दिव्यांगता के विषयों की समझ
को बढ़ावा देने और दिव्यांगो के अधिकारों पर परिचर्चाओं के लिए संयुक्त राष्ट्र
महासभा द्वारा प्रतिवर्ष दिनांक 3 दिसम्बर
को पूरे
विश्व में दिव्यांगता दिवस के आयोजन की उद्घोषणा की गई | भारत
में वर्ष 1995 का समय दिव्यांगो के अधिकारों के लिए एक आधार वर्ष है
जहां से आगे चलकर दिव्यांगो के सामाजिक ,
राजनैतिक और आर्थिक रूप से सशक्तिकरण की
बातें नीतिगत फैसलों में हमें दिखाई देती है | दिव्यांगता दिवस की भी आधारशिला
1992 में हम देखते हैं। स्वतन्त्रता के
बाद हालांकि संवैधानिक प्रावधानों में
समानता, स्वतन्त्रता और बंधुत्व के मूलभूत सिद्धांतों को अंगीकार करने के बाद भी दिव्यांगो को समाज की मुख्यधारा से अलग ही
रखा जाता था | प्रारब्ध और पूर्व -जन्म विषयक संकल्पनाओं से भरे भारतीय
समाज में दिव्यांगो के हकों के लिए आवाजें
मुखरित होने में आजादी के बाद लगभग 25-30
साल लग गए |
वर्ष 1980 के पूर्वार्ध में दिव्यांगो के बीच
कार्य कर रहे स्वयं सेवी संगठनों और उनकी सामाजिक सक्रियता से विश्व के अन्य देशों के समान भारत में भी दिव्यांगो के अधिकारों की बातें उठने लगी |
संयुक्त राष्ट्र के वर्ष 1982-1993 के दशक को दिव्यांगो का दशक घोषित करते ही दिव्यांगो
के अधिकारों और उनको मुख्यधारा में लाने के प्रयासों पर काम शुरू हुए | वर्ष 1986
में दिव्यांगो के लिए भारत द्वारा स्थापित पुनर्वास आयोग इन्हीं प्रयासों की
अभिव्यक्ति था |
भारत में दिव्यांगो के हितार्थ किए गए प्रयासों
को वैश्विक मंचों में हस्ताक्षरित प्रोटोकोलों और बाध्यकारी संधियों
से संबल मिला इसमें कोई दो राय नहीं
| एशियाई और प्रशांत क्षेत्र में विकलांग
लोगों की पूर्ण भागीदारी और समानता की संयुक्त राष्ट्र उद्घोषणा को
दिसम्बर 1992 में बीजिंग में स्वीकृत किया गया और इसकी ही भारतीय
अनुगूँज पीडब्ल्यूडी अधिनियम, 1995 के
रूप में सामने आती है | विकलांग
व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD)
प्रोटोकॉल को 13
दिसंबर, 2006 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनाया गया | भारत ने भी
विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD) पर हस्ताक्षर किये और इसकी पुष्टि की।
क्रियान्वयन में आ रही
चुनौतियों के ही कारण लगभग दो दशकों के बाद
पीडब्ल्यूडी अधिनियम, 1995 में सुधार कर दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016
(आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम 2016) लाया गया | आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम 2016 में
पीडब्ल्यूडी अधिनियम, 1995 के अंतर्गत निर्दिष्ट 7 अक्षमताओं में 14 और समावेशित की गयी है और इस प्रकार कुल 21
अक्षमताओं को इस अधिनियम के अंतर्गत रखा गया | मेडिकल मॉडल के स्थान पर एक विकसित
और गतिशील सामाजिक मॉडल के आधार पर दिव्यांगता को पुनः इस अधिनियम
में परिभाषित किया गया |
इस अधिनियम के तहत उच्च
शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों
में भी पूर्ववर्ती 3 प्रतिशत से कोटे को बढ़ाकर क्रमशः 5 व 4 प्रतिशत किया गया | वर्ष 2010 में गठित सुधा
कौल समिति की अनुशंसा आधारित यह अधिनियम
दिव्यांगों को सभी सार्वजनिक भवनों, अस्पतालों, पोलिंग स्टेशन और यातायात के
साधनों में सुगमता पूर्वक पहुंच बढ़ाने के भी प्रावधान करता है | मानसिक बीमारियों
के संबंध में स्पष्टता के साथ ही अधिनियम
के प्रावधान पूर्ववर्ती अधिनियम की तुलना
में ज्यादा स्पष्ट और समावेशी हैं |
वर्ष 2011 में संपन्न भारत की जनगणना और हाल ही में किए गए एनएसएस के 76 वें
सर्वे के अनुसार दिव्यांगो का भारत की आबादी में लगभग 2.21 प्रतिशत हिस्सा है
जिसमें लगभग 56 प्रतिशत पुरुष और 44 प्रतिशत महिलाएं हैं । कुल दिव्यांगों में से
लगभग 69 प्रतिशत आबादी ग्रामीण भारत में और 31 प्रतिशत आबादी शहरी भारत में निवास
करती है |मानसिक भिन्नता वाले लगभग 50 प्रतिशत बच्चों ने कभी किसी शैक्षिक संस्थान
में प्रवेश लिया ही नहीं है । 5 से 19 वर्ष के आयु वर्ग में मात्र 61 प्रतिशत
बच्चे ही शैक्षिक संस्थानों में अध्ययन कर रहे हैं। दिव्यांगजनों में से अभी भी
लगभग 38 प्रतिशत आबादी को अपना ध्यान रखने के लिए कोई केयर टेकर जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं है । दिव्यांगजन अधिकार
अधिनियम की विविध योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु इस वर्ष बजट में 150 करोड़ रूपये
आवंटित किए गए हैं जोकि पिछले वर्ष से 90 करोड़ कम है।
भारत में की गई सकारात्मक कोशिशो पर भी गौर करें तो भारत में
दिव्यांगजनों के लिए सहायता उपकरणों की खरीद/फिटिंग के लिए दिव्याङ्ग व्यक्तियों
की सहायता योजना, जिसे एडिप योजना ( एडीआईपी ) के नाम से जाना जाता है भारत में 80
के दशक से चल रही है | इस योजना के अंतर्गत सुधारात्मक सर्जरी करने हेतु भी सहायता
मिलती है | दिव्यांगजनों के लिए वर्तमान
सरकार द्वारा दीनदयाल दिव्यांग पुनर्वास योजना चलायी जा रही है जिसका उद्देश्य
दिव्यांगों के लिए समर्पित स्वैच्छिक
संगठनों को वित्तीय सहायता के माध्यम से सशक्त करना है |
दिव्यांगजन स्वालंबन
योजना केंद्र सरकार की एक ऋण योजना है | दिव्यांगों को आय सृजन में
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान देने वाली कोई भी गतिविधि शुरू करने के लिए
वित्तीय सहायता इसके अंतर्गत दी जाती है |
वर्तमान समय में भारत सरकार द्वारा सुगम्य भारत अभियान भी चलाया जा रहा है
| सरकार द्वारा वर्ष 2016 में एक ऑनलाइन सुगम्य पुस्तकालय की भी अवधारणा सामने
लायी गयी है जहां दिव्यांगजन इंटरनेट के
माध्यम से पुस्तकों तक सुगमता से पहुंच सकते हैं | विशिष्ट दिव्यांगता पहचान
(यूडीआईडी) की भी शुरुवात वर्तमान सरकार द्वारा की गयी है जिसके अंतर्गत
दिव्यांगजनों को विशिष्ट पहचान संख्या प्रदान की जा रही है |
समाज में प्रत्येक दिव्यांग
की गरिमा को बनाए रखने और समाज की
मुख्यधारा में दिव्यांगों की पूर्ण
भागीदारी के लिए और उनके चिन्हीकरण में
पंचायतों, नगरपालिकाओं और एनजीओ की भूमिका को बढ़ाए जाने की आज आवश्यकता है
| वर्तमान में शारीरिक,मानसिक और
मनौवैज्ञानिक पुनर्वास को बढ़ावा देने की कोशिश करते अनेक संगठनों और
व्यक्तित्वों को और भी प्रोत्साहित किए
जाने की आवश्यकता है | आज पैरा ओलंपिक और
स्पेशल ओलंपिकों में हमारे दिव्यांगों ने देश को गौरव प्रदान किया है |
प्रशासन,कला,संगीत, लेखन और खेल में भारत को आईएएस इरा सिंघला, लेखक ललित कुमार ,डॉक्टर सुरेश
