अगली बार कोई पूछे कि देश में क्या चल रहा है तो बेधड़क बोलिए देश में आजकल सीबीआई, ईडी, एसटीएफ चल रहा है । फुर्सत मिली तो कभी रणबीर सिंह की तो कभी प्रेगनेंट कलाकारों के बेबी बंप की तस्वीरें भी चल रही हैं । बस कुछ मत बताइए तो ये कि कैसे पर्चे लीक होने का ट्रेंड देश में बढ़ रहा है और कैसे कैश दो नौकरी लो
की जड़ें प्रायः अधिकतर राज्यों में अपनी जड़ें जमा चुकी है ।
सीबीआई से ध्यान आया दिल्ली का । वहां के शिक्षा मंत्री के पीछे भी सीबीआई लगी है । दिल्ली में ही तो पूर्व सरकार के वित्त मंत्री भी पाए जाते हैं उनके भी पीछे ईडी पड़ी है । कुछ महीनों पहले कोरोना योद्धा के रूप में सामने आए सोनू सूद के भी पीछे ईडी पड़ी थी। लालू जी का हाल किसी से छुपा है नहीं । इनको भी ऊपर सीबीआई, ईडी का वक्तानुसार वरदहस्त प्राप्त होता रहता है । इसी बीच देश की प्रमुख राजनैतिक पार्टी के मुखिया और विपक्ष के आधारस्तंभ राहुल गांधी भी इसी क्रम का हिस्सा रहे।
उपरोक्त पूरे घटनाक्रमों में एक चीज स्पष्ट है और वह है ईडी और सीबीआई की बड़ी सक्रियता । इन सक्रियताओं की तरफ युवाओं का एक बहुत ही बड़ा वर्ग बड़ी उम्मीद से देख रहा है । यह वही वर्ग है जिसने बिहार में पेपर लीक से लेकर उत्तर प्रदेश में नोट के बदले नौकरी का दंश झेला है , जिसने उत्तराखंड में राजनैतिक संरक्षण प्राप्त नेताओं की मिलीभगत से विलंबित और निलंबित होती प्रतियोगी परीक्षाएं देखी हैं। कहने को तो ये
युवा किसी देश के मेरुदंड होते हैं लेकिन सरकारी नौकरियों के बदलते ट्रेंड ने इनकी ही मेरुदंड को सबसे ज्यादा नुकसान किया है । कोरोना काल के बाद युवाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग प्रतियोगी परीक्षाओं में कहीं उम्र की पात्रता से वंचित हो तो कहीं जेब में पैसों की कमी के चलते तेजी से डिप्रेशन की तरफ बढ़ता जा रहा है जिसके लिए न ही किसी भी प्रकार का सर्वेक्षण किया गया है और न ही इस आवश्यकता को महसूस किया गया है। तमाम स्वरोजगार योजनाओं की पात्रता से वंचित युवाओं का वर्ग इस उम्मीद में है कि अंतरराज्य गुटों की सक्रियता को देश की सीबीआई नियंत्रित करे । शिथिल कानूनों का फायदा उठाकर नौकरियों के ठेकेदारों ने पूरे युवाओं के साथ धोखा किया है। हाल ही मैं उत्तराखंड में पेपर लीक प्रकरण में जिस प्रकार 2 दर्जन के आसपास गिरफ्तारियां भारत के अलग अलग हिस्सों से हो रही हैं तथा पकड़े जाने वाले लोग राजनीतिक सरोकार रखने वाले हैं ऐसे में सीबीआई जांच के अलावा और कोई विकल्प युवाओं को नहीं दिखता । मसलन सामने आ रहे कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि परीक्षा कराने के लिए एक राज्य में प्रतिबंधित संगठन को ही दूसरे राज्य में अनुमति दी गई हैं। ऐसे गैर जिम्मेदार व्यवहार के लिए कौन दोषी है ? क्या सरकारी तंत्र में यह देखने की भी फुर्सत नीति नियंताओं को नहीं है कि जिन एजेंसी का सहारा लिया जा रहा है उनका इतिहास क्या है ? और ऐसे में कोई भी समाज के प्रबुद्ध वर्ग का सदस्य इस प्रक्रियाओं पर सवाल उठाएगा ही इसमें कोई शक नहीं ।
जब देश में सीबीआई, ईडी की सक्रियताओं का प्रचलन बड़ा है तो क्यों न जिन जिन राज्यों में ऐसी नकल की घटनाएं हुई हैं वहां चयन बोर्ड के सभी सदस्यों की आय की जांच सीबीआई द्वारा की जाए ? राज्य एसटीएफ के स्थान पर क्यों नहीं इन विषयों की सीबीआई से जांच कराई जा रही है यह यक्ष प्रश्न आज युवाओं को परेशान किए हुए है ?
भारत के युवाओं में आज निराशा अपना घर कर रही है । विश्विद्यालयों में स्थाई नियुक्तियां ठंडे बस्ते में पड़ी हैं । आयोजित हुई प्रतियोगी परीक्षाओं में गोलमाल की संभावनाओं का हिस्सा ज्यादा है । राज्य सरकारों द्वारा आयोजित परीक्षाओं के परिणाम आते नहीं कि न्यायालय में वाद दायर हो जाते हैं । अग्निवीर योजना की भर्ती में अभ्यर्थियों को दौड़ हेतु प्रस्तावित समय से कम समय दिया जा रहा है । 12 वीं के बाद आईआईटी, मेडिकल और विश्वविद्यालयों की राह देख रहे बच्चों की प्रवेश प्रक्रियाएं शुरू नहीं हुई हैं । ऐसे में लीक होते पर्चे और बिकती सरकारी नौकरियां अनिश्वितताओं का दौर अपने साथ लेके आ रही हैं ।
ऐसे दौर में सीबीआई जांच और समयबद्धता से प्रतियोगी परीक्षाओं की राह देखता युवा मन देश में ही विलग होते जा रहे हैं जिस ओर ध्यान दिया जाना वक्त की मांग है ।
जय प्रकाश पाण्डेय
लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।
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