दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक, बैसीलस माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक (बैक्टीरिया )से होने वाली संक्रामक बीमारी टीबी, आज वैश्विक चिंता का कारण बनते जा रही है । यह माना जाता है कि विश्व की एक चौथाई आबादी आज टीबी से संक्रमित है जिसमें पुरुषों में संक्रमण महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा है।आमतौर पर फेफड़ों (फुफ्फुसीय टीबी) को प्रभावित करने वाली यह संक्रामक व्याधि अन्य अंगों (अतिरिक्त-फुफ्फुसीय टीबी) को भी प्रभावित कर सकती है। टीबी के प्रसार के आरंभिक चरण फेफड़ों से यह प्रसार पेट और जननांगों तक भी पहुंच सकता है जिससे अन्य समस्याओं के अतिरिक्त गर्भधारण में समस्याओं से स्त्री शक्ति को जूझना पड़ सकता है । सामान्यतः लगातार 5-6 महीने की दवा के साथ टीबी का नियंत्रण हो जाता है लेकिन जब टीबी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं को नियमित नही लिया जाता तो कभी-कभी दवा प्रतिरोधी टीबी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। टीबी की यह स्थिति सबसे खराब स्थिति है ।
टीबी हवा के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलती है। जब फेफड़ों या गले के टीबी रोग से ग्रसित व्यक्ति खांसता, छींकता, बोलता या गाता है तो टीबी के जीवाणु हवा में फैल जाते हैं। आस-पास के लोग इन जीवाणुओं में सांस ले सकते हैं और संक्रमित हो सकते हैं।
अनेक वैश्विक,राष्ट्रीय,और स्थानीय प्रयासों के बाद भी टीबी के सर्वाधिक मामले विकासशील देशों से आ रहे हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन, द्वारा जारी वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2022, के अनुसार वैश्विक स्तर पर तपेदिक (टीबी) और दवा प्रतिरोधी तपेदिक (टीबी) (एमडीआर, एक्सडीआर और टीडीआर टीबी ) से संक्रमित व्यक्तियों की संख्या में वर्ष 2020 के मुकाबले वर्ष 2021 में लगभग 4.5 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है । दवा प्रतिरोधी तपेदिक( टीबी) के भी मामलों में वर्ष 2020 व वर्ष 2021 के बीच 3 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है । इस रिपोर्ट के अनुसार इलाज तक पहुंच न होने के कारण ही टीबी से होने वाली वैश्विक मौतों की संख्या में वृद्धि हुई है । आज भारत विश्व के उन प्रमुख 10 देशों में शामिल हैं जहां विश्व के लगभग 65 प्रतिशत तपेदिक के मरीज पाए जाते हैं। भारत में टीबी के मरीजों की यह संख्या चीन, इंडोनेशिया,पाकिस्तान,बांग्लादेश और कोंगो से भी उच्च है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2022 में यह भी बताया गया है कि भारत में वर्ष 2020 के मुकाबले वर्ष 2021 में लगभग 18 प्रतिशत ज्यादा टीबी के मामले सामने आए हैं । वर्ष 2020 में आई गिरावटों के पीछे दरअसल कोविड काल में टीबी के रोगियों की रिपोर्टिंग में आई कमी थी ।भारत में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की भारत क्षय रोग रिपोर्ट 2022 (इंडिया टीबी रिपोर्ट 2022) में भारत में टीबी के मामलों में वर्ष 2020 के मुकाबले वर्ष 2021 में 19 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है । टीबी के किसी भी प्रकार से होने वाली मृत्युओं के मामले में भी लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है ।
भारत द्वारा वर्ष 1997 से ही किए जा रहे वैश्विक और देशज प्रयासों के बाद भी दवा प्रतिरोधी ड्रग रेसिस्टेंट तपेदिक(एमडीआर टीबी) मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। भारत द्वारा क्षयरोग (टी.बी.) को नियंत्रित करने के लिए किए जा रहे प्रयास गौरतलब हैं । टीबी की लड़ाई में पहला सशक्त चरण, कुपोषण से मरीज को सुरक्षित करना है । इस तथ्य को समझते हुए वर्ष 2018 से निक्षय पोषण योजना के तहत मरीजों को पोषण युक्त आहार हेतु वित्तीय सहायता दी जाती है ताकि कुपोषण जैसे रोग से पहले से ही पीड़ित व्यक्ति को और दिक्कतों का सामना न करना पड़ जाए। वर्ष 2020 और वर्ष 2021 के दौरान, भारत ने प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण कार्यक्रम के माध्यम से टीबी रोगियों को 89 मिलियन डॉलर (670 करोड़ रुपये) का नकद हस्तांतरण भी किया है । पूरे देश में वर्ष 2021 में लगभग 22 करोड़ से अधिक लोगों की टीबी की जांच की गई। प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत, 40,000 से अधिक निक्षय मित्र पूरे देश में 10.45 लाख से अधिक टीबी रोगियों की आज लगातार मदद कर रहे हैं। अभी हाल ही में उत्तराखंड के एम्स ऋषिकेश द्वारा सुदूरवर्ती टिहरी गढ़वाल में ड्रोन के माध्यम से टीबी की दवाइयां संफलतापूर्वक भेजी गई हैं ।निजी क्षेत्रों के भी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के सहयोग से काफी हद तक स्थितियां सुधरने का क्रम आज बना हुआ है लेकिन अभी भी चुनौतियां विकराल हैं। सामाजिक जागरूकता के अभाव से अभी भी टीबी और विशेषकर एमडीआर टीबी के मामले कम दर्ज कराए जाते हैं।
टीबी उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय नीति को वर्ष 2017 में इस संकल्प के साथ लाया गया कि वर्ष 2025 तक हमने इसे पूरी तरह से भारत से खत्म करना है । एमडीआर टीबी को भी नियंत्रित करने, गुणवत्तापूर्ण चिकित्सकीय परीक्षण एवं इलाज को प्रभावी ढंग से फैलाने और स्वास्थ्य क्षेत्रों में संक्रमण के प्रसार को नियंत्रित करने की दिशा में ,संकल्पित होने की दिशा में ये हमारे प्रभावी कदम हैं । पोषणीय समर्थन, यात्रा व्यय समर्थन और सामाजिक एवम मानसिक समर्थन आज टीबी से ग्रस्त नागरिकों को सशक्त कर रहा है । भारत टीबी और एमडीआर टीबी के प्रभावी अंत के लिए अपने अनुसंधान कार्यक्रमों में भी विशेष प्रयास कर रहा है । टीबी के मरीजों की आर्थिक सहायता के लिए राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के तहत अप्रैल-2018 से निक्षय पोषण योजना भी देश में संचालित है । इसके तहत टीबी मरीज को पौष्टिक आहार के लिए 6 महीने तक 500 रुपए प्रतिमाह सहायता दी जाती है।निक्षय इकोसिस्टम, टीबी हारेगा देश जीतेगा सरीखे कैंपेन प्रभावी नीतियों के निर्माण एवं क्रियान्वयन में आज मील का पत्थर साबित हो रही हैं। वर्ष 2016 में भारत एमडीआर-टीबी के उपचार के लिए बेडाक्यूलिन और वर्ष 2019 से डिलामेनिड ड्रग्स को भी अपने तपेदिक नियंत्रित कार्यक्रम में शामिल करने वाला पहला देश बन गया है ।
उच्च गुणवत्ता वाली दवाइयों की समुचित उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वर्ष 2001 वह आधारभूमि हैं जहां वैश्विक ड्रग सुविधा (ग्लोबल ड्रग फैसिलिटी) का गठन किया गया । एमडीआर-टीबी वाले रोगियों के लिए दूसरी-पंक्ति की टीबी दवाओं तक पहुंच की सुविधा सुनिश्चित करने ,दवाओं की खरीद के लिए देशों के मध्य सहमति स्थापित करने और देशों को उनके एमडीआर-टीबी प्रबंधन कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन में सहयोग देने के उद्देश्य से वर्ष 2010 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ग्रीनलाइट समिति की स्थापना की गई । इसके अतिरिक्त टीबी के वैश्विक भार को वर्ष 2035 तक 90 प्रतिशत तक कम करने तथा टीबी से होने वाली मृत्युओं की संख्या को वर्ष 2035 तक 95 प्रतिशत तक कम करने के संकल्प के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष 2015 से ही टीबी की समाप्ति हेतु कार्यक्रम चलाया जा रहा है।
टीबी के बढ़ते मामलों के देखते हुए आज जिला स्तर से एक कदम और आगे बढ़कर ग्राम पंचायतों के माध्यम से गांवों के क्लस्टर बनाकर वहां अधिकाधिक परीक्षण प्रयोगशालाओं को स्थापित करने की आवश्यकता है । सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम महज दिवस विशेष तक सीमित न होकर व्यापक आधार पाएं इस लिए भी योजनाओं के क्रियान्वयन में उर्ध्वगामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
टीबी को हराने के लिए सामाजिक जागरूकता और प्रतिबद्धता ही प्रभावी माध्यम है, अतः योजनाओं के प्रचार,प्रसार और प्रस्तावित अभियानों में पंचायती राज संस्थाओं की महत्ती भूमिका स्थापित कर टीबी मुक्त भारत की तरफ हम कदम बढ़ाने में सफल होंगे।
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