रविवार, 28 अगस्त 2022

अफवाहों से भरे बीते 8 वर्ष

 

जय प्रकाश पाण्डेय 


प्रोपेगेंडा' भारतीय राजनीति की वर्तमान आधारशिला बनता जा रहा है और भारतीय राजनीति अफवाहों के कलेवर में सड़कों में लग रहे जाम और नारों के बीच आगे बढ़ रही है जबकि भारत का लोकतंत्र अंतिम छोर में विकास और उत्थान के लिए संकल्पित जीवन अर्पण करने वाले व्यक्तियों को राष्ट्रपति के रूप में स्थापित करते हुए आगे बढ़ रहा है । दोनों के बीच बुनियादी फर्क साफ है । भारत का विपक्ष आज महज अफवाहों के ब्रांड अंबेडसर के रूप में स्थापित होते जा रहे हैं और सत्ता पक्ष लोकतंत्र को उसके गंतव्य तक पहुंचाने वाले साधन के रूप में । 



आज वर्ष 2022 में पहुंचकर , अतीत के 8 सालों को देखते हैं और भ्रष्टाचारियों,अर्बन नक्सलियों और असामाजिक तत्वों की खबरों को देखते हैं तो समझ आता है क्यों एक पूरा कुनबा इस विचारधारा को हराने के पीछे लग गया । विदेशी फंडिंग प्राप्त एनजीओ की कार्यशैली के नियमन संबंधी कानून हों ,भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कार्यवाही हो या फिर नक्सल प्रभावित राज्यों में अमन के साथ विकास के उपाय या फिर राष्ट्र विकास के कार्य , जिनके सरोकार प्रभावित होने वाले थे, अग्रिम पंक्ति में खड़े नारेबाज और आलोचक यही थे । शायद ये प्राध्यापकों, बुद्धिजीवियों, भ्रष्ट नेताओं का वर्ग इतना दूरगामी था कि इनको पता था देश में भारतीय जनता पार्टी के शासन का अर्थ । आज फेसबुकिया क्रांति करते ये लोग अभी भी पाए जाते हैं और अपनी असफल योजनाओं, प्रशासनिक अक्षमताओं को छुपाने में अनवरत रूप से संलग्न हैं । 



सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुख्यधारा के सभी मीडिया चैनलों ने वर्ष 2013 के उत्तरार्ध से ही जिसका प्रमुखता से मीडिया ट्रायल किया और प्रबुद्ध विचारकों ने जिसके विपक्ष में कहानियां,उपन्यास लिख डाले , बड़े बड़े शायरों ने शेर बना डाले ऐसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विशेष जांच दल द्वारा क्लीन चिट दी गई थी । उसके विपक्ष में दायर याचिका को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभी हाल में खारिज कर दिया गया है लेकिन जिस फर्जीवाड़े और नकारात्मकता का माहौल तथाकथित मुख्यधारा के चैनलों,बुद्धिजीवियों,विपक्ष के नेताओं द्वारा पहले बनाया गया था उसकी क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती । 

आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही नहीं,देश के गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा अन्य राष्ट्रवादी नेताओं की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया गया। इस प्रयास में सूचना के सभी तंत्र संलग्न रहे । यह पूरी प्रक्रिया पूर्व निर्धारित योजना से चलती । पहले मानव हत्यारे,और मानवीय संवेदनाओं को स्पर्श करने वाले नाम घोषित किये जाते और फिर पूरे देश में नकारात्मकता का और डर का माहौल तैयार किया जाता ।  


देश के गृह मंत्री श्री अमित शाह के लिए तो आम जनता के सम्मुख नकारात्मकता का वह अंबार लगाया गया जो तब ध्वस्त हुआ जब गृहमंत्री ने वर्ष 2017 में संसद में अपनी बातों को रखना शुरू किया । जिस तार्किकता, स्पष्टता और दृढ़ता से राष्ट्रीय महत्व के सभी विषयों पर उन्होंने स्टैंड लिया है वह काबिले तारीफ है । 


 उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के संदर्भ में भी ऐसे दुष्प्रचारों को जो हवा दी गई वह भी तब स्पष्ट हुई जब स्वयं गोरखधाम के मुस्लिम समुदाय ने योगी आदित्यनाथ के समर्थन में वास्तविक तथ्यों को रखना शुरू किया ।


यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि क्योंकि नागरिकों को यह समझना होगा कानूनी लंबित वादों के संबंध में मीडिया ट्रायल और तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा बयान, विचार तो दिए जा सकते हैं लेकिन कानूनी प्रक्रिया में फंसे व्यक्ति के सामने कानूनी प्रक्रिया का हवाला देना ही विकल्प बचता है क्योंकि यह कानूनी और संवैधानिक बाध्यता बन जाती है । इसी का फायदा पत्रकारिता से लेकर विश्विद्यालयों के प्राध्यापकों ने जमकर उठाया । और मानवीयता के उस क्षरण बिंदु पर लाके खड़ा किया जहां अफवाहों,मनगढ़ंत तथ्यों के आधार पर मीडिया ट्रायल किया जाने लगा ।



वर्ष 2013 के उत्तरार्ध से अभी तक राष्ट्रीय नीतियों के मामलों पर विपक्ष को आप दुष्प्रचार में ज्यादा लगा हुआ पाते हैं । इसी दुष्प्रचार के तहत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रति वैचारिक वैमनस्य के बीज आम छात्रों और आम जनमानस के बीच भरने शुरू हुए । मसलन बंगाल हिंसा और केरल में स्वयंसेवकों की हत्या करने वाली सरकारों के हिमायती और अवसरों पर अपनी सुविधा से मुंह खोलने वाले प्राध्यापकों,लेखकों और बुद्धिजीवीयों द्वारा आजादी के आंदोलन और अतिवादियों के साथ संघ के तार जोड़ने की कोशिश हुई । सब बिना तथ्यों,और प्रमाणों के । संघ के विचारों को मनमाफिक इन मीडिया चैनलों ने परोसा और एक बड़ा वर्ग इस साजिश को समझ नहीं पाया । 


अवार्ड वापसी गैंग, मॉब लिंचिंग,कलबुर्गी सरीखे विद्वानों की हत्या, गोकशी, नागरिकता अधिनियम, धारा 370 , रोहिंग्या विवाद और कृषि विधेयक इन सभी घटनाओं के आलोक में वर्ष 2014 से अभी तक के भारत को देखेंगे तो हम पाएंगे देश में संसद को छोड़कर हर जगह जनता को बरगलाने का, विरोध का और अधूरी जानकारियों को फैलाने का माहौल तैयार किया जा रहा है । 


संसद में यह स्थिति पैदा करने के लिए विपक्ष के पास जनादेश नहीं है और स्वस्थ विमर्श तो विपक्ष की सोच से परे है। ऐसे में माहौल के निर्माणकर्ताओं का चरित्र और व्यक्तित्व दोनों धीरे धीरे बाहर आ रहा है । गत दिनों पूर्व हुई कुछ गिरफ्तारियों को भी इन अफवाहों के सृजनकर्ता की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है । ऐसे माहौल के सृजनकर्ताओं ने मानों मन में ठाना है कि इफ यू कांट कन्वींस दैन कन्फ्यूज् ( यदि आप भरोसे में नही ले सकते तो असमंजस में डाल दें) और देश के नागरिक अपने जीवन की आपाधापी के बाद इन्हीं विषयों में विमर्श में लगे हैं जबकि यह ऐसा दशक होने जा रहा है जो भारत के गौरवमयी इतिहास और स्वर्णिम भविष्य को विश्वमंच में स्थापित करता दिख रहा है। । शेष बचे विमर्श को संसद में बैठे विपक्ष के वकील सांसद पूरा कर देते हैं जिनको तोड़ने मरोड़ने और जोड़ने की विशेषज्ञता होती है । खाली खजानों के बाद भी देश में हो रहे अनगिनत विकास के कार्यों को प्रिंट मीडिया और सोशल साइट्स में विरले ही जगह मिली है । मिर्च मसालेदार आधे अधूरे तथ्यों को ही खबर बनाने की होड़ ने भारत को नुकसान पहुंचाया है जिस पर विवेचना अत्यंत आवश्यक है। 


भारत ने विश्व के अन्य प्रमुख देशों के सामने भी खुद को सशक्तता के साथ आज स्थापित किया है लेकिन राजनीतिक अखाड़े ने भारत में आए बदलाव पर विमर्शों को मौन कर दिया क्योंकि भले ही सरकार भारतीय जनता पार्टी की हो अभी भी ऐसी कई दीमकें प्रणाली में विद्यमान हैं जो प्रजातंत्र की सफलता में बाधक हैं। ये वहीं दीमकें हैं जिन्होंने न समय पर आतंकवाद के निस्तारण के लिए प्रायोगिक योजनाएं बनाई न ही समय से प्रतियोगी परीक्षाएं करवाई । न ही सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास कार्य किया न ही लक्षद्वीप सरीखे संभावनाओं के द्वारों में पर्यटन संभावनाओं को खोज की । न ही नक्सलवाद को नियंत्रित करने के लिए नीतियां बनाई और न ही पूर्वोत्तर भारत को मुख्यधारा में लाने के प्रयास किए । कोशिशें अब ऐसे दीमकों से बचने की होने चाहिए ।



इस तरह दुस्प्रचारों के दौर से निकलकर, अफवाहों के बाजार से हम धीरे धीरे बाहर आ रहे हैं लेकिन सिस्टम को खोखला बनाने वाली दीमकों का चिन्हीकरण आवश्यक है । वर्ष 2014 से अभी तक के भारत के स्वर्णमयी यात्रा को प्रत्येक नागरिक ने अपने स्वतंत्र इंद्रियों से ग्रहण करना होगा। 


दरअसल अफवाहें, दुष्प्रचार अपने साथ सत्य को दबाए रखते हैं और हम यह तब समझ पाते हैं जब ऐसी अफवाहें और दुष्प्रचार अपना कारनामा कर चुकी होती हैं । 

आज देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और स्वयं आदरणीय सर संघचालक जी द्वारा भी इन अफवाहों को विभिन्न माध्यमों से नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है और सकारात्मकता की तरफ समाज को ले जाने के प्रयास किए गए हैं लेकिन फेसबुकिया क्रांतिकारियों को इन विचारों को सुनने समझने और देखने की फुरसत नहीं ।

कश्मीर समस्या हल, नागरिकता अधिनियम,नोटबंदी,जीएसटी,आतंक निरोधी अधिनियम,और असामाजिक तत्वों से निपटान करती यह सरकार दृढ़ता के उस स्तर को दिखाती है जो लोकतंत्र का आधार है । जनतंत्र में सामाजिक जागरूकता लाना भी आदर्श नागरिक का कर्तव्य है और ऐसी सामाजिक जागरूकता राजनैतिक जागरूकता का मार्ग प्रशस्त करेगी इसी उम्मीद के साथ हमें जागरूकता के दूत बनने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा ।


लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।

गुरुवार, 25 अगस्त 2022

दिन ढल जाए : ईडी, सीबीआई सताए

 

अगली बार कोई पूछे कि देश में क्या चल रहा है तो बेधड़क बोलिए देश में आजकल सीबीआई, ईडी, एसटीएफ चल रहा है । फुर्सत मिली तो कभी रणबीर सिंह की तो कभी प्रेगनेंट कलाकारों के बेबी बंप की तस्वीरें भी चल रही हैं । बस कुछ मत बताइए तो ये कि कैसे पर्चे लीक होने का ट्रेंड देश में बढ़ रहा है और कैसे कैश दो नौकरी लो 

की जड़ें प्रायः अधिकतर राज्यों में अपनी जड़ें जमा चुकी है । 


सीबीआई से ध्यान आया दिल्ली का । वहां के शिक्षा मंत्री के पीछे भी सीबीआई लगी है । दिल्ली में ही तो पूर्व सरकार के वित्त मंत्री भी पाए जाते हैं उनके भी पीछे ईडी पड़ी है । कुछ महीनों पहले कोरोना योद्धा के रूप में सामने आए सोनू सूद के भी पीछे ईडी पड़ी थी। लालू जी का हाल किसी से छुपा है नहीं । इनको भी ऊपर सीबीआई, ईडी का वक्तानुसार वरदहस्त प्राप्त होता रहता है । इसी बीच देश की प्रमुख राजनैतिक पार्टी के मुखिया और विपक्ष के आधारस्तंभ राहुल गांधी भी इसी क्रम का हिस्सा रहे।  


 उपरोक्त पूरे घटनाक्रमों में एक चीज स्पष्ट है और वह है ईडी और सीबीआई की बड़ी सक्रियता । इन सक्रियताओं की तरफ युवाओं का एक बहुत ही बड़ा वर्ग बड़ी उम्मीद से देख रहा है । यह वही वर्ग है जिसने बिहार में पेपर लीक से लेकर उत्तर प्रदेश में नोट के बदले नौकरी का दंश झेला है , जिसने उत्तराखंड में राजनैतिक संरक्षण प्राप्त नेताओं की मिलीभगत से विलंबित और निलंबित होती प्रतियोगी परीक्षाएं देखी हैं। कहने को तो ये 

युवा किसी देश के मेरुदंड होते हैं लेकिन सरकारी नौकरियों के बदलते ट्रेंड ने इनकी ही मेरुदंड को सबसे ज्यादा नुकसान किया है । कोरोना काल के बाद युवाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग प्रतियोगी परीक्षाओं में कहीं उम्र की पात्रता से वंचित हो तो कहीं जेब में पैसों की कमी के चलते तेजी से डिप्रेशन की तरफ बढ़ता जा रहा है जिसके लिए न ही किसी भी प्रकार का सर्वेक्षण किया गया है और न ही इस आवश्यकता को महसूस किया गया है। तमाम स्वरोजगार योजनाओं की पात्रता से वंचित युवाओं का वर्ग इस उम्मीद में है कि अंतरराज्य गुटों की सक्रियता को देश की सीबीआई नियंत्रित करे । शिथिल कानूनों का फायदा उठाकर नौकरियों के ठेकेदारों ने पूरे युवाओं के साथ धोखा किया है। हाल ही मैं उत्तराखंड में पेपर लीक प्रकरण में जिस प्रकार 2 दर्जन के आसपास गिरफ्तारियां भारत के अलग अलग हिस्सों से हो रही हैं तथा पकड़े जाने वाले लोग राजनीतिक सरोकार रखने वाले हैं ऐसे में सीबीआई जांच के अलावा और कोई विकल्प युवाओं को नहीं दिखता । मसलन सामने आ रहे कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि परीक्षा कराने के लिए एक राज्य में प्रतिबंधित संगठन को ही दूसरे राज्य में अनुमति दी गई हैं। ऐसे गैर जिम्मेदार व्यवहार के लिए कौन दोषी है ? क्या सरकारी तंत्र में यह देखने की भी फुर्सत नीति नियंताओं को नहीं है कि जिन एजेंसी का सहारा लिया जा रहा है उनका इतिहास क्या है ? और ऐसे में कोई भी समाज के प्रबुद्ध वर्ग का सदस्य इस प्रक्रियाओं पर सवाल उठाएगा ही इसमें कोई शक नहीं ।


जब देश में सीबीआई, ईडी की सक्रियताओं का प्रचलन बड़ा है तो क्यों न जिन जिन राज्यों में ऐसी नकल की घटनाएं हुई हैं वहां चयन बोर्ड के सभी सदस्यों की आय की जांच सीबीआई द्वारा की जाए ? राज्य एसटीएफ के स्थान पर क्यों नहीं इन विषयों की सीबीआई से जांच कराई जा रही है यह यक्ष प्रश्न आज युवाओं को परेशान किए हुए है ?


 भारत के युवाओं में आज निराशा अपना घर कर रही है । विश्विद्यालयों में स्थाई नियुक्तियां ठंडे बस्ते में पड़ी हैं । आयोजित हुई प्रतियोगी परीक्षाओं में गोलमाल की संभावनाओं का हिस्सा ज्यादा है । राज्य सरकारों द्वारा आयोजित परीक्षाओं के परिणाम आते नहीं कि न्यायालय में वाद दायर हो जाते हैं । अग्निवीर योजना की भर्ती में अभ्यर्थियों को दौड़ हेतु प्रस्तावित समय से कम समय दिया जा रहा है । 12 वीं के बाद आईआईटी, मेडिकल और विश्वविद्यालयों की राह देख रहे बच्चों की प्रवेश प्रक्रियाएं शुरू नहीं हुई हैं । ऐसे में लीक होते पर्चे और बिकती सरकारी नौकरियां अनिश्वितताओं का दौर अपने साथ लेके आ रही हैं ।

ऐसे दौर में सीबीआई जांच और समयबद्धता से प्रतियोगी परीक्षाओं की राह देखता युवा मन देश में ही विलग होते जा रहे हैं जिस ओर ध्यान दिया जाना वक्त की मांग है । 


जय प्रकाश पाण्डेय 

लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

हिंदूफोबिक फिल्में और नागरिक कर्तव्य

भारत की आजादी के 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं । आज जब देश स्वतंत्रता के विजय जश्न को महसूस कर रहा है ऐसे में आर्टिस्टिक फ्रीडम के आधार पर हिंदूफोबिक फिल्मों के बढ़ते प्रचलन पर भी चर्चा आवश्यक हो जाती है । ओटीटी प्लेटफार्म के आने के बाद तो इस विषय पर गहन चिंतन वक्त की मांग बन चुका है । अक्सर फिल्म निर्माताओं द्वारा जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कल्पना तत्व के समावेश की बात कही जाती है वह स्वतंत्रता प्रायः मात्र हिंदू देवी देवताओं के चित्रण और हिंदुओं के पवित्र ग्रंथों और उनके त्यौहारों के ही आसपास सीमित रहती है । ऐसे में अत्यंत आवश्यक है कि धार्मिक-ऐतिहासिक विषयों पर फिल्म निर्माण हेतु कठोर नियमों बनाएं जाएं ताकि सामाजिक सौहार्द की भावना स्थापित रहे । 


हालांकि हिंदूफोबिक शब्द की कोई सर्वमान्य परिभाषा अभी नहीं है लेकिन हिंदूफोबिक फिल्मों से तात्पर्य ऐसी फिल्मों से है जिसमें हिंदुओं की सनातनी सांस्कृतिक,सामाजिक धरोहरों के विरुद्ध दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है । जहां सनातनी मान्यताओं का परिहास किया जाता है, सनातनी व्रत -त्योहारों का उपहास होता है और ये इतने योजनाबद्ध और बौद्धिक तरीके से होता है कि फिल्म को 3-4 बार देखने के बाद भी सामान्यजन इस बात को समझ नहीं पाता । कुछ फिल्मों में यह फोबिया गलत तथ्यों को पेश कर या अपने हिसाब से तथ्यों को बदलकर स्थापित किया जाता है। जिस फिल्मी क्षेत्र में फिल्मों की रेटिंग और समीक्षा से लेकर कास्टिंग तक और शोध के नाम पर इस तरह के संवेदनशील विषयों को दरकिनार कर दिया जाता है वहां देश की आबादी के एक बड़े वर्ग के अंदर इस फोबिया के विरुद्ध विरोध चलता रहेगा इसमें कोई शक नहीं है । 


सनातन संस्कृतियां अपने मूल संस्कारों को त्यागे बिना पुराने जर्जर हो चुके ताने- बाने को छोड़कर प्रगतिशीलता के साथ आगे बढ़ी हैं । सनातन संस्कृति ने वक्त के साथ प्रगतिशीलता को चुना और यही कारण हैं कि सनातन धर्म इतने प्राचीन समय से आश्चर्य,जिज्ञासा और समर्पण का विषय सबके लिए रहा है । लेकिन इस सच को फिल्मों में देखने के अवसर कम ही प्राप्त हुए हैं । 

संभवतः इसलिए की आजादी के बाद एक समय तक भारतीय सिनेमा में एक धर्म विशेष के लोगों का पैसा, एक धर्म विशेष के लोगों का प्रभुत्व और एक धर्म विशेष के लोगों का ही सिनेमा बना हुआ था जिसकी सीमाओं को तकनीकी क्रांति ने वर्तमान समय में तोड़ा है । 


हिंदुओं और उनकी मान्यताओं पर सुनियोजित तरीके से पिछले 75वर्षो में फिल्म जगत के अधिकांश स्थापित चेहरों ने हमले किए हैं और ये ऐसे सुनियोजित हमले रहें जिन्होंने सेक्युलरवाद का झुनझुना आम हिन्दू को पकड़वा दिया और सांस्कृतिक सनातनी मान्यताओं को विस्मृत कराने की कोशिश की । 80 के दशक की एक फिल्म में एक हिंदू पुजारी को एक हत्यारे के रूप में और एक हिंदू मंदिर को अपराध के जनक क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया है जो हिंदुओं के बारे में नकारात्मक पूर्वाग्रह पैदा करता है। इस फिल्म में एक किरदार का नाम कृष्णा रखा गया था और उन्हें सड़कों पर महिलाओं के साथ बदसलूकी करने की भूमिका के साथ एक बांसुरी दी गई थी। इतने घटिया चरित्र वाली ऐसी फिल्म में भगवान कृष्ण का नाम इस्तेमाल किया गया। क्या ऐसी स्थितियों को महज संयोग कहना सही होगा या फिर ये किसी अन्य चीजों की तरफ ईशारा कर रही हैं जिसके लिए स्तरीय शोध की अत्यंत आवश्यकता है। 



हिंदूफोबिक फिल्मों का दूसरा स्तर वह है जहां ऐतिहासिक तथ्यों से तोड़- मरोड़ की जाती है और हिंदुओं के अतीत को पराजित, दीन हीन, मुस्लिम आक्रांताओं से हताश -निराश जाति के रूप में स्थापित करने की कोशिश की जाती है । पद्मावत से लेकर पृथ्वीराज तक की फिल्में इसी सीमा में आती हैं । ऐसी फिल्मों में कल्पना तत्व समावेशित करने का नुकसान यह है कि न ही ये इतिहास सम्मत रह पाती हैं और न ही लोक सम्मत । 


 ऐतिहासिक फिल्मों का एक खास सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव लोगों के साथ होता है ऐसे में ऐतिहासिक विषयों पर कितनी स्वतंत्रता एक फिल्म निर्माता ले सकता है यह विषय अब तय होना चाहिए । इतिहास से गैर सम्मत और कल्पना के साथ बनाएं गए नैरेटिव को तो दिखाना ही नहीं चाहिए क्योंकि इससे न सिर्फ भावनाएं आहत होती हैं बल्कि गलत इतिहास की नींव भी रखी जाती है । जिस जगह इतिहास मौन हो जाता है, वहां कल्पना का विस्तार होना चाहिए। लेकिन अब हालत यह हो गई है कि फिल्में, धारावाहिक बनाने के पहले ही साफ लिख दिया जाता है कि धारावाहिक की सभी घटनाएं और पात्र काल्पनिक हैं। इस तरह का काम तो इतिहास के साथ मजाक ही कहा जा सकता है। ऐसा होना इतिहास और उस स्थान दोनों के लिए विध्वंसकारी है।


भारतीय सेंसर बोर्ड अभी भी सीमित शक्तियों के साथ फिल्मों के नियमन और कैटेगरी वर्गीकरण का कार्य ज्यादा करता आया है । इधर सेंसर बोर्ड ऐसे सीन और शब्दों की संख्या बढ़ाता जा रहा है जिन पर डिसक्लेमर या बीप आती है। फिल्मों में ऐसे डिस्क्लेमर और बीप का प्रयोग बढ़ा ही है ।

इस विषय पर अब सेंसर बोर्ड की भूमिका से ज्यादा नागरिकों की भूमिका सामने आती है । फिल्म निर्माताओं को समाज का आईना बनने के लिए, समाज के बिखरे कई अनसुने,अनजान किस्सों को स्क्रीन उपलब्ध कराने की तरफ आगे बढ़ना चाहिए । फिल्म निर्माताओं को भविष्य के भारत के विकासपरक नजरिए से चिंतनशील सृजन की तरफ आगे बढ़ना चाहिए न कि अंतर्मन में सामाजिक वैमनस्य को फैलाते सृजन की तरफ ।

वर्तमान समय में जहां ओटीटी प्लेटफॉर्म भी एक नए मंच के रूप में सामने आ रहे हैं वहां इस देश के नागरिकों को चाहिए कि किसी भी धर्म विशेष, संस्कृति विशेष पर नकारात्मक रवैया रखने वाली फिल्मों,धारावाहिकों आदि का सामूहिक बहिष्कार करें । यही नागरिक कर्तव्य का बोध न केवल हिंदूफोबिक फिल्मों/ धारावाहिकों के विस्तार को रोकने में सहायता देगा बल्कि सामाजिक सौहार्द्रता का वातावरण भी स्थापित करेगा, इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है ।


लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।

  

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गुरुवार, 4 अगस्त 2022

लीक होते प्रश्नपत्र, निराश होता युवा ।

 


युवा किसी देश के मेरुदंड होते हैं । किसी देश की समृद्धि में युवाओं के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोलन से लेकर सम्पूर्ण क्रांति व अन्ना हजारे आंदोलन तक, वर्तमान भारत के विकास में एक उल्लेखनीय भूमिका निभाई है । कुछ समय पूर्व यही युवा वर्ग लखनऊ में उत्तर प्रदेश सब इंस्पेक्टर परीक्षा धांधली के विरोध में अपने अधिकारों के लिए मुखर हो रहा था। कुछ महीनों पूर्व यही युवा बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा के लीक प्रश्नपत्र के लिए मुखरित हुआ था । व्यापम घोटाले के सामने आने पर भी यही युवा मुखरित हुआ था और आज फिर से उत्तराखंड में भी यही हाल निर्मित हो रहे हैं । बस अंतर इतना है कि अन्य राज्यों ने जहां एसआईटी, एसटीएफ, सीबीआई के साथ साथ अपने निगरानी तंत्र को मजबूत करने की कोशिश की वहीं उत्तराखंड में ऐसे पेपर लीक न हों इसके लिए एसटीएफ, एसआईटी जांच के अलावा परीक्षा के प्रारूप को ही बदलने की चर्चाएं शुरू हो रही है, इससे युवाओं का वह वर्ग जो पिछले 5-7 सालों से तैयारी में लगा था उसके ऊपर प्रतिकूल फर्क पड़ेगा इसमें कोई दो राय नहीं । समूह ग स्तर पर आयोजित होने वाले परीक्षाओं में द्वितीय स्तर पर लिखित परीक्षा संबंधी चर्चाएं कोचिंग सेंटरों के हक में ज्यादा, और छात्रों के हकों में कम प्रतीत होता है । 


इन सब के बीच सबसे हैरानी का विषय यह रहा है कि अपने अधिकारों के लिए सबूतों की पोटली लिए घूमते और आंदोलन का मार्ग तय करते अधिकतर छात्रों को ऐसी किसी मांग के एवज में खुद पर एफआईआर झेलनी पड़ती हैं और ऐसी आवाजों का साथी कोई बन नहीं पाता । अब वह समय आ गया है जब इन विषयों पर खुलकर विमर्श हों । अब इस तरफ सोचना अपरिहार्य हो गया है कि इन परीक्षाओं से संबंधित आला अधिकारियों की आय की एसआईटी नहीं बल्कि सीबीआई जांच हो और प्रक्रियाएं पारदर्शी हों । सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को भी सम्मिलित करते हुए नीतियों का खाका खींचा जाए और प्रतियोगी परीक्षाओं के नीतिगत निर्णयों, प्रारूपों या अन्य निर्णयों में उम्र के आधार पर 21 से 35 के स्पष्ट परिभाषित युवाओं को सम्मिलित किया जाए न की राजनैतिक पार्टियों के युवा संगठनों में होने वाली उम्र की पात्रता के आधार पर । 



ऐसे युवाओं को मौजदूगी प्रशासनिक तंत्र और सिविल सोसाइटी के तंत्र में पर्याप्त है, जरूरी है तो अपने इगो, और वरिष्ठता के दंभ को किनारे रखकर जमीनी स्तर पर निर्णयों, योजनाओं के क्रियान्वयन की । आज वह समय आ गया है कि इस विषय पर जन पटल पर परिचर्चा हो कि परीक्षा केंद्रों को किन आधारों पर संबद्ध किया जाता है ? किन आधारों पर ऐसे केंद्रों को परीक्षा केंद्र बनाया जाता है जहां स्नातक डिग्री के आधार पर परीक्षा दे रहा छात्र कक्षा 5 में पढ़ने वाले बच्चे के टेबल- कुर्सी में बैठकर परीक्षा देता है ? 2 घंटे की परीक्षा में जहां दशमलव का भी महत्व होता है वहां इन भौतिक कमियों को आज के समय में तो हम दरकिनार कर ही नहीं सकते। किन आधारों पर ऐसे परीक्षा केंद्रों को संबद्ध किया जाता है जहां बाहर से परीक्षा देने आए छात्रों के बैग रखने और चिलचिलाती गर्मी में पंखे तक की व्यवस्था नहीं होती ? ऐसे परीक्षाकेंद्र कैसे संबद्ध हो जाते हैं जहां अलग कमरे में बैठा के पेपर लीक कराया जाता है। आज वह समय आ गया है जब इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के क्रम में उत्तरदाई आला अफसरों पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही हो । 




सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस तरह सभी परीक्षाओं के प्रारूप ऑनलाइन होते जा रहे हैं ऐसे में सूचना तंत्र और तकनीक के द्वारा व्यापक स्तर पर इन परीक्षाओं को प्रभावित किया जा सकता है इसमें कोई दो राय नहीं है । और ऐसे में अन्य राज्यों की साइबर सेल के भी समन्वित सहयोग के द्वारा ही इन चीजों को रोका जा सकता है । ऑनलाइन प्रारूप की परीक्षाओं ने भी भारत के उन गांवों, उन पहाड़ी क्षेत्रों में जहां फोन के कनेक्शन तक नहीं आते वहां के युवाओं को आईआईटी,मेडिकल आदि क्षेत्रों से प्रायः दूर रखने में महती भूमिका बनाई है ।


ऐसा नहीं है कि अतीत की प्रश्नपत्र लीक होने वाली घटनाओं के सीख नहीं ली गई है । पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा केंद्रों में प्रवेश के समय नकल रोकने के लिए कपड़ों की बाहें तक कटवाई गई हैं । केरल में छात्राओं को इनर वियर उतारने के लिए हाल ही में नीट की परीक्षा के दौरान निर्देशित किया गया । अन्य जगहों पर समय समय पर नाक -कानों की परंपरागत बालियां तक उतरवाई गई हैं । सांस्कृतिक और परंपरागत प्रतीकों जैसेेे रक्षा कवच को परीक्षा केंद्रों में कैंची से काट कर कूड़ेदान में फेंका गया है । ऐसे में इन सभी चीजों को सह रहा वास्तविक युवा यही चाहता है कि ढकोसले में न पड़कर वास्तविक रूप से प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और परीक्षा को परीक्षा जैसे बनाए रखने का काम हो । उपरोक्त बताए गई वास्तविक घटनाएं कितना नकल रोकने में सक्षम हैं यह सोचनीय विषय है । और यदि उपरोक्त के आधार पर नकल रोकने की हम उम्मीद कर रहे हैं तो हम डिजिटल होते भारत की समझ से काफी दूर हैं । 




एक मामले में अब स्पष्टता आवश्यक है युवा आखिर किसे माना जाए । भारत के लिए दिक्कत यह है कि सरकारी आंकड़ों में हम जिसे युवा मानते हैं, उसका प्रतिनिधित्व राजनीतिक पार्टीयों के पैंतालीस के आसपास के नेता करते हैं । नीतिगत फैसलों में भी वही अधिकारी प्रायः शामिल हैं जिनकी उम्र चालीस-पैंतालीस की दहलीज पार कर गई है । युवापन एक मानसिक मनोदशा है जिसका उम्र के साथ कोई संबंध नहीं है । मसलन एक 60 साल का व्यक्ति भी युवा हो सकता है । यह बात बिल्कुल सही है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उम्र और मानसिक शारीरिक स्थिति के आधार पर युवाओं का वर्गीकरण और नियमन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अत्यंत आवश्यक है , खासकर जब ये विषय देश की मानव पूंजी, कार्यशील जनसंख्या और राष्ट्र विकास से जुड़े हों ।आज यह आवश्यक है कि परीक्षा केंदों में नकल रोकने के नाम पर हमारी सांस्कृतिक पहचानों को कूड़े के डब्बों में न स्थान मिलें । आवश्यक है कि स्वतंत्र,पारदर्शी प्रणाली से नियमित प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित हों ताकि वास्तविक युवा भारत के विकास में सक्रिय सहयोग दे पाए । 






लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।


अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

  युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र   की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है   । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोल...