क्या आप को शहीद राजेंद्र सिंह का नाम याद है ? यह नाम इस लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मानवाधिकारों की पैरोकारी करते तमाम बुद्धिजीवियों, शोध विश्लेषकों की जुबां इस नाम के लिए खामोश है | ख़ामोशी इसलिए है कि सेना की वर्दी पहने व्यक्ति के लिए मुखरित होने के लिए कोई आवाजें नहीं हैं |
संविधान द्वारा प्रदत्त गरिमा पूर्वक जीवन जीने के अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार एवम आत्मरक्षा के अधिकार के प्रावधान प्रायः सेना के लिए नदारद ही रहे हैं | क्या आपको जुलाई 2018 की वह घटना याद है जब भारतीय वायु सेना का मिग 21 विमान पठानकोट से चलकर कांगड़ा में दुर्घटना ग्रस्त हुआ । भारतीय वायु सेना के पिछले 10 सालों में ऐसे 31 एयरक्राफ्ट दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं ।क्या आपको जुलाई 2018 में ही कश्मीर घाटी में छुट्टी पर घर गए 4 सुरक्षाकर्मियों की आतंकवादियों द्वारा कायरतापूर्ण हत्या याद है ?क्या आपको वर्ष 2017 में कश्मीर के सोपिया में लेफ्टिनेंट उमर फय्याज के विवाह समारोह से कत्लेआम का दृश्य याद है ? यदि आपका जवाब नकारात्मक में है
तब फिर -
धूल साफ कर जो तस्वीरें शान से आज सजाई हैं, इससे पहले इनकी याद किसे कहां और कब आई है । ये पंक्तियां हमारी मनःस्थिति पर सटीक बैठती हैं ।
एक सैनिक इस स्थिति से भलीभांति परिचित होता है कि देश की सुरक्षा के लिए एक एक गोली को उसने अपने सीने में लेके भी देश की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है लेकिन वह इस स्थिति से परिचित नहीं होता है कि वांछित उपकरणों के बिना युद्ध में उसे शहीदी हासिल हो सकती है ।यह शहीदी केवल युद्ध में ही नहीं बल्कि स्टोन पेल्टर्स द्वारा, खराब जीपीएस आधारित उपकरणों और गैर बुलेटप्रूफ वर्दी एवम वाहनों से भी प्राप्त हो सकती है ।वह इस स्थिति से परिचित नहीं होता कि मैम साहबों के प्यारे टॉमी की मॉर्निंग वॉक भी उसे ड्यूटी के रूप में हासिल हो सकती है । और इस प्रकार की स्थितियों को मानवाधिकारों के आलोक में देखने से स्थिति सही हो सकती है इसमें दो राय नहीं ।
भारत में तो सुरक्षा एजेंसियों के मानव अधिकारों पर चर्चा और भी अनिवार्य हो जाती है । देश में चरमपंथी तत्वों की मौजूदगी इस विषय पर और भी सशक्तता से सोचे जाने कि मांग करती है । चीन, इजरायल,आदि देशों ने अपने यहाँ सेनाओं में कार्यरत सैनिकों के मानवाधिकारों को समझते हुए पत्थर फेंकने वाले आम सिविलियन के खिलाफ फायर आर्म्स उपयोग करने की अनुशंसा की हैं ।
भारत में यह भी देखने को मिलता है कि देश की सम्प्रभुता के लिए खतरा बनते चरमपंथियों द्वारा स्थानीय नागरिको को बरगलाकर लालच देकर या मानसिक प्रताड़नाओं द्वारा हमारी सेनाओं पर प्रायोजित हमले कराये जाते हैं । कभी कभी यह हमले किसी आतंकवादी को बचाने के लिए ढाल का काम करते है तो कभी कभी यह हमले हमारे सैनिको को मौत के मुँह में धकेलते है । नक्सलबाड़ी क्षेत्रों में कई बार राज्य प्रशासन और केंद्रीय सेनाओं के ईगो,अधिकार क्षेत्र की लड़ाई में या तो हमारे जवान शहीद होते हैं या फिर इतने प्रयास से की गई रेकीयां असफल हो जाती हैं ऐसे में इन स्थितियों से यदि किसी सैनिक की शारीरिक,मानसिक,स्थिति प्रतिकूलित होती है तो उसे मानव अधिकारों के पैरोकार देख नहीं पाते ।
मानव अधिकार और सेना इन दोनों में संबंध स्थापित करने की यदि हम कोशिश करें तो हमको सेना के द्वारा मानवधिकार हनन की तमाम खबरें, एफआईआर के कलेवर में या केस के रूप में मिल जाते है वही शहीद राजेंद्र सिंह जैसे शख्स जिनको भीड़तंत्र द्वारा स्टोन पेलटिंग के तहत मार दिया जाता है , पर तमाम विमर्श मौन हो जाते है | बोफोर्स जैसे घोटाले और आधुनिक सुविधाओं से वंचित सेनाओं के लिए आवाजें उठती इस देश में कम ही दिखती हैं । और सेवा नियमावली से बंधे हमारे सैन्य बल अपने मानव अधिकारों को खोते नजर आते हैं ।
स्टोन पेल्टर्स के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस ले लिए जाते हैं जो कि एक तमाचा होता है देश के सैन्य बलों के ऊपर जो यह घोषित करता है कि सैन्य बलों से ऊपर भी बढ़कर लोक लुभावन राजनीति है । ऐसे कदम सैन्य बलों के मनोबल को तोड़ने का काम करते हैं । हाल ही में ब्रिटिश सेना द्वारा अपने सैनिकों को उनके कार्यरत क्षेत्र में भी मानवाधिकार प्रदत्त किए गए हैं । कॉम्बैट इम्यूनिटी का भी अधिकार ब्रिटिश संसद ने अपने सैन्य बलों को दिया है । भारत में स्थिति अभी इसके उलट है । तमाम केसों में सैन्य संस्थाओं द्वारा जांच की गई हैं जिनकी जानकारी आम जनमानस को नही हैं ।
संविधान का अनुच्छेद 33 मौलिक अधिकारों के अपवाद के रूप में दिखता है । अनुच्छेद 33 के तहत प्रदत्त अधिकारों का उल्लेख यहां महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी अनुच्छेद के कारण हमारे सैन्य बलों की आवाजें हम तक नहीं पहुंच पाती । अनुच्छेद 33 अपने आप में किसी भी अधिकार को समाप्त नहीं करता है; इसकी प्रयोज्यता संसदीय विधान पर निर्भर करती है।अनुच्छेद 33 संसद को यह अधिकार देता है कि वह सशस्त्र बलों , अर्ध-सैनिक बलों , पुलिस बलों, खुफिया एजेंसी एवं अन्य के मूल अधिकार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकें।ऐसा इसलिए ताकि उनके कर्तव्यों का उचित पालन और उनमें अनुशासन बना रहना सुनिश्चित रहे।
इसी व्यवस्था का इस्तेमाल करते हुए संसद ने सैन्य अधिनियम 1950, नौसेना अधिनियम 1950, वायु सेना अधिनियम 1950, सीमा सुरक्षा बल अधिनियम आदि बनाए है।
इस बात पर कोई दो राय नहीं देश की संप्रभुता और सीमाओं की रक्षक सैन्य सेवाओं को अनुशासन और कार्यदक्ष होना चाहिए लेकिन हाल ही में तमाम केसों में तथा आर्म्ड फोर्सेज के ट्रिब्यूनलों से प्राप्त निर्णयों को देखकर यह कहा जा सकता है कि न्याय का सिद्धांत इन देश सेवा में लगे सैन्य बलों से अभी दूर है । हमारे पास कोई ऐसी प्रणाली नही है जिससे सैन्य बलों के अंदर असुरक्षा, हताशा और अस्तित्ववादी प्रवृति को पहचान कर उसे कम किया जा सके ।
अतः ऐसे में आवश्यकता है ऐसे अधिकारों को प्रदत्त करने की जिनसे उनके अनुशासन में फर्क आए बिना उनके मानव अधिकार भी संरक्षित किए जा सके ।
कल्पना करें आप ऐसे सैनिक की जो गलवान घाटी में बिना अच्छी क्वालिटी के जूतों और लड़ाकू साधनों के साथ निगरानी कर रहा है, या फिर कल्पना करें सियाचिन में कार्य कर रहे सैनिक की जिसको खून जमा देने वाली ठंड में गर्म रखने के लिए ढंग की वर्दी तक प्राप्त नहीं है या फिर कल्पना करे युद्ध में जाते वाहन की जो तकनीक से लेकर अपनी अवस्था तक में इतना जर्जर हो चुका है की सामान्य माइनिंग से उड़ जाता है तो ऐसे में क्या ये सभी प्रश्न जीवन जीने के अधिकार के अंतर्गत नहीं आयेंगे । क्या ऐसी किसी घटना के लिए मानवाधिकार के प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते ?
वर्ष 2014 के बाद देश में जिस तरह सैन्य सेनाओं के आधुनिकीकरण की तरफ , सैन्य बलों के मानवाधिकारों की तरफ कदम बढ़े हैं वैसे में यह एक सुखद अनुभूति है कि ऊपर बताई गई काल्पनिक स्थितियों से वर्तमान में हमारा जूझना कम हुआ है वरना वर्ष 1962 से 2010 तक के भारत को हम सबने देखा है और जिया है । अर्धदली या सहायक वाली अवधारणा को भी इसी गरिमामय जीवन जीने के अधिकार के आलोक में हमें देखना होगा ताकि हम समझ पाएं कि मैम साहबों के लिए गाड़ी के दरवाजे खोलते और साहबों के कुत्तों को घुमाने ले जाते सैन्य बलों के गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार की किस प्रकार धज्जियां उड़ रही हैं।
विगत वर्षों में तीनों सेनाओं, खासकर थल सेना में आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। कुछ परेशान करने वाली घटनाएं भी हुई हैं जिनमें सैनिकों ने अपने अधिकारियों के खिलाफ शारीरिक बल का प्रयोग किया है या आदेशों का पालन करने से इनकार कर दिया है। कुछ घटनाओं में उन्होंने अपने अधिकारी के लिए "बैटमैन" या "अर्दली" की गरिमापूर्ण भूमिका में काम करने से इनकार कर दिया है। कुछ लोगों ने अपने वरिष्ठों और संगठन के खिलाफ अपनी राय और शिकायतों को प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया का फायदा उठाया है । यह प्रवृत्ति परेशान करने वाली है। स्थानांतरण, प्रोमोशन, पोस्टिंग आदि विषयों में भी पारदर्शिता की कमी देखी जा सकती है ।
आज सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों में निहित अधिकारों से, जिसमें भारत एक पक्ष है,सैन्य बलों के सदस्यों को वंचित किया जा सकता है, भले ही उनके अनुशासन या कर्तव्य के प्रदर्शन पर कोई प्रभाव न पड़े और खासकर तब जब कोई प्रणाली ही न हो यह बताने के लिए कि अनुशासन और कर्तव्य पर प्रदर्शन पर प्रभाव कितना और कैसे पड़ेगा ।
पीपीएस बेदी मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के पच्चीस साल बाद, संसद ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण अधिनियम को पासकर सशस्त्र बल न्यायाधिकरण की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया । वर्ष 2009 में गठित यह ट्रिब्यूनल हालांकि अभी भी कई सुधारों के आग्रह के साथ कार्यरत है ।
वस्तुतः लोकतंत्र की अवधारणा संविधान से अपनी शक्ति को सृजित करती है । सैन्य बलों के सदस्यों के मानवाधिकार संबंधी मामलों पर तभी सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे जब देश की संसद में अनुच्छेद 33 के संबध में विस्तृत परिचर्चा हो और सेवा नियमावली के उन प्रावधानों को भी बदला जाए जो गरिमा पूर्ण जीवन जीने के अधिकार से वंचित करते हैं ।
लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।