मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

विलुप्त होती मातृभाषाएं और भारत


जय प्रकाश पाण्डेय

वरि. राजभाषा अधिकारी

 

सांस्कृतिक और  भौगोलिक विविधताओं से समृद्ध  भारतवर्ष   ने साहित्य, विज्ञान, दर्शन और कला के क्षेत्रों में समस्त विश्व को महत्वपूर्ण योगदान दिया है । भारतेंदु हरिश्चंद्र,  अन्नमय्या,  रामदासु, कं दुकुरी, और तिरुवल्लुवर, कंबन जैसे भाषाप्रेमियों की धरती भारत द्वारा संस्कृत,हिंदी,तमिल,तेलगु,बांग्ला,उड़िया, मलयालम आदि विभिन्न भारतीय भाषाओं में दिए गए वैश्विक अवदान, आज किसी परिचय के आकांक्षी नहीं हैं । इन भाषाओं के अलावा लोक में  बोलियों के रूप से स्थापित भाषाओं,  ने भी भारत के सामाजिक,राजनैतिक और सांस्कृतिक पक्षों को सामने रखा है |  भारतीय संविधान की अष्टम सूची में 22 भाषाओं   शामिल हैं । इनके अलावा भी देश भर में कई अन्य भाषाएँ और बोलियां भी बोली जाती हैं, जिनमें से कई को संबंधित राज्य सरकारों द्वारा मान्यता भी प्राप्त है। नवीनतम एथ्नोलॉग रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 19,500 से अधिक विभिन्न मातृभाषाएँ  हैं जिसमें से हिंदी विश्व में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है । ऐसे में मातृभाषा दिवस अपनी विस्मृत होती जा रही बोलियों और भाषाओं के संरक्षण,संवर्धनका एक अवसर है । वेंटीलेटर पर सांसें ले रही बोलियों और भाषाओं के संरक्षण की दिशा में  कार्य करने की प्रेरणा देने वाला  यह अवसर है |  भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के लिए प्रतिवर्ष 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस आयोजित किया जाता है। इस दिन की स्थापना संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा वर्ष 1999 में दुनिया भर के लोगों द्वारा उपयोग की जाने वाली सभी भाषाओं के संरक्षण और संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।

 

 

दरअसल इतिहास के पृष्ठ को देखें तो भारत विभाजन से जन्में पाकिस्तान में उर्दू भाषा को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की भी आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित करने की उद्घोषणा हुई । 21 फरवरी 1952 की तारीख को बांग्लादेश में मातृभाषा बंगाली के समर्थन में आंदोलनों का दौर शुरू हुआ । आंदोलन ने अंततः बंगाली को पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी और बाद में बांग्लादेश की स्वतंत्रता का मार्ग भी प्रशस्त हुआ। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मातृभाषा के संवर्धन के इस आदर्श दृष्टांत के आधार पर 21 फरवरी का दिन मातृभाषा दिवस के रूप में बनाने की घोषणा की । यह दुनिया भर में बोली जाने वाली कई अलग-अलग भाषाओं और लुप्तप्राय भाषाओं को संरक्षित करने,उन्हें पुनर्जीवित करने और उनके महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के अवसर प्रदान करता है । यूनेस्को द्वारा वर्ष 2022 से 2032 तक के दशक को मातृभाषा के लिए अंतर्राष्ट्रीय दशक घोषित किया गया है । 

 

 

 

मातृभाषा अस्मिता की बोधक और संस्कृति की संवाहक भी होती है । महात्मा गांधी जी ने इसी मातृभाषा के महत्व को समझते हुए कहा था कि “ मनुष्य के मानसिक विकास के लिए उसके ऊपर मातृभाषा के अतिरिक्त दूसरी भाषा लादना  मातृभूमि के विरूद्ध पाप है ” |

अफसोस की बात यह है कि राष्ट्रपिता के ये कथन आजादी के बाद ही  मानस पुत्रों द्वारा  विस्मृत कर दिये गए | आजाद भारत की शिक्षा नीतियों ने लॉर्ड मैकाले को सही साबित करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा,भाषा, साहित्य  और संस्कारों को हासिए में  धकेलते हुए अंग्रेजी भाषा का वह दिवास्वप्न दिखाया जिसकी साध में   हमने अपनी जड़ें खो दी और राजनीति लाभों के चलते हिन्दी बनाम अन्य  भारतीय भाषाओं के मुद्दे संसद में लंबे समय तक गूँजने लगे | सांस्कृतिक रूप से इतने समृद्ध भारतीय जनमानस की सांस्कृतिक एकता को भी नीतियों ने नुकसान पहुंचाया और इस प्रकार आजादी के बाद एक बहुत बढ़ा वर्ग अपने क्षेत्र से बाहर की अन्य भाषाओं का अध्ययन तक नहीं कर पाया |  

 

 भाषाओं के सवाल पर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर या एक भाषा के पक्षधर बनकर मूल्यांकन की परंपरा भारत में भी घर करने लगी है। स्वतंत्रता के बाद इतने विशद भाषाई समृद्धता से आने वाली पीढ़ी को भाषाई राजनीति के चलते दूर होना पड़ा है । हिंदी और अंग्रेजी , और राष्ट्रभाषा की लड़ाइयों के बीच हमारी अपनी अनेक मातृभाषाऐं हासिए में चली गई हैं । अहोम, रंगकास ,सैंगमई, तोलचा आदि इस कड़ी में प्रमुख नाम हैं । अकेले उत्तराखंड में ही आज गढ़वाली,कुमाऊंनी और रौंगपो सहित दस बोलियां खतरे में हैं । सीमांत क्षेत्र पिथौरागढ़ की दो बोलियां तोलचा और रंगकस तो विलुप्त भी हो चुकी है । मातृभाषा को कम आंकने, अंग्रेजीयत की झूठी ब्रांडिंग, और मातृभाषा में सीमित अवसरों के साथ, कृषि के बदलते पैटर्न, शहरी कहलाने की जिद  और  कुछ कानूनों के कारण आबादी का एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी मातृभाषा से दूर होता जा रहा है । नई शिक्षा नीति के तहत अनिवार्यतः मातृभाषा  में आरंभिक  शिक्षा विषयक प्रावधान जरूर इस दिशा में सकारात्मक परिणाम देंगें | बीते वर्ष पूर्व राज्यसभा अध्यक्ष श्री वैंकैया नायडू ने अपने उद्बोधन में बताया था कि भारत में लगभग उन्नीस हजार पांच सौ (19500) मातृभाषायें एवं बोलियां हैं ,जिनमें से लगभग 200 भाषाएं विलुप्त होने की कगार पर हैं । दरसअल यह विलोपन भाषा का ही नहीं बल्कि उस भाषा से जुड़ी एक समृद्ध ज्ञान परंपरा, विशुद्ध स्मृतियों और उस स्थान विशेष की संस्कृति का भी होता है ।

 

संकटापन्न भाषाओं के लिए यूनेस्को द्वारा बनाए गए एटलस ऑफ द वर्ल्डस लैंग्वेज इन डेंजर के वर्ष 2019 के आंकड़ों के अनुसार भारत में 453 भाषाएं लुप्तप्राय की श्रेणी में आ गई हैं । भारत में 197 भाषाओं को असुरक्षित और 65 भाषाओं को गंभीर रूप से संकटग्रस्त समझा गया । अंडमानीज, बिरहोर, दमपाल, ग्रेट अंडमानीज, जेरु, सुंडा, मांडा, ओंगि, सेंगमाई,ताई नोरा आदि ऐसी ही संकटग्रस्त भाषाएं हैं ।इन लुप्तप्राय भाषाओं में से अधिकांश सीमांत और वंचित समुदायों द्वारा बोली जाती हैं। 

 

भारत में हमारी भाषाओं और बोलियों के हासिये में पहुचाने वाले कारकों में प्रमुख भाषाओं जैसे हिंदी या अंग्रेजी की तरफ प्रवासन, अल्पसंख्यक भाषाओं के लिए संस्थागत समर्थन की कमी, और आर्थिक और सामाजिक दबाव भी शामिल हैं। बाजार, शिक्षा और रोजगार के चलते जंजातीय बोलियों में भी स्थानिक शब्द प्रचलन से आज बाहर हो रहे हैं | ऐसे में प्रमाणिक सर्वेक्षणों के अभाव, नीतिगत निर्णयों की शिथिलता और मातृभाषाओ के ऐतिहासिक सांस्कृतिक पक्ष में कम दिलचस्पी लेते आम भारतीय जनमानस के बीच से अंडमानीज, बिरहोर, दमपाल आदि भाषाओं का विलोपन की कगार पर खड़ा होना शर्मनाक स्थिति है ।

 

 

विगत वर्षों में डिजिटल अभिलेखागार, शैक्षिक कार्यक्रमों और सामुदायिक पहलों के निर्माण सहित भारत में लुप्तप्राय भाषाओं के दस्तावेजों को सुरक्षित और संरक्षित करने के लिए प्रयास प्रशंसनीय हैं हालांकि इन प्रयासों की गतिशीलता और भी बढ़ाने की आवश्यकता है । भारत सरकार ने लुप्तप्राय भाषाओं के दस्तावेजो को संरक्षित करने के लिए पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया नामक एक पहल भी शुरू की है।

 

भारतीय मातृभाषाओं और बोलियों  की भी लिपि विकसित करने की कोशिश भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन में सहायक सिद्ध होगी  गढ़वाली, कुमाऊनी, बोडो, शेरपा मुंडारी,संथाली,खड़िया आदि अन्य भाषाओं के भी प्रतीक चिह्नों को ध्यान में रखते हुए लिपियों का विकास कर ,इन भाषाओं को भी लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।  सरकारी आँकड़ों के निर्धारित मापदंडों में  भाषा कहलवाने के लिए भाषा को बोलने वालों की न्यूनतम  अपेक्षित संख्या 10 हजार है। भाषा सम्बन्धी नीतिगत निर्णयों में जनसंख्या के इस  आग्रह के स्थान पर भाषा के  महत्व और भूमिकाओं पर आधारित आँकड़ों का संग्रहण इस दिशा में सशक्त कदम होगा |  पूरे देश में प्रमाणिक आंकड़ों के संग्रहण के बिना इस लड़ाई को जीतने में लंबा वक्त लग सकता है । आज हमारी जनजातियों की भाषाएं विलुप्ति की कगार में हैं । हमें भीली ,पटेलिया, कोरकू आदि आदिवासी बोलियों पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। घुमंतू,पहाड़ी,तटीय इलाकों के भाषा बोलने वाले समुदायों को बचाने हेतु उनके अनुसार योजनाओं के गठन एवं क्रियान्वयन किए जाने की आवश्यकता है । 

 

 

नीतिगत निर्णयों में संवेदना : सशक्त होंगे दिव्यांगजन


 

दिव्यांगता के विषयों की समझ को बढ़ावा देने और दिव्यांगो के अधिकारों पर परिचर्चाओं के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा प्रतिवर्ष  दिनांक 3 दिसम्बर को  पूरे  विश्व में दिव्यांगता दिवस के आयोजन की उद्घोषणा की गई   | भारत  में  वर्ष 1995 का समय  दिव्यांगो के अधिकारों के लिए एक आधार वर्ष है जहां से आगे चलकर  दिव्यांगो के सामाजिक , राजनैतिक  और आर्थिक रूप से सशक्तिकरण की बातें नीतिगत फैसलों में हमें दिखाई देती है | दिव्यांगता दिवस की भी आधारशिला 1992 में हम देखते हैं।  स्वतन्त्रता के बाद हालांकि  संवैधानिक प्रावधानों में समानता, स्वतन्त्रता और बंधुत्व   के  मूलभूत सिद्धांतों को अंगीकार करने के बाद  भी दिव्यांगो को समाज की मुख्यधारा से अलग ही रखा जाता था |  प्रारब्ध और   पूर्व -जन्म विषयक संकल्पनाओं से भरे भारतीय समाज में  दिव्यांगो के हकों के लिए आवाजें मुखरित होने में  आजादी के बाद लगभग 25-30 साल लग गए |

 

 वर्ष 1980 के पूर्वार्ध में दिव्यांगो के बीच कार्य कर रहे स्वयं सेवी संगठनों और उनकी सामाजिक सक्रियता  से विश्व के अन्य  देशों के समान भारत में भी  दिव्यांगो के अधिकारों की बातें उठने लगी | संयुक्त राष्ट्र के वर्ष 1982-1993 के दशक को दिव्यांगो का दशक घोषित करते ही दिव्यांगो के अधिकारों और उनको मुख्यधारा में लाने के प्रयासों पर काम शुरू हुए | वर्ष 1986 में दिव्यांगो के लिए भारत द्वारा स्थापित पुनर्वास आयोग इन्हीं प्रयासों की अभिव्यक्ति था |

 

 भारत में दिव्यांगो के हितार्थ किए गए प्रयासों को  वैश्विक मंचों में  हस्ताक्षरित प्रोटोकोलों और बाध्यकारी संधियों से संबल मिला  इसमें कोई दो राय नहीं |  एशियाई और प्रशांत क्षेत्र में विकलांग लोगों की पूर्ण भागीदारी और समानता की संयुक्त राष्ट्र  उद्घोषणा को  दिसम्बर 1992 में बीजिंग में स्वीकृत किया गया और इसकी ही भारतीय अनुगूँज   पीडब्ल्यूडी अधिनियम, 1995 के रूप में सामने आती है |  विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD)  प्रोटोकॉल  को  13 दिसंबर, 2006 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनाया गया | भारत ने भी विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD) पर हस्ताक्षर किये और इसकी पुष्टि की।

 

क्रियान्वयन में आ रही चुनौतियों के ही कारण लगभग दो दशकों के बाद  पीडब्ल्यूडी अधिनियम, 1995 में सुधार कर दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 (आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम 2016)  लाया गया |      आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम 2016 में पीडब्ल्यूडी अधिनियम, 1995 के अंतर्गत निर्दिष्ट 7 अक्षमताओं में  14 और समावेशित की गयी है और इस प्रकार कुल 21 अक्षमताओं को इस अधिनियम के अंतर्गत रखा गया | मेडिकल मॉडल के स्थान पर एक विकसित और गतिशील  सामाजिक  मॉडल के आधार पर दिव्यांगता को पुनः इस अधिनियम में परिभाषित  किया गया |

 

इस अधिनियम के तहत उच्च शैक्षणिक संस्थानों और  सरकारी नौकरियों में भी पूर्ववर्ती 3 प्रतिशत से कोटे को बढ़ाकर क्रमशः 5 व 4  प्रतिशत किया गया | वर्ष 2010 में गठित सुधा कौल समिति की  अनुशंसा आधारित यह अधिनियम दिव्यांगों को सभी सार्वजनिक भवनों, अस्पतालों, पोलिंग स्टेशन और यातायात के साधनों में सुगमता पूर्वक पहुंच बढ़ाने के भी प्रावधान करता है | मानसिक बीमारियों के संबंध में स्पष्टता  के साथ ही अधिनियम के प्रावधान पूर्ववर्ती  अधिनियम की तुलना में ज्यादा स्पष्ट  और समावेशी हैं |

