गुरुवार, 23 मार्च 2023

प्रतिबद्धता और योजनाओं के क्रियान्वयन से हारेगा टीबी

 


दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक, बैसीलस माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक (बैक्टीरिया )से होने वाली संक्रामक बीमारी टीबी, आज वैश्विक चिंता का कारण बनते जा रही है । यह माना जाता है कि विश्व की एक चौथाई आबादी आज टीबी से संक्रमित है जिसमें पुरुषों में संक्रमण महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा है।आमतौर पर फेफड़ों (फुफ्फुसीय टीबी) को प्रभावित करने वाली यह संक्रामक व्याधि अन्य अंगों (अतिरिक्त-फुफ्फुसीय टीबी) को भी प्रभावित कर सकती है। टीबी के प्रसार के आरंभिक चरण फेफड़ों से यह प्रसार पेट और जननांगों तक भी पहुंच सकता है जिससे अन्य समस्याओं के अतिरिक्त गर्भधारण में समस्याओं से स्त्री शक्ति को जूझना पड़ सकता है । सामान्यतः लगातार 5-6 महीने की दवा के साथ टीबी का नियंत्रण हो जाता है लेकिन जब टीबी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं को नियमित नही लिया जाता तो कभी-कभी दवा प्रतिरोधी टीबी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। टीबी की यह स्थिति सबसे खराब स्थिति है ।

टीबी हवा के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलती है। जब फेफड़ों या गले के टीबी रोग से ग्रसित व्यक्ति खांसता, छींकता, बोलता या गाता है तो टीबी के जीवाणु हवा में फैल जाते हैं। आस-पास के लोग इन जीवाणुओं में सांस ले सकते हैं और संक्रमित हो सकते हैं।

अनेक वैश्विक,राष्ट्रीय,और स्थानीय प्रयासों के बाद भी टीबी के सर्वाधिक मामले विकासशील देशों से आ रहे हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन, द्वारा जारी वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2022, के अनुसार वैश्विक स्तर पर तपेदिक (टीबी) और दवा प्रतिरोधी तपेदिक (टीबी) (एमडीआर, एक्सडीआर और टीडीआर टीबी ) से संक्रमित व्यक्तियों की संख्या में वर्ष 2020 के मुकाबले वर्ष 2021 में लगभग 4.5 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है । दवा प्रतिरोधी तपेदिक( टीबी) के भी मामलों में वर्ष 2020 व वर्ष 2021 के बीच 3 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है । इस रिपोर्ट के अनुसार इलाज तक पहुंच न होने के कारण ही टीबी से होने वाली वैश्विक मौतों की संख्या में वृद्धि हुई है । आज भारत विश्व के उन प्रमुख 10 देशों में शामिल हैं जहां विश्व के लगभग 65 प्रतिशत तपेदिक के मरीज पाए जाते हैं। भारत में टीबी के मरीजों की यह संख्या चीन, इंडोनेशिया,पाकिस्तान,बांग्लादेश और कोंगो से भी उच्च है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2022 में यह भी बताया गया है कि भारत में वर्ष 2020 के मुकाबले वर्ष 2021 में लगभग 18 प्रतिशत ज्यादा टीबी के मामले सामने आए हैं । वर्ष 2020 में आई गिरावटों के पीछे दरअसल कोविड काल में टीबी के रोगियों की रिपोर्टिंग में आई कमी थी ।भारत में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की भारत क्षय रोग रिपोर्ट 2022 (इंडिया टीबी रिपोर्ट 2022) में भारत में टीबी के मामलों में वर्ष 2020 के मुकाबले वर्ष 2021 में 19 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है । टीबी के किसी भी प्रकार से होने वाली मृत्युओं के मामले में भी लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है ।

भारत द्वारा वर्ष 1997 से ही किए जा रहे वैश्विक और देशज प्रयासों के बाद भी दवा प्रतिरोधी ड्रग रेसिस्टेंट तपेदिक(एमडीआर टीबी) मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। भारत द्वारा क्षयरोग (टी.बी.) को नियंत्रित करने के लिए किए जा रहे प्रयास गौरतलब हैं । टीबी की लड़ाई में पहला सशक्त चरण, कुपोषण से मरीज को सुरक्षित करना है । इस तथ्य को समझते हुए वर्ष 2018 से निक्षय पोषण योजना के तहत मरीजों को पोषण युक्त आहार हेतु वित्तीय सहायता दी जाती है ताकि कुपोषण जैसे रोग से पहले से ही पीड़ित व्यक्ति को और दिक्कतों का सामना न करना पड़ जाए। वर्ष 2020 और वर्ष 2021 के दौरान, भारत ने प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण कार्यक्रम के माध्यम से टीबी रोगियों को 89 मिलियन डॉलर (670 करोड़ रुपये) का नकद हस्तांतरण भी किया है । पूरे देश में वर्ष 2021 में लगभग 22 करोड़ से अधिक लोगों की टीबी की जांच की गई। प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत, 40,000 से अधिक निक्षय मित्र पूरे देश में 10.45 लाख से अधिक टीबी रोगियों की आज लगातार मदद कर रहे हैं। अभी हाल ही में उत्तराखंड के एम्स ऋषिकेश द्वारा सुदूरवर्ती टिहरी गढ़वाल में ड्रोन के माध्यम से टीबी की दवाइयां संफलतापूर्वक भेजी गई हैं ।निजी क्षेत्रों के भी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के सहयोग से काफी हद तक स्थितियां सुधरने का क्रम आज बना हुआ है लेकिन अभी भी चुनौतियां विकराल हैं। सामाजिक जागरूकता के अभाव से अभी भी टीबी और विशेषकर एमडीआर टीबी के मामले कम दर्ज कराए जाते हैं।

टीबी उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय नीति को वर्ष 2017 में इस संकल्प के साथ लाया गया कि वर्ष 2025 तक हमने इसे पूरी तरह से भारत से खत्म करना है । एमडीआर टीबी को भी नियंत्रित करने, गुणवत्तापूर्ण चिकित्सकीय परीक्षण एवं इलाज को प्रभावी ढंग से फैलाने और स्वास्थ्य क्षेत्रों में संक्रमण के प्रसार को नियंत्रित करने की दिशा में ,संकल्पित होने की दिशा में ये हमारे प्रभावी कदम हैं । पोषणीय समर्थन, यात्रा व्यय समर्थन और सामाजिक एवम मानसिक समर्थन आज टीबी से ग्रस्त नागरिकों को सशक्त कर रहा है । भारत टीबी और एमडीआर टीबी के प्रभावी अंत के लिए अपने अनुसंधान कार्यक्रमों में भी विशेष प्रयास कर रहा है । टीबी के मरीजों की आर्थिक सहायता के लिए राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के तहत अप्रैल-2018 से निक्षय पोषण योजना भी देश में संचालित है । इसके तहत टीबी मरीज को पौष्टिक आहार के लिए 6 महीने तक 500 रुपए प्रतिमाह सहायता दी जाती है।निक्षय इकोसिस्टम, टीबी हारेगा देश जीतेगा सरीखे कैंपेन प्रभावी नीतियों के निर्माण एवं क्रियान्वयन में आज मील का पत्थर साबित हो रही हैं। वर्ष 2016 में भारत एमडीआर-टीबी के उपचार के लिए बेडाक्यूलिन और वर्ष 2019 से डिलामेनिड ड्रग्स को भी अपने तपेदिक नियंत्रित कार्यक्रम में शामिल करने वाला पहला देश बन गया है ।

उच्च गुणवत्ता वाली दवाइयों की समुचित उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वर्ष 2001 वह आधारभूमि हैं जहां वैश्विक ड्रग सुविधा (ग्लोबल ड्रग फैसिलिटी) का गठन किया गया । एमडीआर-टीबी वाले रोगियों के लिए दूसरी-पंक्ति की टीबी दवाओं तक पहुंच की सुविधा सुनिश्चित करने ,दवाओं की खरीद के लिए देशों के मध्य सहमति स्थापित करने और देशों को उनके एमडीआर-टीबी प्रबंधन कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन में सहयोग देने के उद्देश्य से वर्ष 2010 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ग्रीनलाइट समिति की स्थापना की गई । इसके अतिरिक्त टीबी के वैश्विक भार को वर्ष 2035 तक 90 प्रतिशत तक कम करने तथा टीबी से होने वाली मृत्युओं की संख्या को वर्ष 2035 तक 95 प्रतिशत तक कम करने के संकल्प के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष 2015 से ही टीबी की समाप्ति हेतु कार्यक्रम चलाया जा रहा है।

टीबी के बढ़ते मामलों के देखते हुए आज जिला स्तर से एक कदम और आगे बढ़कर ग्राम पंचायतों के माध्यम से गांवों के क्लस्टर बनाकर वहां अधिकाधिक परीक्षण प्रयोगशालाओं को स्थापित करने की आवश्यकता है । सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम महज दिवस विशेष तक सीमित न होकर व्यापक आधार पाएं इस लिए भी योजनाओं के क्रियान्वयन में उर्ध्वगामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

टीबी को हराने के लिए सामाजिक जागरूकता और प्रतिबद्धता ही प्रभावी माध्यम है, अतः योजनाओं के प्रचार,प्रसार और प्रस्तावित अभियानों में पंचायती राज संस्थाओं की महत्ती भूमिका स्थापित कर टीबी मुक्त भारत की तरफ हम कदम बढ़ाने में सफल होंगे।


रविवार, 5 मार्च 2023

समुद्रीय जलस्तर वृद्धि के विकराल चित्र

 

महाकवि जयशंकर प्रसाद जी ने महाप्रलय के बाद का दृश्य कामायनी में प्रकट करते हुए लिखा था –

“हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर,

बैठ शिला की शीतल छाँह

एक पुरुष, भीगे नयनों से

देख रहा था प्रलय प्रवाह ।

नीचे जल था ऊपर हिम था,

एक तरल था एक सघन,

एक तत्व की ही प्रधानता

कहो उसे जड़ या चेतन “

 केन्या के बैरिंगो झील से कुछ समय पूर्व आ रही तस्वीरें जयशंकर प्रसाद जी की कविता के साक्षात चित्र सामने रख देती है। आज बैरिंगों झील का जलस्तर बढ़ता जा रहा है । मलेरिया,टाइफाइड, आदि संक्रामक रोगों से जन,जंगल,जमीन और जानवरों का संघर्ष लगातार जारी है । कमोबेश यही स्थिति ऑस्ट्रेलिया और हवाई द्वीप के बीच स्थित तुवालु समूहों भी देखने को मिल रही है जो लंबे समय से जलवायु परिवर्तन और बढ़ते समुद्र के स्तर के जोखिमों का सामना कर रहे हैं। उच्च ज्वार की स्थिति में तुवाल समूहों के 40% क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं और यह संभावना है कि सदी के अंत तक पूरे देश के पानी के नीचे होने का अनुमान है। तुवालुवासी तटीय क्षेत्रों में रहते हैं, इसलिए पहले से ही कमजोर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाला जा रहा है। इसी प्रकार की स्थिति दक्षिण प्रशांत में लगभग 1,000 द्वीपों और एटोल के एक समूह सोलोमन द्वीप की है जो धीरे-धीरे समुद्र के जलस्तर से काबिज होता जा रहा है।

समुद्रीय जलस्तर में वृद्धि सम्पूर्ण विश्व को अपनी विभीषिका में समेट लेने वाले घटना है । तेजी।से होते जलवायु परिवर्तन से समुद्रीय जलस्तर वृद्धि की घटनाओं में वृद्धि हुई है । समुद्रीय जल स्तर में वृद्धि के स्वरूप तटीय पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण, तूफान की तीव्रता और बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि होती है। इससे भूजल के संदूषण का भी खतरा बना रहता है और खाद्य सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। समुद्रीय जलस्तर में वृद्धि से भारत जैसे लंबी तटरेखा वाले देशों में विपरीत परिस्थितियां जन्म लेंगी इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती । इस संदर्भ में कुछ प्रमुख आंकड़ों पर गौर करना आवश्यक हो जाता है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार वर्ष 2000 से वर्ष 2019 की समयावधि में प्राकृतिक त्रासदियों की संख्या लगभग 3500 रही हैं । पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच दशकों में भारतीय तट के आसपास समुद्र का स्तर औसतन 1.7 मिमी प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बंगाल की खाड़ी में समुद्र के स्तर में वृद्धि अरब सागर से अधिक है। समुद्र के स्तर में यह वृद्धि जहां तटीय कटाव और विशाल परिस्थितिकी परिवर्तन को जन्म दे सकती है वहीं संसाधनों में विकृति भी उत्पन्न कर सकती है । बाढ़ और खारे पानी के आक्रमण से मनुष्य के साथ साथ समुद्री जीवन में भी उत्पन्न अस्थिरता , कई जीवों के अस्तित्व पर भी संकट डाल सकती है। संवेदनशील हिंदुकश पर्वत श्रृंखलाओ में वर्ष 1950 से वर्ष 2014 तक 1.3 डिग्री तापमान वृद्धि देखी गई है ।

 विश्व मौसम संगठन की हालिया प्रकाशित रिपोर्ट में यह बताया गया है कि वर्ष 2013 से वर्ष 2022 के मध्य समुद्री जल स्तर का विस्तार 4.5 मिलीमीटर तक हुआ है जो कि वर्ष 1900 से वर्ष 1970 के बीच हुए विस्तार से लगभग तीन गुना है । समुद्र के स्तर में वृद्धि की औसत दर वर्ष 1901 और वर्ष 1971 के बीच प्रति वर्ष 1.3 मिमी से बढ़कर वर्ष 1971 और वर्ष 2006 के बीच 1.9 मिमी प्रति वर्ष हो गई। विश्व मौसम संगठन के अनुसार, वर्ष 2013 और वर्ष 2022 के बीच समुद्र के स्तर में प्रति वर्ष 4.5 मिमी की वृद्धि हुई है।

इस रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित न रखा गया तो अगले 2000 वर्षों में वैश्विक औसत समुद्र-स्तर 2 से 3 मीटर तक बढ़ जाएगा । यहां यह तथ्य ध्यातव्य है कि वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्यों के साथ चलने पर सुमद्रजल स्तर में 2 से 6 मीटर की वृद्धि की संभावना है जोकि विलोपन का प्रमुख खतरा है । अतः ऐसे में हमारा ध्यान वैश्विक भू ताप को 1.5 डिग्री तक सीमित करना चाहिए । वैश्विक समुद्रीय जल स्तर वृद्धि और परिणाम रिपोर्ट के अनुसार लंबी तटीय संरचना एवं तटीय जनसंख्या वाले देश भारत, नीदरलैंड, बांग्लादेश, चीन आदि के साथ साथ निचले स्तर के छोटे छोटे द्वीपों पर समुद्री जलस्तर बढ़ने का सर्वाधिक खतरा रहेगा । यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब पेरिस जलवायु समझौते के अंतर्गत

पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से कम करने और अधिमानतः इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लक्ष्य के साथ विश्व के अलग अलग देश साथ चल रहे हैं। जिसे वर्ष 2030 तक प्राप्त किया जाना हैं

आईपीसीसी की जलवायु परिवर्तन 2021 की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि हिंद महासागर के दक्षिण पश्चिमी हिस्से में वैश्विक अनुपात से भी ज्यादा जलस्तर वृद्धि की घटनाएं सामने आ रही हैं ।

बढ़ते समुद्र का स्तर तटीय पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण का कारण बनता है, तूफान की तीव्रता और बाढ़ की तीव्रता बिगड़ती है। वे मिट्टी और भूजल के संदूषण का कारण भी बन सकते हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा पर और नकरात्मक प्रभाव पड़ सकता है । जलस्तर वृद्धि से उत्पन्न लवणता मत्स्य उत्पादन को भी प्रभावित कर सकती है ।

भारत सरकार ने समुद्र के स्तर में वृद्धि के मुद्दे से निपटने के लिए कई पहल की हैं, जिसमें जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना का विकास, तटीय क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम का निर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना शामिल है। हालाँकि, भारत में समुद्र के स्तर में वृद्धि के प्रभावों को कम करने के लिए और अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

भारत ने जलवायु परिवर्तन पर एक व्यापक राष्ट्रीय कार्य योजना विकसित की है, जिसमें आठ राष्ट्रीय मिशन शामिल हैं, जिनमें से एक टिकाऊ आवास और तटीय प्रबंधन पर केंद्रित है।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2019 में तटीय क्षेत्रों के सतत विकास और प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए तटीय क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम का उद्देश्य तटीय समुदायों के लचीलेपन में सुधार करना, आजीविका के अवसरों में वृद्धि करना और तटीय पर्यावरण की रक्षा करना है। भारत सरकार ने 2030 तक 450 गीगावाट अक्षय ऊर्जा पैदा करने का लक्ष्य भी इसी संदर्भ में रखा है। अक्षय ऊर्जा की ओर यह बदलाव जीवाश्म ईंधन पर भारत की निर्भरता को कम करेगा और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी कम करेगा।

 भारत सरकार ने समुद्र तट को कटाव से बचाने और बड़ते जलस्तर से मीठे पानी के स्रोतों में खारे पानी की मिलावट को रोकने के लिए मैंग्रोव संरक्षण परियोजनाएं भी शुरू की हैं। सरकार ने कमजोर तटीय क्षेत्रों को कटाव और बाढ़ से बचाने के लिए समुद्र की दीवारों, घाटियों और ब्रेकवाटर के निर्माण सहित कई तटीय संरक्षण और बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाओ की भी तरफ कदम बढ़ाने शुरू किए हैं।

 वस्तुतः इतने संवेदनशील वैश्विक विषय पर सभी देशों को अपने यहां किए जा रहे अनुसंधानों,प्रयोगों को दूसरे देशों के साथ भी साझा करने की आवश्यकता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जर्नल नेचर में हाल ही में ज्कोशवन ( ग्रीनलैंड) में 100 मी. लंबे बांध निर्माण संबंधी प्रस्ताव भी सामने रखे हैं । आर्कटिक के गलते हिमनदों के जल से बनी कृत्रिम झीलों की योजना पर यूके, जर्मनी आदि राष्ट्र कार्य कर रहे हैं । वैश्विक भू तापन को रोकने के लिए कृत्रिम स्नो कवर, एरोसोल छिड़काव,और जियोइंजीनियरिंग के नवोन्मेषी प्रयोगों के लिए एक मंच पर आने की आज आवश्यकता है ।


अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

  युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र   की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है   । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोल...