देव भूमि उत्तराखंड को बने लगभग 16 वर्ष पूरे हो चुके हैं | सांस्कृतिक विभिन्नता को सहेज कर रखने एवं प्रशासनिक कुशलता के मुद्दे को लेकर
उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश से अलग किया गया,और इस पहाडी प्रदेश की राजधानी दून को
बनाया गया |
विकास के जिन पैमानों को अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं उपयोग में लाती है अगर उससे देखा जाए तो उत्तराखंड की स्थिति तो आज पहले
से भी बदतर हो चुकी है | प्रदेश में विकास के नाम पर महज लीपापोती के आंकड़े हैं | प्रत्येक
प्रदेश की अपनी संस्कृति होती है,जिसके नाम पर हुक्मरान अपनी सल्तनत बचाते हैं |
उत्तराखंड की यह संस्कृति अब खोने लगी है | आज यहाँ के व्यापारी समुदाय से लेकर
राजनीतिक गलियारों में बाहरी लोगों का कब्ज़ा हो चूका है | ऐसे लोग जिनका दूर दूर
तक पहाड़ी संस्कृति से वास्ता नही है वो लोग यह निर्धारण करने में लगे हैं की
देवभूमि का भविष्य क्या होगा |
कांग्रेस युक्त होती जा रही भारतीय जनता पार्टी को देवभूमि के लोगों की
भावनाओ के साथ खेलने का कोई हक नही है | देवभूमि में वर्तमान में न जाने भारतीय
जनता पार्टी का प्रदेश थिंक टैंक कौन है,यह जरुर स्पष्ट है कि उसे पहाड़ी संवेदनाओं
से कुछ लेने देना नहीं है | क्या 1-2 अक्टूबर 1994 के उस
काले दिन को हम भूल जाएँ जब हमारी देवभूमि
की माताओं के साथ,बहनों के साथ,बलात्कार किया जा रहा था |क्या यह भुलाया जा सकता
है कि उत्तराखंड गठन के लिए दिल्ली में अपनी मांग रखने जा रहे लोगों को किस कदर
गोलियों से भूना गया ? हाँ हो सकता है आप लोग यह भूल गए हों,या आप लोगों को पता न
हो,या आप भी उन बाहरी लोगों में से ही हों जिन्होंने पहले देहरादून में अपनी पूँजी
लगायी ,फिर व्यापार का प्रसार किया,और जब मोटी रकम का जत्त्था हो गया तो पहाड़ की
राजनीती के नीति नियंता होने लगे और यदि ऐसा नही है तो आन्दोलन के उस दौर में उत्तर प्रदेश का दामन थामने वाली रीता बहुगुणा जैसी उन तमाम शख्सियतों को पार्टी में लेना छोड़ें एवं उत्तराखंड के आम जनमानस की
भावनाओं को समझते हुए गैरसैण राजधानी विवाद,उत्तराखंड के युवाओं हेतु रोजगार एवं
तेजी से होते माइग्रेशन को रोकने का कुछ
ब्लू प्रिंट सामने रखे |
जब हमारे साथ ही बने झारखण्ड,छतीसगढ़ जैसे
राज्यों ने सरकारी सेवाओं में अपने यहाँ के स्थायी निवासियों हेतु आरक्षण का प्रावधान किया
है तो यह उत्तराखंड में क्यों नही ?आप सबको
स्थिति पता है आज भी अधिकतर पहाड़ियों का जीवन बदतर ही है | प्राकृतिक सुन्दरता का
फायदा तो ये बाहरी ही ले गए हैं | हमे तो बस मेस में काम करने वाले,बर्तन उठाने
वाले मात्र तक रख दिया है |मसूरी का उदहारण इस सन्दर्भ में देखने योग्य है |
17 सालों में यहाँ के जान प्रतिनिधि,(ऐसे
प्रतिनिधियों को जन प्रतिनिधि न ही कहा
जाए ) ने विकास का ढोलक पीट पीट के बजाया
| अरे विकास क्या होता है यह पता भी है मेरे तथाकथित जान प्रतिनिधियों | दून के
विकास से अपनी छाती को फूलाने वालों कभी मुनस्यारी ,धारचूला,पिथोरागढ़,अल्मोड़ा,बागेश्वर,खिर्सू,गरुड़,आदि
पर जानकारी जुटाओ तो, अपनी छाती में जो हमारे हिस्से को मारकर आप लोगों ने मांस लटकाया
है न, वह गिर पड़ेगा |इतने वर्ष बाद भी आप लोगों ने क्या किया है ?चिरकुट सी
राजनीती करते हो आप लोग और सोचते हो राजनेता हैं ? यही छुटभय्यी राजनीति है तभी तो
केंद्र तक आपमें से शायद ही कोई पहुच पाता है |
2017 के चुनाव में आम जनता के हितों को
ध्यान में रखते हुए आप सबको यह निर्धारित करना होगा की राजधानी का मुद्दा कब तक
सुलझेगा ? आपको यह बताना होगा की अँधेरी सड़कों में,पीली पोल लाइट के रहते हुए आप
कैसे पर्यटकों को आकर्षित करेंगे ?आपको यह ब्लूप्रिंट देना होगा कि मात्र 2
एअरपोर्ट के साथ आप कैसे पहाड़ी समाज का समेकित विकास करेंगे | याद रखयेगा ये सवाल अब पूछे जायेंगे |
आपको यह जवाब देना होगा कि तदर्थ शिक्षकों
पर लाठीचार्ज ही होता रहेगा या फिर उनको स्थायी किया जाएगा ?आपको यह बताना होगा कि
पिथोरागढ़ जैसी विधानसभा जहाँ इतने मंत्रियों के पैत्रिक निवास हैं वहां अभी तक
विकास की लहर महज अवैध शराब और रेत तस्करी तक क्यों सीमित है ?आप उन लोगों से अब
बच नहीं सकते जिन्होंने जान प्रतिनिधियों
के सिस्टम को जान लिया है | पार्टी की राष्ट्रीय छवि आप ही जैसे लोगों से ख़राब
होती है | देवभूमि के सीधे साधे लोग आप लोगों के शोषण से अब त्रस्त हो चुके हैं | यह एक चेतावनी है आप सभी जान
प्रतिनिधियों के लिए देव भूमि के समाज के लिए सोचिये वरना जिस गोलू
देवता,देवतारी संस्कृति,के नाम पर पैसा बनाकर अपना घर भर रहे हैं वहीँ उत्तराखंड
की जनता अपनी गुहार लगाएगी |
गोलू देवता का इन्साफ आपको भी पता है |
मेरे उत्तराखंड के सभी निवासियों से निवेदन है कि इस चुनाव में देव भूमि को वास्तव
में उसके सही हकदारों को सौंपे | रोड बनाना,हैण्डपंप लगवाना,मंदिर बनवाना ये सब
लोलीपोप हैं जो आप लोगों तक फेकें गए हैं | और वास्तव में अगर किसी ने यह काम किया
भी है तो यह उस व्यक्ति विशेष की जिम्मेदारी है | देव नगरी में उसे सत्ता दें
जिसने बेरोजगारी,पलायन,शहरी सौन्दर्यीकरण,महिला सशक्तिकरण,सरकारी शिक्षा केंद्र से
सम्बंधित प्रयास किये हैं |
देवभूमि हम सबकी है | देवभूमि के लोगों का
विकास हमारा ही दायित्व है | देवभूमि के
लोग आज भी वही जीवन जीने को अभिशप्त हैं जो आज से 20 वर्ष पूर्व था | कुछ भी नहीं
बदला,न सोच,न समाज,न लोग ...बस बदली है तो जान प्रतिनिधियों की सोच जो अब देवभूमि
को अपने निजी हितों की पूर्ति का साधन मात्र देखती है |