विकसित देश, गिरते स्वास्थ्य विमर्श और पथ प्रदर्शक भारत -जय प्रकाश पाण्डेय
वर्ष 1973 में रो बनाम वेड वाद के माध्यम से पश्चिमी देशों और विशेषकर अमेरिका में गर्भपात का अधिनियम महिलाओं के लिए व्यापकता से प्रवर्तित हुआ और इस वाद के बाद अमेरिका में गर्भपात को एक संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई । इस वाद से गर्भपात को भ्रूण की व्यवहारिकता के बिंदु (जिसके बाद भ्रूण गर्भ से बाहर स्वतंत्र जीवित रह सके ) तक अनुमति दी गई | गत दिनों पूर्व रीपब्लिकन (कट्टरपंथी) बहुमत वाली अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस अधिकार को वापस ले लिया गया | जिस देश को विकास, उदारता, अभिव्यक्ति और अधिकारों के संरक्षण में पथ प्रदर्शक दशकों तक माना गया और न्यायिक सक्रियता के लिए प्रायः सभी देशों ने जिससे प्रेरणा ली वहाँ महिलाओं के गर्भपात के अधिकार की समाप्ति वाद विवाद और विमर्श को न्यौता तो देती ही है |
गर्भपात की संवैधानिक सुरक्षा को 9 न्यायाधीशों की बेंच ने 6-3 के निर्णय से समाप्त किया | हैरानी की बात यह है कि 6-3 से समाप्त हुए इस अधिकार को खत्म करने के पक्ष में जिन न्यायाधीशों ने मतदान किया वह ट्रंप शासनकाल में रिपब्लिकन पार्टी द्वारा ही चयनित थे | गर्भपात को एक संवैधानिक अधिकार के रूप में इस निर्णय के द्वारा खत्म किया गया है | अब अमेरिका में प्रत्येक राज्य अपने यहाँ गर्भपात संबंधी कानून बना सकते हैं जो कि सत्तर के दशक के पूर्व की स्थिति है |
अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट जिसे काफी प्रोग्रेसिव माना जाता रहा है, उसके हाल ही में दिए गए गर्भपात विरोधी निर्णय के पीछे विभिन्न पूर्वधारणाएं सामने आ रही हैं |अमेरिका में गृह युद्धों के समय भी गर्भपात के खिलाफ चलाए गए अभियानों में ईसाई धर्मसमूहों की भूमिका रही है जिनकी धार्मिक मान्यता है कि गर्भधारण के साथ ही जीवन की शुरुवात होती है और ऐसे में अजन्मे व्यक्ति के भी अधिकारों का संरक्षण आवश्यक है । और यही कारण है कि इस समयावधि में निजी मानवीय अधिकारों के ऊपर सामुदायिक एवम धार्मिक विचारों को तरजीह दी गई । और गर्भपात संबंधी अधिकारों को निरस्त कर दिया गया और इसे गैर कानूनी घोषित किया गया ।
आज कहीं ईसाई धर्म में जीवन की परिभाषा के आधार पर तो कहीं अमेरिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका के व्यापक प्रभुत्व के संबंध में तो कहीं रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स की विचारधारा संघर्ष के रूप में ,
रूस अमेरिकी विवाद के बाद अमेरिका एक बार पुनः चर्चा का केंद्र बना हुआ है |
यहां या ध्यातव्य है कि भारत के संविधान निर्माताओं ने दूरदर्शिता के आधार पर कार्यपालिका से स्वतंत्र न्यायपालिका का अस्तित्व संविधान में स्थापित किया |आजादी के समय हमारे नीति नियंताओं ने केवल सामाजिक आवश्यकताओं से ही नहीं बल्कि धार्मिक सांस्कृतिक परम्पराओं के भी विभिन्न पहलुओं पर विषद चिंतन मनन को ध्यान में रखकर संविधान सृजन किया और महिलाओं के विकासोन्मुख अधिकारों को देश को सौंपा | साथ ही संविधान का इस स्तर पर सृजन किया कि भविष्य में सुधार की गुंजाइश बाकी रहे तथा कार्यपालिका अपने प्रभुत्व को संविधान के ऊपर स्थापित करने की कोशिश न करे | एनजेएसी एक्ट की असंवैधानिकता को इससे जोडके देखा जा सकता है जिसमें न्यायिक सक्रियता यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा नहीं दिखती तो भारत में भी कार्यपालिका का प्रभुत्व न्यायपालिका के ऊपर बढ़ता और अमेरिका जैसे निर्णय हमारे सामने भी दिख सकते थे ।
वर्ष 2018 में अमेरिका में मिसीसिपी कानून रिपब्लिकन बहुमत विधायिका द्वारा लिया गया जिसके अंतर्गत 15 सप्ताह के बाद गर्भपात पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा की गई थी। इसी के साथ ही हृदय स्पंदन आधारित गर्भपात कानून भी इसी समय सीमा के भीतर लाया गया जिसके अंतर्गत भूमि के हृदय गतिविधि का पता चलने के बाद गर्भपात पर प्रतिबंध लगाया गया हालांकि दोनों कानूनों को अंतिम रूप से सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किया गया । वर्तमान गर्भपात विरोधी कानून उपरोक्त दोनों कानूनों के ही एक चरण को ही दिखाते हैं।
रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स के बीच विभाजन और सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट रिपब्लिकन बहुमत को वर्तमान अमेरिकी निर्णय के पीछे प्रमुखता से देखा जा सकता है |
सविता हलप्पनावर का नाम इस संदर्भ में समचीन है | भारतीय मूल की आयरलैंड निवासी दंत चिकित्सक जिन्होंने गर्भधारण के 17 वें सफ़्ताह स्वास्थ्य कारणों से गर्भपात की अनुमति मांगी थी लेकिन इस आधुनिक विकसित राष्ट्र ने स्वीकृति प्रदान नहीं की और मात्र 31 वर्ष में कैथोलिक मान्यताओं और आयरलैंड के नियमों के चलते हम इन्हें बचा नहीं पाए |
सवाल यह है कि वैश्विक मंचों में कब महिलाओं के अधिकार और दैहिक प्राण व स्वतंत्रता के अधिकारों को अमलीजामा पहनाया जाएगा | आप सोच सकते हैं वह स्थिति जहां बलात्कार पीड़िता के गर्भ में बलात्कार का प्रतिफल हो | क्या यह मानसिक सुख प्रदान करने वाली स्थिति है या संत्रास वाली यह विचारणीय बिंदु है | कल्पना करें जब हम को ज्ञात हो जन्म लेने वाला शिशु गंभीर बीमारियों से ग्रसित है और आपको कानून विवश कर दें ऐसे जन्म के लिए | क्या यह उस मां को आत्मिक शांति देगा या उसके मानवीय स्वास्थ्य को भी प्रभावित करेगा।?
दरअसल 70 वें दशक में सम्पूर्ण विश्व में इतनी ज्यादा प्रौद्योगिकी चिकित्सकीय क्षेत्र में उपलब्ध नहीं थी जो एक भ्रूण के विषय में उसके लिंग से लेकर रोगों की स्थिति को समझा पाये | प्रौद्योगिकी विकास एवं सामाजिक परिवर्तन के साथ हमें आधुनिक प्रौद्योगिकी के आलोक में स्वस्थ्य चर्चायेँ वैश्विक मंचों में करने की आवश्यकता है | भारत इस संदर्भ में वैश्विक जगत के सम्मुख पथ प्रदर्शक की भूमिका निभा सकता है |
आजाद भारत ने शांतिलाल समिति की अनुशंसा पर 1964 में गर्भपात को कानूनी मान्यता देने का प्रथम प्रयास किया | गर्भ के चिकित्सकीय समापन अधिनियम 1971 (मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी संशोधन अधिनियम) 1971 के द्वारा इस स्तर पर प्रयास हुए हालांकि तब भी इसे आत्यंतिक अधिकार के रूप में नहीं देखा गया | महिलाओं को गर्भपात के संबंध में स्वायत्तता भी इस अधिनियम द्वारा प्रदान नहीं की गयी थी | कुछेक पूर्व निर्धारित स्थितियों में ही गर्भपात की अनुमति प्रदत्त थी | वर्ष 2002 में इस अधिनियम में कुछ आंशिक सुधार किए गए जिसमें से ऑपरेशन के लिए स्थलों का चिन्हिकरण उनकी मान्यता और चिकित्सकीय मापदण्डों एवं कुछ दवाओं का समावेश इसमें शामिल था |
वर्ष 2021 के सुधार अधिनियम ने पहली बार मानवीय सामाजिक दशा में भी गर्भपात की अवधारणा को व्यापक रूप से सम्मिलित किया और इस अधिनियम को और भी समसामयिक और दूरदर्शी बनाया | महिलाओं की स्वीकृति को ही प्रमुखता देना, गर्भपात हेतु गर्भधारण की सीमा 20 सप्ताह से 24 सप्ताह करना, तथा विशेष चिकित्सकीय परिस्थितियों जैसे भ्रूण की अक्षमता आदि में ऊपरी सीमा को खत्म करना प्रगतिशील अधिनियम को दिखाता है | अन्य सकारात्मक लाभों की बात करें तो केवल विवाहित महिला ही नहीं अविवाहित महिला को भी गर्भपात का यह अधिकार दिया गया है ।पुराने प्रावधानों के तहत जहां 20 सफ्ताह तक प्रेगनेंसी के निर्णय के लिए 2 चिकित्सको की सलाह अनिवार्य थी इस संशोधित अधिनियम द्वारा ऐसे चिकित्सकीय विमर्श को केवल 20 से 24 हफ्तों वाले मामलों के लिए कर दिया गया है । 20 सप्ताह तक गर्भपात हेतु 1 चिकित्सक की सलाह पर्याप्त मानी गई । इससे दो डॉक्टरों तक पहुंच सुनिश्चित करने के दौरान हुई देरी,सामाजिक वंचना आदि से बचने में सहायता प्राप्त होगी । इसके तहत प्रथम बार यौन हमले या बलात्संग या कौटुम्बिक व्यभिचार के उत्तरजीवी, अल्पवय,गर्भावस्था के दौरान वैवाहिक प्रांस्थिति में परिवर्तन (वैधव्य या विवाह विच्छेद); शारीरिक अक्षमताओं वाली स्त्रियां,.मानसिक रूप से रुग्ण स्त्री ( मानसिक मन्दता सहित) ,भ्रूणीय विकृति एवं मानवीय स्थितियों या आपदा या आकस्मिकता की परिस्थितियों में गर्भावस्था वाली महिलाओं को भी शामिल किया गया |
अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के विपरीत भारत में सर्वोच्च न्यायालय एवम उच्च न्यायालयों द्वारा इस संदर्भ में दिए गए निर्णयों पर भी गौर करेंगे तो हम पाते हैं भारतीय न्यायालयों ने मानवीय अधिकारों के आलोक में विभिन्न निर्णय दिए हैं जो भारत की सशक्त और दूरगामी स्वतंत्र न्यायपालिका के आदर्श को विश्व के सामने रखने में सक्षम हैं ।
सुचिता श्रीवास्तव के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट का मत रहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है उसके अंतर्गत प्रजनन संबंध विकल्प के अधिकार भी सम्मिलित है यह इस अनुच्छेद का व्यापक आयाम है ।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया के एस पुट्टस्वामी मामले में, नौ-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सर्वसम्मति से संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में निजता के अधिकार की पुष्टि की । इसमें सुचिता श्रीवास्तव के मामले के निर्णय को दोहराया गया और माना गया कि महिला का गर्भपात संबंधी अधिकार निजता के अधिकार के दायरे में आता है और इसलिए उसके सभी प्रजनन अधिकार राज्य द्वारा सुनिश्चित किए जाने चाहिए। इस प्रकार, अदालतों द्वारा यह स्थापित किया गया है कि गर्भपात का महिला का अधिकार मौलिक अधिकार है ।
हाल ही में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के 16 वर्षीय बलात्कार पीड़िता के 28 हफ्ते से ऊपर के भ्रूण को समाप्त करने की प्रार्थना को न्यायालय ने स्वीकृत किया गया और मेडिकल बोर्ड की अनुशंसा के विपरीत यह माना कि यदि इस इस पीड़िता को गर्भपात की अनुमति नहीं दी गई तो यह मानवीय गरिमा से जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन होगा ।
वर्ष 2017 में उच्चतम न्यायालय ने 13 वर्ष की बलात्कार पीड़ित बालिका को 31 सफ्ताह के भ्रूण के गर्भपात की अनुमति प्रदान की । भारत के तत्कालीन उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा ने यह स्पष्ट किया है जिस मानसिक अवसाद की स्थिति से वह बच्ची गुजर रही है ऐसे में गर्भपात की अनुमति आवश्यक है ।
उपरोक्त दोनों मामलों में चिकित्सकीय बोर्ड में गर्भपात की अनुशंसा नहीं की थी बल्कि गर्भपात से जीवन को नुकसान होने की संभावना पर बाल दिया गया था लेकिन उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के ये निर्णय प्रगतिशील भारत के प्रगतिशील कानूनों और उनके पीछे उन कानूनों को घोषित करने वाले दूरगामी बुद्धिजीवियों की मंशा को सामने रखते हैं ।
हालांकि भारत में अभी भी जानकारियों के अभाव के चलते और सामाजिक जागरूकता की कमी के चलते यह सामान्य अवधारणा है कि गर्भपात कानूनी नहीं है | अभी भी सामजिक लोक लाज एवं कानूनी जानकारी के अभाव में संस्थागत गर्भपात नहीं कराये जाते हैं | इस संदर्भ में व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है | भारत में कानूनी दृष्टिकोण से महिला को मानसिक रूप से स्वथ्य होने पर गर्भपात हेतु न ही पति,न ही पार्टनर और न ही परिवार की स्वीकृति की आवश्यकता है इसके बाद भी महिलाओं को अनेकों बाधाओं का सामना करना पड़ता है । पितृसत्तात्मक समाज के ताने बाने के बीच स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा महिलाओं से उनके पति या परिवार की स्वीकृति गर्भपात के लिए मांगना और कभी कभी उनकी निजता को भंग करके पहचान सार्वजनिक करना ये बुनियादी विमर्श के बिंदु हैं ।सेक्स वर्कर्स, एचआईवी पॉजिटिव महिला , एकल महिलाओं और अविवाहित युवाओं के लिए तो यह पहुंच और भी बाधाओं से भरी है ।
संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या कोष के रिपोर्ट के अनुसार विश्व में होने वाले गर्भपातों में से लगभग 45% सुरक्षित तरीकों के कारण होते हैं जो कि मातृत्व मृत्यु दर का प्रमुख कारण भी है | संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रिपोर्ट 2022 के अनुसार वर्ष 2007-2011 में 67 प्रतिशत गर्भपात के मामलों को असुरक्षित गर्भपात की श्रेणी में रखा गया । इसी रिपोर्ट में आगे बताया गया है की भारत में 15-19 आयु वर्ग में गर्भपात के कारण होने वाली मृत्यु की ज्यादा संभावना है जबकि कानूनन यह बाल विवाह की श्रेणी में आयेगा लेकिन ऐसी वैश्विक रिपोर्ट जमीनी सच्चाई भी बताती हैं और भारत में अभी भी बाल विवाह का होना गुपचुप तरीके से जारी है इसमें कोई शक नहीं है ।
भारत की लगभग 65% जनसंख्या देश के ग्रामीण इलाकों में निवास करती है| यहां अभी भी स्त्री व प्रसूति रोग विशेषज्ञ की कमी बनी रहती है ऐसे में परिणामतः संवेदनशील प्रक्रियाओं का सहायक स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा किया जाना स्वाभाविक है है | आज भी ग्रामीण भारत में पहाड़ों के दुर्गम क्षेत्रों में डॉक्टर्स की भारी किल्लत से हम जूझ रहे हैं और उसमें भी स्पेशलिस्ट ( विशेषज्ञ ) डॉक्टर्स का तो पूछिए ही मत । भारत में डॉक्टर्स और जनसंख्या का अनुपात विश्व स्वास्थ्य संगठन के लक्ष्य के नजदीक है लेकिन मात्र एमबीबीएस ही नहीं हमें विशेषज्ञ डॉक्टरों के संबंध में इस अनुपात को बढ़ाए जाने की आवश्यकता है । जब तक देश में मेडिकल पीजी के लिए सीटों की संख्या बढ़ाई नहीं जाएगी तब तक जमीनी स्तर में हम स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुंचा पाएंगे इसमें शक किया जा सकता है । उत्तराखंड के अधिकांश गांवों में जहां विशेषज्ञों की कमी है तो वहीं पूर्वोत्तर भारत में भी यही स्थिति है । वहीं दिल्ली जैसे स्थानों में मल्टी स्पेशलिटी अस्पतालों ने इन कमियों को दूर करने की कोशिश की जरूर है लेकिन जेब के खर्चे को बढ़ाकर ।
हमें यह समझने की आवश्यकता है कि हमारी जनसंख्या को कितने सामान्य चिकित्सक और कितने विशेषज्ञों की आवश्यकता है । मसलन कई ऐसे राज्य हैं जहां स्नातकोत्तर चिकित्सा में दोहरे अंक में सीटें हैं और कुछ ऐसे राज्य भी हैं जहां यह संख्या मात्र एक अंक तक सीमित है ।इस असमानता को कम किए जाने की आवश्यकता है । इस संबंध में किसी योजना को बनाने से पहले जमीनी स्तर पर कार्य कर दे चिकित्सकों से संवाद आवश्यक है जिसकी अभी कमी दिखाई देती है ।
भारत में मातृत्व मृत्य दर 113 है जो कि क्रमिक रूप से कमी की तरफ ही आगे बढ़ रही है । वर्ष 2014-2016 में यह 130 थी जो कि 2015-2017 में 113 तक आ गई है । यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य की और ध्यान देना आवश्यक है कि अधिकांश अफ्रीकी एवम एशियाई देशों में उच्च मातृत्व मृत्यु दर बनी हुई है । भारत के पड़ोसी राज्यों की बात करें तो श्रीलंका और चीन को छोड़कर शेष सभी राष्ट्र भारत से क्रम में नीचे हैं ।
समावेशी विकास लक्ष्यों के तहत वर्ष 2030 तक वैश्विक मातृत्व मृत्यु दर को प्रति 1 लाख जीवित में 70 से भी कम तक लाने का लक्ष्य है
भारत इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है इसमें कोई दो राय नहीं है । वर्तमान में सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में भी जिस तरह क्रमिकता से बजटीय मदद को बढ़ाया गया है वो ध्यान आकृष्ट करता है । वर्ष 2017-2018 में आवंटित 47353 करोड़ रूपये के मुकाबले वर्तमान वर्ष में 83000 करोड़ रुपए आवंटित होना हमारे धीरे धीरे बढ़ते मजबूत कदमों को दिखाता है ।
लेकिन भारत समेत विश्व के अन्य विकाशसील देशों की एक और प्रमुख समस्या है और वह है असुरक्षित गर्भपात के कारण होने वाली मृत्यु के आंकड़ों की असंगति । और यही प्रमुख समस्या भी है कि भले ही सतत विकास लक्ष्य के तहत मातृत्व मृत्य दर को वांछित रूप से लक्षित करके हासिल भी कर लिया जायेगा लेकिन उन मामलों का क्या को आज भी किसी रजिस्टर में प्रविष्टि नहीं पाते ।
वस्तुतः विगत वर्षों में भारत द्वारा सामाजिक उत्थान, पर्यावरणीय विकास और मानव अधिकारों के क्षेत्र में और सतत समावेशी विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जितने भी प्रयास किए जा रहे हैं वो अनुकरणीय है । संवैधानिक संशोधनों की बात हो न्यायिक सक्रियता की या फिर स्वतंत्र न्यायपालिका की, भारत के कदम विश्व के तमाम देशों के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका निभा सकते हैं । महिलाओं के मातृत्व से जुड़े विषयों को उनके नैसर्गिक अधिकार की तरह देखता भारत रिपब्लिकन-डेमोक्रेट्स विचारधाराओं,धार्मिक परंपराओं ,कार्यपालिका की न्यायपालिका में दखलंदाजी के बीच फंसते जा रहे अमेरिका के लिए प्रेरणा पुंज है जहां समाज के अंतिम वर्ग के लिए निस्वार्थ लगे हुए प्रेरक व्यक्तित्व को देश के सर्वोच्च पद की तरफ बढ़ते हुए देखा जा रहा है ।
जय प्रकाश पाण्डेय
लेखक पंजाब नेशनल बैंक में पूर्व अधिकारी तथा
किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में स्वतंत्र लेखक, टिप्पणीकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं ।
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