आडवाणी , पद्मश्री टैनिस खिलाड़ी एच.बोनीफ़ेस प्रभु , अभिनेत्री सुधा चंद्रन,
पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा, संगीतज्ञ रवीद्र जैन
और अभिषेक गोगोई , मनोज शेलके आदि अनेक व्यक्तित्वों ने गौरव की प्रतीति कराई है | दिव्यांग जनों का विकास तभी संभव है जब संवेदना
के धरातल पर नीतिगत फैसलों का निर्माण हों
और इन नीतिगत फैसलों मे निस्वार्थ भाव से कार्यरत स्वयंसेवी लोगों का भी समावेशन
हो ।
सभी दिव्यांग व्यक्तियों को
समान आर्थिक पृष्ठभूमि वाले किसी भी अन्य
व्यक्ति की तुलना में जीवनयापन की उच्च वहनीय लागत का वहन करना पड़ता है इसमें कोई
दो राय नहीं हो सकती । भारत में गरीबी रेखा की अनिवार्य पात्रता के आग्रह के साथ
आती सरकारी योजनाओं का लाभ इस कारण भी नहीं मिल पाता है । ऐसे में राज्य सरकारों की भी भूमिका बढ़ जाती
है और केंद्र की ही जिम्मेदारी के स्थान पर राज्य सरकारों आधारित प्रयास किए जाने
आवश्यक हैं। उत्तर-प्रदेश सरकार द्वारा इस संदर्भ में किए गए प्रयास प्रशंसनीय है।
महंगाई के आधार पर योजनाओं
की राशि में वृद्धि, दिव्यांगों को निशुल्क दिए जाने वाले उपकरण/ कृत्रिम अंगों लोगों की खास जरूरतों के
अनुसार प्रदान किए जाने और इन उपकरणों/
कृत्रिम अंगों के स्थान पर इनकी लागत के सीधे
बैंक अंतरण की प्रणाली भी वर्तमान नीतियों का हिस्सा बन सकती है । दिव्यांगता सहायक उपकरणों जैसे व्हीलचेयर,
वॉकिंग फ्रेम, ट्राइसाइकिल, ब्रेल पेपर, ब्रेल टाइपराइटर और ब्रेल घड़ियों और अन्य
कृत्रिम अंगों और श्रवण यंत्र सहित आर्थोपेडिक उपकरणों आदि पर लगाए जाने वाले गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स
(जीएसटी) की आवश्यकताओं और करों के निर्धारण में भी लोकहितवादी दृष्टिकोण
दिव्यांगों के सशक्तिकरण का एक प्रभावी
माध्यम बन सकता है।
‘क्या आप एक दिव्यांग
व्यक्ति हैं?’ या ‘क्या आपके परिवार में कोई विकलांग व्यक्ति है?’ जैसे प्रश्नों
को आंकड़े लेते वक्त बदलने की आवश्यक है
क्योंकि अभी भी भारत में दिव्यांगताओं को नकारात्मक रवैये से जूझना पड़ता
है । इससे वास्तविक दिव्यांग आबादी का पता लगाना असंभव हो जाता है। राष्ट्रीय
नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) को सर्वेक्षण के लिए प्रयुक्त प्रश्नावली में भी
संभव परिवर्तनों पर गौर करना चाहिए । राष्ट्रीय
दिव्यांगजन पेंशन की भी राशि आज के समय के हिसाब से बढ़ाने की आवश्यकता है |आज
जनसांख्यकीय परिवर्तन के फलस्वरूप रोजगार और उच्च शिक्षण संस्थानों में दिव्यांगो
के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की जानी
चाहिए |
दिव्यांगो के लिए एक वैधानिक सिविल कोर्ट की शक्ति से युक्त
राष्ट्रीय आयोग बनाने की आज आवश्यकता है
| अधिक से अधिक स्पेशल विद्यालयों
को खोले जाने की आज आवश्यकता है | निजी
प्रयासों से संचालित ऐसे विद्यालयों को
सरकारी मदद से न सिर्फ विद्यालयी शिक्षा बल्कि नवाचार और भविष्य के लिए
कौशल विकास जैसे कार्यक्रमों से भी जोड़ने की कोशिशें दिव्यांगों के सशक्तिकरण की
दिशा महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होंगी।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें