रविवार, 5 नवंबर 2023

सौर जियोइंजीनियरिंग पर वैश्विक नियमन की आवश्यकता

 

जय प्रकाश पांडेय

वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी

जलवायु परिवर्तन पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता ने वैज्ञानिकों को सौर जियोइंजीनियरिंग जैसे नवीन दृष्टिकोण तलाशने के लिए प्रेरित किया है। पेरिस जलवायु समझौते (वर्ष 2015) के अंतर्गत ग्रीन हाउस गैस को कम किए जाने के लिए निर्धारित किए गए उत्सर्जन संबधी लक्ष्यों को प्राप्त करने में वर्तमान वैश्विक जगत असफल सिद्ध हो रहा है । भूतापन से, अन्य जलवायुवीय दशाओं के अतिरिक्त बढ़ते मूसलाधार बारिश के पैटर्न, अधिक शक्तिशाली तूफानों की बारंबारता और समुद्र के स्तर में वृद्धि जैसी दशाओं को जोड़ा जा सकता है । पश्चिम के विद्वानों का एक बड़ा वर्ग इस संदर्भ में पहले ही इंगित कर चुका है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए 2030 के दशक तक वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने के लिए बड़े पैमाने पर परियोजनाओं की आवश्यकता होगी। कहना न होगा यह अप्रत्यक्ष रूप से सौर जियोइंजीनियरिंग और उससे संबंधित तकनीक की ही तरफ इशारा है ।

 सौर जियोइंजीनियरिंग में पृथ्वी की सतह तक पहुँचने वाले सौर विकिरण की मात्रा को कम करने के लिए वैज्ञानिक विषयों जैसे स्ट्रैटोस्फेरिक एरोसोल इंजेक्शन, अंतरिक्ष-आधारित रिफ्लेक्टर आदि का इस्तेमाल किया जाता है । दूसरे शब्दों में कहें तो

सौर जियोइंजीनियरिंग पृथ्वी पर आने वाली सूरज की रोशनी को कम करने, यानी “सूर्य को मंद” करने के लिए काल्पनिक प्रौद्योगिकियों के एक सेट का वर्णन करती है (राष्ट्रीय विज्ञान, इंजीनियरिंग और चिकित्सा अकादमी, 2021) हालाँकि जियोइंजीनियरिंग की ये प्रौद्योगिकियाँ जलवायु संशोधन के संदर्भ में संभावित लाभ प्रस्तुत कर सकती हैं, लेकिन वे अपने सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक प्रभावों के संबंध में चिंताएँ भी बढ़ाती हैं। मुख्य रूप से उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी यूरोप द्वारा किए जा रहे जियोइंजीनियरिंग संबंधी अनुसंधान, विशेष रूप से सौर जियोइंजीनियरिंग पर हावी है। वहीं चीन के प्रयोगों ने भी आशंका की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है । भारत की विषम भौगोलिक परिस्थितियां भी इस क्षेत्र में विस्तृत शोध की संभावनाओं के द्वार खोलती है जिसके लिए बजटीय माध्यमों के साथ साथ वैज्ञानिकों को नियत लक्ष्यों के साथ प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है ।

वर्ष 2019 में, सौर जियोइंजीनियरिंग सहित जियोइंजीनियरिंग विकल्पों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करने के लिए प्रस्तावित यूएनईपी प्रस्ताव को संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील और सऊदी अरब द्वारा अवरुद्ध कर दिया गया था। ऐसे में यह आशंका कि विनियमन और संयुक्त शोध के बिना, एक देश के प्रयास दूसरे देशों को प्रभावित कर सकते हैं, को गलत नहीं ठहराया जा सकता है। सौर जियोइंजीनियरिंग प्रौद्योगिकियों की तैनाती पर उचित, न्यायसंगत और प्रभावी बहुपक्षीय नियंत्रण की गारंटी दे सकने में सक्षम संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन में भी संस्थागत बल का अभाव वर्तमान में दिखता है ।

अनियंत्रित जियोइंजीनियरिंग पर नियमों की कमी के विनाशकारी प्रभाव भी हो सकते हैं, खासकर विकासशील देशों के लिए जिनके पास गहन अनुसंधान और विकास (आर एंड डी) करने, ऐसी योजनाओं को व्यापक रूप से लागू करने या उनके अनपेक्षित परिणामों को संभालने के लिए संसाधनों की कमी है।

उदाहरण के लिए, कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों ने सुझाव दिया है कि ऊपरी वायुमंडल में सूरज की रोशनी कम करने वाले रसायनों का छिड़काव करने से वैश्विक मौसम पैटर्न प्रभावित हो सकता है और पूरे एशिया और अफ्रीका में मानसून के पैटर्न में बदलाव हो सकता है । एक अन्य प्रसंग में वर्ष 2021 में बिल गेट्स ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में एक शोध का समर्थन किया, जिसमें उत्तरी स्कैंडिनेविया के वातावरण में कैल्शियम कार्बोनेट के छिड़काव की धारणा का परीक्षण किया गया था। हालाँकि, स्थानीय स्वदेशी समुदायों और पर्यावरणविदों के विरोध के कारण परियोजना को रोक दिया गया था।

जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे संवेदनशील देशों में से एक भारत की निर्भरता यहां की मानसूनी जलवायु में प्रमुखता से है । लू, सूखा और मानसूनी व्यवधान जैसे गंभीर प्रभावों का सामना करते भारत को सौर जियोइंजीनियरिंग के संभावित लाभों और जोखिमों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है । अमेरिका,चीन और यूरोप तथा विश्व के अन्य देशों द्वारा किए जा रहे सौर जियोइंजीनियरिंग संबधी नवोन्मेषों को समझना और उसमें बराबर भागीदारी करना भारत में नीति निर्माताओं और शोधकर्ताओं के लिए के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत अपनी अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि पर बहुत अधिक निर्भर है। जहां सौर जियोइंजीनियरिंग कृषि उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन के कुछ नकारात्मक प्रभावों को कम करने में मदद कर सकती है,जिससे संभावित रूप से किसानों और देश में खाद्य उत्पादन को लाभ होगा वहीं दूसरी तरफ आज भारत जलसंकट के मुद्दों का सामना कर रहा है, और सौर जियोइंजीनियरिंग का जल संसाधनों की उपलब्धता और वितरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। भविष्य की जल संसाधन प्रबंधन रणनीतियों के लिए सतही जल अपवाह, भूजल पुनर्भरण और मानसून पैटर्न पर संभावित प्रभाव को समझना महत्वपूर्ण है ।

वर्तमान में चीन द्वारा मेगा-बांध परियोजनाओं (जैसे थ्री गोरजेस) सहित अन्य बड़े इंजीनियरिंग परियोजनाओं के संभावित दुष्परिणामों से यह तो स्पष्ट है कि किसी प्रकार के वैश्विक मत के बिना भी चीन जियोइंजीनियरिंग परियोजनाओं पर कार्य जारी रख सकता है और इस कार्य का सम्पूर्ण एशिया विशेषकर भारत में प्रभाव पड़ेगा इसमें कोई दो राय नहीं है । चीन की बड़े पैमाने की मौसम संशोधन परियोजना, तियान्हे, या स्काई रिवर जोकि एक क्लाउड सीडिंग जियोइंजीनियरिंग परियोजना है इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है जिसमें भारत और अन्य दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों सहित पड़ोसी देशों के लिए संभावित सुरक्षा निहितार्थ भी व्याप्त हैं। तियान्हे के जलवायु जियोइंजीनियरिंग उद्यम का लक्ष्य चीन के उत्तरी हिस्सों में जहां कम वर्षा होती है और इसकी नदियों में जलस्तर में गिरावट देखी जा रही है वहां सूखे जैसी स्थितियों का प्रबंधन करना है। वायुमंडल में सिल्वर आयोडाइड कणों को लॉन्च करके ईंधन कक्षों की सहायता से यांग्त्ज़ी नदी बेसिन के अतिरिक्त जल को येलो नदी तक हस्तांतरण की योजना के जलवायुवीय पहलुओं पर भी गौर करना भारत के लिए अत्यंत आवश्यक है।

आज बड़े बड़े उद्योगपतियों और संस्थानों आदि द्वारा भी जहां सुपरकंप्यूटर क्षमताओं का इस्तेमाल कर वातावरण में भारी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) को इंजेक्ट करने की योजना बन रही है वही सौर जियोइंजीनियरिंग के संभावित प्रभावों का अध्ययन करने के लिए माली, ब्राजील, थाईलैंड और अन्य देशों के वैज्ञानिकों के लिए भी वित्तीय मदद भी दी जा रही है। अमेरिका के नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंजीनियरिंग और मेडिसिन में तो , जिन्होंने , पांच वर्षों में $ 100 मिलियन से $ 200 मिलियन के शुरुआती निवेश के साथ एक अमेरिकी सौर जियोइंजीनियरिंग अनुसंधान कार्यक्रम स्थापित करने की सिफारिश भी की गई हैं ।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दीर्घकालिक टिकाऊ समाधानों में एक व्यापक दृष्टिकोण शामिल होना चाहिए जो भारत और वैश्विक समुदाय के लिए अधिक लचीला और पर्यावरणीय रूप से सतत समावेशी भविष्य बनाने के लिए शमन, अनुकूलन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर जोर देता है। वस्तुत: सौर जियोइंजीनियरिंग को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के विकल्प के रूप में नहीं बल्कि एक पूरक उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत को इस संबंध में सबसे कमजोर देशों की जरूरतों और प्राथमिकताओं को भी संबोधित करते हुए उनकी न्यायसंगत भागीदारी सुनिश्चित करते हुए , जलवायु न्याय के सिद्धांतों पर विचार करना चाहिए और वैश्विक समुदाय को संगठित करने के उद्यम करने चाहिए।


रविवार, 30 अप्रैल 2023

मजदूर दिवस और भारत के श्रम कानून

 

राष्ट्र के विकास में सत्यमेव जयते और श्रमेव जयते दोनों का होना आवश्यक है। दिवस विशेष आधारित चिंतन पद्धतियों की परंपरा भारत की संस्कृति का हिस्सा नहीं है । यही कारण है कि वर्तमान संदर्भों के अनेक आंदोलनों जैसे नारीवादी आंदोलनों,श्रमिक आंदोलनों,आदि के जनक के रूप में सर्वमान्य पश्चिमी देशों से ज्यादा व्यापक , प्रभावी कदम भारतीयता का हिस्सा रहे हैं । यह अलग बात है कि इस तरफ सार्थक और तथ्यात्मक संवाद कम हुए हैं ।

 भारत में “कर्मिका दिनचारणे”, कर्मिका दिनोत्सवम, “उझाईपलार दिनम” और “थोझीलाली दिनम” के रूप में जाने जाने वाले “अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस”,की जड़ें वर्ष 1886 में शिकागो के "हे-मार्केट "दंगों से जुड़ी हैं। कार्य के घंटे पुनर्निर्धारण करने की मांग से शुरू यह संघर्ष पुलिस और श्रमिक प्रदर्शनकारियों के बीच हुए एक हिंसक टकराव में बदल गया जिसमें अनेक प्राण अपने हकों के लिए लड़ते हुए पुलिस की बेरहमी का शिकार हुए। इस घटना ने पूरे विश्व को, श्रमिकों के अधिकारों पर चिंतन के लिए बाध्य किया और विश्व के प्रत्येक देश ने खासकर औपनिवेशिक सत्ताओं से शासित राष्ट्रों ने तो और भी मुखरता से श्रमिकों के विषयों को उठाना शुरू किया । इस आंदोलन के तीन साल बाद 1889 में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन की बैठक हुई। जिसमें तय हुआ कि हर मजदूर से केवल दिन के 8 घंटे ही काम लिया जाएगा। इस सम्मेलन में ही 1 मई को मजदूर दिवस मनाने का प्रस्ताव भी रखा गया।

भारत के संदर्भ में देखे तो इस घटना से पूर्व ही श्रमिकों के हितार्थ कदम उठने शुरू हो चुके थे । समाज-सुधारक, शशिपद बनर्जी ने कलकत्ता में वर्ष 1870 में एक मजदूर क्लब स्थापित किया , और मजदूरों को शिक्षित करने के लिए वर्ष 1874 में ‘भारत श्रमजीवी’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया । मजदूर संघर्ष के इतिहास में वर्ष 1877 में नागपुर के एंप्रेस मिल्स में हुई हड़ताल का जिक्र प्रासंगिक है । यह भी एक सर्वविदित तथ्य है कि वर्ष 1882 और 1890 के बीच बंबई और मद्रास में लगभग 20 से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हड़तालें दर्ज की गई थीं।

वर्ष 1878 में सोराबजी शपूर्जी बंगाली ने मजदूरों को कार्य की बेहतर दशाएँ उपलब्ध कराने के लिए बंबई की विधान परिषद् में एक विधेयक रखने का प्रयास भी किया। यह ध्यातव्य है कि तब तक शिकागो की घटना नहीं हुई थी । वर्ष 1880 के दशक में द्वारकानाथ गांगुली ने चाय बागानों के दास-श्रमिकों जैसी दशाओं के विरुद्ध आंदोलन चलाया। बंबई में इसी नारायण मेघाजी लोखंडे, ने ‘दीनबंधु’ नामक एक अंग्रेजी-मराठी साप्ताहिक पत्रिका द्वारा वर्ष 1884 में श्रम के घंटों में कमी की माँग के लिए मजदूरों की सभाओं का आयोजन किया । भारत में यह सब उसी स्वाभाविक चिंतन प्रक्रिया का हिस्सा था जिसका अंतिम लक्ष्य अंत्योदय है ।

 आजादी के आंदोलन में श्रमिक वर्गों का योगदान और श्रमिक संघों (ट्रेड यूनियन) की भूमिका जगजाहिर है। औपनिवेशिक शासन और विदेशी एवं भारतीय पूँजीपतियों के शोषण का सामना करते मजदूर वर्ग को आरंभ में नरमपंथी आंदोलनकारियों से भी सक्रिय सहयोग नहीं मिला। "देश के सारे प्रांतों में मजदूरों के सारे संगठनों के कार्यों को समन्वित करने और आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मसलों पर भारतीय मजदूर के हितों को प्रश्रय देने के लिए" वर्ष 1920 में बंबई में एन.एम. जोशी, लाला लाजपतराय, जोसेफ बप्तिस्ता और दीवान चमनलाल के प्रयास से ‘आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ (ए.आई.टी.यू.सी) की स्थापना भारतीय मजदूर संघ के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना थी । वस्तूतः इसके बाद ही विभिन्न श्रमिक संघों (ट्रेड यूनियनों) विभिन्न विचारधाराओं की पोषक बनकर सामने आई । स्वतंत्रता के बाद तो देश में श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले श्रमिक संघों में कई गुना वृद्धि हुई । मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले देश में इन संघों की बहुलता ने मज़दूर वर्ग को खंडित करने का ही ज्यादा कार्य किया । निजी स्वार्थों की बलिवेदी पर मज़दूर वर्ग के मुद्दे भेंट चढ़ गए।

आजाद भारत में आज भी लगभग 90 फीसदी मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं जिनको अभी भी सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं । इन्हीं को लक्षित करते हुए संगठित व असंगठित क्षेत्र में लगभग 50 करोड़ से ज्यादा श्रमिकों को प्रभावित करने वाले विभिन्न श्रम कानूनों को अब सिर्फ चार संहिताओं में समाहित कर सरल करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया गया है । इससे श्रमिकों को सम्मान, सुरक्षा और अच्छी सेहत प्राप्त होगी। वेतन संहिता, 2019, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता, 2020 के निर्माण के पीछे वर्ष 2002 में द्वितीय राष्ट्रीय श्रम आयोग रिपोर्ट की अनुशंसाएं भी है जिसमें विभिन्न कानूनों को 4 या 5 संहिताओं में बदलने की अनुशंसा की गई। उपरोक्त श्रम संहिताओं में वैधानिक न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिकों की स्वास्थ्य देखभाल के संदर्भ में प्रयास किए गए हैं । इन संहिताओं के सकारात्मक बिंदुओं की प्राप्ति आपको हर जगह हो सकती है लेकिन इनकी कुछ कमियों की तरफ इंगित करते हुए अनेक सामाजिक संगठनों,ट्रेड यूनियनों, और बुद्धिजीवी वर्ग के असंतोष वाले कुछ प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान देना अपरिहार्य है।

सबसे बड़ा असंतोष श्रमिक संघों (ट्रेड यूनियंस)द्वारा अपने बातों को प्रभावी ढंग से रखने और दबाव बनाने के लिए

प्रयुक्त हड़ताल की पद्धति से संबंधित है । नई संहिता में यह प्रावधान है कि ट्रेड यूनियन और दबाव समूहों को वैध हड़ताल के लिए न्यूनतम 60 दिनों की पूर्वसूचना देनी होगी जो इससे पहले 14 दिन निर्धारित थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह श्रमिक संघों की प्रचलित प्रभावी पद्धतियों पर प्रहार ही है। बदले नियमों के अनुसार श्रम कानूनों का अनुपालन करने के लिए ऐसे नियोक्ता, बाध्य होंगे जिनके यहां 300 या 300 से अधिक लोग कार्यरत है । पहले यह सीमा 100 थी । ऐसे में ऐसे संस्थान जहां कार्यरत लोगों की संख्या 100 से कम है वहां श्रम कानूनों का क्या होगा यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने है। नौकरी से अवसान के संदर्भ में भी अपीलीय ट्रिब्यूनल प्राधिकरण के अंतिम फैसले को नई नियमों के तहत केंद्र सरकार बदल सकती है । यह बदलाव एक तरह से शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत के विपक्ष में दिखता है ।

सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020, में सामाजिक सुरक्षा कोष का दायरा बढ़ाया गया है। सामाजिक सुरक्षा पात्रता के लिए ,सरकार, नियमों को व्यक्ति की आय और कार्यरत उद्योग के आकार के आधार पर निर्धारण करेगी, ऐसे में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है । संशोधित नियम, इस दृष्टि से सार्वजनिक सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम के विपक्ष में ही दिखता है । खानपान की व्यवस्था से लेकर सॉफ्टवेयर विकास तक, हर चीज में प्रति घंटा या अंशकालिक नौकरियों में लगे गिग श्रमिकों और व्यक्तियों या संगठनों को सीधे ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करके विशिष्ट सेवाएँ प्रदान करने वाले प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स जैसे उबेर ड्राइवर, ज़ोमैटो डिलीवरी एजेंट आदि को भी सामाजिक सुरक्षा कोष में शामिल तो किया गया है लेकिन किसको असंगठित क्षेत्र का, गिग या प्लेटफार्म क्षेत्र का माना जायेगा इन परिभाषाओ में अभी भी स्पष्टता की मांग है।

व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति सहिंता विधेयक, 2020 यह नियमन करता है कि सुरक्षा के प्रावधान वहां लागू होंगे जहां न्यूनतम 20 लोग (विद्युत उपभोग) और 40 लोग ( गैर विद्युत उपभोग) कार्यरत हों । सुरक्षा एक ऐसा विषय है जिसका प्रभाव व्यापक और दूरगामी होता है । ऐसे में सुरक्षा स्वास्थ्य और कार्यरत दशाओं के भी प्रावधानो के क्रियान्वयन के लिए न्यूनतम अपेक्षित संख्या का दायरा होना भविष्य में चुनौती पेश कर सकता है ।

 भारतीय संविधान के तहत श्रम विषय को समवर्ती सूची में रखा गया है और इसलिये केंद्र और राज्य दोनों सरकारें (केंद्र के लिये आरक्षित कुछ मामलों को छोड़कर) इस विषय पर विधि बना सकती हैं।एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड, आयुष्मान भारत, श्रमिक पोर्टल , आदि विभिन्न पहलें आज सक्रियता से कार्य कर रही हैं। अतः ऐसे में संहिताओं के ऐसे प्रसंग जिनपर विरोध है सार्थक संवादों का सृजन कर और राज्य सरकारों को प्रोत्साहित कर श्रम कानूनों के ध्येय को पाया जा सकता है।


गुरुवार, 23 मार्च 2023

प्रतिबद्धता और योजनाओं के क्रियान्वयन से हारेगा टीबी

 


दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक, बैसीलस माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक (बैक्टीरिया )से होने वाली संक्रामक बीमारी टीबी, आज वैश्विक चिंता का कारण बनते जा रही है । यह माना जाता है कि विश्व की एक चौथाई आबादी आज टीबी से संक्रमित है जिसमें पुरुषों में संक्रमण महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा है।आमतौर पर फेफड़ों (फुफ्फुसीय टीबी) को प्रभावित करने वाली यह संक्रामक व्याधि अन्य अंगों (अतिरिक्त-फुफ्फुसीय टीबी) को भी प्रभावित कर सकती है। टीबी के प्रसार के आरंभिक चरण फेफड़ों से यह प्रसार पेट और जननांगों तक भी पहुंच सकता है जिससे अन्य समस्याओं के अतिरिक्त गर्भधारण में समस्याओं से स्त्री शक्ति को जूझना पड़ सकता है । सामान्यतः लगातार 5-6 महीने की दवा के साथ टीबी का नियंत्रण हो जाता है लेकिन जब टीबी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं को नियमित नही लिया जाता तो कभी-कभी दवा प्रतिरोधी टीबी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। टीबी की यह स्थिति सबसे खराब स्थिति है ।

टीबी हवा के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलती है। जब फेफड़ों या गले के टीबी रोग से ग्रसित व्यक्ति खांसता, छींकता, बोलता या गाता है तो टीबी के जीवाणु हवा में फैल जाते हैं। आस-पास के लोग इन जीवाणुओं में सांस ले सकते हैं और संक्रमित हो सकते हैं।

अनेक वैश्विक,राष्ट्रीय,और स्थानीय प्रयासों के बाद भी टीबी के सर्वाधिक मामले विकासशील देशों से आ रहे हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन, द्वारा जारी वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2022, के अनुसार वैश्विक स्तर पर तपेदिक (टीबी) और दवा प्रतिरोधी तपेदिक (टीबी) (एमडीआर, एक्सडीआर और टीडीआर टीबी ) से संक्रमित व्यक्तियों की संख्या में वर्ष 2020 के मुकाबले वर्ष 2021 में लगभग 4.5 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है । दवा प्रतिरोधी तपेदिक( टीबी) के भी मामलों में वर्ष 2020 व वर्ष 2021 के बीच 3 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है । इस रिपोर्ट के अनुसार इलाज तक पहुंच न होने के कारण ही टीबी से होने वाली वैश्विक मौतों की संख्या में वृद्धि हुई है । आज भारत विश्व के उन प्रमुख 10 देशों में शामिल हैं जहां विश्व के लगभग 65 प्रतिशत तपेदिक के मरीज पाए जाते हैं। भारत में टीबी के मरीजों की यह संख्या चीन, इंडोनेशिया,पाकिस्तान,बांग्लादेश और कोंगो से भी उच्च है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2022 में यह भी बताया गया है कि भारत में वर्ष 2020 के मुकाबले वर्ष 2021 में लगभग 18 प्रतिशत ज्यादा टीबी के मामले सामने आए हैं । वर्ष 2020 में आई गिरावटों के पीछे दरअसल कोविड काल में टीबी के रोगियों की रिपोर्टिंग में आई कमी थी ।भारत में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की भारत क्षय रोग रिपोर्ट 2022 (इंडिया टीबी रिपोर्ट 2022) में भारत में टीबी के मामलों में वर्ष 2020 के मुकाबले वर्ष 2021 में 19 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है । टीबी के किसी भी प्रकार से होने वाली मृत्युओं के मामले में भी लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है ।

भारत द्वारा वर्ष 1997 से ही किए जा रहे वैश्विक और देशज प्रयासों के बाद भी दवा प्रतिरोधी ड्रग रेसिस्टेंट तपेदिक(एमडीआर टीबी) मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। भारत द्वारा क्षयरोग (टी.बी.) को नियंत्रित करने के लिए किए जा रहे प्रयास गौरतलब हैं । टीबी की लड़ाई में पहला सशक्त चरण, कुपोषण से मरीज को सुरक्षित करना है । इस तथ्य को समझते हुए वर्ष 2018 से निक्षय पोषण योजना के तहत मरीजों को पोषण युक्त आहार हेतु वित्तीय सहायता दी जाती है ताकि कुपोषण जैसे रोग से पहले से ही पीड़ित व्यक्ति को और दिक्कतों का सामना न करना पड़ जाए। वर्ष 2020 और वर्ष 2021 के दौरान, भारत ने प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण कार्यक्रम के माध्यम से टीबी रोगियों को 89 मिलियन डॉलर (670 करोड़ रुपये) का नकद हस्तांतरण भी किया है । पूरे देश में वर्ष 2021 में लगभग 22 करोड़ से अधिक लोगों की टीबी की जांच की गई। प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत, 40,000 से अधिक निक्षय मित्र पूरे देश में 10.45 लाख से अधिक टीबी रोगियों की आज लगातार मदद कर रहे हैं। अभी हाल ही में उत्तराखंड के एम्स ऋषिकेश द्वारा सुदूरवर्ती टिहरी गढ़वाल में ड्रोन के माध्यम से टीबी की दवाइयां संफलतापूर्वक भेजी गई हैं ।निजी क्षेत्रों के भी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के सहयोग से काफी हद तक स्थितियां सुधरने का क्रम आज बना हुआ है लेकिन अभी भी चुनौतियां विकराल हैं। सामाजिक जागरूकता के अभाव से अभी भी टीबी और विशेषकर एमडीआर टीबी के मामले कम दर्ज कराए जाते हैं।

टीबी उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय नीति को वर्ष 2017 में इस संकल्प के साथ लाया गया कि वर्ष 2025 तक हमने इसे पूरी तरह से भारत से खत्म करना है । एमडीआर टीबी को भी नियंत्रित करने, गुणवत्तापूर्ण चिकित्सकीय परीक्षण एवं इलाज को प्रभावी ढंग से फैलाने और स्वास्थ्य क्षेत्रों में संक्रमण के प्रसार को नियंत्रित करने की दिशा में ,संकल्पित होने की दिशा में ये हमारे प्रभावी कदम हैं । पोषणीय समर्थन, यात्रा व्यय समर्थन और सामाजिक एवम मानसिक समर्थन आज टीबी से ग्रस्त नागरिकों को सशक्त कर रहा है । भारत टीबी और एमडीआर टीबी के प्रभावी अंत के लिए अपने अनुसंधान कार्यक्रमों में भी विशेष प्रयास कर रहा है । टीबी के मरीजों की आर्थिक सहायता के लिए राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के तहत अप्रैल-2018 से निक्षय पोषण योजना भी देश में संचालित है । इसके तहत टीबी मरीज को पौष्टिक आहार के लिए 6 महीने तक 500 रुपए प्रतिमाह सहायता दी जाती है।निक्षय इकोसिस्टम, टीबी हारेगा देश जीतेगा सरीखे कैंपेन प्रभावी नीतियों के निर्माण एवं क्रियान्वयन में आज मील का पत्थर साबित हो रही हैं। वर्ष 2016 में भारत एमडीआर-टीबी के उपचार के लिए बेडाक्यूलिन और वर्ष 2019 से डिलामेनिड ड्रग्स को भी अपने तपेदिक नियंत्रित कार्यक्रम में शामिल करने वाला पहला देश बन गया है ।

उच्च गुणवत्ता वाली दवाइयों की समुचित उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वर्ष 2001 वह आधारभूमि हैं जहां वैश्विक ड्रग सुविधा (ग्लोबल ड्रग फैसिलिटी) का गठन किया गया । एमडीआर-टीबी वाले रोगियों के लिए दूसरी-पंक्ति की टीबी दवाओं तक पहुंच की सुविधा सुनिश्चित करने ,दवाओं की खरीद के लिए देशों के मध्य सहमति स्थापित करने और देशों को उनके एमडीआर-टीबी प्रबंधन कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन में सहयोग देने के उद्देश्य से वर्ष 2010 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ग्रीनलाइट समिति की स्थापना की गई । इसके अतिरिक्त टीबी के वैश्विक भार को वर्ष 2035 तक 90 प्रतिशत तक कम करने तथा टीबी से होने वाली मृत्युओं की संख्या को वर्ष 2035 तक 95 प्रतिशत तक कम करने के संकल्प के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष 2015 से ही टीबी की समाप्ति हेतु कार्यक्रम चलाया जा रहा है।

टीबी के बढ़ते मामलों के देखते हुए आज जिला स्तर से एक कदम और आगे बढ़कर ग्राम पंचायतों के माध्यम से गांवों के क्लस्टर बनाकर वहां अधिकाधिक परीक्षण प्रयोगशालाओं को स्थापित करने की आवश्यकता है । सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम महज दिवस विशेष तक सीमित न होकर व्यापक आधार पाएं इस लिए भी योजनाओं के क्रियान्वयन में उर्ध्वगामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

टीबी को हराने के लिए सामाजिक जागरूकता और प्रतिबद्धता ही प्रभावी माध्यम है, अतः योजनाओं के प्रचार,प्रसार और प्रस्तावित अभियानों में पंचायती राज संस्थाओं की महत्ती भूमिका स्थापित कर टीबी मुक्त भारत की तरफ हम कदम बढ़ाने में सफल होंगे।


रविवार, 5 मार्च 2023

समुद्रीय जलस्तर वृद्धि के विकराल चित्र

 

महाकवि जयशंकर प्रसाद जी ने महाप्रलय के बाद का दृश्य कामायनी में प्रकट करते हुए लिखा था –

“हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर,

बैठ शिला की शीतल छाँह

एक पुरुष, भीगे नयनों से

देख रहा था प्रलय प्रवाह ।

नीचे जल था ऊपर हिम था,

एक तरल था एक सघन,

एक तत्व की ही प्रधानता

कहो उसे जड़ या चेतन “

 केन्या के बैरिंगो झील से कुछ समय पूर्व आ रही तस्वीरें जयशंकर प्रसाद जी की कविता के साक्षात चित्र सामने रख देती है। आज बैरिंगों झील का जलस्तर बढ़ता जा रहा है । मलेरिया,टाइफाइड, आदि संक्रामक रोगों से जन,जंगल,जमीन और जानवरों का संघर्ष लगातार जारी है । कमोबेश यही स्थिति ऑस्ट्रेलिया और हवाई द्वीप के बीच स्थित तुवालु समूहों भी देखने को मिल रही है जो लंबे समय से जलवायु परिवर्तन और बढ़ते समुद्र के स्तर के जोखिमों का सामना कर रहे हैं। उच्च ज्वार की स्थिति में तुवाल समूहों के 40% क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं और यह संभावना है कि सदी के अंत तक पूरे देश के पानी के नीचे होने का अनुमान है। तुवालुवासी तटीय क्षेत्रों में रहते हैं, इसलिए पहले से ही कमजोर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाला जा रहा है। इसी प्रकार की स्थिति दक्षिण प्रशांत में लगभग 1,000 द्वीपों और एटोल के एक समूह सोलोमन द्वीप की है जो धीरे-धीरे समुद्र के जलस्तर से काबिज होता जा रहा है।

समुद्रीय जलस्तर में वृद्धि सम्पूर्ण विश्व को अपनी विभीषिका में समेट लेने वाले घटना है । तेजी।से होते जलवायु परिवर्तन से समुद्रीय जलस्तर वृद्धि की घटनाओं में वृद्धि हुई है । समुद्रीय जल स्तर में वृद्धि के स्वरूप तटीय पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण, तूफान की तीव्रता और बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि होती है। इससे भूजल के संदूषण का भी खतरा बना रहता है और खाद्य सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। समुद्रीय जलस्तर में वृद्धि से भारत जैसे लंबी तटरेखा वाले देशों में विपरीत परिस्थितियां जन्म लेंगी इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती । इस संदर्भ में कुछ प्रमुख आंकड़ों पर गौर करना आवश्यक हो जाता है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार वर्ष 2000 से वर्ष 2019 की समयावधि में प्राकृतिक त्रासदियों की संख्या लगभग 3500 रही हैं । पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच दशकों में भारतीय तट के आसपास समुद्र का स्तर औसतन 1.7 मिमी प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बंगाल की खाड़ी में समुद्र के स्तर में वृद्धि अरब सागर से अधिक है। समुद्र के स्तर में यह वृद्धि जहां तटीय कटाव और विशाल परिस्थितिकी परिवर्तन को जन्म दे सकती है वहीं संसाधनों में विकृति भी उत्पन्न कर सकती है । बाढ़ और खारे पानी के आक्रमण से मनुष्य के साथ साथ समुद्री जीवन में भी उत्पन्न अस्थिरता , कई जीवों के अस्तित्व पर भी संकट डाल सकती है। संवेदनशील हिंदुकश पर्वत श्रृंखलाओ में वर्ष 1950 से वर्ष 2014 तक 1.3 डिग्री तापमान वृद्धि देखी गई है ।

 विश्व मौसम संगठन की हालिया प्रकाशित रिपोर्ट में यह बताया गया है कि वर्ष 2013 से वर्ष 2022 के मध्य समुद्री जल स्तर का विस्तार 4.5 मिलीमीटर तक हुआ है जो कि वर्ष 1900 से वर्ष 1970 के बीच हुए विस्तार से लगभग तीन गुना है । समुद्र के स्तर में वृद्धि की औसत दर वर्ष 1901 और वर्ष 1971 के बीच प्रति वर्ष 1.3 मिमी से बढ़कर वर्ष 1971 और वर्ष 2006 के बीच 1.9 मिमी प्रति वर्ष हो गई। विश्व मौसम संगठन के अनुसार, वर्ष 2013 और वर्ष 2022 के बीच समुद्र के स्तर में प्रति वर्ष 4.5 मिमी की वृद्धि हुई है।

इस रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित न रखा गया तो अगले 2000 वर्षों में वैश्विक औसत समुद्र-स्तर 2 से 3 मीटर तक बढ़ जाएगा । यहां यह तथ्य ध्यातव्य है कि वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्यों के साथ चलने पर सुमद्रजल स्तर में 2 से 6 मीटर की वृद्धि की संभावना है जोकि विलोपन का प्रमुख खतरा है । अतः ऐसे में हमारा ध्यान वैश्विक भू ताप को 1.5 डिग्री तक सीमित करना चाहिए । वैश्विक समुद्रीय जल स्तर वृद्धि और परिणाम रिपोर्ट के अनुसार लंबी तटीय संरचना एवं तटीय जनसंख्या वाले देश भारत, नीदरलैंड, बांग्लादेश, चीन आदि के साथ साथ निचले स्तर के छोटे छोटे द्वीपों पर समुद्री जलस्तर बढ़ने का सर्वाधिक खतरा रहेगा । यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब पेरिस जलवायु समझौते के अंतर्गत

पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से कम करने और अधिमानतः इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लक्ष्य के साथ विश्व के अलग अलग देश साथ चल रहे हैं। जिसे वर्ष 2030 तक प्राप्त किया जाना हैं

आईपीसीसी की जलवायु परिवर्तन 2021 की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि हिंद महासागर के दक्षिण पश्चिमी हिस्से में वैश्विक अनुपात से भी ज्यादा जलस्तर वृद्धि की घटनाएं सामने आ रही हैं ।

बढ़ते समुद्र का स्तर तटीय पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण का कारण बनता है, तूफान की तीव्रता और बाढ़ की तीव्रता बिगड़ती है। वे मिट्टी और भूजल के संदूषण का कारण भी बन सकते हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा पर और नकरात्मक प्रभाव पड़ सकता है । जलस्तर वृद्धि से उत्पन्न लवणता मत्स्य उत्पादन को भी प्रभावित कर सकती है ।

भारत सरकार ने समुद्र के स्तर में वृद्धि के मुद्दे से निपटने के लिए कई पहल की हैं, जिसमें जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना का विकास, तटीय क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम का निर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना शामिल है। हालाँकि, भारत में समुद्र के स्तर में वृद्धि के प्रभावों को कम करने के लिए और अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

भारत ने जलवायु परिवर्तन पर एक व्यापक राष्ट्रीय कार्य योजना विकसित की है, जिसमें आठ राष्ट्रीय मिशन शामिल हैं, जिनमें से एक टिकाऊ आवास और तटीय प्रबंधन पर केंद्रित है।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2019 में तटीय क्षेत्रों के सतत विकास और प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए तटीय क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम का उद्देश्य तटीय समुदायों के लचीलेपन में सुधार करना, आजीविका के अवसरों में वृद्धि करना और तटीय पर्यावरण की रक्षा करना है। भारत सरकार ने 2030 तक 450 गीगावाट अक्षय ऊर्जा पैदा करने का लक्ष्य भी इसी संदर्भ में रखा है। अक्षय ऊर्जा की ओर यह बदलाव जीवाश्म ईंधन पर भारत की निर्भरता को कम करेगा और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी कम करेगा।

 भारत सरकार ने समुद्र तट को कटाव से बचाने और बड़ते जलस्तर से मीठे पानी के स्रोतों में खारे पानी की मिलावट को रोकने के लिए मैंग्रोव संरक्षण परियोजनाएं भी शुरू की हैं। सरकार ने कमजोर तटीय क्षेत्रों को कटाव और बाढ़ से बचाने के लिए समुद्र की दीवारों, घाटियों और ब्रेकवाटर के निर्माण सहित कई तटीय संरक्षण और बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाओ की भी तरफ कदम बढ़ाने शुरू किए हैं।

 वस्तुतः इतने संवेदनशील वैश्विक विषय पर सभी देशों को अपने यहां किए जा रहे अनुसंधानों,प्रयोगों को दूसरे देशों के साथ भी साझा करने की आवश्यकता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जर्नल नेचर में हाल ही में ज्कोशवन ( ग्रीनलैंड) में 100 मी. लंबे बांध निर्माण संबंधी प्रस्ताव भी सामने रखे हैं । आर्कटिक के गलते हिमनदों के जल से बनी कृत्रिम झीलों की योजना पर यूके, जर्मनी आदि राष्ट्र कार्य कर रहे हैं । वैश्विक भू तापन को रोकने के लिए कृत्रिम स्नो कवर, एरोसोल छिड़काव,और जियोइंजीनियरिंग के नवोन्मेषी प्रयोगों के लिए एक मंच पर आने की आज आवश्यकता है ।


मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

विलुप्त होती मातृभाषाएं और भारत


जय प्रकाश पाण्डेय

वरि. राजभाषा अधिकारी

 

सांस्कृतिक और  भौगोलिक विविधताओं से समृद्ध  भारतवर्ष   ने साहित्य, विज्ञान, दर्शन और कला के क्षेत्रों में समस्त विश्व को महत्वपूर्ण योगदान दिया है । भारतेंदु हरिश्चंद्र,  अन्नमय्या,  रामदासु, कं दुकुरी, और तिरुवल्लुवर, कंबन जैसे भाषाप्रेमियों की धरती भारत द्वारा संस्कृत,हिंदी,तमिल,तेलगु,बांग्ला,उड़िया, मलयालम आदि विभिन्न भारतीय भाषाओं में दिए गए वैश्विक अवदान, आज किसी परिचय के आकांक्षी नहीं हैं । इन भाषाओं के अलावा लोक में  बोलियों के रूप से स्थापित भाषाओं,  ने भी भारत के सामाजिक,राजनैतिक और सांस्कृतिक पक्षों को सामने रखा है |  भारतीय संविधान की अष्टम सूची में 22 भाषाओं   शामिल हैं । इनके अलावा भी देश भर में कई अन्य भाषाएँ और बोलियां भी बोली जाती हैं, जिनमें से कई को संबंधित राज्य सरकारों द्वारा मान्यता भी प्राप्त है। नवीनतम एथ्नोलॉग रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 19,500 से अधिक विभिन्न मातृभाषाएँ  हैं जिसमें से हिंदी विश्व में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है । ऐसे में मातृभाषा दिवस अपनी विस्मृत होती जा रही बोलियों और भाषाओं के संरक्षण,संवर्धनका एक अवसर है । वेंटीलेटर पर सांसें ले रही बोलियों और भाषाओं के संरक्षण की दिशा में  कार्य करने की प्रेरणा देने वाला  यह अवसर है |  भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के लिए प्रतिवर्ष 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस आयोजित किया जाता है। इस दिन की स्थापना संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा वर्ष 1999 में दुनिया भर के लोगों द्वारा उपयोग की जाने वाली सभी भाषाओं के संरक्षण और संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।

 

 

दरअसल इतिहास के पृष्ठ को देखें तो भारत विभाजन से जन्में पाकिस्तान में उर्दू भाषा को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की भी आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित करने की उद्घोषणा हुई । 21 फरवरी 1952 की तारीख को बांग्लादेश में मातृभाषा बंगाली के समर्थन में आंदोलनों का दौर शुरू हुआ । आंदोलन ने अंततः बंगाली को पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी और बाद में बांग्लादेश की स्वतंत्रता का मार्ग भी प्रशस्त हुआ। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मातृभाषा के संवर्धन के इस आदर्श दृष्टांत के आधार पर 21 फरवरी का दिन मातृभाषा दिवस के रूप में बनाने की घोषणा की । यह दुनिया भर में बोली जाने वाली कई अलग-अलग भाषाओं और लुप्तप्राय भाषाओं को संरक्षित करने,उन्हें पुनर्जीवित करने और उनके महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के अवसर प्रदान करता है । यूनेस्को द्वारा वर्ष 2022 से 2032 तक के दशक को मातृभाषा के लिए अंतर्राष्ट्रीय दशक घोषित किया गया है । 

 

 

 

मातृभाषा अस्मिता की बोधक और संस्कृति की संवाहक भी होती है । महात्मा गांधी जी ने इसी मातृभाषा के महत्व को समझते हुए कहा था कि “ मनुष्य के मानसिक विकास के लिए उसके ऊपर मातृभाषा के अतिरिक्त दूसरी भाषा लादना  मातृभूमि के विरूद्ध पाप है ” |

अफसोस की बात यह है कि राष्ट्रपिता के ये कथन आजादी के बाद ही  मानस पुत्रों द्वारा  विस्मृत कर दिये गए | आजाद भारत की शिक्षा नीतियों ने लॉर्ड मैकाले को सही साबित करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा,भाषा, साहित्य  और संस्कारों को हासिए में  धकेलते हुए अंग्रेजी भाषा का वह दिवास्वप्न दिखाया जिसकी साध में   हमने अपनी जड़ें खो दी और राजनीति लाभों के चलते हिन्दी बनाम अन्य  भारतीय भाषाओं के मुद्दे संसद में लंबे समय तक गूँजने लगे | सांस्कृतिक रूप से इतने समृद्ध भारतीय जनमानस की सांस्कृतिक एकता को भी नीतियों ने नुकसान पहुंचाया और इस प्रकार आजादी के बाद एक बहुत बढ़ा वर्ग अपने क्षेत्र से बाहर की अन्य भाषाओं का अध्ययन तक नहीं कर पाया |  

 

 भाषाओं के सवाल पर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर या एक भाषा के पक्षधर बनकर मूल्यांकन की परंपरा भारत में भी घर करने लगी है। स्वतंत्रता के बाद इतने विशद भाषाई समृद्धता से आने वाली पीढ़ी को भाषाई राजनीति के चलते दूर होना पड़ा है । हिंदी और अंग्रेजी , और राष्ट्रभाषा की लड़ाइयों के बीच हमारी अपनी अनेक मातृभाषाऐं हासिए में चली गई हैं । अहोम, रंगकास ,सैंगमई, तोलचा आदि इस कड़ी में प्रमुख नाम हैं । अकेले उत्तराखंड में ही आज गढ़वाली,कुमाऊंनी और रौंगपो सहित दस बोलियां खतरे में हैं । सीमांत क्षेत्र पिथौरागढ़ की दो बोलियां तोलचा और रंगकस तो विलुप्त भी हो चुकी है । मातृभाषा को कम आंकने, अंग्रेजीयत की झूठी ब्रांडिंग, और मातृभाषा में सीमित अवसरों के साथ, कृषि के बदलते पैटर्न, शहरी कहलाने की जिद  और  कुछ कानूनों के कारण आबादी का एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी मातृभाषा से दूर होता जा रहा है । नई शिक्षा नीति के तहत अनिवार्यतः मातृभाषा  में आरंभिक  शिक्षा विषयक प्रावधान जरूर इस दिशा में सकारात्मक परिणाम देंगें | बीते वर्ष पूर्व राज्यसभा अध्यक्ष श्री वैंकैया नायडू ने अपने उद्बोधन में बताया था कि भारत में लगभग उन्नीस हजार पांच सौ (19500) मातृभाषायें एवं बोलियां हैं ,जिनमें से लगभग 200 भाषाएं विलुप्त होने की कगार पर हैं । दरसअल यह विलोपन भाषा का ही नहीं बल्कि उस भाषा से जुड़ी एक समृद्ध ज्ञान परंपरा, विशुद्ध स्मृतियों और उस स्थान विशेष की संस्कृति का भी होता है ।

 

संकटापन्न भाषाओं के लिए यूनेस्को द्वारा बनाए गए एटलस ऑफ द वर्ल्डस लैंग्वेज इन डेंजर के वर्ष 2019 के आंकड़ों के अनुसार भारत में 453 भाषाएं लुप्तप्राय की श्रेणी में आ गई हैं । भारत में 197 भाषाओं को असुरक्षित और 65 भाषाओं को गंभीर रूप से संकटग्रस्त समझा गया । अंडमानीज, बिरहोर, दमपाल, ग्रेट अंडमानीज, जेरु, सुंडा, मांडा, ओंगि, सेंगमाई,ताई नोरा आदि ऐसी ही संकटग्रस्त भाषाएं हैं ।इन लुप्तप्राय भाषाओं में से अधिकांश सीमांत और वंचित समुदायों द्वारा बोली जाती हैं। 

 

भारत में हमारी भाषाओं और बोलियों के हासिये में पहुचाने वाले कारकों में प्रमुख भाषाओं जैसे हिंदी या अंग्रेजी की तरफ प्रवासन, अल्पसंख्यक भाषाओं के लिए संस्थागत समर्थन की कमी, और आर्थिक और सामाजिक दबाव भी शामिल हैं। बाजार, शिक्षा और रोजगार के चलते जंजातीय बोलियों में भी स्थानिक शब्द प्रचलन से आज बाहर हो रहे हैं | ऐसे में प्रमाणिक सर्वेक्षणों के अभाव, नीतिगत निर्णयों की शिथिलता और मातृभाषाओ के ऐतिहासिक सांस्कृतिक पक्ष में कम दिलचस्पी लेते आम भारतीय जनमानस के बीच से अंडमानीज, बिरहोर, दमपाल आदि भाषाओं का विलोपन की कगार पर खड़ा होना शर्मनाक स्थिति है ।

 

 

विगत वर्षों में डिजिटल अभिलेखागार, शैक्षिक कार्यक्रमों और सामुदायिक पहलों के निर्माण सहित भारत में लुप्तप्राय भाषाओं के दस्तावेजों को सुरक्षित और संरक्षित करने के लिए प्रयास प्रशंसनीय हैं हालांकि इन प्रयासों की गतिशीलता और भी बढ़ाने की आवश्यकता है । भारत सरकार ने लुप्तप्राय भाषाओं के दस्तावेजो को संरक्षित करने के लिए पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया नामक एक पहल भी शुरू की है।

 

भारतीय मातृभाषाओं और बोलियों  की भी लिपि विकसित करने की कोशिश भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन में सहायक सिद्ध होगी  गढ़वाली, कुमाऊनी, बोडो, शेरपा मुंडारी,संथाली,खड़िया आदि अन्य भाषाओं के भी प्रतीक चिह्नों को ध्यान में रखते हुए लिपियों का विकास कर ,इन भाषाओं को भी लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।  सरकारी आँकड़ों के निर्धारित मापदंडों में  भाषा कहलवाने के लिए भाषा को बोलने वालों की न्यूनतम  अपेक्षित संख्या 10 हजार है। भाषा सम्बन्धी नीतिगत निर्णयों में जनसंख्या के इस  आग्रह के स्थान पर भाषा के  महत्व और भूमिकाओं पर आधारित आँकड़ों का संग्रहण इस दिशा में सशक्त कदम होगा |  पूरे देश में प्रमाणिक आंकड़ों के संग्रहण के बिना इस लड़ाई को जीतने में लंबा वक्त लग सकता है । आज हमारी जनजातियों की भाषाएं विलुप्ति की कगार में हैं । हमें भीली ,पटेलिया, कोरकू आदि आदिवासी बोलियों पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। घुमंतू,पहाड़ी,तटीय इलाकों के भाषा बोलने वाले समुदायों को बचाने हेतु उनके अनुसार योजनाओं के गठन एवं क्रियान्वयन किए जाने की आवश्यकता है । 

 

 

नीतिगत निर्णयों में संवेदना : सशक्त होंगे दिव्यांगजन


 

दिव्यांगता के विषयों की समझ को बढ़ावा देने और दिव्यांगो के अधिकारों पर परिचर्चाओं के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा प्रतिवर्ष  दिनांक 3 दिसम्बर को  पूरे  विश्व में दिव्यांगता दिवस के आयोजन की उद्घोषणा की गई   | भारत  में  वर्ष 1995 का समय  दिव्यांगो के अधिकारों के लिए एक आधार वर्ष है जहां से आगे चलकर  दिव्यांगो के सामाजिक , राजनैतिक  और आर्थिक रूप से सशक्तिकरण की बातें नीतिगत फैसलों में हमें दिखाई देती है | दिव्यांगता दिवस की भी आधारशिला 1992 में हम देखते हैं।  स्वतन्त्रता के बाद हालांकि  संवैधानिक प्रावधानों में समानता, स्वतन्त्रता और बंधुत्व   के  मूलभूत सिद्धांतों को अंगीकार करने के बाद  भी दिव्यांगो को समाज की मुख्यधारा से अलग ही रखा जाता था |  प्रारब्ध और   पूर्व -जन्म विषयक संकल्पनाओं से भरे भारतीय समाज में  दिव्यांगो के हकों के लिए आवाजें मुखरित होने में  आजादी के बाद लगभग 25-30 साल लग गए |

 

 वर्ष 1980 के पूर्वार्ध में दिव्यांगो के बीच कार्य कर रहे स्वयं सेवी संगठनों और उनकी सामाजिक सक्रियता  से विश्व के अन्य  देशों के समान भारत में भी  दिव्यांगो के अधिकारों की बातें उठने लगी | संयुक्त राष्ट्र के वर्ष 1982-1993 के दशक को दिव्यांगो का दशक घोषित करते ही दिव्यांगो के अधिकारों और उनको मुख्यधारा में लाने के प्रयासों पर काम शुरू हुए | वर्ष 1986 में दिव्यांगो के लिए भारत द्वारा स्थापित पुनर्वास आयोग इन्हीं प्रयासों की अभिव्यक्ति था |

 

 भारत में दिव्यांगो के हितार्थ किए गए प्रयासों को  वैश्विक मंचों में  हस्ताक्षरित प्रोटोकोलों और बाध्यकारी संधियों से संबल मिला  इसमें कोई दो राय नहीं |  एशियाई और प्रशांत क्षेत्र में विकलांग लोगों की पूर्ण भागीदारी और समानता की संयुक्त राष्ट्र  उद्घोषणा को  दिसम्बर 1992 में बीजिंग में स्वीकृत किया गया और इसकी ही भारतीय अनुगूँज   पीडब्ल्यूडी अधिनियम, 1995 के रूप में सामने आती है |  विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD)  प्रोटोकॉल  को  13 दिसंबर, 2006 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनाया गया | भारत ने भी विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD) पर हस्ताक्षर किये और इसकी पुष्टि की।

 

क्रियान्वयन में आ रही चुनौतियों के ही कारण लगभग दो दशकों के बाद  पीडब्ल्यूडी अधिनियम, 1995 में सुधार कर दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 (आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम 2016)  लाया गया |      आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम 2016 में पीडब्ल्यूडी अधिनियम, 1995 के अंतर्गत निर्दिष्ट 7 अक्षमताओं में  14 और समावेशित की गयी है और इस प्रकार कुल 21 अक्षमताओं को इस अधिनियम के अंतर्गत रखा गया | मेडिकल मॉडल के स्थान पर एक विकसित और गतिशील  सामाजिक  मॉडल के आधार पर दिव्यांगता को पुनः इस अधिनियम में परिभाषित  किया गया |

 

इस अधिनियम के तहत उच्च शैक्षणिक संस्थानों और  सरकारी नौकरियों में भी पूर्ववर्ती 3 प्रतिशत से कोटे को बढ़ाकर क्रमशः 5 व 4  प्रतिशत किया गया | वर्ष 2010 में गठित सुधा कौल समिति की  अनुशंसा आधारित यह अधिनियम दिव्यांगों को सभी सार्वजनिक भवनों, अस्पतालों, पोलिंग स्टेशन और यातायात के साधनों में सुगमता पूर्वक पहुंच बढ़ाने के भी प्रावधान करता है | मानसिक बीमारियों के संबंध में स्पष्टता  के साथ ही अधिनियम के प्रावधान पूर्ववर्ती  अधिनियम की तुलना में ज्यादा स्पष्ट  और समावेशी हैं |

वर्ष 2011 में  संपन्न भारत की  जनगणना और हाल ही में किए गए एनएसएस के 76 वें सर्वे के अनुसार दिव्यांगो का भारत की आबादी में लगभग 2.21 प्रतिशत हिस्सा है जिसमें लगभग 56 प्रतिशत पुरुष और 44 प्रतिशत महिलाएं हैं । कुल दिव्यांगों में से लगभग 69 प्रतिशत आबादी ग्रामीण भारत में और 31 प्रतिशत आबादी शहरी भारत में निवास करती है |मानसिक भिन्नता वाले लगभग 50 प्रतिशत बच्चों ने कभी किसी शैक्षिक संस्थान में प्रवेश लिया ही नहीं है । 5 से 19 वर्ष के आयु वर्ग में मात्र 61 प्रतिशत बच्चे ही शैक्षिक संस्थानों में अध्ययन कर रहे हैं। दिव्यांगजनों में से अभी भी लगभग 38 प्रतिशत आबादी को अपना ध्यान रखने के लिए कोई केयर टेकर जैसी  सुविधा उपलब्ध नहीं है । दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की विविध योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु इस वर्ष बजट में 150 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं जोकि पिछले वर्ष से 90 करोड़ कम है।

 

भारत में की गई  सकारात्मक कोशिशो पर भी गौर करें तो भारत में दिव्यांगजनों के लिए सहायता उपकरणों की खरीद/फिटिंग के लिए दिव्याङ्ग व्यक्तियों की सहायता योजना, जिसे एडिप योजना ( एडीआईपी ) के नाम से जाना जाता है भारत में 80 के दशक से चल रही है | इस योजना के अंतर्गत सुधारात्मक सर्जरी करने हेतु भी सहायता मिलती है | दिव्यांगजनों  के लिए वर्तमान सरकार द्वारा दीनदयाल दिव्यांग पुनर्वास योजना चलायी जा रही है जिसका उद्देश्य दिव्यांगों के लिए समर्पित  स्वैच्छिक संगठनों को वित्तीय सहायता के माध्यम से सशक्त करना  है |

 

दिव्यांगजन  स्वालंबन  योजना केंद्र सरकार की एक ऋण योजना है | दिव्यांगों को आय सृजन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान देने वाली कोई भी गतिविधि शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता इसके अंतर्गत दी जाती है |  वर्तमान समय में भारत सरकार द्वारा सुगम्य भारत अभियान भी चलाया जा रहा है | सरकार द्वारा वर्ष 2016 में एक ऑनलाइन सुगम्य पुस्तकालय की भी अवधारणा सामने लायी गयी है जहां दिव्यांगजन  इंटरनेट के माध्यम से पुस्तकों तक सुगमता से पहुंच सकते हैं | विशिष्ट दिव्यांगता पहचान (यूडीआईडी) की भी शुरुवात वर्तमान सरकार द्वारा की गयी है जिसके अंतर्गत दिव्यांगजनों को विशिष्ट पहचान संख्या प्रदान की जा रही है | 

 

समाज में प्रत्येक दिव्यांग की गरिमा को बनाए  रखने और समाज की मुख्यधारा में दिव्यांगों  की पूर्ण भागीदारी के लिए और उनके  चिन्हीकरण में पंचायतों, नगरपालिकाओं और एनजीओ की भूमिका को बढ़ाए जाने की आज  आवश्यकता है   | वर्तमान में  शारीरिक,मानसिक और मनौवैज्ञानिक पुनर्वास को बढ़ावा देने की कोशिश करते अनेक संगठनों और व्यक्तित्वों  को और भी प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है  | आज पैरा ओलंपिक और स्पेशल ओलंपिकों में हमारे दिव्यांगों ने देश को गौरव प्रदान किया है | प्रशासन,कला,संगीत, लेखन और खेल में भारत को आईएएस  इरा सिंघला, लेखक ललित कुमार ,डॉक्टर सुरेश आडवाणी , पद्मश्री टैनिस खिलाड़ी एच.बोनीफ़ेस प्रभु , अभिनेत्री सुधा चंद्रन, पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा, संगीतज्ञ रवीद्र जैन  और अभिषेक गोगोई , मनोज शेलके आदि अनेक व्यक्तित्वों ने  गौरव की प्रतीति कराई है |  दिव्यांग जनों का विकास तभी संभव है जब संवेदना के  धरातल पर नीतिगत फैसलों का निर्माण हों और इन नीतिगत फैसलों मे निस्वार्थ भाव से कार्यरत स्वयंसेवी लोगों का भी समावेशन हो ।

 

सभी दिव्यांग व्यक्तियों को समान आर्थिक पृष्ठभूमि  वाले किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में जीवनयापन की उच्च वहनीय लागत का वहन करना पड़ता है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती । भारत में गरीबी रेखा की अनिवार्य पात्रता के आग्रह के साथ आती सरकारी योजनाओं का लाभ इस कारण भी नहीं मिल पाता है ।  ऐसे में राज्य सरकारों की भी भूमिका बढ़ जाती है और केंद्र की ही जिम्मेदारी के स्थान पर राज्य सरकारों आधारित प्रयास किए जाने आवश्यक हैं। उत्तर-प्रदेश सरकार द्वारा इस संदर्भ में किए गए प्रयास प्रशंसनीय है।

 

महंगाई के आधार पर योजनाओं की राशि में  वृद्धि,  दिव्यांगों को निशुल्क दिए जाने वाले  उपकरण/ कृत्रिम अंगों लोगों की खास जरूरतों के अनुसार प्रदान किए जाने और  इन उपकरणों/ कृत्रिम अंगों के स्थान पर इनकी लागत के सीधे  बैंक अंतरण की प्रणाली भी वर्तमान नीतियों का हिस्सा बन सकती है ।  दिव्यांगता सहायक उपकरणों जैसे व्हीलचेयर, वॉकिंग फ्रेम, ट्राइसाइकिल, ब्रेल पेपर, ब्रेल टाइपराइटर और ब्रेल घड़ियों और  अन्य  कृत्रिम अंगों और श्रवण यंत्र सहित आर्थोपेडिक उपकरणों आदि पर  लगाए जाने वाले गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) की आवश्यकताओं और करों के निर्धारण में भी लोकहितवादी दृष्टिकोण दिव्यांगों के सशक्तिकरण का   एक प्रभावी माध्यम बन सकता है। 

‘क्या आप एक दिव्यांग व्यक्ति हैं?’ या ‘क्या आपके परिवार में कोई विकलांग व्यक्ति है?’ जैसे प्रश्नों को आंकड़े लेते वक्त बदलने की आवश्यक है  क्योंकि अभी भी भारत में दिव्यांगताओं को नकारात्मक रवैये से जूझना पड़ता है । इससे वास्तविक दिव्यांग आबादी का पता लगाना असंभव हो जाता है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) को सर्वेक्षण के लिए प्रयुक्त प्रश्नावली में भी संभव परिवर्तनों पर गौर करना चाहिए ।  राष्ट्रीय दिव्यांगजन पेंशन की भी राशि आज के समय के हिसाब से बढ़ाने की आवश्यकता है |आज जनसांख्यकीय परिवर्तन के फलस्वरूप रोजगार और उच्च शिक्षण संस्थानों में दिव्यांगो के  प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की जानी चाहिए |

दिव्यांगो के लिए  एक वैधानिक सिविल कोर्ट की शक्ति से युक्त राष्ट्रीय आयोग बनाने की आज आवश्यकता है  |  अधिक से अधिक स्पेशल विद्यालयों को खोले जाने की आज  आवश्यकता है | निजी प्रयासों से संचालित ऐसे विद्यालयों को   सरकारी मदद से न सिर्फ विद्यालयी शिक्षा बल्कि नवाचार और भविष्य के लिए कौशल विकास जैसे कार्यक्रमों से भी जोड़ने की कोशिशें दिव्यांगों के सशक्तिकरण की दिशा महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होंगी।

बुधवार, 25 जनवरी 2023

गणतंत्र के संकल्प

 


सर्दियों में हर वर्ष हमारा ठिठुरता गणतंत्र अपने मूल कलेवर में नए अनुभवों को जोड़ते हुए एक नई विकास यात्रा का क्रम विकसित करता है । यह विकास का क्रम ही हमारी कूप मंडूक दृष्टि को वैश्विक दृष्टि प्रदान करता है और इस बात को मस्तिष्क में घर करवाता है कि-

 

यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहां से।

अब तक मगर है बाक़ी नामों-निशां हमारा।।

कुछ बात है कि हस्‍ती मिटती नहीं हमारी।

 सदियों रहा है दुश्‍मन दौरे-ज़मां हमारा।।

 

 हर वर्ष  यह उत्सव तब तक भारतीय श्रेष्ठता और वैश्विक मंच में हमारी जगद्गुरु की भूमिका के प्रति भाव को मजबूती प्रदान करता है जब तक कि  भारत से  बाहर जाकर, भारत के नागरिक, होने के महत्व को वीज़ा की प्रतीक्षा में एयरपोर्ट लाइन में वह स्वयं लगकर महसूस न कर लें ।

वस्तुतः  गणतंत्र दिवस के  उत्साह का यह ज्वार भी गणतंत्र दिवस के दो तीन दिन बाद प्रत्येक अखबार में देखी जाने वाली मृत्यु,बलात्कार,प्राकृतिक आपदाओं, घोटालों, और सड़कों पर उठती आवाजों के बीच धीमा पड़ जाता है । दरअसल वर्तमान भारत भूलने की बुरी लत से जूझ रहा है । हमको प्रभावित करने वाली  सबसे ज्वलंत खबरों तक को हम लोग वर्ष के अंत तक पहुंचते पहुंचते भूल जाते हैं ।

 

राष्ट्रीय महत्व के दिनों में हमारे अंदर का देशभक्त, अपनी  प्रोफाइल पिक्चर में तिरंगा लगाने से लेकर,गाल में तिरंगे वाले टैटू के लिए जग जाता है । देशभक्ति गीतों की आवाज से हौले से उठने वाले रौंगटे को महसूस करने के अभ्यस्त हम लोग उन खबरों,उन विषयों पर बात तक करना मुनासिब नहीं सोचते जो हमारे भविष्य के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष  आधार है ।

 

दिवस विशेष,आधारित चिंतन  परंपरा ,भारत में भी अब प्रायः देखने को मिल रही है । कुछ दिनों पहले एक कवि ने कहा था –

 

धूल साफ कर जो तस्वीरें शान से आज सजाई हैं,इससे पहले इनकी याद किसे, कहां और कब आई है ?

 

 आज दिन विशेष को महत्व देने वाली पीढ़ी, फादर्स डे, मदर्स डे, फ्रेंड्स डे,अर्थ डे आदि के बौद्धिक मकड़जाल में फंसकर शाश्वत रूप से इन विषयों में सोचना धीरे धीरे कम कर रही है ।

 

विविधता वाले तथाकथित सपेरों के देश में दैवीय नियतिवाद  का स्थान कर्मवाद ने जरूर लिया है तभी विश्व की सबसे विकसित ताकतों में आज हम शामिल हैं लेकिन अभी भी गांधी जी के तीनों मूल मंत्रों बुरा मत देखो,बुरा मत कहो और बुरा मत सुनो को हम लोग अपने स्वार्थपरक नजरिए से तोड़ते मरोड़ते रहते हैं।

 

भारत की सामासिक संस्कृति में चिंतन प्रक्रिया को सतत मानते हुए ही समाज सुधारकों, देशभक्तों ने स्वर्णिम अतीत से प्रेरणा ग्रहण की थी। चिंतन के आधार पर विमर्शों से प्राप्त बिंदुओं को, ध्यान में रखते हुए  कर्तव्य निर्धारण करने वाले मतवालों,का दौर अब चला गया है । आज चिंतन महज खानापूर्ति का जरिया बन चुका है । हाल ये है कि यदि 15 अगस्त और 26 जनवरी को सरकार द्वारा अवकाश घोषित कर दिया जाए, तो व्यक्ति  उस स्थिति में  गणतांत्रिक भारत का स्वतंत्र नागरिक होने कर अधिक गर्व महसूस कर पाएगा । एक दिन की छुट्टी की उम्मीद, हमेशा राष्ट्रीय चिंतन से ऊपर ही तो रहती है आजकल ।

 

सरकारी दफ्तरों में हमारे राष्ट्रीय पर्व देशभक्ति से मीलों दूर औपचारिकताओं और प्रोटोकॉल से बंधकर रह जाते हैं । अखबारों में, संवादों में, न्यूज में , जनमंचों में,देश के राष्ट्रीय पर्वों पर बातें तो होती हैं लेकिन इस राष्ट्रीय पर्व के निहितार्थ, उसकी दिशा क्या सही दिशा है? इस पर बोलना लिखना और सवालात करना आपको पाकिस्तानी से लेकर देशद्रोही तक बना सकता है । फालतू समय वाला व्यक्तित्व भी आपको घोषित किया जा सकता है ।

 

गणतंत्र दिवस का दिन हमारी आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का दिन है।  यह दिन यह विचारने का है कि 150 वर्षों की औपनिवेशिक सत्ता के वो क्या बीज तत्व आज भी मौजूद हैं जो भारत के लोगों की प्रगति में बाधक हैं।  यह दिन यह विचारने का है कि संविधान के किन किन विषयों को वक्त की जरूरत के हिसाब से बदला जा सकता है । यह दिन यह विचारने का है कि राष्ट्रविकास की प्रक्रिया में संविधान में और क्या बेहतर परिवर्तन किए जा सकते हैं जिससे अंतिम पंक्ति में बैठा व्यक्ति भी राष्ट्र विकास में सहायक हो सके । यह दिन उन विमर्शों  को केंद्र बिंदु में लाने का दिन है जिन विमर्शों को हमारी  संविधान सभा में किया गया था   हालांकि जो बाद में संविधान का भाग भी न बन पाए थे ।

 

यह दिन ऐसे विषयों पर  सार्थक जन संवाद का दिन है जिन विषयों  पर हमारे संविधानवेताओं के अलग अलग मत रहे और इस कारण तत्कालीन परिस्थितियों में उनको संविधान में महत्व न देना ही वांछित समझा गया  आज फिर 21 सदी के भारत के सामने वो विषय प्रमुखता से सामने आ रहे हैं। यह दिन  इस चिंतन का भी मौका देता है कि राष्ट्र निर्माण में हमारे किन मूल भारतीय तत्वों का लोप हो गया और कौन से तत्वों का लबादा हमें भूमंडलीकरण और छवि निर्माण के चलते छोड़ना पड़ा ।

 

 

लेकिन अपनी अपनी गुहा में रहने के अभ्यस्त हम लोग भूलने की बीमारी से ऐसे ग्रसित हो चुके हैं कि सरकारों द्वारा, हमारे लिए किए गए कार्यों के विषय में  विज्ञापनों में  करोड़ों- करोड़ों खर्च करके  उनको बताना पड़ता है । विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में खुद को देखते हम लोगों की लगभग 35 प्रतिशत आबादी तो वोट ही करना भूल जाती है । जनता का, जनता द्वारा ,और जनता के लिए शासन हो ऐसी आदर्श लोकतंत्र की परिभाषाएं भी

जनमानस के स्मृति पटल से निकल जाती है । और इस प्रकार लोकतंत्र में मसलन चुनावों से चंद दिनों पूर्व रातों में  सबकुछ भूलजाने की प्रवृति वाली जनता को ऐतिहासिक  सामाजिक, धार्मिक ,राजनैतिक और लैंगिक विषयों को समझाने का दौर चलता है ।

  गणतंत्र दिवस की पूर्वपीठिका में ,भगवत कृपा को प्राप्त राष्ट्र में ,संविधान में वर्णित हमारी विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका को संविधान प्रदत्त शक्तियों के दायरे में रहने और एक दूसरे के कार्यों में दखल न देने की प्रेरणा मिले, हमारी राज्य सरकारें अपनी अपनी डफली अपना अपना राग छोड़कर केंद्र की योजनाओं में सक्रियता से कार्य कर सहकारी संघवाद को बढ़ावा दें और देश का आम नागरिक अपने नागरिक कर्तव्यों को समझकर तदनुसार कार्य करे, इस गणतंत्र दिवस  कम से कम यह उम्मीद तो कर ही सकते हैं ।

 

हिंदी साहित्य में आधुनिक युग के प्रमुख हस्ताक्षर मैथिलीशरण गुप्त जी की बातें इस गणतंत्र दिवस का ध्येय बने तो संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा  निभाने में हम सक्षम होंगे ,इसमें दो मत नहीं ।

 

हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी,

आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी।

मंगलवार, 17 जनवरी 2023

असंतुलित विकास और उदासीनता से जूझता पहाड़

 

कितना आसान है ,हम सब के लिए जोशीमठ के विषय में सर्दी की सुबह चाय की चुस्कियों के संग चर्चाएं करना । कितना आसान है, संभावित आपदा प्रभावितों को उनके जन,जंगल,जमीन छोड़ घर खाली करने के लिए दिए गए सरकारी फरमान पर अनुवर्ती कार्यवाही करना । कितना आसान है, त्रासदी के सामने खड़े होने की स्थिति में जांच समितियों के गठन और रिपोर्ट की प्रतीक्षा करना,लेकिन बहुत मुश्किल है प्राकृतिक आपदाओं के खतरों के निशान पूर्व में ही भांपकर त्वरित नीतिगत निर्णय लेना । बहुत मुश्किल है लोगों के विगत 1 वर्ष से निकल रहे मशाल जुलूसों , मांग जुलूसों पर ध्यान रहना । और बहुत मुश्किल है पहाड़ को पहाड़ बने रहने और धार्मिक यात्राओं को पर्यटन यात्राएं न बना देने की पहलों को समर्थन देना ।

 पूरा हिमालय आज संभावित खतरों से जूझ रहा है । राष्ट्रीय राजमार्ग-6 जोकि मणिपुर,मिजोरम,त्रिपुरा,और दक्षिणी असम को जोड़ता है काफी दिनों तक पिछले वर्ष मुख्यधारा से कटा रहा । रोंटी ग्लेशियर से अलग हुए बर्फ खंड से उत्पन्न बाढ़ की स्थिति ने 70 से ज्यादा लोगों की जिंदगी उत्तराखंड में ली । किन्नौर जिले में भूस्खलन से हुई जनहानि भी इसी कड़ी में एक और उदाहरण है । लोकसभा में एक प्रश्न के प्रतिउत्तर के आधार पर देखें तो इस वर्ष 2021-2022 जुलाई माह तक प्राकृतिक आपदाओं से 1098 जिंदगियों को हमने खोया है । यह स्थिति हिमालयी राज्यों तक ही सीमित न रहकर उत्तरप्रदेश,कर्नाटक,राजस्थान आदि राज्यों तक है ,सभी इससे प्रभावित रहे हैं । अभी हमारे दिमाग से चक्रवात गुलाब, चक्रवात शाहीन और चक्रवात यास आदि से हुए मिलियनों के नुकसान की स्मृति मिटी नहीं हैं कि फिर से हम प्राकृतिक आपदाओं से जूझने लगे हैं। कर्नाटक,महाराष्ट्र और तमिलनाडु में उत्पन्न परिस्थितियों ने हमें हमारे बाढ़ प्रबंधन और प्राकृतिक आपदा के प्रबंधन संबंधी मॉडलों पर विचार करने को बाध्य किया है।

उत्तराखंड की बात करें तो जमीनी धरातल पर, सामरिक महत्व के लिए आवश्यक चार धाम सड़क परियोजनाओं, रोपवे सेवाओं, धार्मिक पर्यटन और ऊर्जा राज्य के लिए जलविद्युत परियोजनाओं जैसी अवधारणाओं ने पहले से ही सेस्मिक जोन पांच में अवस्थित उत्तराखंड की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाया है। बेतरतीब अनियोजित बहु मंजिला होटलों के नियामकों , रेत खनन, हेलंग बाईपास निर्माण कार्य, एनटीपीसी तपोवन विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना,जोशीमठ-औली रोपवे आदि विषयों पर पुनर्चर्चा का अब समय आ गया है । निकासी तंत्र की शिथिल स्थिति और अलकनंदा और धौलीगंगा दोनों ही नदियों द्वारा जोशीमठ शहर के नीचे की मिट्टी का कटान किया जाना भूस्खलन की संभावनाओं को और बढ़ा देता है । उत्तराखंड में यह स्थिति प्रायः अधिकतर पर्वतीय क्षेत्रों की है, ऐसे में अत्यंत आवश्यक है उत्तराखंड के सभी पर्वतीय क्षेत्रों का वैज्ञानिक और शोधपरक अनुसंधान किया जाए।

जोशीमठ की घटना के बाद से पहाड़ों के अलग क्षेत्रों से अनियोजित शहरीकरण, बांधों से उत्पन्न संकट , और बड़ती होटल संस्कृति के कारण उत्पन्न स्थितियों पर चर्चाएं होना शुरू हुई हैं। उत्तराखंड के संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्रों में मानवीय क्रियाकलापों के समुच्चय ने आपदाओं को न्यौता देने का कार्य किया हैं । दरअसल पर्वतीय प्रदेश में राज्य गठन के बाद से ही मैदान में बसे देहरादून के विपरीत पहाड़ों में स्थित गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग क्रमशः उठती आई है । शासन,प्रशासन और यहां के जनप्रतिनिधि पहाड़ में जब रहेंगे, तब पहाड़ के दुख,तकलीफ और यहां की शाश्वत चिंताओं के विषय में चिंतन कर पाएंगे इसी आधारबिंदु पर अतीत से हो रही मांगे आज उत्तराखंड के दरकते पहाड़ों और पहाड़ों में आ रही त्रासदी के रूपों को देखकर जायज लगती हैं ।

 मसलन राजधानी देहरादून से जोशीमठ पहुंचने पर लगभग पहाड़ी सफर के 8- 9 घंटे लगते हैं । प्रशासन और सक्षम प्राधिकारियों की इस दुरूह सफर में जाने की इच्छाशक्ति में कमी भी कहीं न कहीं इतने भयावह रूप के लिए उत्तरदाई है वरना क्षेत्र के लोगों द्वारा तो विभिन्न अवसरों पर जोशीमठ की स्थिति की जांच की मांग उठाई ही गई है । हास्यास्पद स्थिति तब पैदा होती है जब देश के प्रतिष्ठित भू- विज्ञान से संबधित संस्थान देहरादून में ही हैं और देश के प्रतिष्ठित उच्च क्षमता वाले सबसे पुराने इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी रूड़की भी उत्तराखंड में अवस्थित है लेकिन इसके बाद भी जोशीमठ की खबरों के मीडिया द्वारा सामने आने से पहले ऐसी कोई भी टीम गठित नहीं की गई। ऐसे विशेषज्ञों के तकनीकी ज्ञान,अनुभव का उपयोग पहले से किया जाता तो स्थिति को भयावह होने से पहले रोका जा सकता था ।

कोरोना के बाद की विषम स्थितियों में लोगों ने कहीं मुख्यमंत्री स्वरोजगार से तो कहीं बैंको से ऋण प्राप्त कर छोटे छोटे स्वरोजगार विकसित करने की कोशिश की । कहीं बकरी पालन,मवेशीपालन तो कहीं दुकानदारी से पैसा जमा कर जीवन निर्वाह करते लोगों के सम्मुख विस्थापन के बाद जीविका का प्रमुख प्रश्न है ।

अपने जानवरों को परिवार का अंश मानने वाले इन देवभूमि के निवासियों को उनके मवेशियों के साथ विस्थापित करने की योजना बनाई जानी चाहिए । कोविड काल में अनेकों साथियों ने स्वरोजगार के अवसर को विकसित करने की पहलें की । इसके एवज में उन्होंने बैंकों से ऋण भी लिए था । अब ऐसी स्थिति में सरकार को बैंकों को समझना होगा कि आपदा प्रभावित क्षेत्र के लोगों द्वारा लिए गए ऋणों की वसूली में कुछ समय के लिए छूट दी जाए ।

आपदा से प्रभावित होने वाले बच्चों की भी बोर्ड परीक्षाओं का यह समय है । ऐसे में इस आपदा से हमारे बच्चों के ऊपर पड़ने वाले मानसिक दबाव को महसूस करते हुए हमें परीक्षा की तैयारी के विषय में प्रावधान करने होंगे । दरकते पहाड़ों के संभावित खतरों ने नैनिहालों की शिक्षा संबधी व्यवस्थाओं पर भी सोचने की स्थिति पैदा कर दी है ।

जिन सक्षम प्राधिकारियों के कानों में स्थानीय आंदोलन की आवाज नहीं पहुंची वही लोग अब सक्रियता से संभावित आपदा स्थलों का चिन्हीकरण करने में व्यस्त हैं । इसके अलावा लोगों को जागरूक भी किए जाने की आवश्यकता आज दिखती है । अभी भी स्थानीय निवासियों का एक बड़ा वर्ग जोशीमठ छोडके जाना नहीं चाहता है । प्रशासन को सहानुभूतिपरक पुनर्वास योजनाएं बनाने की आज आवश्यकता है । यह सही वक्त है जब बेतरतीब दबाव झेलते पहाड़ों के लिए लंबे समय से मांगी जा रही इनर लाइन परमिट संबंधी मांगों पर गौर किया जाए । जोशीमठ के साथ साथ पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों का पारदर्शी वैज्ञानिक सर्वे आज उत्तराखंड की आवश्यकता है ।


रविवार, 8 जनवरी 2023

प्राकृतिक आपदाओं के पीछे मानवीय क्रियाकलाप

 

उत्तराखंड के सुदूरवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में जनमानस भूगर्भीय संक्रियाओं के कारण आने वाले भूकंपों, भूस्खलनों, भू -धसाव गिरते पहाड़ों ,पत्थरों और पर्यावरणीय संवेदनशील योजनाओं से हमेशा संघर्ष करते आया है । प्राकृतिक आपदाओं के लिए संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में विगत वर्षों में भयावह आपदाएं आई हैं। 


उत्तराखंड जन,जंगल, जमीन के आंदोलनों की भूमि रहा है । चिपको आंदोलन से लेकर गंगा बचाओ अभियान तक पर्यावरणीय सरोकारों के लिए यहां विरोध होता रहा है लेकिन मुख्यधारा की नजरों में हमेशा घटनाएं देर से ही पहुंची हैं । वर्तमान में जोशीमठ से भूस्खलन की आ रही विकराल खबरों ने एक बार पुनः विकास बनाम विनाश के विमर्श को जन्म दे दिया है। जोशीमठ में कई मकानों में बड़ी दरारें आ गईं । पानी का रिसाव भी शुरू हो गया। बद्रीनाथ हाईवे पर भी मोटी दरारें आईं हैं । भू-धंसाव से ज्योतेश्वर मंदिर और मंदिर परिसर में दरारें आ गई हैं। लगभग 570 परिवार इससे प्रभावित है। डर और अनिश्चितता के कारण मजबूरन सर्दी में भी अपने घरों को छोड़ने को अभिशप्त इन लोगों की स्थिति पर पूरे देश का ध्यान गया है। 


जोशीमठ ,उत्तराखंड के चमोली जनपद में स्थित करोड़ों भारतीयों की आस्था का मुख्य प्रवेश द्वार है जहां से आगे आद्यगुरू शंकराचार्य के द्वारा स्थापित चार धाम में से एक बद्रीनाथ और पवित्र हेमकुंड साहिब अवस्थित है। जोशीमठ में भगवान् विष्णु का एक मंदिर है । सर्दियों में जब बद्रीनाथ के कपाट बंद हो जाते हैं, तब भगवान बद्री की प्रतिष्ठा इसी मंदिर में होती है । किसी समय में कत्यूरी शासकों की लंबे समय तक राजधानी रहा 6150 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित यह जोशीमठ क्षेत्र आज भी पर्वतारोहीयों और ट्रैकर्स की पसंदीदा जगहों में से एक हैं। इसी जोशीमठ से कुछ 15 किलोमीटर दूर रैणी नामक एक गांव में विश्व को पर्यावरणीय जागरूकता का संदेश देने वाली और चिपको आंदोलन की प्रमुख हस्ताक्षर गौरा देवी भी संबंधित हैं। पिछले वर्ष गौरा देवी के इस गांव को भी भूस्खलन के परिणामों से जूझते हुए देखा गया । इसी रैणी गांव में जोशीमठ-मलारी हाइवे का लगभग 40 मीटर हिस्सा भूस्खलन से जमींदोज हो गया था। ऐसे में ऋषिगंगा परियोजना के निर्माण के वक्त जो आशंकाएं व्यक्त की थीं, वे आज सच हो रहीं हैं।


उत्तराखंड के अधिकतर संवेदनशील क्षेत्र मोरेन ( हिमोद) के ऊपर अवस्थित हैं । ऐसे में हल्की हल्की दरारें पहाड़ों के लोगों के जीवन का हिस्सा अतीत में भी रही हैं । लेकिन जोशीमठ में चौतौरफा क्रियाएं बड़ी हैं, और उसका ही नकारात्मक पक्ष सामने आ रहा है ।


उत्तराखंडवासियों ने वर्ष 1990 में आए विनाशकारी भूकंप के घावों से अभी मुक्ति पाई भी नही थी कि कुदरत ने हमें केदारनाथ त्रासदी जैसी घटनाओं से पुनः परिचय कराया । समय समय पर हम सबने समाचार पत्रों में त्रासदी की तस्वीरें देखी हैं । पूरे हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को समझते हुए वर्ष 1976 में 18 सदस्यीय मिश्रा समिति ने अपनी अनुशंसाओ में इस पूरे क्षेत्र और विशेषकर जोशीमठ की संवेदनशीलता के विषय में अनेक बातें कही थी । समिति ने इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार के भारी अवसंरचनात्मक निर्माण पर बैन की मांग की थी। 



राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में वर्ष 2021 में आए 4.6 प्रतिशत तीव्रता के भूकंप का केंद्र जोशीमठ ही था । हाल ही में नवंबर 2022 में नेपाल में आए भूकंप का अहसास जोशीमठ तक किया गया था । विगत दस वर्षों में 700 भूकंप के मामले उत्तराखंड में देखे गए हैं । हालांकि यह सब प्रायः कम तीव्रता के ही रहे थे ।


जन,जंगल,जमीन और जानवर को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारणों की लंबी फेहरिस्त में मानवीय क्रियाकलापों और उसमें भी विशेषतः इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास (अवसंरचनात्मक विकास) के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी महत्ती भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता । सड़क विस्तार परियोजनाओं से लेकर पर्यटन स्थलों के ऊपर जनसांख्यकीय आधिक्य , जलविद्युत परियोजनाओं तक और जंगलों के जलने से लेकर होटलों के लिए कंक्रीट के विस्तार तक सभी ने केवल जोशीमठ ही नहीं बल्कि पूरे उत्तराखंड को प्रभावित किया है। जमीनी धरातल पर सामरिक महत्व के लिए आवश्यक चार धाम सड़क परियोजनाओं, रोपवे सेवाओं, धार्मिक पर्यटन और ऊर्जा राज्य के लिए जलविद्युत परियोजनाओं जैसी अवधारणाओं ने पहले से ही सेस्मिक जोन पांच में अवस्थित उत्तराखंड की परिस्थतिकी को नुकसान पहुंचाया है। 


बेतरतीब अनियोजित चार पांच मंजिला होटलो के नियामकों , रेत खनन, हेलंग बाईपास निर्माण कार्य, एनटीपीसी तपोवन विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना,जोशीमठ-औली रोपवे आदि विषयों पर पुनर्चर्चा का अब समय आ गया है । निकासी तंत्र की शिथिल स्थिति और अलकनंदा और धौलीगंगा दोनों ही नदियों द्वारा जोशीमठ शहर के नीचे की मिट्टी का कटान किया जाना भूस्खलन की संभावनाओं को और बढ़ा देता है । 


आज यह सवाल भी पूछे जाना वक्त की मांग है कि आपदा के संबध में नीतिगत निर्णयों को क्या आपदा होने का इंतजार करना चाहिए ? क्या पुनर्वास की नीतियों का निर्धारण घटना होने के बाद ही किया जाना चाहिए ? क्या श्रद्धालुओं की सुविधा के नाम पर धार्मिक जगहों को पिकनिक स्पॉटो में बदला जाना चाहिए ? क्या धार्मिक पर्यटन स्थलों के विकास के नाम पर पारिस्थितिकी संतुलन से समझौता किया जा सकता है ? क्या हैली सेवाओं से हमारे धामों के दर्शन कर रहे श्रद्धालुओं में एक उम्र की सीमा लागू की जा सकती है? क्या पर्यटन का दबाव झेल रहे हिमालय क्षेत्र में दैनिक आधार पर पर्यटकों की संख्या सीमित कर देनी चाहिए आधारित ये सब प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हैं? 


जाहिर है संविधान से चलने वाले इस देश में उपरोक्त बातें आपको संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों और विशेषकर अबाधित रूप से देश के अंदर चलने फिरने में बाधक लगें लेकिन सच यह है कि हिमालयी राज्यों में पर्यटन के दबाव को अब महसूस किया जाने लगा है और उसी संविधान के अपवादों का भी उपयोग करने का यह सही वक्त है । उत्तराखंड के जिन निवासियों को विकास के इन मॉडलों का दंश झेलना पड़ रहा है उनके पुनर्वास के लिए त्वरित नीतिगत निर्णय लेना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है ।


जोशीमठ की घटना में उत्तराखंड सरकार ने हालांकि त्वरित कार्यवाही करते हुए इस संबध में उच्च स्तरीय जांच समिति बनाई है और जांच समिति की रिपोर्ट आने तक सारे कार्य रोक दिए हैं लेकिन इतने समय से संघर्षशील जोशीमठ के लोगों की अभी तक सुनवाई न होना प्रशासन का जनता से विलगाव ही दिखाता है । 


 हिमालयी राज्यों में देश की ऊर्जा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाए जा रहे बांधों के निर्माण से होने वाले नुकसानों और फायदों के विषय में विस्तृत और विश्वसनीय सूचनाओं का विस्तार आम जन तक सुलभ होने पर ही तुलनात्मक अध्ययन किया जाना संभव है लेकिन यह बात स्पष्ट है कि पहाड़ी राज्यों की भौगोलिक स्थितियों और पर्यावरणविदो की सलाहों और विरोधों के स्वर को तिलांजलि देकर ग्लेशियरों से घिरे धार्मिक स्थलों और संवेदनशील क्षेत्रों के नजदीक पर्यटन के दबाव को कम करना आज आवश्यक है । सरकारी तंत्र में कार्यरत वैज्ञानिकों के साथ साथ स्वतंत्र वैज्ञानिकों के मतों को साथ में देखकर ही निष्पक्ष रूप से संवेदनशील इलाकों में विकासात्मक अप्रोच की तरफ आगे बढ़ना आज आवश्यक है । हाल ही में सम्मेद शिखरजी पर्वत क्षेत्र को पर्यटन स्थल में बदले जाने के विरोध ने भी पूरे देश का ध्यान खींचा है । केंद्रीय सरकार ने जैनियों की आस्था को समझते हुए झारखंड सरकार के फैसले पर रोक लगा दी हैं। ऐसे मुहिमों की आज आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि हमारे तीर्थ और धार्मिक संकल्पनाए अपनी केंद्रीय धुरी से उत्तर कर नाचते गाते पिकनिक, स्पोटों और मौज मस्ती तक सीमित न रह जाए ।

बुधवार, 4 जनवरी 2023

सर्वाइकल कैंसर की स्वदेशी वैक्सीन : जागरूक होकर ही जीतेंगे जंग ।


भारत में महिलाओं को होने वाले कैंसर में सर्वाइकल कैंसर या बच्चेदानी के मुंह का कैंसर दूसरे क्रम में आता है । भारत में स्तन कैंसर के बाद ह्यूमन पैपिलोमा वायरस, के संक्रमण से होने वाले सर्वाइकल कैंसर से हमारी आधी धुरी, ये स्त्री शक्तियां आज सर्वाधिक प्रभावित होती हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष लगभग तीन लाख स्त्रियों की मृत्यु सर्वाइकल कैंसर से होती है।

नेशनल कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के आंकड़ों के अनुसार भारत में महिलाओं को होने वाले कैंसर में से 6-29 प्रतिशत कैंसर के मामले सर्वाइकल कैंसर के होते हैं । भारत में स्वास्थ्य नीतियों को वर्ष 1983, वर्ष 2002 और वर्ष 2017 में संशोधित किया गया लेकिन किसी में भी सर्वाइकल कैंसर की दिशा में कोई ठोस कदम देखने को नहीं मिलते । सस्ते स्वदेशी टीके की अनुपलब्धता, जानकारियों का अभाव, बड़ी संख्या में वैक्सीन की सरकारी खरीद न होना और बच्चों के पाठ्यक्रमों में ऐसी सूचनाओं के नदारद होने का परिणाम यह है कि आज भी महिलाओं का एक बड़ा वर्ग, एक बड़ी लंबी आयु तक, इससे ग्रसित होने के बावजूद भी यह नहीं जान पाता कि उसको यह बीमारी है ।

 विगत वर्षों में हमारे राष्ट्र ने स्वास्थ्य संबंधी क्षेत्रों में और विशेषकर टीकाकरण अभियानों (इम्यूनाइजेशन कार्यक्रमों )में उल्लेखनीय प्रगति की है । सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा सर्वाइकल कैंसर के लिए हाल ही में वैक्सीन जारी करने की घोषणा इसी प्रगति का एक हिस्सा है । स्वदेशी वैक्सीन को विकसित करने की सूचना भारत समेत पूरे विश्व और विशेषकर अफ्रीकी देशों के लिए और सार्क देशों के लिए वैसी ही शुभ है जैसी कोरोन्ना के समय में स्वदेशी कोरोना वैक्सीन के विकसित होने के बाद की थी। ह्यूमन पैपिलोमा वायरस की वैक्सीन को सार्वभौमिक टीकाकरण अभियान में शामिल किए जाने की मांग लंबे समय से मेडिकल कॉलेजों,प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में कार्यरत चिकित्सकों और विभिन्न बुद्धिजीवियों द्वारा भी दोहराई गई है । सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह की अनुशंसाओं ने सर्वाइकल कैंसर के संबंध में अपने नीतिगत निर्णयों में इसको अमलीजामा पहनाने में आज प्रमुखता से काम किया है । हालांकि अभी इस संदर्भ में सकारात्मक परिणाम आने में 1 -2 वर्ष का समय लगेगा ।

इससे जहां अन्य वैक्सीन के विकल्प हमें प्राप्त होंगे वहीं हमारी सस्ती दवाइयों को अफ्रीकी और अन्य राष्ट्रों में भी अतीत की तरह स्वीकृति मिलेगी यह कहा जा सकता है । भारत सरकार ने अन्य वैश्विक समुदाय को भी वैक्सीन मदद करने के उद्देश्य से कोरोना समय में वैक्सीन मैत्री नामक पहल जारी की । विगत 3 वर्षों से विश्व के लाखों लोगों को फायदा दे रही यह एक प्रशंसनीय पहल है ।

 ह्यूमन पैपीलोमा वायरस के कारण होने वाले सर्वाइकल कैंसर के इस संक्रमण को कैंसर में बदलने में सात से पंद्रह साल लगते हैं , अतः प्रारंभिक चरणों में इसकी पहचान और प्रभावी रोकथाम की जा सकती है । टीकाकरण के लिए सरकारी सुझावों की समिति की अनुशंसा के बाद इस वैक्सीन को भारतीय ड्रग महानियंत्रक से अनुमति भी मिल चुकी है । भारत में वर्ष 2023 के मध्य से इस स्वदेशी वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित रहेगी । 9 से 14 वर्ष तक की आयु वर्ग की बच्चियों को विद्यालयों,और स्वास्थ्य केंद्रों में यह सुविधा सरकार की तरफ से प्राप्त होगी । ऐसे में टीचर -पैरेंट्स मीटिंग्स में ऐसे जागरूकता संबधी विषयों पर चर्चा भी आज आवश्यक हो जाती है। वर्तमान में यही सबसे बड़ी चुनौती है । आज हमें जागरूकता के नए माध्यमों को भी अपनाने की आवश्यकता है ।

ऐसी स्त्रियां जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) कम हो ,हाइजीन का उचित ध्यान न हो, गर्भाशय के बार बार प्रभावित होने की स्थिति में हों और असुरक्षित यौन संबंधों के कारण,

बच्चेदानी के कैंसर या सर्वाइकल कैंसर की संभावना उनमें होती है। असामान्य रक्त स्राव,महीने के बीच में रक्त स्राव होना,यौन संबंधों के बाद रक्त स्राव होना ये प्रायः इसके प्रमुख लक्षण हैं । इन लक्षणों को सामान्यतः आम लक्षण समझे जाने और लापरवाही के कारण पहली स्टेज में परीक्षण (डायग्नोस) होने के मामलों में काफी कमी वर्तमान में देखी जा सकती है ।

 कैंसर बनने से पहले प्री कैंसर / डिस्प्लेशिया के स्तर पर पहचान हो जाने से इसका इलाज बहुत ही समान्य तरीके से संभव है और बच्चेदानी निकालने,कीमोथेरेपी और रेडिएशन से भी बचा जा सकता है । पैप स्मीयर परीक्षण, ह्यूमन पैपिलोमावायरस के परीक्षण से महिला को कैंसर होने या न होने की संभावना का परीक्षण डॉक्टर बच्चेदानी से पानी लेकर लगा सकते हैं । पैप स्मीयर परीक्षण रिपोर्ट ठीक आने पर अगले तीन से पांच साल तक किसी जांच की आवश्यकता नहीं होती ।

 बायोप्सी टेस्ट के माध्यम से कैंसर होने या न होने की जांच की जा सकती है । एमआरआई,अल्ट्रासाउंड आदि के द्वारा शरीर में हुए कैंसर के प्रसार को समझा जा सकता है। शुरुवाती चरणों में यदि डायग्नोस कर लिया गया तो सर्जरी से बच्चेदानी निकाल कर इसको पूरी तरह ठीक भी किया जा सकता है । यदि किसी व्यक्ति के शरीर में दूसरे और तीसरे चरण तक यह कैंसर फैल जाता है तो हल्की कीमोथेरेपी और रेडिएशन की मदद से इसका उपचार संभव है।

वर्तमान में विदेशी वैक्सीनों की उपलब्धता तो भारत में है लेकिन यह आर्थिक दृष्टि से अभी भी कई परिवारों की सीमा से बाहर है । भारतीय स्वदेशी वैक्सीन के निर्माण की , और नौ से पंद्रह आयु वर्ग की बच्चियों हेतु उसे इम्यूनाइजेशन कार्यक्रम में डाले जाने की घोषणा के बाद इस आधे पहिए की युवा पीढ़ी के साथी आर्थिक कारणों से इन वैक्सिनों से दूर नहीं रह पाएंगे यह निश्चित है ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसी संदर्भ में एक वैश्विक अभियान चलाया है । 90-70- 90 लक्ष्य । इन लक्ष्यों की प्राप्ति वर्ष 2030 तक करने के उद्देश्य से सभी राष्ट्रों को अपने देश की 15 वर्ष तक की लड़कियों की 90 प्रतिशत आबादी को सर्वाइकल कैंसर की प्रतिरक्षा प्रदान करनी है । सरकारों को यह ध्यान देना है कि 70 प्रतिशत महिलाओं को कम से कम दो परीक्षणों की उच्च सुविधा उपलब्ध हो पाए और 90 प्रतिशत महिलाओं में किसी भी प्रकार के कैंसर और विशेषतः सर्वाइकल कैंसर की जांच और इलाज को संपन्न करवाना है।

 इन महत्त्वपूर्ण संकल्प आधारित लक्ष्यों की तरफ विश्व के अलग अलग देश अपने अपने नीतिगत निर्णय और योजनाओं में लगे हैं। ऐसे में स्वदेशी वैक्सीन के आने बाद सार्वभौमिक प्रतिरक्षा कार्यक्रम के तहत यदि इसको लाया जाएगा तो भारत विश्व के सामने प्रभावी उदाहरण पेश कर सकता है । भारत में शुरुवाती उम्र में इस वैक्सीन को पुरुष और महिला दोनों पर लगवाने की आवश्यकता हैं क्योंकि सर्वाइकल कैंसर के मामलों में कमी लाने के लिए पुरुषों का भी प्रतिरक्षित रहना आवश्यक है । विश्व के अनेक देशों में इस संबंध में लिंग विभेद को दरकिनार करते हुए प्रतिरक्षा कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

भारत द्वारा विगत वर्षों में स्वास्थ्य क्षेत्र में विपरीत परिस्थितियों में भी पूरे विश्व के कल्याण की भरसक कोशिश की की गई । इन विपरीत परिस्थितियों में भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं का एक इकोसिस्टम विकसित करने की कोशिश की है । हालांकि केंद्र- राज्य विषय की टकराहट के चलते कहीं कहीं स्थितियां आज भी भयावह हैं । हमारे पुराने अनुभवों ने अतीत में वैक्सीनेशन कार्यक्रमों में हमारी आगनबाड़ियों और एएनएम शक्तियों की मजबूत भूमिका को सबके सामने स्थापित किया है।

हमने यह ध्यान देना होगा कि ये प्रोत्साहन महज संवाद के प्रोत्साहन न हों और ऐसे निष्ठावान कार्मिकों को सम्मानजनक कार्य की दशाओं और वेतनमान को भी हम प्रदान करेंगे । ओडिशा राज्य में हाल ही में वेतनमान के लिए आंदोलनरत आंगनबाड़ी कार्मिक महिलाओं का दृष्टांत इस संदर्भ में समीचीन है। भारत में अनुसंधान पर और भी सक्रियता से और मूल भाषाओं में होने वाले अनुसंधानों को बजटीय प्रावधानों से और भी प्रोत्साहित किया जाने की आवश्यकता है। केंद्र सरकार के प्रयासों को राज्यों की इच्छाशक्तियों से बल मिलता है, ऐसे में लोकतंत्र की वाहक राज्य सरकारें भारत की इस स्त्री शक्तियों के संबंध में, लिए जा रहे नीतिगत निर्णयों में सक्रिय सहभागिता निभाएंगी यह उम्मीद की जा सकती है ।


अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

  युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र   की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है   । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोल...