गुरुवार, 25 जनवरी 2024

भारत -मालदीव संबंध : अतीत, वर्तमान और भविष्य

 


 


भारत द्वारा कोरोना के समय आर्थिक संकट से उबरने के लिए 250 मिलियन यूएस डॉलर की दी गई मदद हेतु संयुक्त राष्ट्र में धन्यवाद देते मालदीव के विदेश मंत्री के वक्तव्य को अभी तीन वर्ष भी नहीं हुए थे कि मालदीव के जनप्रतिनिधियों, विपक्ष और सरकार की मंशा में चीनी मिलावट होते दिखने लगी है । सत्ता परिवर्तन के साथ संबंधों में परिवर्तन प्रायः दक्षेस (सार्क) के सभी देशों के मध्य देखा गया है  और खासकर जहां के अनुभवों में तख्तापल्ट राजनीति का घालमेल रहा है वहां भारत के लिए और भी कड़वाहट भरे उदाहरण मिल जाते हैं । फिर चाहे वह श्रीलंका हो, नेपाल हो या फिर मालदीव । उदाहरण के लिए वर्ष 2012 में राष्ट्रपति  मोहम्मद वहीद ने भारतीय कंपनी जीएमआर से 51.1 करोड़ डॉलर की लागत से विकसित होने वाले माले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के समझौते  को रद्द कर दिया था और उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि भारत मालदीव के आंतरिक मामलों में दख़ल दे रहा है । 

पड़ोसी देशों के ऐसे आरोपों का भारत  अभ्यस्त रहा है लेकिन आज भारत- मालदीव संबंधों की मधुर दास्तां भी सत्ता परिवर्तन और विपक्ष की राजनीति की भेंट चढ़ती दिख रही है । 

 

वर्ष 2023 में, हिंद महासागर क्षेत्र में सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मालदीव में,इंडिया फर्स्टकी नीति अपनाने वाले राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह को हराकर, निर्वाचित नए राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू की सरकार और जेल से छूटकर आए पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने  उन सभी सकारात्मक पहलों पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है जो इतने वर्षों तक मालदीव के सामाजिक,आर्थिक,शैक्षिक, पर्यावरणीय विकास के लिए भारत द्वारा की गई हैं । हालांकि भारत के लिए यह ऐसा पहला अनुभव नहीं है । इससे पहले भी वर्ष  2008 के  चुनाव में  निर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद

और वर्ष 2013 चुनाव में निर्वाचित राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन भी चीन के प्रति झुकाव को प्राथमिकता देते थे ।

अक्टूबर 2020 में आधिकारिक रूप से पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के नेतृत्व में भारत विरोधी अभियान 'इंडिया आउट' शुरू हुआ जिसका प्रभाव अब दोनों देशों के संबंधों में भी दिख रहा है ।



भारत और मालदीव : प्राचीन इतिहास 

 

 हिंद महासागर में भारत के लक्षद्वीप द्वीप समूह के दक्षिण में स्थित मालदीव आठ डिग्री चैनल द्वारा भारतीय के  मिनिकॉय  से अलग होता है ।

मालदीव और भारत हिंद महासागर रिम एसोसिएशन,और दक्षेज देशों के समूह में भी  है। पश्चिम एशिया में अदन की खाड़ी तथा होर्मुज़ की खाड़ी एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में मलक्का जलसंधि के बीच स्थित मालदीव सामरिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है । भारत और मालदीव के बीच सांस्कृतिक,धार्मिक,आर्थिक और सामाजिक संबंध प्राचीन काल से ही रहे हैं ।  प्राचीन काल में मालदीव, सीलोन (श्रीलंका) पर निर्भर था जिसने दक्षिण भारत के साथ वाणिज्यिक और सांस्कृतिक संपर्क बनाए रखा था। रामायण जैसे शास्त्र ग्रंथों और समय समय पर लिखे गए ग्रंथों जैसे कौटिल्य के अर्थशास्त्र , विदेशी यात्रियों के ग्रंथ आदि द्वारा दोनों देशों के बीच सकारात्मक संबंधों का हमें बोध होता है ।

