जय प्रकाश पाण्डेय
वरि. राजभाषा अधिकारी
सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधताओं से समृद्ध भारतवर्ष
ने साहित्य, विज्ञान, दर्शन और कला के क्षेत्रों में समस्त विश्व
को महत्वपूर्ण योगदान दिया है । भारतेंदु हरिश्चंद्र, अन्नमय्या, रामदासु, कं दुकुरी, और तिरुवल्लुवर, कंबन जैसे भाषाप्रेमियों की धरती भारत द्वारा संस्कृत,हिंदी,तमिल,तेलगु,बांग्ला,उड़िया, मलयालम आदि विभिन्न भारतीय भाषाओं में दिए गए वैश्विक अवदान, आज किसी परिचय के आकांक्षी नहीं हैं । इन भाषाओं के अलावा लोक में बोलियों के रूप से स्थापित भाषाओं, ने भी भारत के सामाजिक,राजनैतिक और सांस्कृतिक पक्षों को सामने रखा है | भारतीय संविधान की अष्टम सूची में 22
भाषाओं शामिल हैं
। इनके अलावा भी देश भर में कई अन्य भाषाएँ और बोलियां भी बोली जाती हैं, जिनमें से कई को संबंधित राज्य सरकारों द्वारा मान्यता भी प्राप्त है। नवीनतम
एथ्नोलॉग रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 19,500
से अधिक विभिन्न मातृभाषाएँ हैं जिसमें से हिंदी विश्व में तीसरी सर्वाधिक
बोली जाने वाली भाषा है । ऐसे में मातृभाषा दिवस अपनी विस्मृत होती जा रही बोलियों
और भाषाओं के संरक्षण,संवर्धनका एक अवसर है । वेंटीलेटर पर सांसें
ले रही बोलियों और भाषाओं के संरक्षण की दिशा में
कार्य करने की प्रेरणा देने वाला यह
अवसर है | भाषाई और सांस्कृतिक
विविधता और बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के लिए प्रतिवर्ष 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस आयोजित
किया जाता है। इस दिन की स्थापना संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा
वर्ष 1999 में दुनिया भर के लोगों द्वारा उपयोग
की जाने वाली सभी भाषाओं के संरक्षण और संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।
दरअसल इतिहास के पृष्ठ को देखें तो भारत विभाजन
से जन्में पाकिस्तान में उर्दू भाषा को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की भी
आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित करने की उद्घोषणा हुई । 21 फरवरी 1952 की तारीख को बांग्लादेश में मातृभाषा
बंगाली के समर्थन में आंदोलनों का दौर शुरू हुआ । आंदोलन ने अंततः बंगाली को पाकिस्तान
की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी और बाद में बांग्लादेश की स्वतंत्रता
का मार्ग भी प्रशस्त हुआ। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मातृभाषा के संवर्धन के इस
आदर्श दृष्टांत के आधार पर 21 फरवरी का दिन मातृभाषा दिवस के रूप में बनाने की घोषणा की । यह दुनिया भर में बोली जाने
वाली कई अलग-अलग भाषाओं और लुप्तप्राय भाषाओं को संरक्षित करने,उन्हें पुनर्जीवित करने और उनके महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के अवसर
प्रदान करता है । यूनेस्को द्वारा वर्ष 2022 से 2032 तक के दशक को मातृभाषा के लिए अंतर्राष्ट्रीय
दशक घोषित किया गया है ।
मातृभाषा अस्मिता की बोधक और संस्कृति की संवाहक
भी होती है । महात्मा गांधी जी ने इसी मातृभाषा के महत्व को समझते हुए कहा था कि “
मनुष्य के मानसिक विकास के लिए उसके ऊपर मातृभाषा के अतिरिक्त दूसरी भाषा लादना
मातृभूमि के विरूद्ध पाप है ” |
अफसोस की बात यह है कि राष्ट्रपिता के ये
कथन आजादी के बाद ही मानस पुत्रों
द्वारा विस्मृत कर दिये गए | आजाद भारत की शिक्षा नीतियों ने
लॉर्ड मैकाले को सही साबित करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा,भाषा, साहित्य और संस्कारों को हासिए
में धकेलते हुए अंग्रेजी भाषा का वह
दिवास्वप्न दिखाया जिसकी साध में हमने
अपनी जड़ें खो दी और राजनीति लाभों के चलते हिन्दी बनाम अन्य भारतीय भाषाओं के मुद्दे संसद में लंबे समय तक
गूँजने लगे | सांस्कृतिक रूप से इतने समृद्ध भारतीय जनमानस
की सांस्कृतिक एकता को भी नीतियों ने नुकसान पहुंचाया और इस प्रकार आजादी के बाद
एक बहुत बढ़ा वर्ग अपने क्षेत्र से बाहर की अन्य भाषाओं का अध्ययन तक नहीं कर पाया |
भाषाओं के सवाल पर पूर्वाग्रह से ग्रस्त
होकर या एक भाषा के पक्षधर बनकर मूल्यांकन की परंपरा भारत में भी घर करने लगी है। स्वतंत्रता
के बाद इतने विशद भाषाई समृद्धता से आने वाली पीढ़ी को भाषाई राजनीति के चलते दूर होना
पड़ा है । हिंदी और अंग्रेजी , और राष्ट्रभाषा की लड़ाइयों के
बीच हमारी अपनी अनेक मातृभाषाऐं हासिए में चली गई हैं । अहोम, रंगकास ,सैंगमई,
तोलचा आदि इस कड़ी में प्रमुख नाम हैं ।
अकेले उत्तराखंड में ही आज गढ़वाली,कुमाऊंनी
और रौंगपो सहित दस बोलियां खतरे में हैं । सीमांत
क्षेत्र पिथौरागढ़ की दो बोलियां तोलचा और रंगकस तो विलुप्त भी हो
चुकी है । मातृभाषा को कम आंकने, अंग्रेजीयत की झूठी
ब्रांडिंग, और मातृभाषा में सीमित अवसरों के साथ, कृषि के बदलते पैटर्न, शहरी कहलाने की
जिद और कुछ कानूनों के कारण आबादी का एक बड़ा वर्ग आज भी
अपनी मातृभाषा से दूर होता जा रहा है । नई शिक्षा नीति के तहत अनिवार्यतः
मातृभाषा में आरंभिक शिक्षा विषयक प्रावधान जरूर इस दिशा में
सकारात्मक परिणाम देंगें | बीते वर्ष पूर्व राज्यसभा
अध्यक्ष श्री वैंकैया नायडू ने अपने उद्बोधन में बताया था कि भारत में लगभग
उन्नीस हजार पांच सौ (19500) मातृभाषायें एवं बोलियां हैं ,जिनमें से लगभग 200 भाषाएं विलुप्त होने की कगार पर हैं । दरसअल यह विलोपन
भाषा का ही नहीं बल्कि उस भाषा से जुड़ी एक समृद्ध ज्ञान परंपरा, विशुद्ध स्मृतियों और उस स्थान विशेष की संस्कृति का भी होता है ।
संकटापन्न भाषाओं के लिए यूनेस्को द्वारा बनाए
गए एटलस ऑफ द वर्ल्डस लैंग्वेज इन डेंजर के वर्ष 2019
के आंकड़ों के अनुसार भारत में 453 भाषाएं लुप्तप्राय
की श्रेणी में आ गई हैं । भारत में 197 भाषाओं को असुरक्षित और
65 भाषाओं को गंभीर रूप से संकटग्रस्त समझा गया । अंडमानीज,
बिरहोर, दमपाल, ग्रेट अंडमानीज,
जेरु, सुंडा, मांडा,
ओंगि, सेंगमाई,ताई नोरा आदि ऐसी ही संकटग्रस्त भाषाएं हैं ।इन लुप्तप्राय भाषाओं में से अधिकांश सीमांत
और वंचित समुदायों द्वारा बोली जाती हैं।
भारत में हमारी भाषाओं और बोलियों के हासिये
में पहुचाने वाले कारकों में प्रमुख भाषाओं जैसे हिंदी या अंग्रेजी की तरफ प्रवासन, अल्पसंख्यक भाषाओं के लिए संस्थागत समर्थन
की कमी, और आर्थिक और सामाजिक दबाव भी शामिल हैं। बाजार, शिक्षा और रोजगार के चलते जंजातीय बोलियों में भी स्थानिक शब्द प्रचलन से
आज बाहर हो रहे हैं | ऐसे में प्रमाणिक सर्वेक्षणों के अभाव,
नीतिगत निर्णयों की शिथिलता और मातृभाषाओ के ऐतिहासिक सांस्कृतिक पक्ष
में कम दिलचस्पी लेते आम भारतीय जनमानस के बीच से अंडमानीज, बिरहोर, दमपाल आदि भाषाओं का
विलोपन की कगार पर खड़ा होना शर्मनाक स्थिति है ।
विगत वर्षों में डिजिटल अभिलेखागार, शैक्षिक कार्यक्रमों और सामुदायिक पहलों
के निर्माण सहित भारत में लुप्तप्राय भाषाओं के दस्तावेजों को सुरक्षित और संरक्षित
करने के लिए प्रयास प्रशंसनीय हैं हालांकि इन प्रयासों की गतिशीलता और भी बढ़ाने की
आवश्यकता है । भारत सरकार ने लुप्तप्राय भाषाओं के दस्तावेजो को संरक्षित करने के लिए
“पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया” नामक एक पहल भी शुरू की है।
भारतीय मातृभाषाओं और बोलियों की भी लिपि विकसित करने की कोशिश भाषाओं के
संरक्षण एवं संवर्धन में सहायक सिद्ध होगी । गढ़वाली, कुमाऊनी, बोडो,
शेरपा मुंडारी,संथाली,खड़िया आदि अन्य भाषाओं के भी प्रतीक चिह्नों को ध्यान
में रखते हुए लिपियों का विकास कर ,इन भाषाओं को भी लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। सरकारी आँकड़ों के निर्धारित मापदंडों में भाषा कहलवाने के लिए भाषा को बोलने वालों की न्यूनतम
अपेक्षित संख्या 10 हजार
है। भाषा सम्बन्धी नीतिगत निर्णयों में जनसंख्या के इस आग्रह के स्थान पर भाषा के महत्व और भूमिकाओं पर आधारित आँकड़ों का संग्रहण
इस दिशा में सशक्त कदम होगा | पूरे देश में प्रमाणिक आंकड़ों के संग्रहण के बिना
इस लड़ाई को जीतने में लंबा वक्त लग सकता है । आज हमारी जनजातियों की भाषाएं विलुप्ति
की कगार में हैं । हमें भीली ,पटेलिया, कोरकू आदि आदिवासी बोलियों पर भी ध्यान दिए जाने
की आवश्यकता है। घुमंतू,पहाड़ी,तटीय इलाकों
के भाषा बोलने वाले समुदायों को बचाने हेतु उनके अनुसार योजनाओं के गठन एवं क्रियान्वयन
किए जाने की आवश्यकता है ।