना भी आदर्श नागरिक का कर्तव्य है और ऐसी सामाजिक जागरूकता राजनैतिक जागरूकता का मार्ग प्रशस्त करेगी इसी उम्मीद के साथ हमें जागरूकता के दूत बनने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा ।


लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।

गुरुवार, 25 अगस्त 2022

दिन ढल जाए : ईडी, सीबीआई सताए

 

अगली बार कोई पूछे कि देश में क्या चल रहा है तो बेधड़क बोलिए देश में आजकल सीबीआई, ईडी, एसटीएफ चल रहा है । फुर्सत मिली तो कभी रणबीर सिंह की तो कभी प्रेगनेंट कलाकारों के बेबी बंप की तस्वीरें भी चल रही हैं । बस कुछ मत बताइए तो ये कि कैसे पर्चे लीक होने का ट्रेंड देश में बढ़ रहा है और कैसे कैश दो नौकरी लो 

की जड़ें प्रायः अधिकतर राज्यों में अपनी जड़ें जमा चुकी है । 


सीबीआई से ध्यान आया दिल्ली का । वहां के शिक्षा मंत्री के पीछे भी सीबीआई लगी है । दिल्ली में ही तो पूर्व सरकार के वित्त मंत्री भी पाए जाते हैं उनके भी पीछे ईडी पड़ी है । कुछ महीनों पहले कोरोना योद्धा के रूप में सामने आए सोनू सूद के भी पीछे ईडी पड़ी थी। लालू जी का हाल किसी से छुपा है नहीं । इनको भी ऊपर सीबीआई, ईडी का वक्तानुसार वरदहस्त प्राप्त होता रहता है । इसी बीच देश की प्रमुख राजनैतिक पार्टी के मुखिया और विपक्ष के आधारस्तंभ राहुल गांधी भी इसी क्रम का हिस्सा रहे।  


 उपरोक्त पूरे घटनाक्रमों में एक चीज स्पष्ट है और वह है ईडी और सीबीआई की बड़ी सक्रियता । इन सक्रियताओं की तरफ युवाओं का एक बहुत ही बड़ा वर्ग बड़ी उम्मीद से देख रहा है । यह वही वर्ग है जिसने बिहार में पेपर लीक से लेकर उत्तर प्रदेश में नोट के बदले नौकरी का दंश झेला है , जिसने उत्तराखंड में राजनैतिक संरक्षण प्राप्त नेताओं की मिलीभगत से विलंबित और निलंबित होती प्रतियोगी परीक्षाएं देखी हैं। कहने को तो ये 

युवा किसी देश के मेरुदंड होते हैं लेकिन सरकारी नौकरियों के बदलते ट्रेंड ने इनकी ही मेरुदंड को सबसे ज्यादा नुकसान किया है । कोरोना काल के बाद युवाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग प्रतियोगी परीक्षाओं में कहीं उम्र की पात्रता से वंचित हो तो कहीं जेब में पैसों की कमी के चलते तेजी से डिप्रेशन की तरफ बढ़ता जा रहा है जिसके लिए न ही किसी भी प्रकार का सर्वेक्षण किया गया है और न ही इस आवश्यकता को महसूस किया गया है। तमाम स्वरोजगार योजनाओं की पात्रता से वंचित युवाओं का वर्ग इस उम्मीद में है कि अंतरराज्य गुटों की सक्रियता को देश की सीबीआई नियंत्रित करे । शिथिल कानूनों का फायदा उठाकर नौकरियों के ठेकेदारों ने पूरे युवाओं के साथ धोखा किया है। हाल ही मैं उत्तराखंड में पेपर लीक प्रकरण में जिस प्रकार 2 दर्जन के आसपास गिरफ्तारियां भारत के अलग अलग हिस्सों से हो रही हैं तथा पकड़े जाने वाले लोग राजनीतिक सरोकार रखने वाले हैं ऐसे में सीबीआई जांच के अलावा और कोई विकल्प युवाओं को नहीं दिखता । मसलन सामने आ रहे कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि परीक्षा कराने के लिए एक राज्य में प्रतिबंधित संगठन को ही दूसरे राज्य में अनुमति दी गई हैं। ऐसे गैर जिम्मेदार व्यवहार के लिए कौन दोषी है ? क्या सरकारी तंत्र में यह देखने की भी फुर्सत नीति नियंताओं को नहीं है कि जिन एजेंसी का सहारा लिया जा रहा है उनका इतिहास क्या है ? और ऐसे में कोई भी समाज के प्रबुद्ध वर्ग का सदस्य इस प्रक्रियाओं पर सवाल उठाएगा ही इसमें कोई शक नहीं ।


जब देश में सीबीआई, ईडी की सक्रियताओं का प्रचलन बड़ा है तो क्यों न जिन जिन राज्यों में ऐसी नकल की घटनाएं हुई हैं वहां चयन बोर्ड के सभी सदस्यों की आय की जांच सीबीआई द्वारा की जाए ? राज्य एसटीएफ के स्थान पर क्यों नहीं इन विषयों की सीबीआई से जांच कराई जा रही है यह यक्ष प्रश्न आज युवाओं को परेशान किए हुए है ?


 भारत के युवाओं में आज निराशा अपना घर कर रही है । विश्विद्यालयों में स्थाई नियुक्तियां ठंडे बस्ते में पड़ी हैं । आयोजित हुई प्रतियोगी परीक्षाओं में गोलमाल की संभावनाओं का हिस्सा ज्यादा है । राज्य सरकारों द्वारा आयोजित परीक्षाओं के परिणाम आते नहीं कि न्यायालय में वाद दायर हो जाते हैं । अग्निवीर योजना की भर्ती में अभ्यर्थियों को दौड़ हेतु प्रस्तावित समय से कम समय दिया जा रहा है । 12 वीं के बाद आईआईटी, मेडिकल और विश्वविद्यालयों की राह देख रहे बच्चों की प्रवेश प्रक्रियाएं शुरू नहीं हुई हैं । ऐसे में लीक होते पर्चे और बिकती सरकारी नौकरियां अनिश्वितताओं का दौर अपने साथ लेके आ रही हैं ।

ऐसे दौर में सीबीआई जांच और समयबद्धता से प्रतियोगी परीक्षाओं की राह देखता युवा मन देश में ही विलग होते जा रहे हैं जिस ओर ध्यान दिया जाना वक्त की मांग है । 


जय प्रकाश पाण्डेय 

लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

हिंदूफोबिक फिल्में और नागरिक कर्तव्य

भारत की आजादी के 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं । आज जब देश स्वतंत्रता के विजय जश्न को महसूस कर रहा है ऐसे में आर्टिस्टिक फ्रीडम के आधार पर हिंदूफोबिक फिल्मों के बढ़ते प्रचलन पर भी चर्चा आवश्यक हो जाती है । ओटीटी प्लेटफार्म के आने के बाद तो इस विषय पर गहन चिंतन वक्त की मांग बन चुका है । अक्सर फिल्म निर्माताओं द्वारा जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कल्पना तत्व के समावेश की बात कही जाती है वह स्वतंत्रता प्रायः मात्र हिंदू देवी देवताओं के चित्रण और हिंदुओं के पवित्र ग्रंथों और उनके त्यौहारों के ही आसपास सीमित रहती है । ऐसे में अत्यंत आवश्यक है कि धार्मिक-ऐतिहासिक विषयों पर फिल्म निर्माण हेतु कठोर नियमों बनाएं जाएं ताकि सामाजिक सौहार्द की भावना स्थापित रहे । 


हालांकि हिंदूफोबिक शब्द की कोई सर्वमान्य परिभाषा अभी नहीं है लेकिन हिंदूफोबिक फिल्मों से तात्पर्य ऐसी फिल्मों से है जिसमें हिंदुओं की सनातनी सांस्कृतिक,सामाजिक धरोहरों के विरुद्ध दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है । जहां सनातनी मान्यताओं का परिहास किया जाता है, सनातनी व्रत -त्योहारों का उपहास होता है और ये इतने योजनाबद्ध और बौद्धिक तरीके से होता है कि फिल्म को 3-4 बार देखने के बाद भी सामान्यजन इस बात को समझ नहीं पाता । कुछ फिल्मों में यह फोबिया गलत तथ्यों को पेश कर या अपने हिसाब से तथ्यों को बदलकर स्थापित किया जाता है। जिस फिल्मी क्षेत्र में फिल्मों की रेटिंग और समीक्षा से लेकर कास्टिंग तक और शोध के नाम पर इस तरह के संवेदनशील विषयों को दरकिनार कर दिया जाता है वहां देश की आबादी के एक बड़े वर्ग के अंदर इस फोबिया के विरुद्ध विरोध चलता रहेगा इसमें कोई शक नहीं है । 


सनातन संस्कृतियां अपने मूल संस्कारों को त्यागे बिना पुराने जर्जर हो चुके ताने- बाने को छोड़कर प्रगतिशीलता के साथ आगे बढ़ी हैं । सनातन संस्कृति ने वक्त के साथ प्रगतिशीलता को चुना और यही कारण हैं कि सनातन धर्म इतने प्राचीन समय से आश्चर्य,जिज्ञासा और समर्पण का विषय सबके लिए रहा है । लेकिन इस सच को फिल्मों में देखने के अवसर कम ही प्राप्त हुए हैं । 

संभवतः इसलिए की आजादी के बाद एक समय तक भारतीय सिनेमा में एक धर्म विशेष के लोगों का पैसा, एक धर्म विशेष के लोगों का प्रभुत्व और एक धर्म विशेष के लोगों का ही सिनेमा बना हुआ था जिसकी सीमाओं को तकनीकी क्रांति ने वर्तमान समय में तोड़ा है । 


हिंदुओं और उनकी मान्यताओं पर सुनियोजित तरीके से पिछले 75वर्षो में फिल्म जगत के अधिकांश स्थापित चेहरों ने हमले किए हैं और ये ऐसे सुनियोजित हमले रहें जिन्होंने सेक्युलरवाद का झुनझुना आम हिन्दू को पकड़वा दिया और सांस्कृतिक सनातनी मान्यताओं को विस्मृत कराने की कोशिश की । 80 के दशक की एक फिल्म में एक हिंदू पुजारी को एक हत्यारे के रूप में और एक हिंदू मंदिर को अपराध के जनक क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया है जो हिंदुओं के बारे में नकारात्मक पूर्वाग्रह पैदा करता है। इस फिल्म में एक किरदार का नाम कृष्णा रखा गया था और उन्हें सड़कों पर महिलाओं के साथ बदसलूकी करने की भूमिका के साथ एक बांसुरी दी गई थी। इतने घटिया चरित्र वाली ऐसी फिल्म में भगवान कृष्ण का नाम इस्तेमाल किया गया। क्या ऐसी स्थितियों को महज संयोग कहना सही होगा या फिर ये किसी अन्य चीजों की तरफ ईशारा कर रही हैं जिसके लिए स्तरीय शोध की अत्यंत आवश्यकता है। 



हिंदूफोबिक फिल्मों का दूसरा स्तर वह है जहां ऐतिहासिक तथ्यों से तोड़- मरोड़ की जाती है और हिंदुओं के अतीत को पराजित, दीन हीन, मुस्लिम आक्रांताओं से हताश -निराश जाति के रूप में स्थापित करने की कोशिश की जाती है । पद्मावत से लेकर पृथ्वीराज तक की फिल्में इसी सीमा में आती हैं । ऐसी फिल्मों में कल्पना तत्व समावेशित करने का नुकसान यह है कि न ही ये इतिहास सम्मत रह पाती हैं और न ही लोक सम्मत । 


 ऐतिहासिक फिल्मों का एक खास सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव लोगों के साथ होता है ऐसे में ऐतिहासिक विषयों पर कितनी स्वतंत्रता एक फिल्म निर्माता ले सकता है यह विषय अब तय होना चाहिए । इतिहास से गैर सम्मत और कल्पना के साथ बनाएं गए नैरेटिव को तो दिखाना ही नहीं चाहिए क्योंकि इससे न सिर्फ भावनाएं आहत होती हैं बल्कि गलत इतिहास की नींव भी रखी जाती है । जिस जगह इतिहास मौन हो जाता है, वहां कल्पना का विस्तार होना चाहिए। लेकिन अब हालत यह हो गई है कि फिल्में, धारावाहिक बनाने के पहले ही साफ लिख दिया जाता है कि धारावाहिक की सभी घटनाएं और पात्र काल्पनिक हैं। इस तरह का काम तो इतिहास के साथ मजाक ही कहा जा सकता है। ऐसा होना इतिहास और उस स्थान दोनों के लिए विध्वंसकारी है।


भारतीय सेंसर बोर्ड अभी भी सीमित शक्तियों के साथ फिल्मों के नियमन और कैटेगरी वर्गीकरण का कार्य ज्यादा करता आया है । इधर सेंसर बोर्ड ऐसे सीन और शब्दों की संख्या बढ़ाता जा रहा है जिन पर डिसक्लेमर या बीप आती है। फिल्मों में ऐसे डिस्क्लेमर और बीप का प्रयोग बढ़ा ही है ।

इस विषय पर अब सेंसर बोर्ड की भूमिका से ज्यादा नागरिकों की भूमिका सामने आती है । फिल्म निर्माताओं को समाज का आईना बनने के लिए, समाज के बिखरे कई अनसुने,अनजान किस्सों को स्क्रीन उपलब्ध कराने की तरफ आगे बढ़ना चाहिए । फिल्म निर्माताओं को भविष्य के भारत के विकासपरक नजरिए से चिंतनशील सृजन की तरफ आगे बढ़ना चाहिए न कि अंतर्मन में सामाजिक वैमनस्य को फैलाते सृजन की तरफ ।

वर्तमान समय में जहां ओटीटी प्लेटफॉर्म भी एक नए मंच के रूप में सामने आ रहे हैं वहां इस देश के नागरिकों को चाहिए कि किसी भी धर्म विशेष, संस्कृति विशेष पर नकारात्मक रवैया रखने वाली फिल्मों,धारावाहिकों आदि का सामूहिक बहिष्कार करें । यही नागरिक कर्तव्य का बोध न केवल हिंदूफोबिक फिल्मों/ धारावाहिकों के विस्तार को रोकने में सहायता देगा बल्कि सामाजिक सौहार्द्रता का वातावरण भी स्थापित करेगा, इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है ।


लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।

  

 .

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

लीक होते प्रश्नपत्र, निराश होता युवा ।

 


युवा किसी देश के मेरुदंड होते हैं । किसी देश की समृद्धि में युवाओं के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोलन से लेकर सम्पूर्ण क्रांति व अन्ना हजारे आंदोलन तक, वर्तमान भारत के विकास में एक उल्लेखनीय भूमिका निभाई है । कुछ समय पूर्व यही युवा वर्ग लखनऊ में उत्तर प्रदेश सब इंस्पेक्टर परीक्षा धांधली के विरोध में अपने अधिकारों के लिए मुखर हो रहा था। कुछ महीनों पूर्व यही युवा बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा के लीक प्रश्नपत्र के लिए मुखरित हुआ था । व्यापम घोटाले के सामने आने पर भी यही युवा मुखरित हुआ था और आज फिर से उत्तराखंड में भी यही हाल निर्मित हो रहे हैं । बस अंतर इतना है कि अन्य राज्यों ने जहां एसआईटी, एसटीएफ, सीबीआई के साथ साथ अपने निगरानी तंत्र को मजबूत करने की कोशिश की वहीं उत्तराखंड में ऐसे पेपर लीक न हों इसके लिए एसटीएफ, एसआईटी जांच के अलावा परीक्षा के प्रारूप को ही बदलने की चर्चाएं शुरू हो रही है, इससे युवाओं का वह वर्ग जो पिछले 5-7 सालों से तैयारी में लगा था उसके ऊपर प्रतिकूल फर्क पड़ेगा इसमें कोई दो राय नहीं । समूह ग स्तर पर आयोजित होने वाले परीक्षाओं में द्वितीय स्तर पर लिखित परीक्षा संबंधी चर्चाएं कोचिंग सेंटरों के हक में ज्यादा, और छात्रों के हकों में कम प्रतीत होता है । 


इन सब के बीच सबसे हैरानी का विषय यह रहा है कि अपने अधिकारों के लिए सबूतों की पोटली लिए घूमते और आंदोलन का मार्ग तय करते अधिकतर छात्रों को ऐसी किसी मांग के एवज में खुद पर एफआईआर झेलनी पड़ती हैं और ऐसी आवाजों का साथी कोई बन नहीं पाता । अब वह समय आ गया है जब इन विषयों पर खुलकर विमर्श हों । अब इस तरफ सोचना अपरिहार्य हो गया है कि इन परीक्षाओं से संबंधित आला अधिकारियों की आय की एसआईटी नहीं बल्कि सीबीआई जांच हो और प्रक्रियाएं पारदर्शी हों । सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को भी सम्मिलित करते हुए नीतियों का खाका खींचा जाए और प्रतियोगी परीक्षाओं के नीतिगत निर्णयों, प्रारूपों या अन्य निर्णयों में उम्र के आधार पर 21 से 35 के स्पष्ट परिभाषित युवाओं को सम्मिलित किया जाए न की राजनैतिक पार्टियों के युवा संगठनों में होने वाली उम्र की पात्रता के आधार पर । 



ऐसे युवाओं को मौजदूगी प्रशासनिक तंत्र और सिविल सोसाइटी के तंत्र में पर्याप्त है, जरूरी है तो अपने इगो, और वरिष्ठता के दंभ को किनारे रखकर जमीनी स्तर पर निर्णयों, योजनाओं के क्रियान्वयन की । आज वह समय आ गया है कि इस विषय पर जन पटल पर परिचर्चा हो कि परीक्षा केंद्रों को किन आधारों पर संबद्ध किया जाता है ? किन आधारों पर ऐसे केंद्रों को परीक्षा केंद्र बनाया जाता है जहां स्नातक डिग्री के आधार पर परीक्षा दे रहा छात्र कक्षा 5 में पढ़ने वाले बच्चे के टेबल- कुर्सी में बैठकर परीक्षा देता है ? 2 घंटे की परीक्षा में जहां दशमलव का भी महत्व होता है वहां इन भौतिक कमियों को आज के समय में तो हम दरकिनार कर ही नहीं सकते। किन आधारों पर ऐसे परीक्षा केंद्रों को संबद्ध किया जाता है जहां बाहर से परीक्षा देने आए छात्रों के बैग रखने और चिलचिलाती गर्मी में पंखे तक की व्यवस्था नहीं होती ? ऐसे परीक्षाकेंद्र कैसे संबद्ध हो जाते हैं जहां अलग कमरे में बैठा के पेपर लीक कराया जाता है। आज वह समय आ गया है जब इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के क्रम में उत्तरदाई आला अफसरों पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही हो । 




सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस तरह सभी परीक्षाओं के प्रारूप ऑनलाइन होते जा रहे हैं ऐसे में सूचना तंत्र और तकनीक के द्वारा व्यापक स्तर पर इन परीक्षाओं को प्रभावित किया जा सकता है इसमें कोई दो राय नहीं है । और ऐसे में अन्य राज्यों की साइबर सेल के भी समन्वित सहयोग के द्वारा ही इन चीजों को रोका जा सकता है । ऑनलाइन प्रारूप की परीक्षाओं ने भी भारत के उन गांवों, उन पहाड़ी क्षेत्रों में जहां फोन के कनेक्शन तक नहीं आते वहां के युवाओं को आईआईटी,मेडिकल आदि क्षेत्रों से प्रायः दूर रखने में महती भूमिका बनाई है ।


ऐसा नहीं है कि अतीत की प्रश्नपत्र लीक होने वाली घटनाओं के सीख नहीं ली गई है । पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा केंद्रों में प्रवेश के समय नकल रोकने के लिए कपड़ों की बाहें तक कटवाई गई हैं । केरल में छात्राओं को इनर वियर उतारने के लिए हाल ही में नीट की परीक्षा के दौरान निर्देशित किया गया । अन्य जगहों पर समय समय पर नाक -कानों की परंपरागत बालियां तक उतरवाई गई हैं । सांस्कृतिक और परंपरागत प्रतीकों जैसेेे रक्षा कवच को परीक्षा केंद्रों में कैंची से काट कर कूड़ेदान में फेंका गया है । ऐसे में इन सभी चीजों को सह रहा वास्तविक युवा यही चाहता है कि ढकोसले में न पड़कर वास्तविक रूप से प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और परीक्षा को परीक्षा जैसे बनाए रखने का काम हो । उपरोक्त बताए गई वास्तविक घटनाएं कितना नकल रोकने में सक्षम हैं यह सोचनीय विषय है । और यदि उपरोक्त के आधार पर नकल रोकने की हम उम्मीद कर रहे हैं तो हम डिजिटल होते भारत की समझ से काफी दूर हैं । 




एक मामले में अब स्पष्टता आवश्यक है युवा आखिर किसे माना जाए । भारत के लिए दिक्कत यह है कि सरकारी आंकड़ों में हम जिसे युवा मानते हैं, उसका प्रतिनिधित्व राजनीतिक पार्टीयों के पैंतालीस के आसपास के नेता करते हैं । नीतिगत फैसलों में भी वही अधिकारी प्रायः शामिल हैं जिनकी उम्र चालीस-पैंतालीस की दहलीज पार कर गई है । युवापन एक मानसिक मनोदशा है जिसका उम्र के साथ कोई संबंध नहीं है । मसलन एक 60 साल का व्यक्ति भी युवा हो सकता है । यह बात बिल्कुल सही है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उम्र और मानसिक शारीरिक स्थिति के आधार पर युवाओं का वर्गीकरण और नियमन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अत्यंत आवश्यक है , खासकर जब ये विषय देश की मानव पूंजी, कार्यशील जनसंख्या और राष्ट्र विकास से जुड़े हों ।आज यह आवश्यक है कि परीक्षा केंदों में नकल रोकने के नाम पर हमारी सांस्कृतिक पहचानों को कूड़े के डब्बों में न स्थान मिलें । आवश्यक है कि स्वतंत्र,पारदर्शी प्रणाली से नियमित प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित हों ताकि वास्तविक युवा भारत के विकास में सक्रिय सहयोग दे पाए । 






लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।


सोमवार, 25 जुलाई 2022

भारत में सैनिकों के मानवाधिकार दशा और दिशा । जय प्रकाश पाण्डेय

 


क्या आप को शहीद राजेंद्र सिंह का नाम याद है ? यह नाम इस लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मानवाधिकारों की पैरोकारी करते तमाम बुद्धिजीवियों, शोध विश्लेषकों की जुबां इस नाम के लिए खामोश है | ख़ामोशी इसलिए है कि सेना की वर्दी पहने व्यक्ति के लिए मुखरित होने के लिए कोई आवाजें नहीं हैं | 


 संविधान द्वारा प्रदत्त गरिमा पूर्वक जीवन जीने के अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार एवम आत्मरक्षा के अधिकार के प्रावधान प्रायः सेना के लिए नदारद ही रहे हैं | क्या आपको जुलाई 2018 की वह घटना याद है जब भारतीय वायु सेना का मिग 21 विमान पठानकोट से चलकर कांगड़ा में दुर्घटना ग्रस्त हुआ । भारतीय वायु सेना के पिछले 10 सालों में ऐसे 31 एयरक्राफ्ट दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं ।क्या आपको जुलाई 2018 में ही कश्मीर घाटी में छुट्टी पर घर गए 4 सुरक्षाकर्मियों की आतंकवादियों द्वारा कायरतापूर्ण हत्या याद है ?क्या आपको वर्ष 2017 में कश्मीर के सोपिया में लेफ्टिनेंट उमर फय्याज के विवाह समारोह से कत्लेआम का दृश्य याद है ? यदि आपका जवाब नकारात्मक में है 

तब फिर -


धूल साफ कर जो तस्वीरें शान से आज सजाई हैं, इससे पहले इनकी याद किसे कहां और कब आई है । ये पंक्तियां हमारी मनःस्थिति पर सटीक बैठती हैं । 

 

एक सैनिक इस स्थिति से भलीभांति परिचित होता है कि देश की सुरक्षा के लिए एक एक गोली को उसने अपने सीने में लेके भी देश की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है लेकिन वह इस स्थिति से परिचित नहीं होता है कि वांछित उपकरणों के बिना युद्ध में उसे शहीदी हासिल हो सकती है ।यह शहीदी केवल युद्ध में ही नहीं बल्कि स्टोन पेल्टर्स द्वारा, खराब जीपीएस आधारित उपकरणों और गैर बुलेटप्रूफ वर्दी एवम वाहनों से भी प्राप्त हो सकती है ।वह इस स्थिति से परिचित नहीं होता कि मैम साहबों के प्यारे टॉमी की मॉर्निंग वॉक भी उसे ड्यूटी के रूप में हासिल हो सकती है । और इस प्रकार की स्थितियों को मानवाधिकारों के आलोक में देखने से स्थिति सही हो सकती है इसमें दो राय नहीं । 

भारत में तो सुरक्षा एजेंसियों के मानव अधिकारों पर चर्चा और भी अनिवार्य हो जाती है । देश में चरमपंथी तत्वों की मौजूदगी इस विषय पर और भी सशक्तता से सोचे जाने कि मांग करती है । चीन, इजरायल,आदि देशों ने अपने यहाँ सेनाओं में कार्यरत सैनिकों के मानवाधिकारों को समझते हुए पत्थर फेंकने वाले आम सिविलियन के खिलाफ फायर आर्म्स उपयोग करने की अनुशंसा की हैं । 

भारत में यह भी देखने को मिलता है कि देश की सम्प्रभुता के लिए खतरा बनते चरमपंथियों द्वारा स्थानीय नागरिको को बरगलाकर लालच देकर या मानसिक प्रताड़नाओं द्वारा हमारी सेनाओं पर प्रायोजित हमले कराये जाते हैं । कभी कभी यह हमले किसी आतंकवादी को बचाने के लिए ढाल का काम करते है तो कभी कभी यह हमले हमारे सैनिको को मौत के मुँह में धकेलते है । नक्सलबाड़ी क्षेत्रों में कई बार राज्य प्रशासन और केंद्रीय सेनाओं के ईगो,अधिकार क्षेत्र की लड़ाई में या तो हमारे जवान शहीद होते हैं या फिर इतने प्रयास से की गई रेकीयां असफल हो जाती हैं ऐसे में इन स्थितियों से यदि किसी सैनिक की शारीरिक,मानसिक,स्थिति प्रतिकूलित होती है तो उसे मानव अधिकारों के पैरोकार देख नहीं पाते । 


मानव अधिकार और सेना इन दोनों में संबंध स्थापित करने की यदि हम कोशिश करें तो हमको सेना के द्वारा मानवधिकार हनन की तमाम खबरें, एफआईआर के कलेवर में या केस के रूप में मिल जाते है वही शहीद राजेंद्र सिंह जैसे शख्स जिनको भीड़तंत्र द्वारा स्टोन पेलटिंग के तहत मार दिया जाता है , पर तमाम विमर्श मौन हो जाते है | बोफोर्स जैसे घोटाले और आधुनिक सुविधाओं से वंचित सेनाओं के लिए आवाजें उठती इस देश में कम ही दिखती हैं । और सेवा नियमावली से बंधे हमारे सैन्य बल अपने मानव अधिकारों को खोते नजर आते हैं ।

स्टोन पेल्टर्स के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस ले लिए जाते हैं जो कि एक तमाचा होता है देश के सैन्य बलों के ऊपर जो यह घोषित करता है कि सैन्य बलों से ऊपर भी बढ़कर लोक लुभावन राजनीति है । ऐसे कदम सैन्य बलों के मनोबल को तोड़ने का काम करते हैं । हाल ही में ब्रिटिश सेना द्वारा अपने सैनिकों को उनके कार्यरत क्षेत्र में भी मानवाधिकार प्रदत्त किए गए हैं । कॉम्बैट इम्यूनिटी का भी अधिकार ब्रिटिश संसद ने अपने सैन्य बलों को दिया है । भारत में स्थिति अभी इसके उलट है । तमाम केसों में सैन्य संस्थाओं द्वारा जांच की गई हैं जिनकी जानकारी आम जनमानस को नही हैं । 

 संविधान का अनुच्छेद 33 मौलिक अधिकारों के अपवाद के रूप में दिखता है । अनुच्छेद 33 के तहत प्रदत्त अधिकारों का उल्लेख यहां महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी अनुच्छेद के कारण हमारे सैन्य बलों की आवाजें हम तक नहीं पहुंच पाती । अनुच्छेद 33 अपने आप में किसी भी अधिकार को समाप्त नहीं करता है; इसकी प्रयोज्यता संसदीय विधान पर निर्भर करती है।अनुच्छेद 33 संसद को यह अधिकार देता है कि वह सशस्त्र बलों , अर्ध-सैनिक बलों , पुलिस बलों, खुफिया एजेंसी एवं अन्य के मूल अधिकार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकें।ऐसा इसलिए ताकि उनके कर्तव्यों का उचित पालन और उनमें अनुशासन बना रहना सुनिश्चित रहे।

इसी व्यवस्था का इस्तेमाल करते हुए संसद ने सैन्य अधिनियम 1950, नौसेना अधिनियम 1950, वायु सेना अधिनियम 1950, सीमा सुरक्षा बल अधिनियम आदि बनाए है।

इस बात पर कोई दो राय नहीं देश की संप्रभुता और सीमाओं की रक्षक सैन्य सेवाओं को अनुशासन और कार्यदक्ष होना चाहिए लेकिन हाल ही में तमाम केसों में तथा आर्म्ड फोर्सेज के ट्रिब्यूनलों से प्राप्त निर्णयों को देखकर यह कहा जा सकता है कि न्याय का सिद्धांत इन देश सेवा में लगे सैन्य बलों से अभी दूर है । हमारे पास कोई ऐसी प्रणाली नही है जिससे सैन्य बलों के अंदर असुरक्षा, हताशा और अस्तित्ववादी प्रवृति को पहचान कर उसे कम किया जा सके ।

अतः ऐसे में आवश्यकता है ऐसे अधिकारों को प्रदत्त करने की जिनसे उनके अनुशासन में फर्क आए बिना उनके मानव अधिकार भी संरक्षित किए जा सके । 

 

कल्पना करें आप ऐसे सैनिक की जो गलवान घाटी में बिना अच्छी क्वालिटी के जूतों और लड़ाकू साधनों के साथ निगरानी कर रहा है, या फिर कल्पना करें सियाचिन में कार्य कर रहे सैनिक की जिसको खून जमा देने वाली ठंड में गर्म रखने के लिए ढंग की वर्दी तक प्राप्त नहीं है या फिर कल्पना करे युद्ध में जाते वाहन की जो तकनीक से लेकर अपनी अवस्था तक में इतना जर्जर हो चुका है की सामान्य माइनिंग से उड़ जाता है तो ऐसे में क्या ये सभी प्रश्न जीवन जीने के अधिकार के अंतर्गत नहीं आयेंगे । क्या ऐसी किसी घटना के लिए मानवाधिकार के प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते ? 


वर्ष 2014 के बाद देश में जिस तरह सैन्य सेनाओं के आधुनिकीकरण की तरफ , सैन्य बलों के मानवाधिकारों की तरफ कदम बढ़े हैं वैसे में यह एक सुखद अनुभूति है कि ऊपर बताई गई काल्पनिक स्थितियों से वर्तमान में हमारा जूझना कम हुआ है वरना वर्ष 1962 से 2010 तक के भारत को हम सबने देखा है और जिया है । अर्धदली या सहायक वाली अवधारणा को भी इसी गरिमामय जीवन जीने के अधिकार के आलोक में हमें देखना होगा ताकि हम समझ पाएं कि मैम साहबों के लिए गाड़ी के दरवाजे खोलते और साहबों के कुत्तों को घुमाने ले जाते सैन्य बलों के गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार की किस प्रकार धज्जियां उड़ रही हैं।



विगत वर्षों में तीनों सेनाओं, खासकर थल सेना में आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। कुछ परेशान करने वाली घटनाएं भी हुई हैं जिनमें सैनिकों ने अपने अधिकारियों के खिलाफ शारीरिक बल का प्रयोग किया है या आदेशों का पालन करने से इनकार कर दिया है। कुछ घटनाओं में उन्होंने अपने अधिकारी के लिए "बैटमैन" या "अर्दली" की गरिमापूर्ण भूमिका में काम करने से इनकार कर दिया है। कुछ लोगों ने अपने वरिष्ठों और संगठन के खिलाफ अपनी राय और शिकायतों को प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया का फायदा उठाया है । यह प्रवृत्ति परेशान करने वाली है। स्थानांतरण, प्रोमोशन, पोस्टिंग आदि विषयों में भी पारदर्शिता की कमी देखी जा सकती है । 

 आज सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों में निहित अधिकारों से, जिसमें भारत एक पक्ष है,सैन्य बलों के सदस्यों को वंचित किया जा सकता है, भले ही उनके अनुशासन या कर्तव्य के प्रदर्शन पर कोई प्रभाव न पड़े और खासकर तब जब कोई प्रणाली ही न हो यह बताने के लिए कि अनुशासन और कर्तव्य पर प्रदर्शन पर प्रभाव कितना और कैसे पड़ेगा ।


पीपीएस बेदी मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के पच्चीस साल बाद, संसद ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण अधिनियम को पासकर सशस्त्र बल न्यायाधिकरण की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया । वर्ष 2009 में गठित यह ट्रिब्यूनल हालांकि अभी भी कई सुधारों के आग्रह के साथ कार्यरत है ।

वस्तुतः लोकतंत्र की अवधारणा संविधान से अपनी शक्ति को सृजित करती है । सैन्य बलों के सदस्यों के मानवाधिकार संबंधी मामलों पर तभी सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे जब देश की संसद में अनुच्छेद 33 के संबध में विस्तृत परिचर्चा हो और सेवा नियमावली के उन प्रावधानों को भी बदला जाए जो गरिमा पूर्ण जीवन जीने के अधिकार से वंचित करते हैं ।


लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।

रविवार, 24 जुलाई 2022

श्रीलंकाई संकट और भारत के लिए सबक

 

 

असफल आर्थिक-नीतिगत फैसलों , बढ़ते सामाजिक धार्मिक वैमनस्य और  भ्रष्टाचार के साथ  परिवारवाद ने प्रति व्यक्ति आय के लिए एशिया में चर्चित , चाय और पर्यटन  के लिए विश्व में विख्यात, श्रीलंका को एशिया-प्रशांत क्षेत्र के  आर्थिक संकट से गुजर रहे ,विदेशी ऋण चुकाने में असमर्थ,  दिवालियेपन के करीब पहुंच चुके देश के रूप में स्थापित कर दिया है ।

 हालंकि आनन फानन में राष्ट्रपति राजपक्षे ने जनमंशा और विरोध प्रदर्शनों को ध्यान में रखते हुए पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को नया राष्ट्रपति नियुक्त किया  है लेकिन यक्ष प्रश्न उठकर सामने आ रहे हैं वो ये हैं  कि आखिर श्रीलंका की इस स्थिति का दोषी कौन है ? क्या भारत भी ऐसे किसी संकट का सामना भविष्य में कर सकता है ?  

 

 

सामन्यतया श्रीलंका को आयात आधारित अर्थव्यवस्था माना जाता है । अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को आयात करने वाला यह देश अपने देश की ऊर्जा आवश्यकताओं,खाद्य सामग्रियों और यहां तक की देश के अवसंरचनात्मक विकास हेतु भी विदेशी ऋण पर आश्रित है ।  यूक्रेन रूस विवाद के चलते तेल की उपलब्धता में कमी और  कीमतों में आए उछाल ने श्रीलंका की आर्थिक स्थिति को और भी खराब किया है । केवल  पर्यटन, चाय और रबड़ के निर्यात के आधार पर आगे बढ़ते श्रीलंका में कृषि एवं उद्योगों को विविधता प्रदान करने की आवश्यकता के विषय में सोचा ही नहीं  गया और चीन के साथ यह निर्भरता पिछले एक दशक में बढ़ती गई है ।

 

वर्ष 2019 में ही पॉपुलर राजनीति के तहत श्रीलंका में करों में भारी कमी की गई । वैट को 15 प्रतिशत से कम कर 8 प्रतिशत किया गया । इसी प्रकार लगभग 7 अन्य करों को खत्म किया गया । इससे सरकार के राजस्व में कमी आई | अप्रैल 2021 में विदेशी रासायनिक उर्वरकों पर प्रतिबंध लगाया गया। जैविक खेती (ऑर्गेनिक) की  नीति को ध्यान में रखने के साथ साथ  उर्वरकों के कारण  आयात में खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा  को बहिर्गमन से  रोकने का यह प्रयास था। पूरे देश में जैविक (ऑर्गेनिक) खेती की अवसंरचना को विकसित करने का त्वरित फैसला बाहरी रासायनिक उर्वरकों के आयात में सम्पूर्ण प्रतिबंध के साथ सामने आया । उर्वरकों की अनुपलब्धता से  परंपरागत खेती कर रहे किसानों को अत्यंत हानि हुई और श्रीलंका के उत्पादन में काफी कमी आई और कम उत्पादन के कारण  अनाज का आयात करना श्रीलंका की मजबूरी बन गया । इस आयात का शुल्क चुकाने में  पहले से ज्यादा विदेशी मुद्रा का बहिर्गमन  हुआ । और इन नीतियों  से प्रभावित किसान परिवारों को मुआवजों देने के लिए सरकारी कोष से  प्रचुर राशि का व्यय किया गया और इस तरह पहले से खाली खजाने और खाली होते गए । 

 

 

वर्ष 2018 में ईस्टर चर्च में हमले, सिंहली बनाम बाहरी विवाद और बौद्ध धर्म  अतिवादिता से भी श्रीलंका के  पर्यटन में कमी आनी शुरू हुई । कोविड के बाद पर्यटन सबसे ज्यादा प्रभावित रहा जिस कारण एक  आर्थिक वैक्यूम पैदा हुआ जिसने श्रीलंका की आर्थिक स्थिति को दबावग्रस्त कर दिया । 

 

आज सिंहल बौद्धों की बहुसंख्यक आबादी के तथाकथित  आदर्श नेता पूर्व राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे  अपनी जिंदगी को बचाने हेतु देश छोड़ने पर विवश हुए हैं  और आम जनमानस परिवारवाद की इस राजनीति में ईधन,भोजन के साधनों की जुगत में  संघर्षरत है | 

 

इतिहास को देखें तो हम पाते हैं वर्ष 1956 में आए  सिंहला अधिनियम से सामाजिक विषमताओं का उद्भव श्रीलंका में होना शुरू हुआ था । सिंहली भाषा को राजभाषा बनाए जाने के आलोक में  तमिल और सिंहली के बीच के विवाद की स्थिति को इस अधिनियम ने जन्म दिया । यह वह समय था जब भारत में भी भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हो रहा था । इसी समय पाकिस्तान में भी पूर्वी पाकिस्तान के ऊपर भाषाई अतिवादिता  को थोपा जा रहा था । सन 1950 तक  प्राथमिक उत्पादों के प्रचुर उत्पादन और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मांग के चलते श्रीलंका की आर्थिक स्थिति मजबूत थी । सन 1950 के बाद यह आर्थिक स्थिति कमजोर होते गई और श्रीलंका ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ )का दरवाजा खटखटाया । अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ )के शर्त आधारित अनुदान को प्राप्त कर श्रीलंका में विरोधस्वरूप व्यापक प्रतिक्रियाएं  हुई  और इसी क्रम में श्रीलंका में समाजवादी सरकार के रूप में सीरिमावो भंडारनायके की सरकार आई । भारत इस समय गरीबी हटाओ के अभियान को देश में लागू कर रहा था और श्रीलंका भी समाजवाद को केंद्र में रखकर सामाजिक,आर्थिक विकास की नीतियों में चलने लगा । भविष्य में 1970 में आए तेल संकट के दौर में समाजवादी योजनाएं असफल साबित हुई और राजकोषीय घाटे , राजस्व घाटे और बढ़ते आर्थिक संकट ने  भंडारनायके के स्थान पर राष्ट्रपति  जयवर्धने को श्रीलंका की राजनीति के केंद्र में स्थापित किया और श्रीलंका आर्थिक उदारीकरण,समाजवाद और फिर से आर्थिक उदारीकरण के राह में श्रीलंका आगे बढ़ा। 

 

 

यही वह समय था जब सिंहल -बौद्ध राष्टवाद का जन्म श्रीलंका में होता है। इन्हीं सब परिस्थितियों के आलोक में गृह युद्ध का आरंभ हुआ जो वर्ष 1976 में लिट्टे के  गठन  के साथ वर्ष  1983 तक  अपने चरम पर पहुंचा और  वर्ष 2005 में महिद्रा  राजपक्षे का श्रीलंका की राजनीति में  प्रदार्पण हुआ । 

 

वर्ष 2009 तक श्रीलंका लिट्टे के खिलाफ युद्ध, भ्रष्टाचार , सिंहली -तमिल दंगे आदि  आंतरिक विवादों से जूझता रहा । लिट्टे की मृत्यु के  बाद  राजपक्षे ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ केऔर भारत की जगह व्यवसायिक ऋण का सहारा चीन से लेना शुरू किया । वर्ष 2019 में ईस्टर ब्लास्ट के बाद तो राजपक्षे परिवार को सिंहली पहचान के रूप में पेश किया जाने लगा।  और चीन के साथ नए संबंधों पर कार्य शुरू हुआ |

 

 

बिजली की कमी से जूझते विद्यालय,गिरते स्वास्थ्य स्तर, भोजन,दवाइयों और ईंधन की किल्लत से जूझते श्रीलंका में वर्तमान में 70 प्रतिशत तक महंगाई बढ़ चुकी है । हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए घर पर कब्जा कर लिया है । शिक्षा, स्वास्थ्य और आमदनी के आधार पर देखें तो वर्ष 2020 में श्रीलंका  मानव विकास सूचकांक में 72 वें स्थान पर था जबकि भारत का स्थान 131 था । विश्व बैंक के अनुसार 2020 श्रीलंका की साक्षरता दर लगभग 92 प्रतिशत थी जबकि भारत की 78 प्रतिशत थी । विश्व के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एवं मूलतः भारत से संबन्धित एक अर्थशास्त्री ने तो  एक समय में भारत को इन्हीं आकड़ों के कारण श्रीलंका से पीछे बताया था | ऐसे बुद्धिजीवियों के ही तर्कों और तोड़े मोड़े बयानों के आधार पर श्रीलंका के सामने भारत को रखकर कुछेक बुद्धिजीवी लोग भारत में भी ऐसी स्थिति होने के आंशिक अनुमान कर रहे हैं । ये वहीं लोग हैं जिन्होने  आकड़ों के खेल में विशारद की उपाधि  हासिल की है  लेकिन इन सबके बीच यह ध्यातव्य है कि  भारत इस वर्ष अभी तक 3.5 अरब डॉलर की मदद श्रीलंका को  कर चुका है । यह मदद भोजन , रसद सामग्री के अतिरिक्त  की गयी मदद है | ऊर्जा संकट के बीच भारत की तेल कंपनियाँ श्रीलंका तो तेल भी उपलब्ध करवा रही हैं | 

अगर बात करें श्रीलंका और भारत के तुलनात्मक आर्थिक परिदृश्य की तो हम पाते हैं कि श्रीलंका में  सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के सापेक्ष बैंक ऋण का  अनुपात 100 प्रतिशत  से ऊपर है जबकि भारत में यह लगभग 50 प्रतिशत के आसपास है | किसी भी देश के लिए जीडीपी के सापेक्ष बैंक ऋण  का  59 प्रतिशत से ज्यादा का अनुपात अनूकूल नहीं माना जाता |  अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुसार श्रीलंका का सकल ऋण जीडीपी के प्रतिशत के आधार पर वर्ष 2016 में 79.02 प्रतिशत था जो की वर्ष 2021 में बढ़ाकर 111.42 प्रतिशत हो गया । श्रीलंका का आधे से अधिक ऋण विदेश आधारित है   जबकि भारत का मात्र 3 प्रतिशत के आसपास का ऋण विदेश आधारित है । इन आंकड़ों के आलोक में उन बुद्धिजीवियों से प्रश्न किया जा सकता है जिनको भारत में भविष्य का श्रीलंका नजर आ रहा है । हां यह जरूर है कि  भारत के कुछ राज्यों जैसे पंजाब और पश्चिम बंगाल में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के सापेक्ष ऋण का अनुपात 50 प्रतिशत से ऊपर है | कुछ राज्यों जैसे जम्मू कश्मीर, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश में वित्तीय घाटा 4 प्रतिशत की सीमा को लांघता हुआ नजर आ रहा है लेकिन मजबूत मौद्रिक नीतियों और दूरगामी नीतियों के संरक्षण में हमारा देश आगे बढ़ रहा है और इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए ।

 

 

 

नब्बे के दशक  में भारत के राजकोषीय एवम खाद्यान्न संकट को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने जिन शर्तों के तहत संभाला था उसकी ऊष्मा आज भी महसूस की जा सकती है । यही कारण है कि भारत ने खाद्यान्न सुरक्षा में आज आत्मनिर्भरता ही हासिल नहीं की है बल्कि विश्व के जरूरतमंद  देशों को भी हम आपूर्ति सुनिश्चित कर रहे हैं  ।  खाद्यान्न भंडार में हमने नवीन ऊंचाइयों को छुआ है । भारत ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने की तरफ लगातार प्रयास किए हैं । 

 

 करेंसी स्वैप समझौते के द्वारा  भारत ने पूर्व में ही अपने विदेशी कूटनीति के द्वारा   विश्व के 23 देशों के साथ  भविष्य में हो सकने वाली चुनौतियों को संबोधित किया है तो वहीं  तेल के सामरिक रिजर्व (स्टेटेजिक रिजर्व ) बनाकर  अकस्मात उत्पन्न होने वाली संवेदनशील स्थितियों में   देश की ऊर्जा आवश्यकताओं का भी ख्याल रखा  है ।  हालंकि अभी ऐसे सामरिक भंडारों को बढ़ाए जाने की आज आवश्यकता  है । भारत में वर्तमान में विदेशी मुद्रा भंडार वर्ष 2014 के 322 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर  लगभग 580 बिलयन अमेरिकी डॉलर पहुँच  चुका है  जो कि निर्यात के क्षेत्र में किए जा रहे नवोन्मेषों का ही प्रतिफल है |  दुखद यह है कि वैश्विक मंच में भारत की मजबूत होती साख के इन प्रतीकों के उलट  अखबारों के  संपादकीय लेखों और समाचार चैनलों में भारत  की श्रीलंका जैसी स्थिति होने की संभावनाओं पर विचार मंथन किया जा रहा है |   

 


यह विचार मंथन होना आवश्यक है लेकिन इसके विषय  होने चाहिए कि भाई भतीजावाद, वंशवाद , परिवारवाद के क्या प्रभाव किसी देश की प्रगति में पड़ते हैं और भारत इन सबके बीच कहां खड़ा है । विचारमंथन होना चाहिए की भारत के साथ तमाम समझौतों को  तोड़ने वाले देशों को जरूरत के समय क्यों भारत मदद करता आया है  | विचारमंथन होना चाहिए कि अपने  नीतिगत निर्णयों को कैसे आम जनमानस तक प्रचारित प्रसारित कर जनमानस से सामंजस्य बनाकर कार्य भारत में हों | विचारमंथन होना चाहिए वंशवाद और भ्रस्टाचार को रोकने में आम भारतीय नागरिक की भूमिका पर और ऐसा चिंतन मनन आज वक़्त की मांग है | 

लेखक जय प्रकाश पाण्डेय स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी,  एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।



अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

  युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र   की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है   । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोल...