जय प्रकाश पाण्डेय
भारत में विगत वर्षों में धार्मिक पर्यटन स्थलों के सर्किट निर्माण संबंधी ऐतिहासिक कार्य हुए हैं । भारतीय सामासिक सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता के वाहक इन स्थलों को जहां मैदानी इलाकों में ट्रेन और सड़क प्रणाली से जोड़ने का प्रयास किया गया है वहीं उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों में आल वेदर रोड और चार धाम परियोजनाओं से इन्हें अमलीजामा पहनाया जा रहा है और अब इन्हीं सब से एक कदम आगे बढ़ाकर रोप- वे प्रोजेक्टों को अनुशंसाएं दी जा रही हैं । यह एक तरफ जहां सुविधा, साधन युक्त पर्यटन की तरफ बढ़ते कदम हैं तो वहीं दूसरी तरफ धार्मिक स्थलों के साथ पर्यटन को जोड़ने की दिशा में एक प्रयास भी ।
भारत में श्रद्धालुओं का एक बड़ा वर्ग अभी भी आर्थिक स्थिति से परमार्थ पाने की आकांक्षा रखता हैं। बड़े बड़े अनुष्ठान, दान पुण्य का आग्रही यह वर्ग ही सुविधाओं के साथ मॉडर्न साधनों की भी चाह रखता है । यही वर्ग है जिसके लिए धार्मिक पर्यटन की अधिकांश वर्तमान योजनाएं बनती हैं क्योंकि सामान्य श्रद्धालु तो आज भी अंतिम मौके तक पैदल ही अपना रास्ता तय करना चाहते हैं । विशेष परिस्थितियों में भी हैली सेवाओं की जगह पालकी व्यवस्था को चुनते ये सामान्य श्रद्धालु भलीभांति धार्मिक स्थलों पर बढ़ते दबाव को महसूस करते हैं । धार्मिक पर्यटन की योजनाओं के गठन के समय इनके अनुभव महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं ।
हाल ही में भारत के प्रसिद्ध देवघर मंदिर के रोपवे में हुई घटना के बाद भी , पहाड़ी राज्यों की भौगोलिक स्थितियों और पर्यावरणविदो की सलाहों और विरोधों के स्वर को तिलांजलि देकर रोप- वे जैसे संवेदनशील संपर्क के साधन ग्लेशियरों से घिरे मंदिरों के नजदीक विकसित किये जाने संबंधी कदम कितने सफल होंगे इसका उत्तर समय देगा लेकिन दिव्यांगों और बुजुर्गों को इससे सस्ता सुलभ वैकल्पिक मार्ग भी मिलेगा जो अभी नदारद था। एक समय था जब उम्र के अंतिम चतुर्थांश में ऋषिकेश से पैदल यात्रा केदारनाथ तक के लिए शुरू होती थी जिसमें अनुभव,भावना,श्रद्धा और ईश्वरीय प्रेम के साहचर्य को अनुभूत किया जा सकता था । कहा जाता है कि उस समय शिवत्व की खोज के लिए चार धाम जाने वाले श्रद्धालुओं द्वारा पहले ही पिंड दान हरिद्वार में कर दिया जाता था ।
आज वी -लॉगिंग की दुनिया में केदारनाथ,बद्रीनाथ जैसे धार्मिक केंद्र प्री- वेडिंग शूट से लेकर हनीमून और सप्ताहांत में चिल करने के स्पॉट के रूप में बदलते जा रहे हैं। बहुत आश्चर्य नहीं होगा यदि आने वाले २० वर्षों में ये स्पॉट प्रॉपर्टी इन्वेस्टमेंट के लिए भी आकर्षक हो जायें ।
यह अत्यंत विचारणीय तथ्य है कि हैली सेवाओं ने आर्थिक रूप से सशक्त मनुष्य को धार्मिक यात्राओं को उम्र, समय, ईश्वरीय बुलावे जैसी मान्यताओं से अलग इंस्टाग्राम,फेसबुक में रील आदि बनाने तक सीमित कर दिया है । वहीं इन्हीं जगहों के नजदीक आबादी का एक बड़ा वर्ग अभी भी हैली सेवाओं के विस्तार हेतु और दशकों से सुन रहे हवाई पट्टी में विमानों के उतरने की राह देख रहा है ।
राज्य सरकारों द्वारा किए जा रहे प्रयासों के बावजूद धार्मिक यात्राओं के लिए आने वाले असीमित श्रद्धालुओं ने पर्यावरणीय धारणीयता को भी प्रभावित किया है इसमें कोई शक नहीं है। पर्यावरणीय पारिस्थितिकी दबाव से नासमझ आत्मकेंद्रित पढ़े लिखे भारतीय नागरिकों की पर्यावरणीय चिंता को धार्मिक केंद्रों में पोलोथीन,प्लास्टिक और बोतलों के बढ़ते ढेरों से समझा जा सकता है । क्या श्रद्धालुओं की सुविधा के नाम पर धार्मिक जगहों को पिकनिक स्पॉटो में बदला जाना चाहिए ? क्या धार्मिक पर्यटन स्थलों के विकास के नाम पर पारिस्थितिकी संतुलन से समझौता किया जा सकता है ? क्या बढ़ती हैली सेवाओं की घटनाओं के बीच हैली सेवाओं से हमारे स्थापित धामों के दर्शन कर रहे श्रद्धालुओं में एक उम्र की सीमा लागू की जा सकती है? क्या पर्यटन का दबाव झेल रहे हिमालय क्षेत्र में दैनिक आधार पर पर्यटकों की संख्या सीमित कर देनी चाहिए आधारित ये सब प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हैं? जाहिर है संविधान से चलने वाले इस देश में उपरोक्त बातें आपको संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों और विशेषकर अबाधित रूप से देश के अंदर चलने फिरने में बाधक लगें लेकिन सच यह है कि हिमालयी राज्यों में पर्यटन के दबाव को अब महसूस किया जाने लगा है और उसी संविधान के अपवादों का भी उपयोग करने का यह सही वक्त है । सच यह भी है केदारनाथ,बद्रीनाथ जैसे धामों में आने वाले आर्थिक रूप से समृद्ध श्रद्धालुओं का एक बड़ा धड़ा अब वह भी है जिनको धार्मिक स्थलों और पर्यटन के बीच अंतर नहीं मालूम है । आए दिन गंगा मैया की लहरों में पर्यटकों की शराब की बोतलों के साथ वायरल होते वीडियोज इस बात की गवाही देते हैं ।
पर्यटन का एक दूसरा विकास मॉडल भी हैं जहां आप आधारभूत सुविधाओं की व्यवस्था पैदल मार्ग में करते हैं । भारतीय संस्कृति की चिरंतन काल से सहयोगी रही ये पैदल यात्राएं सांस्कृतिक एकता के साथ साथ एक दूसरे को समझने का मौका भी देती थी । महज झील झरनों तक नहीं बल्कि पूर्णता के साथ उस स्थान को देखने का नजरिया देती थी । कितना अच्छा होता वह दृश्य जब धार्मिक यात्रा करने आ रहे हमारे पर्यटकों के लिए मजबूत स्थाई ट्रांसिट कैंपों की व्यवस्था होती । भोजन, पानी और चिकित्सा की समुचित व्यवस्था होती । ऐसा नहीं है की वर्तमान में ये सुविधाएं नहीं है लेकिन केंद्र के समर्थन से प्राप्त अनुदानों को इस तरफ खर्च किया जाए तो श्रद्धालुओं के लिए वास्तविक रूप से हम जमीन पर प्रभावी रूप से कुछ करने में सक्षम रहेंगे ।
रोप -वे प्रोजेक्टों की तकनीकी कुशलता को बढ़ाकर और एक तय मानकों के क्रियान्वयन से दिव्यांगों, बूढ़े बुजुर्गों को फायदा मिलेगा इसमें कोई शक नहीं है लेकिन धर्म अपनी केंद्रीय धुरी से न उतर जाए, धार्मिक स्थल नाचने गाने के पिकनिक स्पॉट न बन जाएं और हिमालयी राज्य डेस्टिनेशन वैडिंग का साधन मात्र न बन जाएं अतीत के अनुभवों से हमें इस तरफ भी सशक्त कदम बढ़ाए होंगे ।
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल महाविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व महासचिव तथा पूर्व बैंक अधिकारी हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।