वर्ष 2011 में  संपन्न भारत की  जनगणना और हाल ही में किए गए एनएसएस के 76 वें सर्वे के अनुसार दिव्यांगो का भारत की आबादी में लगभग 2.21 प्रतिशत हिस्सा है जिसमें लगभग 56 प्रतिशत पुरुष और 44 प्रतिशत महिलाएं हैं । कुल दिव्यांगों में से लगभग 69 प्रतिशत आबादी ग्रामीण भारत में और 31 प्रतिशत आबादी शहरी भारत में निवास करती है |मानसिक भिन्नता वाले लगभग 50 प्रतिशत बच्चों ने कभी किसी शैक्षिक संस्थान में प्रवेश लिया ही नहीं है । 5 से 19 वर्ष के आयु वर्ग में मात्र 61 प्रतिशत बच्चे ही शैक्षिक संस्थानों में अध्ययन कर रहे हैं। दिव्यांगजनों में से अभी भी लगभग 38 प्रतिशत आबादी को अपना ध्यान रखने के लिए कोई केयर टेकर जैसी  सुविधा उपलब्ध नहीं है । दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की विविध योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु इस वर्ष बजट में 150 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं जोकि पिछले वर्ष से 90 करोड़ कम है।

 

भारत में की गई  सकारात्मक कोशिशो पर भी गौर करें तो भारत में दिव्यांगजनों के लिए सहायता उपकरणों की खरीद/फिटिंग के लिए दिव्याङ्ग व्यक्तियों की सहायता योजना, जिसे एडिप योजना ( एडीआईपी ) के नाम से जाना जाता है भारत में 80 के दशक से चल रही है | इस योजना के अंतर्गत सुधारात्मक सर्जरी करने हेतु भी सहायता मिलती है | दिव्यांगजनों  के लिए वर्तमान सरकार द्वारा दीनदयाल दिव्यांग पुनर्वास योजना चलायी जा रही है जिसका उद्देश्य दिव्यांगों के लिए समर्पित  स्वैच्छिक संगठनों को वित्तीय सहायता के माध्यम से सशक्त करना  है |

 

दिव्यांगजन  स्वालंबन  योजना केंद्र सरकार की एक ऋण योजना है | दिव्यांगों को आय सृजन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान देने वाली कोई भी गतिविधि शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता इसके अंतर्गत दी जाती है |  वर्तमान समय में भारत सरकार द्वारा सुगम्य भारत अभियान भी चलाया जा रहा है | सरकार द्वारा वर्ष 2016 में एक ऑनलाइन सुगम्य पुस्तकालय की भी अवधारणा सामने लायी गयी है जहां दिव्यांगजन  इंटरनेट के माध्यम से पुस्तकों तक सुगमता से पहुंच सकते हैं | विशिष्ट दिव्यांगता पहचान (यूडीआईडी) की भी शुरुवात वर्तमान सरकार द्वारा की गयी है जिसके अंतर्गत दिव्यांगजनों को विशिष्ट पहचान संख्या प्रदान की जा रही है | 

 

समाज में प्रत्येक दिव्यांग की गरिमा को बनाए  रखने और समाज की मुख्यधारा में दिव्यांगों  की पूर्ण भागीदारी के लिए और उनके  चिन्हीकरण में पंचायतों, नगरपालिकाओं और एनजीओ की भूमिका को बढ़ाए जाने की आज  आवश्यकता है   | वर्तमान में  शारीरिक,मानसिक और मनौवैज्ञानिक पुनर्वास को बढ़ावा देने की कोशिश करते अनेक संगठनों और व्यक्तित्वों  को और भी प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है  | आज पैरा ओलंपिक और स्पेशल ओलंपिकों में हमारे दिव्यांगों ने देश को गौरव प्रदान किया है | प्रशासन,कला,संगीत, लेखन और खेल में भारत को आईएएस  इरा सिंघला, लेखक ललित कुमार ,डॉक्टर सुरेश आडवाणी , पद्मश्री टैनिस खिलाड़ी एच.बोनीफ़ेस प्रभु , अभिनेत्री सुधा चंद्रन, पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा, संगीतज्ञ रवीद्र जैन  और अभिषेक गोगोई , मनोज शेलके आदि अनेक व्यक्तित्वों ने  गौरव की प्रतीति कराई है |  दिव्यांग जनों का विकास तभी संभव है जब संवेदना के  धरातल पर नीतिगत फैसलों का निर्माण हों और इन नीतिगत फैसलों मे निस्वार्थ भाव से कार्यरत स्वयंसेवी लोगों का भी समावेशन हो ।

 

सभी दिव्यांग व्यक्तियों को समान आर्थिक पृष्ठभूमि  वाले किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में जीवनयापन की उच्च वहनीय लागत का वहन करना पड़ता है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती । भारत में गरीबी रेखा की अनिवार्य पात्रता के आग्रह के साथ आती सरकारी योजनाओं का लाभ इस कारण भी नहीं मिल पाता है ।  ऐसे में राज्य सरकारों की भी भूमिका बढ़ जाती है और केंद्र की ही जिम्मेदारी के स्थान पर राज्य सरकारों आधारित प्रयास किए जाने आवश्यक हैं। उत्तर-प्रदेश सरकार द्वारा इस संदर्भ में किए गए प्रयास प्रशंसनीय है।

 

महंगाई के आधार पर योजनाओं की राशि में  वृद्धि,  दिव्यांगों को निशुल्क दिए जाने वाले  उपकरण/ कृत्रिम अंगों लोगों की खास जरूरतों के अनुसार प्रदान किए जाने और  इन उपकरणों/ कृत्रिम अंगों के स्थान पर इनकी लागत के सीधे  बैंक अंतरण की प्रणाली भी वर्तमान नीतियों का हिस्सा बन सकती है ।  दिव्यांगता सहायक उपकरणों जैसे व्हीलचेयर, वॉकिंग फ्रेम, ट्राइसाइकिल, ब्रेल पेपर, ब्रेल टाइपराइटर और ब्रेल घड़ियों और  अन्य  कृत्रिम अंगों और श्रवण यंत्र सहित आर्थोपेडिक उपकरणों आदि पर  लगाए जाने वाले गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) की आवश्यकताओं और करों के निर्धारण में भी लोकहितवादी दृष्टिकोण दिव्यांगों के सशक्तिकरण का   एक प्रभावी माध्यम बन सकता है। 

‘क्या आप एक दिव्यांग व्यक्ति हैं?’ या ‘क्या आपके परिवार में कोई विकलांग व्यक्ति है?’ जैसे प्रश्नों को आंकड़े लेते वक्त बदलने की आवश्यक है  क्योंकि अभी भी भारत में दिव्यांगताओं को नकारात्मक रवैये से जूझना पड़ता है । इससे वास्तविक दिव्यांग आबादी का पता लगाना असंभव हो जाता है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) को सर्वेक्षण के लिए प्रयुक्त प्रश्नावली में भी संभव परिवर्तनों पर गौर करना चाहिए ।  राष्ट्रीय दिव्यांगजन पेंशन की भी राशि आज के समय के हिसाब से बढ़ाने की आवश्यकता है |आज जनसांख्यकीय परिवर्तन के फलस्वरूप रोजगार और उच्च शिक्षण संस्थानों में दिव्यांगो के  प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की जानी चाहिए |

दिव्यांगो के लिए  एक वैधानिक सिविल कोर्ट की शक्ति से युक्त राष्ट्रीय आयोग बनाने की आज आवश्यकता है  |  अधिक से अधिक स्पेशल विद्यालयों को खोले जाने की आज  आवश्यकता है | निजी प्रयासों से संचालित ऐसे विद्यालयों को   सरकारी मदद से न सिर्फ विद्यालयी शिक्षा बल्कि नवाचार और भविष्य के लिए कौशल विकास जैसे कार्यक्रमों से भी जोड़ने की कोशिशें दिव्यांगों के सशक्तिकरण की दिशा महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होंगी।

अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

  युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र   की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है   । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोल...