गुरुवार, 4 अगस्त 2022

लीक होते प्रश्नपत्र, निराश होता युवा ।

 


युवा किसी देश के मेरुदंड होते हैं । किसी देश की समृद्धि में युवाओं के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोलन से लेकर सम्पूर्ण क्रांति व अन्ना हजारे आंदोलन तक, वर्तमान भारत के विकास में एक उल्लेखनीय भूमिका निभाई है । कुछ समय पूर्व यही युवा वर्ग लखनऊ में उत्तर प्रदेश सब इंस्पेक्टर परीक्षा धांधली के विरोध में अपने अधिकारों के लिए मुखर हो रहा था। कुछ महीनों पूर्व यही युवा बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा के लीक प्रश्नपत्र के लिए मुखरित हुआ था । व्यापम घोटाले के सामने आने पर भी यही युवा मुखरित हुआ था और आज फिर से उत्तराखंड में भी यही हाल निर्मित हो रहे हैं । बस अंतर इतना है कि अन्य राज्यों ने जहां एसआईटी, एसटीएफ, सीबीआई के साथ साथ अपने निगरानी तंत्र को मजबूत करने की कोशिश की वहीं उत्तराखंड में ऐसे पेपर लीक न हों इसके लिए एसटीएफ, एसआईटी जांच के अलावा परीक्षा के प्रारूप को ही बदलने की चर्चाएं शुरू हो रही है, इससे युवाओं का वह वर्ग जो पिछले 5-7 सालों से तैयारी में लगा था उसके ऊपर प्रतिकूल फर्क पड़ेगा इसमें कोई दो राय नहीं । समूह ग स्तर पर आयोजित होने वाले परीक्षाओं में द्वितीय स्तर पर लिखित परीक्षा संबंधी चर्चाएं कोचिंग सेंटरों के हक में ज्यादा, और छात्रों के हकों में कम प्रतीत होता है । 


इन सब के बीच सबसे हैरानी का विषय यह रहा है कि अपने अधिकारों के लिए सबूतों की पोटली लिए घूमते और आंदोलन का मार्ग तय करते अधिकतर छात्रों को ऐसी किसी मांग के एवज में खुद पर एफआईआर झेलनी पड़ती हैं और ऐसी आवाजों का साथी कोई बन नहीं पाता । अब वह समय आ गया है जब इन विषयों पर खुलकर विमर्श हों । अब इस तरफ सोचना अपरिहार्य हो गया है कि इन परीक्षाओं से संबंधित आला अधिकारियों की आय की एसआईटी नहीं बल्कि सीबीआई जांच हो और प्रक्रियाएं पारदर्शी हों । सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को भी सम्मिलित करते हुए नीतियों का खाका खींचा जाए और प्रतियोगी परीक्षाओं के नीतिगत निर्णयों, प्रारूपों या अन्य निर्णयों में उम्र के आधार पर 21 से 35 के स्पष्ट परिभाषित युवाओं को सम्मिलित किया जाए न की राजनैतिक पार्टियों के युवा संगठनों में होने वाली उम्र की पात्रता के आधार पर । 



ऐसे युवाओं को मौजदूगी प्रशासनिक तंत्र और सिविल सोसाइटी के तंत्र में पर्याप्त है, जरूरी है तो अपने इगो, और वरिष्ठता के दंभ को किनारे रखकर जमीनी स्तर पर निर्णयों, योजनाओं के क्रियान्वयन की । आज वह समय आ गया है कि इस विषय पर जन पटल पर परिचर्चा हो कि परीक्षा केंद्रों को किन आधारों पर संबद्ध किया जाता है ? किन आधारों पर ऐसे केंद्रों को परीक्षा केंद्र बनाया जाता है जहां स्नातक डिग्री के आधार पर परीक्षा दे रहा छात्र कक्षा 5 में पढ़ने वाले बच्चे के टेबल- कुर्सी में बैठकर परीक्षा देता है ? 2 घंटे की परीक्षा में जहां दशमलव का भी महत्व होता है वहां इन भौतिक कमियों को आज के समय में तो हम दरकिनार कर ही नहीं सकते। किन आधारों पर ऐसे परीक्षा केंद्रों को संबद्ध किया जाता है जहां बाहर से परीक्षा देने आए छात्रों के बैग रखने और चिलचिलाती गर्मी में पंखे तक की व्यवस्था नहीं होती ? ऐसे परीक्षाकेंद्र कैसे संबद्ध हो जाते हैं जहां अलग कमरे में बैठा के पेपर लीक कराया जाता है। आज वह समय आ गया है जब इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के क्रम में उत्तरदाई आला अफसरों पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही हो । 




सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस तरह सभी परीक्षाओं के प्रारूप ऑनलाइन होते जा रहे हैं ऐसे में सूचना तंत्र और तकनीक के द्वारा व्यापक स्तर पर इन परीक्षाओं को प्रभावित किया जा सकता है इसमें कोई दो राय नहीं है । और ऐसे में अन्य राज्यों की साइबर सेल के भी समन्वित सहयोग के द्वारा ही इन चीजों को रोका जा सकता है । ऑनलाइन प्रारूप की परीक्षाओं ने भी भारत के उन गांवों, उन पहाड़ी क्षेत्रों में जहां फोन के कनेक्शन तक नहीं आते वहां के युवाओं को आईआईटी,मेडिकल आदि क्षेत्रों से प्रायः दूर रखने में महती भूमिका बनाई है ।


ऐसा नहीं है कि अतीत की प्रश्नपत्र लीक होने वाली घटनाओं के सीख नहीं ली गई है । पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा केंद्रों में प्रवेश के समय नकल रोकने के लिए कपड़ों की बाहें तक कटवाई गई हैं । केरल में छात्राओं को इनर वियर उतारने के लिए हाल ही में नीट की परीक्षा के दौरान निर्देशित किया गया । अन्य जगहों पर समय समय पर नाक -कानों की परंपरागत बालियां तक उतरवाई गई हैं । सांस्कृतिक और परंपरागत प्रतीकों जैसेेे रक्षा कवच को परीक्षा केंद्रों में कैंची से काट कर कूड़ेदान में फेंका गया है । ऐसे में इन सभी चीजों को सह रहा वास्तविक युवा यही चाहता है कि ढकोसले में न पड़कर वास्तविक रूप से प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और परीक्षा को परीक्षा जैसे बनाए रखने का काम हो । उपरोक्त बताए गई वास्तविक घटनाएं कितना नकल रोकने में सक्षम हैं यह सोचनीय विषय है । और यदि उपरोक्त के आधार पर नकल रोकने की हम उम्मीद कर रहे हैं तो हम डिजिटल होते भारत की समझ से काफी दूर हैं । 




एक मामले में अब स्पष्टता आवश्यक है युवा आखिर किसे माना जाए । भारत के लिए दिक्कत यह है कि सरकारी आंकड़ों में हम जिसे युवा मानते हैं, उसका प्रतिनिधित्व राजनीतिक पार्टीयों के पैंतालीस के आसपास के नेता करते हैं । नीतिगत फैसलों में भी वही अधिकारी प्रायः शामिल हैं जिनकी उम्र चालीस-पैंतालीस की दहलीज पार कर गई है । युवापन एक मानसिक मनोदशा है जिसका उम्र के साथ कोई संबंध नहीं है । मसलन एक 60 साल का व्यक्ति भी युवा हो सकता है । यह बात बिल्कुल सही है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उम्र और मानसिक शारीरिक स्थिति के आधार पर युवाओं का वर्गीकरण और नियमन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अत्यंत आवश्यक है , खासकर जब ये विषय देश की मानव पूंजी, कार्यशील जनसंख्या और राष्ट्र विकास से जुड़े हों ।आज यह आवश्यक है कि परीक्षा केंदों में नकल रोकने के नाम पर हमारी सांस्कृतिक पहचानों को कूड़े के डब्बों में न स्थान मिलें । आवश्यक है कि स्वतंत्र,पारदर्शी प्रणाली से नियमित प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित हों ताकि वास्तविक युवा भारत के विकास में सक्रिय सहयोग दे पाए । 






लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।


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