 

बंगाल में स्थित  मौर्य साम्राज्य के मुख्य समुद्री बंदरगाह ताम्रलिप्ती से  सीलोन और दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य देशों के लिए भी जहाज जाते थे। मौर्य राजा अशोक के एक शिलालेख में सीलोन में धार्मिक मिशनों का उल्लेख है जिसने उस देश में बौद्ध धर्म की शुरुआत की। मालदीव में भी पुरातन बौद्ध स्थलों के अवशेष पाए गए हैं । अनेक विद्वानों का यह भी मत है कि बहुसंख्यक मुस्लिम धर्म से पहले यहां बौद्ध और उससे पहले सनातन  धर्म मौजूद था। 

 

एक लंबे समय तक मालदीव में श्री विजया साम्राज्य इनका ही शासन था । दक्षिण भारत के चोल राजाओं राजराजा चोल और राजेंद्र चोल के समय विजया साम्राज्य को हराने के लिए सेनाओं को भी भेजा गया। यह कहा जाता है कि उत्तरी सीलोन पर विजय प्राप्त करने के बाद, राजराजा चोल ने 12,000 पुराने द्वीपों, मालदीव पर विजय प्राप्त की हालांकि यह ऐसी नौसैनिक विजय थी, जिसका कोई वर्णन या साक्ष्य प्राप्त नहीं होता है । यात्री अब्दुल रज्जाक और फ़्रांसिस बर्नियर ने भी अपने यात्रा पुस्तकों में दोनों देशों के मध्य संबंधों पर प्रकाश डाला है । 

 

इस प्रकार भारत के मालदीव के संबंधों के प्राचीन साक्ष्य हमें मिलते हैं जो बताते हैं कि साझी धार्मिक,सांस्कृतिक,व्यापारिक एकता दोनों देशों में व्याप्त थी ।

 

स्वतंत्रता के बाद भारत- मालदीव संबंध 

 

वर्ष 1965 में मालदीव की ब्रिटेन से  आजादी के बाद से ही भारत और मालदीव के बीच  वाणिज्यिक, सांस्कृतिक आर्थिक, संबंधों का दूसरा दौर शुरू होता होता है । भारत उन आरंभिक देशों में से एक है जिसने मालदीव के मुक्ति संघर्ष और स्वतंत्र मालदीव को सर्वप्रथम मान्यता प्रदान की। 

 

औपनिवेशिक शासन के अधीन रहे भारत और मालदीव दोनों के ही बीच प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान संबंधों में प्रगाढ़ता आयी । वर्ष 1974 में मालदीव के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अहमद जैकी की भारत यात्रा इस संदर्भ में प्रासंगिक है । इसी बैठक के बाद  "भारत और मालदीव ने हिंद महासागर क्षेत्र को शांति क्षेत्र के रूप में स्वीकृत करते हुए इस क्षेत्र को बड़ी महा शक्तियों और सैन्य गतिविधियों से मुक्त  रखने का संकल्प लिया था।  शिक्षा, मत्स्य पालन, वायु और समुद्री संचार के क्षेत्र में अपने द्विपक्षीय सहयोग को बेहतर बनाने  की आवश्यकता पर दोनों पक्ष सहमत हुए। इसी क्रम में  भारत द्वारा शिक्षा के प्रचार प्रसार हेतु मालदीव के 19 एटोल में 19 विद्यालयों की स्थापना,और मत्स्य के  डिब्बाबंद उद्योग को बढ़ावा देने की समुचित व्यवस्था भारत द्वारा की गई। 

 

वर्ष 1975 में ही प्रधानमंत्री जैकी को  सत्ता से निष्कासित कर दिया गया।  वर्ष 1977 वह समय था जब समुद्री सीमाओं के त्रिपक्षीय समझौते को भी बल प्राप्त हुआ।  दोनों  देशों के बीच समुद्री सीमा संधि वर्ष 1976 में हस्ताक्षरित की गई  जहां मालदीव ने मिनिकॉय को भारत के अभिन्न अंग के रूप में मान्यता दी । वर्ष 1978 में मालदीव के एयरपोर्ट निर्माण के लिए भारत के एयरपोर्ट अथॉरिटी को मालदीव सरकार द्वारा निवेदित किया गया था। 

 

80 के दशक के दौरान मालदीव की सत्ता पर आसीन मोमून अब्दुल गयूम के ख़िलाफ़ तख़्तापलट की कोशिशों को निरस्त करने के लिए 'ऑपरेशन कैक्टस' चलाया गया । इसके बाद के वर्षों में  तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी ने भारत की प्रतिबद्धताओं को आगे बढ़ाने का कार्य किया।  भारत की मालदीव के प्रति विदेश नीति में क्रांतिकारी परिवर्तन श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में आया । लगभग एक दशक के बाद  भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी जी का मालदीव दौरा दोनों देशों के बीच रिश्तों की प्रगाढ़ता को स्थापित करने में सहायक सिद्ध हुआ । वर्ष 1995 के बाद इतने वर्षों के अंतराल के बाद अटल जी की यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण रही ।

 

वस्तुत: यदि हम देखें तो मालदीव को सर्वप्रथम आधुनिक बैंकिंग सेवाएं भारत  ने ही प्रदान की हैं  । कोल्ड स्टोरेज प्लांट से लेकर जलपोत निर्माण आदि कार्य भारत द्वारा ही सर्वप्रथम मालदीव में कराए गए ।  संचार के क्षेत्र में, यह भारत ही था जिसने त्रिवेन्द्रम (दक्षिण भारत) और माले के बीच हवाई सेवा और टेलीप्रिंटर से 80 के दशक में ही  प्रत्यक्ष  संपर्क स्थापित किया था। मालदीव के छात्रों और प्रशिक्षुओं को भारत में चिकित्सा, नर्सिंग, इंजीनियरिंग, संचार और शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों में उन्नत अध्ययन की सुविधाएं भी भारत द्वारा प्रदान की गई   

 

वर्ष 2014 के बाद भारत-मालदीव संबंध 

 

वर्ष 2016 में मालदीव ने चीन को अपना एक द्वीप महज 40 लाख डॉलर में 50 सालों के लिए लीज़ पर दे दिया था । वर्ष 2017 में चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता भी मालदीव ने किया।  चीन के वन बेल्ट वन रोड योजना का भी खुल कर समर्थन करने वाले मालदीव में चीन की यह  उपस्थिति सामरिक दृष्टिकोण से सही नहीं है । न केवल हिंद महासागर बल्कि भारत के निकटवर्ती राष्ट्रों में चीन की बढ़ती उपस्थिति चिंता का कारण है । इसी बात को समझते हुए हमारे नीतिगत निर्णयों में शानदार प्रयास विगत वर्षों में होते दिखाई दिए हैं । 

 

 अवसंरचना,स्वास्थ्य सेवाएं,कनेक्टिविटी के संबंध में भारत के प्रधानमंत्री ने मालदीव को समय समय पर न सिर्फ आश्वस्त किया बल्कि सक्रियता से कार्य भी किया है।  वर्ष 2018 में  भारत पहुंचे राष्ट्रपति मोहम्मद सोलह ने 1.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वित्तीय मदद भारत से प्राप्त की । करेंसी स्वैप समझौते से लेकर आडू विकास प्रोजेक्ट, हनिमधू अंतराष्ट्रीय एयरपोर्ट,मालदीव औद्योगिक मत्स्य कंपनी लिमिटेड के विस्तार, फेलिवारु, जेमनाफुशी, जेन इंटरनेशनल एयरपोर्ट, आदि के विकास के लिए भारत ने प्रतिबद्धता जाहिर की थी और इस प्रकार मालदीव के विकास मॉडल में भारत ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की ।

 

भारत की विदेश नीति वर्तमान में महज हस्ताक्षरों तक सीमित नहीं है । प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा  हस्ताक्षरित अनुबंधों के अनुपालन की दिशा में कार्य करते हुए 

हाइड्रोग्राफी के क्षेत्र में तो सर्वे तक पूरे कर लिए गए। 700 से भी अधिक प्रशासनिक अधिकारियों को भारत में प्रशिक्षण दिया गया । 200 से भी अधिक कस्टम अधिकारियों को भारत में प्रशिक्षण दिया गया। वर्ष 2020 में ही तूतीकोरिन, कोच्चि, कुलधुफ़ुशी और माले को जोड़ने वाली कार्गो सेवा का प्रारंभ हुआ । अप्रैल 2021 से ही माले में हुकुरू मिस्की के जीर्णोधार का कार्य भी चल रहा है। रुपे कार्ड, के साथ साथ मत्स्य आधारित उद्योग को बढ़ावा देने के लिए मत्स्य प्रसंस्करण यूनिटों की बात हो या फिर सामुदायिक विकास कार्यक्रमों की विगत वर्षों में उल्लेखनीय गतिशीलता कोभारत ने दिखाया है । 

 

विदेश मंत्री डॉ.एस जयशंकर की उत्तरी एटोल की यात्रा भी  इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है जिसमें  सामुदायिक विकास कार्यक्रमों हेतु 100 मिलियन मालदीवीयन रूपये की आर्थिक मदद दी गई । इसके साथ ही इसी यात्रा में मालदीव विश्वविद्यालय और कोचीन विज्ञान एवं तकनीकी विश्विद्यालयों के बीच क्षमता निर्माण या वृद्धि के लिए समझौतों को भी अंतिम रूप दिया गया । 

 

मार्च 2022 में मालदीव को भारत द्वारा विभिन्न सामाजिक,आर्थिक विकासात्मक कार्यों हेतु सबसे बड़ी लगभग 223 करोड़ की वित्तीय मदद प्राप्त हुई । 

 

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि विभिन्न विकास प्रोजेक्ट से लेकर कैंसर हॉस्पिटल निर्माण तक भारत ने एक अच्छे पड़ोसी और समावेशी विकास की नीति के चलते मालदीव को हर संभव मदद की है । बंदरगाहों के निर्माण से लेकर, मजबूत कनेक्टिविटी तक, सामरिक दृष्टि से महत्त्वूर्ण इस राष्ट्र के लिए भरसक प्रयास किए गए हैं । वर्तमान हालातों में केवल मालदीव का विरोध नहीं बल्कि सार्थक चर्चाओं और कूटनीति के आधार पर इसका समाधान होना चाहिए । लक्षद्वीप के विकास में पर्यटन, इस मॉडल को मालदीव के मॉडल से भलीभांति अध्ययन कर,  वहां से काफी कुछ सीखा जा सकता है । भाववेश में विरोध की राजनीति के इतर हमें बातचीत द्वारा इसे सुलझाने का प्रयास करना चाहिए । आर्थिक और सामरिक दृष्टिकोण से मालदीव से खराब रिश्ते किसी भी प्रकार से स्वीकार्य नहीं किए जा सकते ।

 

 





रविवार, 7 जनवरी 2024

नए भारत का नया कानून : बदलाव और चुनौतियां

 

जय प्रकाश पांडेय

वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी

वर्षों से चुनावी घोषणा पत्रों और विभिन्न मंचों से परिवर्तन हेतु प्रस्तावित भारतीय दंड संहिता 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 और भारतीय आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 को भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता 2023, और भारतीय सुरक्षा (द्वितीय) विधेयक 2023 से हाल ही में प्रतिस्थापित किया गया है, हालांकि नई संहिता के नियमों के लागू होने की तिथि अभी निर्दिष्ट नहीं की गई है। 1834 में थॉमस बबिंगटन मैकाले की अध्यक्षता में गठित समिति की अनुशंसाओं के बाद स्वतंत्र भारत में स्व कानूनों के लिए सशक्त प्रयास के रूप में, गृह मंत्रालय ने वर्ष 2020 में प्रोफेसर (डॉ.) रणबीर सिंह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। समिति की अनुशंसाओं, संसद की प्रक्रियाओं से गुजरता हुआ विधेयक, गृह मंत्रालय की स्थाई समिति की अनुशंसा और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद, भारतीय संस्कृति के सजग प्रहरी , राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख हस्ताक्षर और विश्व को बनारस हिंदू विश्विद्यालय की सौगात देने वाले,भारतरत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी और भारतीय जनता पार्टी के सह- संस्थापक भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्म दिवस के दिन भारत के राजपत्र का हिस्सा बना है जो कि महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक उपलब्धि मानी जा सकती है।

यह माना जा रहा है कि वर्तमान विधेयकों में आम जनमानस की सुविधाओं को केंद्र में रखकर नियम बनाए गए हैं। न्याय प्रणाली के अंतर्गत पीड़ितों, गवाहों और आरोपी व्यक्तियों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना संहिता के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है। इसके तहत त्वरित न्याय की संकल्पना को बल दिया गया है । न्याय की सुधारात्मक भारतीय संकल्पना को बल देते हुए कम्युनिटी सर्विस के प्रावधान को सामने लाया गया है । उत्तरदायी समयबद्ध पुलिस व्यवस्था और ट्रांसपेरेंट प्रक्रिया को नई संहिता सुनिश्चित करती है । नए कानूनों में तकनीक के युग के सापेक्ष इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल प्रमाणों को स्वीकार्य किया गया है। इसके अलावा महिलाओं से संबधित स्नेचिंग, छेड़छाड़ आदि मामलों हेतु पहली बार सख्त सजा के प्रावधान किए गए हैं। बीएनएस विधेयक में साइबर अपराध, आतंकवाद, घृणा अपराध, मॉब लिंचिंग आदि जैसे अपराधों की नई श्रेणियां भी प्रस्तुत की गई है। नई संहिता के अंतर्गत तलाशी और जब्ती प्रक्रिया की वीडियोटेपिंग अनिवार्य कर दी गई है ।

भारत में प्रायः आम जनमानस कानूनी प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ ही रहता है। एफआईआर के संदर्भ में पुलिस प्रशासन के क्षेत्राधिकार, निर्धारित होने के कारण, प्राथमिकी दर्ज करने के लिए पीड़ित पक्ष को भटकना पड़ता है जो पीड़ित पक्ष की परेशानियां ही बढ़ाता है । ऐसे में भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता द्वारा यह स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि आम जनमानस किसी भी नजदीकी थाने में प्राथमिकी दर्ज कर सके । जीरो एफआईआर के सिद्धांत के साथ नई संहिता यह भी सुनिश्चित करती है कि पुलिस प्रशासन वांछित स्टेशनों में ऐसी प्राथमिकी रिपोर्ट को स्वयं हस्तानांतरण करे ।

इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से कार्यवाही की अनुशंसा करती नई भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता सभी मुकदमों,उनकी जांच और कार्यवाही के लिए इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल माध्यमों की आवश्यकता को भी स्वीकार करती है । त्वरित परिणामों के दृष्टिकोण से यह एक सशक्त कदम सिद्ध होगा। यह पीड़ित पक्ष के लिए भी सहायक हो सकता है यदि सभी राज्य सरकारें सक्रियता से कार्य करें । प्रायः घटनाओं के बाद अभियुक्तों द्वारा फरार होने की घटना भारत में एक आम बात है । इस कारण अनेक बार अपराधी की पकड़ ही नही हो पाती है । ऐसे में फरार अभियुक्तों की गैर मौजूदगी में भी उनके ऊपर कार्यवाही का प्रावधान वर्तमान संहिता करती है ।

नई संहिता, न्याय की त्वरित, समयबद्ध व्यवस्था के संदर्भ में भी बात करती है । यह विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए समय सीमाएँ भी निर्धारित करती है। उदाहरण के लिए, नई संहिता के तहत बलात्कार पीड़िताओं की जाँच करने वाले चिकित्सा प्रदाता अपनी रिपोर्ट जांच अधिकारी को सात दिनों के भीतर प्रस्तुत करेंगे।इसके अतिरिक्त 3 साल तक की सजा वाले मामलों में संक्षिप्त विचारण ( समरी ट्रायल) की भी व्यवस्था नई संहिता करती है ताकि अदालतों पर मामलों का बोझ कम किया जा सके। तर्कों की समाप्ति के 30 दिनों के भीतर निर्णय देना (जिसे 60 दिनों तक विस्तारित किया जा सकता है), पीड़ित को 90 दिनों के भीतर जांच की प्रगति की सूचना देना, और सत्र न्यायालय द्वारा पहली सुनवाई के 60 दिनों के भीतर आरोपों की रूपरेखा तैयार करना ये सब कदम नई संहिता के तहत उठाए गए हैं।

पहली बार विवाह, रोजगार, पदोन्नति या झूठी पहचान और झूठे बहानों के द्वारा यौन संबंध बनाना अब एक दंडनीय अपराध माना गया है । 18 वर्ष से कम आयु की बच्चियों के साथ यौन दुराचार के मामलों में मृत्य दंड और मोब लिंचिंग की घटनाओं के मामलों में मृत्य दंड अथवा आजीवन कारावास अथवा 7 साल के सख्त कारावास का भी प्रावधान किया गया है। यह पहला कानून है जो स्पष्ट रूप से बताता है कि सशस्त्र विद्रोह, भारत से अलग होने की कोशिश करना और हमारी एकता, संप्रभुता और अखंडता के साथ खिलवाड़ करना आतंकवाद के रूप में गिना जाएगा । इसके अतिरिक्त आर्थिक आतंकवाद को भी यह चिन्हित करता है ।

चुनौतियां और दिशा :

 अनेक ऐसी संभावनाएं हैं जिनसे आम जनमानस इन नई संहिताओं के विषय में असमंजस में भी है । नई संहिता के तहत कुछ मामलों में पुलिस को एफआईआर करने से पहले प्रारंभिक जांच के अधिकार दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त वर्तमान में, पुलिस हिरासत, गिरफ्तारी के पहले 15 दिनों तक सीमित है। बीएनएसएस सामान्य आपराधिक कानून के तहत पुलिस हिरासत की अधिकतम सीमा का विस्तार 15 दिन की जगह 60 दिन या 90 दिन (अपराध की प्रकृति के आधार पर) करता है ।

पुलिस कस्टडी की सीमा में विस्तार और एफआईआर से पहले प्रारंभिक जांच का विकल्प, पुलिस प्रशासन को अनिर्बाधित अधिकार भी अनायास दे देता है । ऐसे अनिर्बाधित अधिकारो से उनके दुरुपयोग और उल्लंघन की चिंता बनी हुई है । पुलिस कस्टडी में हुई मौतों के लिए कुख्यात रहे भारत में पुलिस कस्टडी की अधिकतम सीमा में अप्रत्याशित विस्तार भी एक विचारणीय बिंदु है ।

जमानत के संदर्भ में नई संहिता यह स्पष्ट करती है कि ऐसे विचाराधीन कैदियों को जमानत दी जाएगी जो पहली बार अपराधी हैं और उन्होंने अधिकतम सजा का एक तिहाई पूरा कर लिया है। हालाँकि आजीवन कारावास वाले दंडनीय अपराध, और ऐसे व्यक्ति जिनके खिलाफ एक से अधिक अपराधों में कार्यवाही लंबित है ऐसे कैदियों को जमानत नहीं दी जाएगी । भारत में आरोपपत्रों में अक्सर कई अपराधों या धाराओं का उल्लेख होता है, इससे कई विचाराधीन कैदी अनिवार्य जमानत के लिए अयोग्य हो सकते हैं।

तकनीक के महत्व को स्वीकार्य करते हुए भारतीय साक्ष्य बिल के अंतर्गत स्वीकार्य दस्तावेजों की श्रेणी में, डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक संचार साधनों के समावेश ने अब कॉल रिकॉर्डिंग्स,ईमेल, आदि के साथ साथ मोबाइल,लैपटॉप,आदि के जरिए प्राप्त सुबूतों को भी प्राथमिक दस्तावेज मानने की तरफ मार्ग प्रशस्त किया है। लेकिन निजी सूचनाओं के संग्रहण और ऐसी व्यवस्था जिसमें डिजिटल सुबूत या सूचनाएं से बिना छेडछाड़ किए संग्रहित रखा जाए यह एक बड़ी चुनौती होगा । निजता के अधिकार को ध्यान में रखते हुए देखें तो निजता के अधिकार के साथ कॉल रिकॉर्डिंग, वॉइस रिकॉर्डिंग आदि को प्राथमिक सुबूतों की श्रेणी में रखना आगे चलकर द्वंद की ही स्थिति पैदा करेगा। वर्तमान समय में जब मोबाइल और लैपटॉप व्यक्ति के निजी जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं ऐसे में नयी संहिता के प्रावधान न्यायालय को जांच हेतु डिजिटल साधनों की भी जब्ती की असीमित शक्ति प्रदान करते हैं । ऐसे व्यक्तियों के भी डिजिटल/ इलेक्ट्रॉनिक जांच के आदेश जिनका ट्रायल से प्रत्यक्ष संबध भी नहीं है, यह निजता के अधिकार के उल्लंघन संबंधी मामलों को बढ़ाएगा।

निजता का अधिकार यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति अपने जीवन के कुछ पहलुओं को निजी रख सकें और सरकार या अन्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप से मुक्त रह सकें।

अतः यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि प्रगतिशील संहिता के साथ व्यक्तियों के गोपनीयता अधिकारों की रक्षा भी समुचित ढंग से की जाए। कानून के शासन के लिए यह अत्यंत आवश्यक कदम है।

बलात्कार के संबंध में लिंग समानता की बात यह संहिता नहीं करती है जो की आश्चर्यजनक बात है। बलात्कार की घटना को महज स्त्री के संबंध में ही देखा गया है । वैवाहिक बलात्कार पर भी संहिता में प्रत्यक्ष रूप से ज्यादा कुछ देखने को नहीं मिलता है । राजद्रोह को देशद्रोह नाम से प्रतिस्थापित जरूर किया गया है लेकिन अभी भी अस्पष्टता बनी हुई है । प्रस्ताव में सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों से अलग देश के खिलाफ विध्वंसक, अलगाववादी और सशस्त्र विद्रोह वाली गतिविधियों को देशद्रोह के अंतर्गत रखा गया है।

ऐसे अपराध जिनके लिए सजा 7 वर्ष से अधिक की है उन मामलों में फोरेंसिक जांच की अनिवार्यता यह संहिता निर्धारित करती है लेकिन अभी भी फोरेंसिक सुविधाओं के संबंध में देश की स्थिति सही नहीं है । ऐसे में नई संहिताओं के अनुसार इकोसिस्टम की व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है ।

वस्तुत: कानून प्रवर्तन और जांच एजेंसियों को प्रदान किए गए बढ़े हुए प्राधिकारों के संभावित दुरुपयोग के बारे में भी आशंकाएं हैं। इसमें कोई दो राय नहीं की वर्तमान संहिताओं ने भारतीयकरण की अच्छी कोशिश की है लेकिन आधारभूत सुविधाओं का विकास और समयबद्ध तरीके से नई संहिताओं का प्रवर्तन अत्यंत आवश्यक है । इसके साथ ही संभावित नकारात्मक पक्षों पर भी सार्थक संवाद से भारतीयता के इन प्रतीकों को व्यापक सहमति प्राप्त हो सकती है । त्वरित न्याय के लिए उपरोक्त प्रयास शानदार हैं परंतु न्यायाधीशों के पदों को सृजित करने, रिक्त पदों को भरने की अत्यंत आवश्यकता है । भारत में प्रति दस लाख की जनसंख्या में वर्तमान में 21 न्यायाधीश मौजूद हैं। एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विधि आयोग की 1987 की रिपोर्ट में प्रति दस लाख में इस संख्या को 50 करने की सिफारिश की गई थी प्रति है । ऐसे में वर्तमान जनसांख्यकीय आधार पर त्वरित रूप से इस दिशा में कार्य करना नई संहिताओं के उद्देश्य प्राप्ति में सहायक सिद्ध होगा ।


अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

  युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र   की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है   । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोल...