सोमवार, 25 जुलाई 2022

भारत में सैनिकों के मानवाधिकार दशा और दिशा । जय प्रकाश पाण्डेय

 


क्या आप को शहीद राजेंद्र सिंह का नाम याद है ? यह नाम इस लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मानवाधिकारों की पैरोकारी करते तमाम बुद्धिजीवियों, शोध विश्लेषकों की जुबां इस नाम के लिए खामोश है | ख़ामोशी इसलिए है कि सेना की वर्दी पहने व्यक्ति के लिए मुखरित होने के लिए कोई आवाजें नहीं हैं | 


 संविधान द्वारा प्रदत्त गरिमा पूर्वक जीवन जीने के अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार एवम आत्मरक्षा के अधिकार के प्रावधान प्रायः सेना के लिए नदारद ही रहे हैं | क्या आपको जुलाई 2018 की वह घटना याद है जब भारतीय वायु सेना का मिग 21 विमान पठानकोट से चलकर कांगड़ा में दुर्घटना ग्रस्त हुआ । भारतीय वायु सेना के पिछले 10 सालों में ऐसे 31 एयरक्राफ्ट दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं ।क्या आपको जुलाई 2018 में ही कश्मीर घाटी में छुट्टी पर घर गए 4 सुरक्षाकर्मियों की आतंकवादियों द्वारा कायरतापूर्ण हत्या याद है ?क्या आपको वर्ष 2017 में कश्मीर के सोपिया में लेफ्टिनेंट उमर फय्याज के विवाह समारोह से कत्लेआम का दृश्य याद है ? यदि आपका जवाब नकारात्मक में है 

तब फिर -


धूल साफ कर जो तस्वीरें शान से आज सजाई हैं, इससे पहले इनकी याद किसे कहां और कब आई है । ये पंक्तियां हमारी मनःस्थिति पर सटीक बैठती हैं । 

 

एक सैनिक इस स्थिति से भलीभांति परिचित होता है कि देश की सुरक्षा के लिए एक एक गोली को उसने अपने सीने में लेके भी देश की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है लेकिन वह इस स्थिति से परिचित नहीं होता है कि वांछित उपकरणों के बिना युद्ध में उसे शहीदी हासिल हो सकती है ।यह शहीदी केवल युद्ध में ही नहीं बल्कि स्टोन पेल्टर्स द्वारा, खराब जीपीएस आधारित उपकरणों और गैर बुलेटप्रूफ वर्दी एवम वाहनों से भी प्राप्त हो सकती है ।वह इस स्थिति से परिचित नहीं होता कि मैम साहबों के प्यारे टॉमी की मॉर्निंग वॉक भी उसे ड्यूटी के रूप में हासिल हो सकती है । और इस प्रकार की स्थितियों को मानवाधिकारों के आलोक में देखने से स्थिति सही हो सकती है इसमें दो राय नहीं । 

भारत में तो सुरक्षा एजेंसियों के मानव अधिकारों पर चर्चा और भी अनिवार्य हो जाती है । देश में चरमपंथी तत्वों की मौजूदगी इस विषय पर और भी सशक्तता से सोचे जाने कि मांग करती है । चीन, इजरायल,आदि देशों ने अपने यहाँ सेनाओं में कार्यरत सैनिकों के मानवाधिकारों को समझते हुए पत्थर फेंकने वाले आम सिविलियन के खिलाफ फायर आर्म्स उपयोग करने की अनुशंसा की हैं । 

भारत में यह भी देखने को मिलता है कि देश की सम्प्रभुता के लिए खतरा बनते चरमपंथियों द्वारा स्थानीय नागरिको को बरगलाकर लालच देकर या मानसिक प्रताड़नाओं द्वारा हमारी सेनाओं पर प्रायोजित हमले कराये जाते हैं । कभी कभी यह हमले किसी आतंकवादी को बचाने के लिए ढाल का काम करते है तो कभी कभी यह हमले हमारे सैनिको को मौत के मुँह में धकेलते है । नक्सलबाड़ी क्षेत्रों में कई बार राज्य प्रशासन और केंद्रीय सेनाओं के ईगो,अधिकार क्षेत्र की लड़ाई में या तो हमारे जवान शहीद होते हैं या फिर इतने प्रयास से की गई रेकीयां असफल हो जाती हैं ऐसे में इन स्थितियों से यदि किसी सैनिक की शारीरिक,मानसिक,स्थिति प्रतिकूलित होती है तो उसे मानव अधिकारों के पैरोकार देख नहीं पाते । 


मानव अधिकार और सेना इन दोनों में संबंध स्थापित करने की यदि हम कोशिश करें तो हमको सेना के द्वारा मानवधिकार हनन की तमाम खबरें, एफआईआर के कलेवर में या केस के रूप में मिल जाते है वही शहीद राजेंद्र सिंह जैसे शख्स जिनको भीड़तंत्र द्वारा स्टोन पेलटिंग के तहत मार दिया जाता है , पर तमाम विमर्श मौन हो जाते है | बोफोर्स जैसे घोटाले और आधुनिक सुविधाओं से वंचित सेनाओं के लिए आवाजें उठती इस देश में कम ही दिखती हैं । और सेवा नियमावली से बंधे हमारे सैन्य बल अपने मानव अधिकारों को खोते नजर आते हैं ।

स्टोन पेल्टर्स के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस ले लिए जाते हैं जो कि एक तमाचा होता है देश के सैन्य बलों के ऊपर जो यह घोषित करता है कि सैन्य बलों से ऊपर भी बढ़कर लोक लुभावन राजनीति है । ऐसे कदम सैन्य बलों के मनोबल को तोड़ने का काम करते हैं । हाल ही में ब्रिटिश सेना द्वारा अपने सैनिकों को उनके कार्यरत क्षेत्र में भी मानवाधिकार प्रदत्त किए गए हैं । कॉम्बैट इम्यूनिटी का भी अधिकार ब्रिटिश संसद ने अपने सैन्य बलों को दिया है । भारत में स्थिति अभी इसके उलट है । तमाम केसों में सैन्य संस्थाओं द्वारा जांच की गई हैं जिनकी जानकारी आम जनमानस को नही हैं । 

 संविधान का अनुच्छेद 33 मौलिक अधिकारों के अपवाद के रूप में दिखता है । अनुच्छेद 33 के तहत प्रदत्त अधिकारों का उल्लेख यहां महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी अनुच्छेद के कारण हमारे सैन्य बलों की आवाजें हम तक नहीं पहुंच पाती । अनुच्छेद 33 अपने आप में किसी भी अधिकार को समाप्त नहीं करता है; इसकी प्रयोज्यता संसदीय विधान पर निर्भर करती है।अनुच्छेद 33 संसद को यह अधिकार देता है कि वह सशस्त्र बलों , अर्ध-सैनिक बलों , पुलिस बलों, खुफिया एजेंसी एवं अन्य के मूल अधिकार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकें।ऐसा इसलिए ताकि उनके कर्तव्यों का उचित पालन और उनमें अनुशासन बना रहना सुनिश्चित रहे।

इसी व्यवस्था का इस्तेमाल करते हुए संसद ने सैन्य अधिनियम 1950, नौसेना अधिनियम 1950, वायु सेना अधिनियम 1950, सीमा सुरक्षा बल अधिनियम आदि बनाए है।

इस बात पर कोई दो राय नहीं देश की संप्रभुता और सीमाओं की रक्षक सैन्य सेवाओं को अनुशासन और कार्यदक्ष होना चाहिए लेकिन हाल ही में तमाम केसों में तथा आर्म्ड फोर्सेज के ट्रिब्यूनलों से प्राप्त निर्णयों को देखकर यह कहा जा सकता है कि न्याय का सिद्धांत इन देश सेवा में लगे सैन्य बलों से अभी दूर है । हमारे पास कोई ऐसी प्रणाली नही है जिससे सैन्य बलों के अंदर असुरक्षा, हताशा और अस्तित्ववादी प्रवृति को पहचान कर उसे कम किया जा सके ।

अतः ऐसे में आवश्यकता है ऐसे अधिकारों को प्रदत्त करने की जिनसे उनके अनुशासन में फर्क आए बिना उनके मानव अधिकार भी संरक्षित किए जा सके । 

 

कल्पना करें आप ऐसे सैनिक की जो गलवान घाटी में बिना अच्छी क्वालिटी के जूतों और लड़ाकू साधनों के साथ निगरानी कर रहा है, या फिर कल्पना करें सियाचिन में कार्य कर रहे सैनिक की जिसको खून जमा देने वाली ठंड में गर्म रखने के लिए ढंग की वर्दी तक प्राप्त नहीं है या फिर कल्पना करे युद्ध में जाते वाहन की जो तकनीक से लेकर अपनी अवस्था तक में इतना जर्जर हो चुका है की सामान्य माइनिंग से उड़ जाता है तो ऐसे में क्या ये सभी प्रश्न जीवन जीने के अधिकार के अंतर्गत नहीं आयेंगे । क्या ऐसी किसी घटना के लिए मानवाधिकार के प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते ? 


वर्ष 2014 के बाद देश में जिस तरह सैन्य सेनाओं के आधुनिकीकरण की तरफ , सैन्य बलों के मानवाधिकारों की तरफ कदम बढ़े हैं वैसे में यह एक सुखद अनुभूति है कि ऊपर बताई गई काल्पनिक स्थितियों से वर्तमान में हमारा जूझना कम हुआ है वरना वर्ष 1962 से 2010 तक के भारत को हम सबने देखा है और जिया है । अर्धदली या सहायक वाली अवधारणा को भी इसी गरिमामय जीवन जीने के अधिकार के आलोक में हमें देखना होगा ताकि हम समझ पाएं कि मैम साहबों के लिए गाड़ी के दरवाजे खोलते और साहबों के कुत्तों को घुमाने ले जाते सैन्य बलों के गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार की किस प्रकार धज्जियां उड़ रही हैं।



विगत वर्षों में तीनों सेनाओं, खासकर थल सेना में आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। कुछ परेशान करने वाली घटनाएं भी हुई हैं जिनमें सैनिकों ने अपने अधिकारियों के खिलाफ शारीरिक बल का प्रयोग किया है या आदेशों का पालन करने से इनकार कर दिया है। कुछ घटनाओं में उन्होंने अपने अधिकारी के लिए "बैटमैन" या "अर्दली" की गरिमापूर्ण भूमिका में काम करने से इनकार कर दिया है। कुछ लोगों ने अपने वरिष्ठों और संगठन के खिलाफ अपनी राय और शिकायतों को प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया का फायदा उठाया है । यह प्रवृत्ति परेशान करने वाली है। स्थानांतरण, प्रोमोशन, पोस्टिंग आदि विषयों में भी पारदर्शिता की कमी देखी जा सकती है । 

 आज सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों में निहित अधिकारों से, जिसमें भारत एक पक्ष है,सैन्य बलों के सदस्यों को वंचित किया जा सकता है, भले ही उनके अनुशासन या कर्तव्य के प्रदर्शन पर कोई प्रभाव न पड़े और खासकर तब जब कोई प्रणाली ही न हो यह बताने के लिए कि अनुशासन और कर्तव्य पर प्रदर्शन पर प्रभाव कितना और कैसे पड़ेगा ।


पीपीएस बेदी मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के पच्चीस साल बाद, संसद ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण अधिनियम को पासकर सशस्त्र बल न्यायाधिकरण की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया । वर्ष 2009 में गठित यह ट्रिब्यूनल हालांकि अभी भी कई सुधारों के आग्रह के साथ कार्यरत है ।

वस्तुतः लोकतंत्र की अवधारणा संविधान से अपनी शक्ति को सृजित करती है । सैन्य बलों के सदस्यों के मानवाधिकार संबंधी मामलों पर तभी सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे जब देश की संसद में अनुच्छेद 33 के संबध में विस्तृत परिचर्चा हो और सेवा नियमावली के उन प्रावधानों को भी बदला जाए जो गरिमा पूर्ण जीवन जीने के अधिकार से वंचित करते हैं ।


लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।

रविवार, 24 जुलाई 2022

श्रीलंकाई संकट और भारत के लिए सबक

 

 

असफल आर्थिक-नीतिगत फैसलों , बढ़ते सामाजिक धार्मिक वैमनस्य और  भ्रष्टाचार के साथ  परिवारवाद ने प्रति व्यक्ति आय के लिए एशिया में चर्चित , चाय और पर्यटन  के लिए विश्व में विख्यात, श्रीलंका को एशिया-प्रशांत क्षेत्र के  आर्थिक संकट से गुजर रहे ,विदेशी ऋण चुकाने में असमर्थ,  दिवालियेपन के करीब पहुंच चुके देश के रूप में स्थापित कर दिया है ।

 हालंकि आनन फानन में राष्ट्रपति राजपक्षे ने जनमंशा और विरोध प्रदर्शनों को ध्यान में रखते हुए पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को नया राष्ट्रपति नियुक्त किया  है लेकिन यक्ष प्रश्न उठकर सामने आ रहे हैं वो ये हैं  कि आखिर श्रीलंका की इस स्थिति का दोषी कौन है ? क्या भारत भी ऐसे किसी संकट का सामना भविष्य में कर सकता है ?  

 

 

सामन्यतया श्रीलंका को आयात आधारित अर्थव्यवस्था माना जाता है । अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को आयात करने वाला यह देश अपने देश की ऊर्जा आवश्यकताओं,खाद्य सामग्रियों और यहां तक की देश के अवसंरचनात्मक विकास हेतु भी विदेशी ऋण पर आश्रित है ।  यूक्रेन रूस विवाद के चलते तेल की उपलब्धता में कमी और  कीमतों में आए उछाल ने श्रीलंका की आर्थिक स्थिति को और भी खराब किया है । केवल  पर्यटन, चाय और रबड़ के निर्यात के आधार पर आगे बढ़ते श्रीलंका में कृषि एवं उद्योगों को विविधता प्रदान करने की आवश्यकता के विषय में सोचा ही नहीं  गया और चीन के साथ यह निर्भरता पिछले एक दशक में बढ़ती गई है ।

 

वर्ष 2019 में ही पॉपुलर राजनीति के तहत श्रीलंका में करों में भारी कमी की गई । वैट को 15 प्रतिशत से कम कर 8 प्रतिशत किया गया । इसी प्रकार लगभग 7 अन्य करों को खत्म किया गया । इससे सरकार के राजस्व में कमी आई | अप्रैल 2021 में विदेशी रासायनिक उर्वरकों पर प्रतिबंध लगाया गया। जैविक खेती (ऑर्गेनिक) की  नीति को ध्यान में रखने के साथ साथ  उर्वरकों के कारण  आयात में खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा  को बहिर्गमन से  रोकने का यह प्रयास था। पूरे देश में जैविक (ऑर्गेनिक) खेती की अवसंरचना को विकसित करने का त्वरित फैसला बाहरी रासायनिक उर्वरकों के आयात में सम्पूर्ण प्रतिबंध के साथ सामने आया । उर्वरकों की अनुपलब्धता से  परंपरागत खेती कर रहे किसानों को अत्यंत हानि हुई और श्रीलंका के उत्पादन में काफी कमी आई और कम उत्पादन के कारण  अनाज का आयात करना श्रीलंका की मजबूरी बन गया । इस आयात का शुल्क चुकाने में  पहले से ज्यादा विदेशी मुद्रा का बहिर्गमन  हुआ । और इन नीतियों  से प्रभावित किसान परिवारों को मुआवजों देने के लिए सरकारी कोष से  प्रचुर राशि का व्यय किया गया और इस तरह पहले से खाली खजाने और खाली होते गए । 

 

 

वर्ष 2018 में ईस्टर चर्च में हमले, सिंहली बनाम बाहरी विवाद और बौद्ध धर्म  अतिवादिता से भी श्रीलंका के  पर्यटन में कमी आनी शुरू हुई । कोविड के बाद पर्यटन सबसे ज्यादा प्रभावित रहा जिस कारण एक  आर्थिक वैक्यूम पैदा हुआ जिसने श्रीलंका की आर्थिक स्थिति को दबावग्रस्त कर दिया । 

 

आज सिंहल बौद्धों की बहुसंख्यक आबादी के तथाकथित  आदर्श नेता पूर्व राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे  अपनी जिंदगी को बचाने हेतु देश छोड़ने पर विवश हुए हैं  और आम जनमानस परिवारवाद की इस राजनीति में ईधन,भोजन के साधनों की जुगत में  संघर्षरत है | 

 

इतिहास को देखें तो हम पाते हैं वर्ष 1956 में आए  सिंहला अधिनियम से सामाजिक विषमताओं का उद्भव श्रीलंका में होना शुरू हुआ था । सिंहली भाषा को राजभाषा बनाए जाने के आलोक में  तमिल और सिंहली के बीच के विवाद की स्थिति को इस अधिनियम ने जन्म दिया । यह वह समय था जब भारत में भी भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हो रहा था । इसी समय पाकिस्तान में भी पूर्वी पाकिस्तान के ऊपर भाषाई अतिवादिता  को थोपा जा रहा था । सन 1950 तक  प्राथमिक उत्पादों के प्रचुर उत्पादन और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मांग के चलते श्रीलंका की आर्थिक स्थिति मजबूत थी । सन 1950 के बाद यह आर्थिक स्थिति कमजोर होते गई और श्रीलंका ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ )का दरवाजा खटखटाया । अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ )के शर्त आधारित अनुदान को प्राप्त कर श्रीलंका में विरोधस्वरूप व्यापक प्रतिक्रियाएं  हुई  और इसी क्रम में श्रीलंका में समाजवादी सरकार के रूप में सीरिमावो भंडारनायके की सरकार आई । भारत इस समय गरीबी हटाओ के अभियान को देश में लागू कर रहा था और श्रीलंका भी समाजवाद को केंद्र में रखकर सामाजिक,आर्थिक विकास की नीतियों में चलने लगा । भविष्य में 1970 में आए तेल संकट के दौर में समाजवादी योजनाएं असफल साबित हुई और राजकोषीय घाटे , राजस्व घाटे और बढ़ते आर्थिक संकट ने  भंडारनायके के स्थान पर राष्ट्रपति  जयवर्धने को श्रीलंका की राजनीति के केंद्र में स्थापित किया और श्रीलंका आर्थिक उदारीकरण,समाजवाद और फिर से आर्थिक उदारीकरण के राह में श्रीलंका आगे बढ़ा। 

 

 

यही वह समय था जब सिंहल -बौद्ध राष्टवाद का जन्म श्रीलंका में होता है। इन्हीं सब परिस्थितियों के आलोक में गृह युद्ध का आरंभ हुआ जो वर्ष 1976 में लिट्टे के  गठन  के साथ वर्ष  1983 तक  अपने चरम पर पहुंचा और  वर्ष 2005 में महिद्रा  राजपक्षे का श्रीलंका की राजनीति में  प्रदार्पण हुआ । 

 

वर्ष 2009 तक श्रीलंका लिट्टे के खिलाफ युद्ध, भ्रष्टाचार , सिंहली -तमिल दंगे आदि  आंतरिक विवादों से जूझता रहा । लिट्टे की मृत्यु के  बाद  राजपक्षे ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ केऔर भारत की जगह व्यवसायिक ऋण का सहारा चीन से लेना शुरू किया । वर्ष 2019 में ईस्टर ब्लास्ट के बाद तो राजपक्षे परिवार को सिंहली पहचान के रूप में पेश किया जाने लगा।  और चीन के साथ नए संबंधों पर कार्य शुरू हुआ |

 

 

बिजली की कमी से जूझते विद्यालय,गिरते स्वास्थ्य स्तर, भोजन,दवाइयों और ईंधन की किल्लत से जूझते श्रीलंका में वर्तमान में 70 प्रतिशत तक महंगाई बढ़ चुकी है । हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए घर पर कब्जा कर लिया है । शिक्षा, स्वास्थ्य और आमदनी के आधार पर देखें तो वर्ष 2020 में श्रीलंका  मानव विकास सूचकांक में 72 वें स्थान पर था जबकि भारत का स्थान 131 था । विश्व बैंक के अनुसार 2020 श्रीलंका की साक्षरता दर लगभग 92 प्रतिशत थी जबकि भारत की 78 प्रतिशत थी । विश्व के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एवं मूलतः भारत से संबन्धित एक अर्थशास्त्री ने तो  एक समय में भारत को इन्हीं आकड़ों के कारण श्रीलंका से पीछे बताया था | ऐसे बुद्धिजीवियों के ही तर्कों और तोड़े मोड़े बयानों के आधार पर श्रीलंका के सामने भारत को रखकर कुछेक बुद्धिजीवी लोग भारत में भी ऐसी स्थिति होने के आंशिक अनुमान कर रहे हैं । ये वहीं लोग हैं जिन्होने  आकड़ों के खेल में विशारद की उपाधि  हासिल की है  लेकिन इन सबके बीच यह ध्यातव्य है कि  भारत इस वर्ष अभी तक 3.5 अरब डॉलर की मदद श्रीलंका को  कर चुका है । यह मदद भोजन , रसद सामग्री के अतिरिक्त  की गयी मदद है | ऊर्जा संकट के बीच भारत की तेल कंपनियाँ श्रीलंका तो तेल भी उपलब्ध करवा रही हैं | 

अगर बात करें श्रीलंका और भारत के तुलनात्मक आर्थिक परिदृश्य की तो हम पाते हैं कि श्रीलंका में  सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के सापेक्ष बैंक ऋण का  अनुपात 100 प्रतिशत  से ऊपर है जबकि भारत में यह लगभग 50 प्रतिशत के आसपास है | किसी भी देश के लिए जीडीपी के सापेक्ष बैंक ऋण  का  59 प्रतिशत से ज्यादा का अनुपात अनूकूल नहीं माना जाता |  अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुसार श्रीलंका का सकल ऋण जीडीपी के प्रतिशत के आधार पर वर्ष 2016 में 79.02 प्रतिशत था जो की वर्ष 2021 में बढ़ाकर 111.42 प्रतिशत हो गया । श्रीलंका का आधे से अधिक ऋण विदेश आधारित है   जबकि भारत का मात्र 3 प्रतिशत के आसपास का ऋण विदेश आधारित है । इन आंकड़ों के आलोक में उन बुद्धिजीवियों से प्रश्न किया जा सकता है जिनको भारत में भविष्य का श्रीलंका नजर आ रहा है । हां यह जरूर है कि  भारत के कुछ राज्यों जैसे पंजाब और पश्चिम बंगाल में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के सापेक्ष ऋण का अनुपात 50 प्रतिशत से ऊपर है | कुछ राज्यों जैसे जम्मू कश्मीर, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश में वित्तीय घाटा 4 प्रतिशत की सीमा को लांघता हुआ नजर आ रहा है लेकिन मजबूत मौद्रिक नीतियों और दूरगामी नीतियों के संरक्षण में हमारा देश आगे बढ़ रहा है और इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए ।

 

 

 

नब्बे के दशक  में भारत के राजकोषीय एवम खाद्यान्न संकट को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने जिन शर्तों के तहत संभाला था उसकी ऊष्मा आज भी महसूस की जा सकती है । यही कारण है कि भारत ने खाद्यान्न सुरक्षा में आज आत्मनिर्भरता ही हासिल नहीं की है बल्कि विश्व के जरूरतमंद  देशों को भी हम आपूर्ति सुनिश्चित कर रहे हैं  ।  खाद्यान्न भंडार में हमने नवीन ऊंचाइयों को छुआ है । भारत ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने की तरफ लगातार प्रयास किए हैं । 

 

 करेंसी स्वैप समझौते के द्वारा  भारत ने पूर्व में ही अपने विदेशी कूटनीति के द्वारा   विश्व के 23 देशों के साथ  भविष्य में हो सकने वाली चुनौतियों को संबोधित किया है तो वहीं  तेल के सामरिक रिजर्व (स्टेटेजिक रिजर्व ) बनाकर  अकस्मात उत्पन्न होने वाली संवेदनशील स्थितियों में   देश की ऊर्जा आवश्यकताओं का भी ख्याल रखा  है ।  हालंकि अभी ऐसे सामरिक भंडारों को बढ़ाए जाने की आज आवश्यकता  है । भारत में वर्तमान में विदेशी मुद्रा भंडार वर्ष 2014 के 322 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर  लगभग 580 बिलयन अमेरिकी डॉलर पहुँच  चुका है  जो कि निर्यात के क्षेत्र में किए जा रहे नवोन्मेषों का ही प्रतिफल है |  दुखद यह है कि वैश्विक मंच में भारत की मजबूत होती साख के इन प्रतीकों के उलट  अखबारों के  संपादकीय लेखों और समाचार चैनलों में भारत  की श्रीलंका जैसी स्थिति होने की संभावनाओं पर विचार मंथन किया जा रहा है |   

 


यह विचार मंथन होना आवश्यक है लेकिन इसके विषय  होने चाहिए कि भाई भतीजावाद, वंशवाद , परिवारवाद के क्या प्रभाव किसी देश की प्रगति में पड़ते हैं और भारत इन सबके बीच कहां खड़ा है । विचारमंथन होना चाहिए की भारत के साथ तमाम समझौतों को  तोड़ने वाले देशों को जरूरत के समय क्यों भारत मदद करता आया है  | विचारमंथन होना चाहिए कि अपने  नीतिगत निर्णयों को कैसे आम जनमानस तक प्रचारित प्रसारित कर जनमानस से सामंजस्य बनाकर कार्य भारत में हों | विचारमंथन होना चाहिए वंशवाद और भ्रस्टाचार को रोकने में आम भारतीय नागरिक की भूमिका पर और ऐसा चिंतन मनन आज वक़्त की मांग है | 

लेखक जय प्रकाश पाण्डेय स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी,  एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।



बुधवार, 13 जुलाई 2022

बदलती सड़कें,बदलते जीवन

 

जय प्रकाश पांडेय


किसी देश के आर्थिक सामाजिक एवं मानवीय विकास में अवसंरचना का महत्वपूर्ण स्थान है । सड़कें इस अवसंरचना का आधारभूत हिस्सा हैं । देश की आर्थिक सामाजिक और मानवीय अवसंरचना के विकासक्रम को सड़कों के विकास से पृथक नहीं देखा जा सकता । इसी आवश्यकता को समझते हुए भारत ने वर्ष 2014 से अभी तक अवसंरचनात्मक विकास के नए स्तर स्पर्श किए हैं । देश के अवसंरचनात्मक विकास में सड़कों के विस्तार विषयक कार्य राष्ट्र विकास में अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध हो रहे हैं इसमें कोई दो राय नहीं । और ऐसे में केंद्रीय परिवहन मंत्री श्री नितिन गडकरी एवम उनकी टीम के द्वारा किए जा रहे नवीन प्रयासों पर चिंतन मनन और उन प्रयासों को वास्तविक धरातल में लाने में हम सबका सहयोग आवश्यक है । ये चिंतन मनन और नवोन्मेषी पहलों पर यदि राज्य सरकारें चिंतन करें तो न केवल अपने प्रदेश की राजधानियों से लेकर जिलों को गड्ढा मुक्त करेंगी साथ ही अपने यहां के निर्वासित जीवन जीने को अभिशप्त ग्रामीणों को भी सड़क से जोड़ सकेंगी। ग्रामीणों का सड़क से जुड़ना देश के सर्वांगीण विकास में सहायक सिद्ध होगा । स्वतंत्र नागरिक समितियों के निर्माण के द्वारा और निजी क्षेत्र के साथ मिलकर राज्य सरकारें इसको संभव कर सकती हैं ।


 पिछले 8 वर्षों में प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर यह बात पूरी जिम्मेदारी से कही जा सकती है कि पूर्वोत्तर भारत, जम्मू कश्मीर,लद्दाख,अरूणांचल,उत्तराखंड और सीमावर्ती जिलों तक सड़क पहुंचाने का,सामरिक महत्व के लिए आवश्यक क्षेत्रों में सड़क पहुंचाने और न केवल सड़क,बल्कि नवीन तकनीक के इस्तेमाल से शानदार सड़क पहुंचाने का कार्य किसी ने किया है तो वह व्यक्तित्व है श्री नितिन गडकरी । वर्ष 2014 में राष्ट्रीय राजमार्ग और अवसंरचना विकास निगम का गठन किया गया । उत्तर पूर्वी राज्यों,उत्तराखंड,जम्मू एवं कश्मीर,लद्दाख और अंडमान निकोबार में इसके माध्यम से राजमार्ग निर्माण संबंधी कदम प्रशंसनीय है। इससे पूर्व यूपीए के समय में वर्ष 2000 से 2014 तक 14 वर्षों में लगभग 27,282 किमी राजमार्गों का विस्तार किया गया । अटल जी के समय में 5 वर्षों में यह विस्तार जहां लगभग 16000 किमी तक किया गया वहीं वर्तमान सरकार द्वारा 4 वर्षों में 2014-2018 की समयावधि में 30,037 किमी के राजमार्ग विस्तार को देखा गया । लगभग 60000 किमी (साठ हजार किमी ) से अधिक के निर्माण कार्य वर्तमान में चल रहे हैं और अभी लगभग 50000 किमी (पचास हजार किमी) के नई घोषणाएं भी हुई हैं ।


हालांकि अपनी परतंत्र मानसिकता और अभिव्यक्ति के लिए शब्दों की कमी को समझते हुए इस नाम और इसके कार्यों पर विमर्श समाज की मुख्यधारा से गायब है । यह भी संभाव्य है कि इसके पीछे भारतीय दर्शन की वह परंपरा है जो मानती आई है -अनुभसत्यम किम प्रमाणं, प्रत्यक्षम किम प्रमाणं!। देश में राष्ट्रीय राजमार्गों के नित नवीन निर्माण से नए भारत की अवसंरचना के सुधारों को आप सभी के प्रत्यक्ष अनुभवों के लिए भी ये राष्ट्रीय राजमार्ग आमंत्रित करते हैं। 


स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही समग्र भारत के लिए सड़कों की आवश्यकता को गंभीरता से लिया गया हो ऐसा प्रतीत नहीं होता । सड़के किसके लिए ? इस सवाल के जवाब अक्सर शहरों तक सीमित रहे और उसमें भी बड़े राज्यों तक। केंद्रीय सचिवालय से चलने वाले हस्ताक्षरों और सत्ता पक्ष के संसद के भाषणों से सड़क संबंधी उपलब्धियां गायब थी और इस बात को समझने में हमें लगभग पूरे 50 साल लग गए की अवसंरचना के विकास क्रम में सड़कों की क्या भूमिका है और राष्ट्रीय एकीकरण में इनका क्या महत्व है । राज्य स्तरों पर कुछेक राज्यों ने इन आवश्यकताओं पर जरूर गौर किया । आर्थिक विकास के क्रम में सड़कों के महत्व को इस दशक में आम भारतीय ने भी समझा है । वोकल फिर लोकल और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं के लिए अवसंरचना का जो खाका तैयार होता है उसमें सड़कें प्रमुख रूप से हैं इस बात को स्वीकार्यता मिली है। 


 स्वतंत्रता प्राप्ति से वर्ष 2014 तक श्री भुवन चंद्र खंडूरी ,श्री टी आर बलू आदि दो नामों को छोड़ दिया जाए तो किसी भी संसद सदस्य को स्थाई कार्यकाल के रूप से इस मंत्रालय की जिम्मेदारी तक नहीं प्राप्त हुई। और इस मंत्रालय में 3 वर्ष से ऊपर का कार्यकाल भारतीय राजनीतिक इतिहास में आज तक उपरोक्त 2 नामों के अतिरिक्त 

श्रीमान नितिन गडकरी का ही है । 

इसे क्या समझा जाए क्या यह मंत्रालय इतना लाभ का पद नहीं था या इतने महत्वपूर्ण मंत्रालय के लिए जिजीविषा हमारे प्रतिनिधियों में नहीं थी ? या फिर आजाद भारत की सबसे बड़ी चुनौती को कोई अपने माथे लेना नहीं चाहता था ।


भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और करोड़ों हिंदुस्तानियों के प्रेरणा पुंज श्री अटल बिहारी वाजपेई जी द्वारा अपने प्रधानमंत्री पद के 5 साल के कार्यकाल के दौरान लगभग 16000 किमी के राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण किया गया । उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री भुवन चंद्र खंडूरी जी की भूमिका इस संबंध में नजरंदाज नहीं की जा सकती । राष्ट्रीय राजमार्ग विकास प्रोजेक्ट को शुरुवात करने वाले अटल जी ने ही पूरे भारत को जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज, चार लेन एवम छह लेन अवधारणा को भारतीय चिंतन पटल के सम्मुख रखा। भारत के ग्रामों को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के भी जरिए जोड़ने का प्रयास अटल जी के ही समय शुरू हुआ हालांकि जनसंख्या को आधार बनाकर बनाई गई सड़कों के जाल से, अभी भी पहाड़ कोसों दूर है । आबादी संबंधी पात्रताएं यहां के वीरान होते गांव पूरी नहीं कर पाते । इसलिए ऐसे कई मामलों के बाद पंचायतों को और नगरपालिकाओं को भी सड़कों को बनाने के लिए राशियां उपलब्ध हुई लेकिन इन राशियों के बाद भी सीमांत पहाड़ी क्षेत्रों में स्थितियां अच्छी नहीं । 

  आदरणीय के गांवों और माननीयों के घर तक पंचायत और नगरपालिका का धन व्यय होना आम बात है ऐसे में गड्ढों की याद किसी को याद आए तो वो है जनता । सामन्यतया पंचायतों या नगरपालिकाओं के भी पास भी सीमित बजट का होना इस समस्या को और बढ़ाता है फिर उसमें से भी प्रभुत्व आधारित बजट की मांग समावेशी विकास में बाधा पहुंचाती है ।



 वर्ष 2014 के बाद अटल जी की अनेक महत्वपूर्ण संकल्पनाओं को अमली जामा पहनते देखना सुखद है । राजमार्गों के एकीकरण और भारत को सड़कों से जोड़ने के क्रम वाले भारत के स्वप्न को पूरा करने का श्रेय भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर पुरुष कहे जाने वाले श्री नितिन गडकरी जी को है इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन क्या कारण है कि इतनी सशक्तता से कार्य कर रही सरकार के बावजूद आज भी गांवों में सड़क न होने से जन, जंगल, जमीन, जानवर सब प्रभावित हैं ? क्या कारण है कि जनसंख्या और सड़कों का अनुपात भी प्रत्येक राज्यों में अलग अलग है? क्या कारण है कि आम जनता की परेशानी फ्लाईओवर या एक्सप्रेस हाईवे नहीं बल्कि तंग सड़कों में पड़े गड्ढे हैं । स्वच्छ भारत मिशन के बाद भी नालियों से सड़क में आते पानी , हर सुबह स्वच्छ वायु से संपर्क करते कूड़े के ढेरों से और कभी टेलीफोन की लाइंस तो कभी स्मार्ट सिटी के तहत लगे समाग्रियों के ढेरों से है । इन बातों पर परिचर्चा के लिए चाय के ढाबों में पाए जाने वाले विद्वत जन और देश में कुछ भी घटित होने के लिए प्रधानमंत्री को दोषी ठहराते लोगों को समझना होगा कि भारत में सड़कों का विभाजन किस प्रकार है । किस सड़क का निर्माण केंद्र स्तर पर होता है और किस स्तर का निर्माण राज्य,ग्राम,जिला स्तर पर । और ऐसी ही जन भागीदारी की आवश्यकता है भारत को जहां नागरिक अपने अधिकार समझें । अपने लिए आने वाली योजनाओं को समझे ,उनके मद में आने वाले धन एवं उसके निर्गमन को समझे। 


 विधायक निधि से सड़कों के निर्माण को तरसती आंखें कभी योजनाओं के पन्नों में झांककर यह देखने का प्रयास ही नहीं करती कि आखिर जिला सड़कों, ग्रामीण सड़कों और शहरी सड़कों का निर्माण करता कौन है । 

अधिकांश राज्यों के पीडब्लूडी विभागों की स्थिति जगजाहिर है । पीडब्लूडी विभागों के कार्य यदि अनुकूल होते तो कम से कम जिला मुख्यालय पहुंचने से पहले भारत में महिलाएं प्रसव से दम न तोड़ती । भारत के 5 -6 राज्यों को छोड़ दिया जाए तो भारत के अधिकांश क्षेत्रों की समस्या जिला सड़कों , ग्रामीण सड़कों और शहरी सड़कों के संबंध में है । 


आधारभूत संरचना के लिए सड़कों का जाल जिस तरह सक्रियता के साथ वर्तमान सरकार द्वारा प्रसार किया जा रहा है ऐसे में समन्वित प्रयास यह होना चाहिए कि,जिला सड़कों , ग्रामीण सड़कों और शहरी सड़कों की दिशा में भी राज्य सरकारें पहल करेंगी । गांवों को भी सड़कों से जोड़कर मुख्यधारा में लाने की पहल हों । पहाड़ों के सीमांत क्षेत्रों में भी मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की लहर सुनाई देगी तो झील झरनों और प्राकृतिक उपहार को भारत के अन्य नागरिक भी महसूस कर पाएंगे । राज्य सरकारों द्वारा राज्य के अंतर्गत आने वाली सड़कों के विकास क्रम को धन की कमी से अवरोधित होने से बचाने के लिए जनभागीदारी,सरकारी संस्थानों द्वारा किए जाने वाले सामाजिक खर्चों को व्यापकता दी जा सकती है । 



गुरुवार, 7 जुलाई 2022

विकसित देश, गिरते स्वास्थ्य विमर्श और पथ प्रदर्शक भारत

विकसित देश, गिरते स्वास्थ्य विमर्श और पथ प्रदर्शक भारत  -जय प्रकाश पाण्डेय 

 

वर्ष 1973 में रो बनाम वेड वाद  के माध्यम से पश्चिमी देशों और विशेषकर अमेरिका में गर्भपात का अधिनियम महिलाओं के लिए व्यापकता से प्रवर्तित हुआ और इस वाद के बाद  अमेरिका में गर्भपात को एक संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई । इस वाद से  गर्भपात को भ्रूण की व्यवहारिकता के बिंदु (जिसके बाद भ्रूण गर्भ से बाहर स्वतंत्र जीवित रह सके ) तक अनुमति दी गई | गत दिनों पूर्व रीपब्लिकन (कट्टरपंथी) बहुमत वाली अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस अधिकार को वापस ले लिया गया | जिस देश को विकास, उदारता, अभिव्यक्ति और अधिकारों के संरक्षण में पथ प्रदर्शक दशकों तक माना गया और न्यायिक  सक्रियता के लिए प्रायः सभी देशों ने जिससे  प्रेरणा ली वहाँ  महिलाओं के गर्भपात के अधिकार की  समाप्ति वाद विवाद और विमर्श को न्यौता तो  देती ही है | 

 

गर्भपात की संवैधानिक सुरक्षा को 9 न्यायाधीशों की बेंच ने 6-3 के निर्णय से समाप्त किया | हैरानी की बात यह है कि 6-3 से समाप्त हुए इस अधिकार को खत्म करने के पक्ष में जिन न्यायाधीशों  ने मतदान किया वह ट्रंप शासनकाल में रिपब्लिकन पार्टी द्वारा ही चयनित  थे | गर्भपात को एक संवैधानिक अधिकार के रूप में इस निर्णय के द्वारा खत्म किया गया है | अब अमेरिका में प्रत्येक राज्य अपने यहाँ गर्भपात संबंधी  कानून बना सकते हैं जो कि सत्तर  के दशक के पूर्व की स्थिति है | 

 

अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट जिसे काफी प्रोग्रेसिव  माना जाता रहा है, उसके हाल ही में दिए गए गर्भपात विरोधी  निर्णय के पीछे विभिन्न पूर्वधारणाएं सामने आ रही हैं |अमेरिका में  गृह युद्धों के समय  भी गर्भपात के खिलाफ चलाए गए अभियानों  में ईसाई धर्मसमूहों की भूमिका रही है जिनकी धार्मिक मान्यता है कि गर्भधारण के साथ ही जीवन की शुरुवात होती है और ऐसे में अजन्मे व्यक्ति के भी अधिकारों का संरक्षण आवश्यक है । और यही कारण है कि इस समयावधि में  निजी मानवीय अधिकारों के ऊपर सामुदायिक एवम धार्मिक विचारों को तरजीह दी गई । और गर्भपात संबंधी अधिकारों को निरस्त कर दिया गया और इसे गैर कानूनी घोषित किया गया ।

 

आज कहीं ईसाई धर्म में जीवन की परिभाषा के आधार पर तो कहीं अमेरिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका के व्यापक प्रभुत्व के संबंध में तो कहीं रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स की विचारधारा संघर्ष के रूप में , 

रूस अमेरिकी विवाद के बाद अमेरिका एक बार पुनः चर्चा का केंद्र बना हुआ है | 

 

यहां या ध्यातव्य है कि भारत के संविधान निर्माताओं ने दूरदर्शिता के आधार पर कार्यपालिका से स्वतंत्र न्यायपालिका का अस्तित्व संविधान में स्थापित किया |आजादी के समय हमारे नीति नियंताओं ने केवल सामाजिक आवश्यकताओं से ही नहीं बल्कि धार्मिक सांस्कृतिक परम्पराओं  के भी विभिन्न पहलुओं पर विषद चिंतन मनन को ध्यान में रखकर संविधान सृजन किया और महिलाओं के विकासोन्मुख अधिकारों को देश को सौंपा |  साथ ही संविधान का इस स्तर  पर सृजन  किया कि भविष्य में सुधार की गुंजाइश बाकी रहे तथा कार्यपालिका अपने प्रभुत्व को संविधान के ऊपर स्थापित करने की कोशिश न करे | एनजेएसी एक्ट की असंवैधानिकता को इससे जोडके देखा जा सकता है जिसमें न्यायिक सक्रियता यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा नहीं दिखती तो भारत में भी कार्यपालिका का प्रभुत्व न्यायपालिका के ऊपर बढ़ता और अमेरिका जैसे निर्णय हमारे सामने भी  दिख सकते थे ।

 

वर्ष 2018 में अमेरिका में मिसीसिपी कानून रिपब्लिकन बहुमत विधायिका द्वारा लिया गया जिसके अंतर्गत 15 सप्ताह के बाद गर्भपात पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा की गई थी।  इसी के साथ ही हृदय स्पंदन आधारित गर्भपात कानून भी इसी समय सीमा के भीतर लाया गया जिसके अंतर्गत भूमि के हृदय गतिविधि का पता चलने के बाद गर्भपात पर प्रतिबंध लगाया गया हालांकि दोनों कानूनों को अंतिम रूप से सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किया गया । वर्तमान गर्भपात विरोधी कानून उपरोक्त दोनों कानूनों के ही एक चरण को ही दिखाते हैं। 

रिपब्लिकन  और डेमोक्रेट्स  के बीच विभाजन और सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट रिपब्लिकन बहुमत को वर्तमान अमेरिकी निर्णय के पीछे प्रमुखता से  देखा जा सकता है |

 

सविता हलप्पनावर का नाम इस संदर्भ में समचीन है | भारतीय मूल की आयरलैंड निवासी दंत चिकित्सक जिन्होंने गर्भधारण के 17 वें सफ़्ताह  स्वास्थ्य कारणों से गर्भपात की अनुमति मांगी थी लेकिन इस आधुनिक विकसित राष्ट्र ने स्वीकृति प्रदान नहीं की और मात्र 31 वर्ष में कैथोलिक मान्यताओं और  आयरलैंड के नियमों के चलते हम इन्हें बचा नहीं पाए |

 

सवाल यह है कि वैश्विक मंचों में कब महिलाओं के अधिकार और दैहिक प्राण व स्वतंत्रता के अधिकारों को अमलीजामा पहनाया जाएगा | आप सोच सकते हैं वह स्थिति जहां बलात्कार पीड़िता के गर्भ में बलात्कार  का प्रतिफल हो | क्या यह मानसिक सुख प्रदान करने वाली स्थिति है या संत्रास वाली  यह विचारणीय बिंदु है |  कल्पना करें  जब हम को ज्ञात हो जन्म लेने वाला शिशु गंभीर बीमारियों से ग्रसित है और आपको कानून विवश कर दें ऐसे जन्म के लिए | क्या यह उस मां को आत्मिक शांति देगा या उसके मानवीय स्वास्थ्य को भी प्रभावित करेगा।?

 

दरअसल 70 वें दशक में सम्पूर्ण विश्व में इतनी ज्यादा प्रौद्योगिकी चिकित्सकीय क्षेत्र में उपलब्ध नहीं थी जो एक भ्रूण के विषय में उसके लिंग से लेकर रोगों की स्थिति को समझा पाये | प्रौद्योगिकी विकास एवं सामाजिक परिवर्तन के साथ हमें आधुनिक प्रौद्योगिकी के आलोक में स्वस्थ्य चर्चायेँ वैश्विक मंचों में करने की आवश्यकता है | भारत इस संदर्भ में वैश्विक जगत के सम्मुख पथ प्रदर्शक की भूमिका निभा सकता है | 

 

 

आजाद भारत ने शांतिलाल समिति की अनुशंसा पर 1964 में गर्भपात को कानूनी मान्यता देने का प्रथम प्रयास किया | गर्भ के चिकित्सकीय समापन अधिनियम 1971 (मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी संशोधन अधिनियम)  1971 के द्वारा इस स्तर पर प्रयास हुए हालांकि तब भी इसे  आत्यंतिक अधिकार के रूप में नहीं देखा गया | महिलाओं को गर्भपात के संबंध में स्वायत्तता भी इस अधिनियम द्वारा प्रदान नहीं की गयी  थी |  कुछेक पूर्व निर्धारित स्थितियों में ही गर्भपात की अनुमति प्रदत्त थी |  वर्ष 2002 में इस अधिनियम में कुछ आंशिक सुधार किए गए जिसमें से ऑपरेशन के लिए स्थलों का चिन्हिकरण उनकी  मान्यता  और चिकित्सकीय मापदण्डों  एवं कुछ दवाओं का समावेश इसमें शामिल था |

 

  वर्ष 2021 के सुधार अधिनियम ने पहली बार मानवीय सामाजिक दशा में भी गर्भपात की अवधारणा को व्यापक रूप से सम्मिलित किया और इस अधिनियम को और भी समसामयिक और दूरदर्शी बनाया | महिलाओं की स्वीकृति को ही प्रमुखता देना, गर्भपात हेतु गर्भधारण की सीमा 20 सप्ताह से 24 सप्ताह करना, तथा विशेष चिकित्सकीय परिस्थितियों जैसे भ्रूण की अक्षमता आदि में ऊपरी सीमा को खत्म करना प्रगतिशील अधिनियम को दिखाता है | अन्य सकारात्मक लाभों की बात करें तो केवल विवाहित महिला ही नहीं अविवाहित महिला को भी गर्भपात का यह अधिकार दिया गया है ।पुराने प्रावधानों के तहत जहां 20 सफ्ताह तक प्रेगनेंसी के निर्णय के लिए 2 चिकित्सको की सलाह अनिवार्य थी इस संशोधित अधिनियम द्वारा ऐसे चिकित्सकीय विमर्श को   केवल 20 से 24 हफ्तों वाले मामलों के लिए कर दिया गया है । 20 सप्ताह तक गर्भपात हेतु 1 चिकित्सक की सलाह पर्याप्त मानी गई । इससे दो डॉक्टरों तक पहुंच सुनिश्चित करने के दौरान हुई देरी,सामाजिक वंचना आदि से बचने में सहायता प्राप्त होगी । इसके तहत प्रथम बार यौन हमले या बलात्संग या कौटुम्बिक व्यभिचार के उत्तरजीवी, अल्पवय,गर्भावस्था के दौरान वैवाहिक प्रांस्थिति में परिवर्तन (वैधव्य या विवाह विच्छेद); शारीरिक अक्षमताओं वाली स्त्रियां,.मानसिक रूप से रुग्ण स्त्री ( मानसिक मन्दता सहित)  ,भ्रूणीय विकृति एवं  मानवीय स्थितियों या आपदा या आकस्मिकता की परिस्थितियों में गर्भावस्था वाली महिलाओं को भी  शामिल किया गया | 

 

अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के विपरीत भारत में सर्वोच्च न्यायालय एवम उच्च न्यायालयों द्वारा इस संदर्भ में दिए गए निर्णयों पर भी गौर करेंगे तो हम पाते हैं भारतीय न्यायालयों ने मानवीय अधिकारों के आलोक में विभिन्न निर्णय दिए हैं जो भारत की सशक्त और दूरगामी स्वतंत्र न्यायपालिका के आदर्श को विश्व के सामने रखने में सक्षम हैं ।

 

सुचिता श्रीवास्तव के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट का मत रहा  कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है उसके अंतर्गत   प्रजनन  संबंध   विकल्प के अधिकार भी सम्मिलित है यह इस अनुच्छेद का व्यापक  आयाम है ।

 

सुप्रीम कोर्ट के हालिया के एस पुट्टस्वामी मामले में, नौ-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा  सर्वसम्मति से संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में निजता के अधिकार की पुष्टि की । इसमें सुचिता श्रीवास्तव के मामले के निर्णय को दोहराया गया और माना गया कि महिला का गर्भपात संबंधी अधिकार  निजता के अधिकार के दायरे में आता है और इसलिए उसके सभी प्रजनन अधिकार राज्य द्वारा सुनिश्चित किए जाने चाहिए। इस प्रकार, अदालतों द्वारा यह स्थापित किया गया है कि गर्भपात का महिला का अधिकार मौलिक अधिकार है ।

हाल ही में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के 16 वर्षीय बलात्कार पीड़िता के 28 हफ्ते से ऊपर के भ्रूण को समाप्त करने की प्रार्थना को न्यायालय ने स्वीकृत किया गया और मेडिकल बोर्ड की अनुशंसा के विपरीत यह माना कि यदि इस इस पीड़िता को गर्भपात की अनुमति  नहीं दी गई तो यह  मानवीय गरिमा से जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन होगा ।

 

वर्ष 2017 में उच्चतम न्यायालय ने 13 वर्ष की बलात्कार पीड़ित बालिका को 31 सफ्ताह के भ्रूण के गर्भपात की अनुमति प्रदान की । भारत के तत्कालीन उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा ने यह स्पष्ट किया है जिस मानसिक अवसाद की स्थिति से वह बच्ची गुजर रही है ऐसे में गर्भपात की अनुमति आवश्यक है । 

 

उपरोक्त दोनों मामलों में चिकित्सकीय बोर्ड में गर्भपात की अनुशंसा नहीं की थी बल्कि गर्भपात से जीवन को नुकसान होने की संभावना पर बाल दिया गया था लेकिन उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के ये निर्णय प्रगतिशील भारत के प्रगतिशील कानूनों और उनके पीछे उन कानूनों को घोषित करने वाले दूरगामी बुद्धिजीवियों की मंशा को सामने रखते हैं ।

हालांकि भारत में अभी भी जानकारियों के अभाव के चलते और  सामाजिक जागरूकता की कमी के चलते यह सामान्य अवधारणा है कि गर्भपात कानूनी नहीं है | अभी भी सामजिक लोक लाज एवं कानूनी जानकारी के अभाव में संस्थागत गर्भपात नहीं कराये जाते हैं  | इस संदर्भ में व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है | भारत में कानूनी दृष्टिकोण से महिला को मानसिक रूप से स्वथ्य होने पर गर्भपात हेतु न ही पति,न ही पार्टनर और न ही परिवार की स्वीकृति की आवश्यकता है इसके बाद भी महिलाओं को अनेकों बाधाओं का सामना करना पड़ता है । पितृसत्तात्मक समाज के ताने बाने के बीच स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा महिलाओं से उनके पति या परिवार की स्वीकृति गर्भपात के लिए मांगना और कभी कभी उनकी निजता को भंग करके पहचान सार्वजनिक करना ये बुनियादी विमर्श के बिंदु हैं ।सेक्स वर्कर्स, एचआईवी पॉजिटिव महिला , एकल महिलाओं और अविवाहित युवाओं के लिए तो यह पहुंच और भी बाधाओं से भरी है ।

 

 

संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या कोष के रिपोर्ट के अनुसार विश्व में होने वाले गर्भपातों  में से लगभग 45% सुरक्षित तरीकों के कारण होते हैं जो कि मातृत्व मृत्यु दर का प्रमुख कारण भी है | संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रिपोर्ट 2022 के अनुसार वर्ष 2007-2011 में 67 प्रतिशत गर्भपात के मामलों को असुरक्षित गर्भपात की श्रेणी में रखा गया । इसी रिपोर्ट में आगे बताया गया है की भारत में 15-19 आयु वर्ग में गर्भपात के कारण होने वाली मृत्यु की ज्यादा संभावना है जबकि कानूनन यह बाल विवाह की श्रेणी में आयेगा लेकिन ऐसी वैश्विक रिपोर्ट जमीनी सच्चाई भी बताती हैं और भारत में अभी भी बाल विवाह का होना गुपचुप तरीके से जारी है इसमें कोई शक नहीं है । 

 

भारत की लगभग 65% जनसंख्या देश के ग्रामीण इलाकों में निवास करती है|  यहां अभी भी स्त्री व प्रसूति रोग विशेषज्ञ की कमी बनी रहती है ऐसे में परिणामतः  संवेदनशील प्रक्रियाओं का सहायक स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा  किया जाना स्वाभाविक है है | आज भी ग्रामीण भारत में पहाड़ों के दुर्गम क्षेत्रों में डॉक्टर्स की भारी किल्लत से हम जूझ रहे हैं और उसमें भी स्पेशलिस्ट ( विशेषज्ञ ) डॉक्टर्स का तो पूछिए ही मत । भारत में डॉक्टर्स और जनसंख्या का अनुपात विश्व स्वास्थ्य संगठन के लक्ष्य के नजदीक है लेकिन मात्र एमबीबीएस ही नहीं हमें विशेषज्ञ डॉक्टरों के संबंध में इस अनुपात को बढ़ाए जाने की आवश्यकता है । जब तक देश में मेडिकल पीजी के लिए सीटों की संख्या बढ़ाई नहीं जाएगी तब तक जमीनी स्तर में हम स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुंचा पाएंगे इसमें शक किया जा सकता है । उत्तराखंड के अधिकांश गांवों में जहां विशेषज्ञों की कमी है तो वहीं पूर्वोत्तर भारत में भी यही स्थिति है । वहीं दिल्ली जैसे स्थानों  में मल्टी स्पेशलिटी अस्पतालों ने इन कमियों को दूर करने की कोशिश की जरूर है लेकिन जेब के खर्चे को बढ़ाकर । 

हमें यह समझने की आवश्यकता है कि हमारी जनसंख्या को कितने सामान्य चिकित्सक और कितने विशेषज्ञों की आवश्यकता है । मसलन कई ऐसे राज्य हैं जहां स्नातकोत्तर चिकित्सा में दोहरे अंक में सीटें हैं और कुछ ऐसे राज्य भी हैं जहां यह संख्या मात्र एक अंक तक सीमित है ।इस असमानता को कम किए जाने की आवश्यकता है ।  इस संबंध में किसी  योजना को बनाने से पहले जमीनी स्तर पर कार्य कर दे चिकित्सकों से संवाद आवश्यक है जिसकी अभी कमी दिखाई देती है ।

 

भारत में मातृत्व मृत्य दर 113 है जो कि क्रमिक रूप से कमी की तरफ ही आगे बढ़ रही है । वर्ष 2014-2016 में यह 130 थी जो कि 2015-2017 में 113 तक आ गई है । यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य की और ध्यान देना आवश्यक है कि अधिकांश अफ्रीकी एवम एशियाई देशों में उच्च मातृत्व मृत्यु दर बनी हुई है । भारत के पड़ोसी राज्यों की बात करें तो श्रीलंका और चीन को छोड़कर शेष सभी राष्ट्र भारत से क्रम में नीचे हैं । 

 

 

समावेशी विकास लक्ष्यों के तहत वर्ष 2030 तक वैश्विक मातृत्व मृत्यु दर को प्रति 1 लाख जीवित में 70 से भी कम तक लाने का लक्ष्य है 

 भारत इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है इसमें कोई दो राय नहीं है । वर्तमान में सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में भी जिस तरह क्रमिकता से बजटीय मदद को बढ़ाया गया है वो ध्यान आकृष्ट करता है । वर्ष 2017-2018  में आवंटित 47353 करोड़ रूपये के मुकाबले वर्तमान वर्ष में 83000 करोड़ रुपए आवंटित होना हमारे धीरे धीरे बढ़ते मजबूत कदमों को दिखाता है ।

लेकिन भारत समेत विश्व के अन्य विकाशसील देशों की एक और प्रमुख समस्या है और वह है असुरक्षित गर्भपात के कारण होने वाली मृत्यु के आंकड़ों की असंगति । और यही प्रमुख समस्या भी है कि भले ही सतत विकास लक्ष्य के तहत मातृत्व मृत्य दर को वांछित रूप से लक्षित करके हासिल भी कर लिया जायेगा लेकिन उन मामलों का क्या को आज भी किसी रजिस्टर में प्रविष्टि नहीं पाते ।

 

वस्तुतः विगत वर्षों में भारत द्वारा सामाजिक उत्थान, पर्यावरणीय विकास और मानव अधिकारों के क्षेत्र में और सतत समावेशी विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जितने भी प्रयास किए जा रहे हैं वो अनुकरणीय है । संवैधानिक संशोधनों की बात हो न्यायिक सक्रियता की या फिर स्वतंत्र न्यायपालिका की, भारत के कदम विश्व के तमाम देशों के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका निभा सकते हैं ।  महिलाओं के मातृत्व से जुड़े विषयों को उनके नैसर्गिक अधिकार की तरह देखता भारत रिपब्लिकन-डेमोक्रेट्स विचारधाराओं,धार्मिक परंपराओं ,कार्यपालिका की न्यायपालिका में दखलंदाजी के बीच फंसते जा रहे अमेरिका के लिए प्रेरणा पुंज है जहां समाज के अंतिम वर्ग के लिए निस्वार्थ लगे हुए प्रेरक व्यक्तित्व को देश के सर्वोच्च पद की तरफ बढ़ते हुए देखा जा रहा है ।  

 

 

जय प्रकाश पाण्डेय 

लेखक  पंजाब नेशनल बैंक में पूर्व अधिकारी तथा 

किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में  स्वतंत्र लेखक, टिप्पणीकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं ।

 

 

अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

  युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र   की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है   । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोल...