शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2022

समावेशी पर्यटन के लिए चुनौतियां

 

 

जय प्रकाश पाण्डेय

भारत में विगत वर्षों में धार्मिक पर्यटन स्थलों के सर्किट निर्माण संबंधी ऐतिहासिक कार्य हुए हैं । भारतीय सामासिक सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता के वाहक इन स्थलों को जहां मैदानी इलाकों में ट्रेन और सड़क प्रणाली से जोड़ने का प्रयास किया गया है वहीं उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों में आल वेदर रोड और चार धाम परियोजनाओं से इन्हें अमलीजामा पहनाया जा रहा है और अब इन्हीं सब से एक कदम आगे बढ़ाकर रोप- वे प्रोजेक्टों को अनुशंसाएं दी जा रही हैं । यह एक तरफ जहां सुविधा, साधन युक्त पर्यटन की तरफ बढ़ते कदम हैं तो वहीं दूसरी तरफ धार्मिक स्थलों के साथ पर्यटन को जोड़ने की दिशा में एक प्रयास भी ।

भारत में श्रद्धालुओं का एक बड़ा वर्ग अभी भी आर्थिक स्थिति से परमार्थ पाने की आकांक्षा रखता हैं। बड़े बड़े अनुष्ठान, दान पुण्य का आग्रही यह वर्ग ही सुविधाओं के साथ मॉडर्न साधनों की भी चाह रखता है । यही वर्ग है जिसके लिए धार्मिक पर्यटन की अधिकांश वर्तमान योजनाएं बनती हैं क्योंकि सामान्य श्रद्धालु तो आज भी अंतिम मौके तक पैदल ही अपना रास्ता तय करना चाहते हैं । विशेष परिस्थितियों में भी हैली सेवाओं की जगह पालकी व्यवस्था को चुनते ये सामान्य श्रद्धालु भलीभांति धार्मिक स्थलों पर बढ़ते दबाव को महसूस करते हैं । धार्मिक पर्यटन की योजनाओं के गठन के समय इनके अनुभव महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं ।

हाल ही में भारत के प्रसिद्ध देवघर मंदिर के रोपवे में हुई घटना के बाद भी , पहाड़ी राज्यों की भौगोलिक स्थितियों और पर्यावरणविदो की सलाहों और विरोधों के स्वर को तिलांजलि देकर रोप- वे जैसे संवेदनशील संपर्क के साधन ग्लेशियरों से घिरे मंदिरों के नजदीक विकसित किये जाने संबंधी कदम कितने सफल होंगे इसका उत्तर समय देगा लेकिन दिव्यांगों और बुजुर्गों को इससे सस्ता सुलभ वैकल्पिक मार्ग भी मिलेगा जो अभी नदारद था। एक समय था जब उम्र के अंतिम चतुर्थांश में ऋषिकेश से पैदल यात्रा केदारनाथ तक के लिए शुरू होती थी जिसमें अनुभव,भावना,श्रद्धा और ईश्वरीय प्रेम के साहचर्य को अनुभूत किया जा सकता था । कहा जाता है कि उस समय शिवत्व की खोज के लिए चार धाम जाने वाले श्रद्धालुओं द्वारा पहले ही पिंड दान हरिद्वार में कर दिया जाता था ।

आज वी -लॉगिंग की दुनिया में केदारनाथ,बद्रीनाथ जैसे धार्मिक केंद्र प्री- वेडिंग शूट से लेकर हनीमून और सप्ताहांत में चिल करने के स्पॉट के रूप में बदलते जा रहे हैं। बहुत आश्चर्य नहीं होगा यदि आने वाले २० वर्षों में ये स्पॉट प्रॉपर्टी इन्वेस्टमेंट के लिए भी आकर्षक हो जायें ।

यह अत्यंत विचारणीय तथ्य है कि हैली सेवाओं ने आर्थिक रूप से सशक्त मनुष्य को धार्मिक यात्राओं को उम्र, समय, ईश्वरीय बुलावे जैसी मान्यताओं से अलग इंस्टाग्राम,फेसबुक में रील आदि बनाने तक सीमित कर दिया है । वहीं इन्हीं जगहों के नजदीक आबादी का एक बड़ा वर्ग अभी भी हैली सेवाओं के विस्तार हेतु और दशकों से सुन रहे हवाई पट्टी में विमानों के उतरने की राह देख रहा है ।

राज्य सरकारों द्वारा किए जा रहे प्रयासों के बावजूद धार्मिक यात्राओं के लिए आने वाले असीमित श्रद्धालुओं ने पर्यावरणीय धारणीयता को भी प्रभावित किया है इसमें कोई शक नहीं है। पर्यावरणीय पारिस्थितिकी दबाव से नासमझ आत्मकेंद्रित पढ़े लिखे भारतीय नागरिकों की पर्यावरणीय चिंता को धार्मिक केंद्रों में पोलोथीन,प्लास्टिक और बोतलों के बढ़ते ढेरों से समझा जा सकता है । क्या श्रद्धालुओं की सुविधा के नाम पर धार्मिक जगहों को पिकनिक स्पॉटो में बदला जाना चाहिए ? क्या धार्मिक पर्यटन स्थलों के विकास के नाम पर पारिस्थितिकी संतुलन से समझौता किया जा सकता है ? क्या बढ़ती हैली सेवाओं की घटनाओं के बीच हैली सेवाओं से हमारे स्थापित धामों के दर्शन कर रहे श्रद्धालुओं में एक उम्र की सीमा लागू की जा सकती है? क्या पर्यटन का दबाव झेल रहे हिमालय क्षेत्र में दैनिक आधार पर पर्यटकों की संख्या सीमित कर देनी चाहिए आधारित ये सब प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हैं? जाहिर है संविधान से चलने वाले इस देश में उपरोक्त बातें आपको संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों और विशेषकर अबाधित रूप से देश के अंदर चलने फिरने में बाधक लगें लेकिन सच यह है कि हिमालयी राज्यों में पर्यटन के दबाव को अब महसूस किया जाने लगा है और उसी संविधान के अपवादों का भी उपयोग करने का यह सही वक्त है । सच यह भी है केदारनाथ,बद्रीनाथ जैसे धामों में आने वाले आर्थिक रूप से समृद्ध श्रद्धालुओं का एक बड़ा धड़ा अब वह भी है जिनको धार्मिक स्थलों और पर्यटन के बीच अंतर नहीं मालूम है । आए दिन गंगा मैया की लहरों में पर्यटकों की शराब की बोतलों के साथ वायरल होते वीडियोज इस बात की गवाही देते हैं ।

पर्यटन का एक दूसरा विकास मॉडल भी हैं जहां आप आधारभूत सुविधाओं की व्यवस्था पैदल मार्ग में करते हैं । भारतीय संस्कृति की चिरंतन काल से सहयोगी रही ये पैदल यात्राएं सांस्कृतिक एकता के साथ साथ एक दूसरे को समझने का मौका भी देती थी । महज झील झरनों तक नहीं बल्कि पूर्णता के साथ उस स्थान को देखने का नजरिया देती थी । कितना अच्छा होता वह दृश्य जब धार्मिक यात्रा करने आ रहे हमारे पर्यटकों के लिए मजबूत स्थाई ट्रांसिट कैंपों की व्यवस्था होती । भोजन, पानी और चिकित्सा की समुचित व्यवस्था होती । ऐसा नहीं है की वर्तमान में ये सुविधाएं नहीं है लेकिन केंद्र के समर्थन से प्राप्त अनुदानों को इस तरफ खर्च किया जाए तो श्रद्धालुओं के लिए वास्तविक रूप से हम जमीन पर प्रभावी रूप से कुछ करने में सक्षम रहेंगे ।

रोप -वे प्रोजेक्टों की तकनीकी कुशलता को बढ़ाकर और एक तय मानकों के क्रियान्वयन से दिव्यांगों, बूढ़े बुजुर्गों को फायदा मिलेगा इसमें कोई शक नहीं है लेकिन धर्म अपनी केंद्रीय धुरी से न उतर जाए, धार्मिक स्थल नाचने गाने के पिकनिक स्पॉट न बन जाएं और हिमालयी राज्य डेस्टिनेशन वैडिंग का साधन मात्र न बन जाएं अतीत के अनुभवों से हमें इस तरफ भी सशक्त कदम बढ़ाए होंगे ।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल महाविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व महासचिव तथा पूर्व बैंक अधिकारी हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।


शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

*हिमालयी राज्यों में बढ़ता आपदा का संकट*


बीते दिनों जब पूरा विश्व अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण दिवस ( 13 अक्टूबर) को मना रहा था उसी से 3 दिन पहले उत्तराखंड के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में जनमानस अत्यधिक बारिश के कारण होने वाले भूस्खलन, गिरते पहाड़ ,पत्थरों और इनके कारण बंद होने की स्थिति में पहुंची सड़कों से संघर्ष कर रहा था । न केवल उत्तराखंड बल्कि विगत वर्षों के कुछ अनुभव हमें पूरे हिमालयी राज्यों में मौसमी दशाओं के बदलते ट्रेंड और उससे आने वाली आपदाओं को हमारे सामने रखते हैं , और यह स्थिति कमोबेश अनेक वर्षों से जारी है । 


अत्यधिक वर्षा के कारण उत्तराखंड,हिमाचल के साथ साथ पूर्वोत्तर के राज्यों को भी इस स्थिति का सामना करना पड़ा है । विगत वर्ष राष्ट्रीय राजमार्ग-6 जोकि मणिपुर,मिजोरम,त्रिपुरा,और दक्षिणी असम को जोड़ता है 

काफी दिनों तक मुख्यधारा से कटा रहा । रोंटी ग्लेशियर से अलग हुए बर्फ खंड से उत्पन्न बाढ़ की स्थिति ने 70 से ज्यादा लोगों की जिंदगी उत्तराखंड में ली । किन्नौर जिले में भूस्खलन से हुई जनहानि भी इसी कड़ी में एक और उदाहरण है । लोकसभा में एक प्रश्न के प्रतिउत्तर के आधार पर देखें तो इस वर्ष 2021-2022 जुलाई माह तक प्राकृतिक आपदाओं से 1098 जिंदगियों को हमने खोया है । यह स्थिति हिमालयी राज्यों तक ही सीमित न रहकर उत्तरप्रदेश,कर्नाटक,राजस्थान आदि राज्यों तक है ,सभी इससे प्रभावित रहे हैं । अभी हमारे दिमाग से चक्रवात गुलाब, चक्रवात शाहीन और चक्रवात यास आदि से हुए मिलियनों के नुकसान की स्मृति मिटी नहीं हैं कि फिर से हम प्राकृतिक आपदाओं से जूझने लगे हैं। कर्नाटक,महाराष्ट्र और तमिलनाडु में जन्मी परिस्थितियों ने हमें हमारे बाढ़ प्रबंधन और प्राकृतिक आपदा के प्रबंधन संबंधी मॉडलों पर विचार करने को बाध्य किया है। 


जन,जंगल,जमीन और जानवर को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारणों की लंबी फेहरिस्त में मानवीय क्रियाकलापों और उसमें भी विशेषतः इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास (अवसंरचनात्मक विकास) के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी महत्ती भूमिका हमें देखने को मिल रही है । सड़क विस्तार परियोजनांओ से लेकर पर्यटन स्थलों के ऊपर जनसांख्यकीय आधिक्य , पनबिजली योजनाओं तक और जंगलों के जलने से लेकर कंक्रीट के विस्तार ने 

क्षेत्रों में पारिस्थितिकी संवेदनशीलतता को प्रभावित किया है। मौजूद चेतावनियों की अनदेखी भी इस संदर्भ में की गई है ।  


 जिन पर्यावरणविदों को हम विकास का विरोधी घोषित करते हैं उनके द्वारा दी गई संकल्पनाएं आज सही साबित होते दिख रही हैं। हिमालयी राज्यों में देश की ऊर्जा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाए जा रहे बांधों के निर्माण से होने वाले नुकसानों और फायदों के विषय में विस्तृत और विश्वसनीय सूचनाओं का विस्तार आम जन तक सुलभ होने पर ही तुलनात्मक अध्ययन किया जाना संभव है ।  


प्राकृतिक आपदाओं में बाढ़,भूकंप,और भूस्खलन,जंगलों की आग की समस्या का सामना करते ये हिमालयी पहाड़ी राज्य आज एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और सामाजिक सहयोग से कोशिशें तो कर रहे हैं लेकिन पूर्व चेतावनी प्रणाली को और भी तकनीक सम्मत करने की आज आवश्यकता है । साथ ही राज्य सरकारों द्वारा लैंडस्लाइड की संभावना वाले इलाकों में स्थाई मजबूत टनलों के आधार से सीधे खाई में भू पदार्थ जाएं ऐसी व्यवस्था के साथ कदम तेजी से बढ़ाए जाने की आवश्यकता है । आपदा के मानचित्र में पहले से संकेतित स्थलों में आपदा आने के बाद वांछित सामग्रियों जैसे फंसे पर्यटकों, वाहनों, यात्रियों के लिए आवश्यक सामग्रियों के संग्रहण संबधी क्रियान्वयन स्थानीय जनता और पंचायतों के सहयोग से किया जा सकता है । ये प्रयास जान माल की हानि को कम करने में अवश्य सक्षम होंगे । आपदा से पहले , आपदा के दौरान और आपदा के बाद इन तीन विषयों की समझ, योजनाओं के क्रियान्वयन और राज्य की नई नीतियों में इनका स्थान हो तो परिणाम सकारात्मक आयेंगे;इसमें कोई दो राय नहीं।  


13 अक्टूबर को मनाए गए ,वर्ष 2022 के अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण दिवस की थीम पूर्व चेतावनी प्रणाली और सूचनाओं तक पहुंच के आग्रह के साथ हमारे सामने थी । देश के पास मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली के सकारात्मक परिणाम हमने विगत वर्षों में बाढ़,चक्रवात आदि घटनाओं के दौरान कुशल आपदा प्रबंधन के रूप में देखें है जिसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों में भी सराहना मिली है । सेंदई फ्रेमवर्क के अंतर्गत घोषित लक्ष्यों को ध्यान कर पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति को पांच साल के भीतर प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली द्वारा संरक्षित किया जाने की योजना की तरफ बढ़ते संयुक्त राष्ट्र के प्रावधान कब भारत के हिमालयी राज्यों के अंतिम छोर में संघर्षरत व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन लाएंगे यह देखना दिलचस्प होगा।  



 उम्मीद है भूमंडलीय ऊष्मीकरण (ग्लोबल वार्मिंग)अंधाधुंध वृक्षों की कटाई, मिट्टी का क्षरण, प्रदूषण, हमारे वजूद को खतरे में डाल रहे विषयों के साथ केंद्रित होकर आपदाओं को कम करने के सार्थक प्रयासों पर चर्चा जमीन पर भी क्रियान्वित होकर हमारे सामने आएगी। प्राकृतिक आपदाएं रोकी नहीं जा सकती हैं। मगर ठोस प्रबंधन व तकनीकी प्रयोगों से आपदा न्यूनीकरण के प्रयास किए जा सकते हैं। आपदा में जान-माल की क्षति के साथ ही आपदा का पहाड़ उन पर टूटता है जिनकी जान तो बच जाती है, किंतु वो अपने घर, जीविका गंवा देते हैं। मुआवजों को राह तकती आंखें भी तभी सुकून पाएंगी जब किन घटनाओं को प्राकृतिक आपदा माना जायेगा इस पर गहन मंथन के बाद मापदंडों को स्पष्ट बनाया जाए। इन पहाड़ी राज्यों में पीड़ितों के विस्थापन, पुनर्वास व जीवन-यापन के लिए अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता है जिसे अनुच्छेद २१ के तहत जीवन के अधिकार में भी सम्मिलित किया गया है।


जय प्रकाश पाण्डेय 

लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।

शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

भारतीय वायुसेना के विमर्श

 


संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न शांति अभियानों से लेकर पड़ोसी राज्य बांग्लादेश की आजादी तक और विदेशों में फंसे हमारे भारतीयों को उनके घरों तक ऑपरेशन गंगा ,ऑपरेशन राहत जैसे विभिन्न अभियानों आदि द्वारा वापिस लाने से लेकर पड़ोसी राज्यों नेपाल,

श्रीलंका आदि को संकट में रशद सामग्री पहुंचाने तक भारतीय वायु सेना का एक लंबा गौरवमयी इतिहास रहा है । 90 वर्षों के इस गौरवमयी इतिहास में भारतीय संप्रभुता की रक्षा करते हुए भारतीय वायु सेना ने देश की बाहरी चुनौतियों को मुंहतोड़ जवाब दिया है । 



°नभः स्पृशं दीप्तम ध्येय वाक्य के साथ भारतीय वायु सेना 8 अक्टूबर 1932 के दिन रॉयल भारतीय वायु सेना के नाम से अपना कार्य शुरू करती है । द्वितीय विश्वयुद्ध, भारत पाक युद्ध, ऑपरेशन विजय, ऑपरेशन कैक्टस लिली, ऑपरेशन मेघदूत, कारगिल युद्ध और हाल ही में 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक आदि अनेक घटनाएं भारतीय वायु सेना को विश्व की मजबूत वायु सेना के रूप में स्थापित करती हैं । 


वर्तमान बदलते भू- राजनैतिक परिदृश्यों पर गौर करें तो हम पाते हैं परंपरागत सैन्य युद्धों की जगह अब वायु सेना आधारित युद्ध लेते जा रहे हैं । मिसाइलों के बढ़ते फ़्लीट ने वायु सेनाओं की आवश्यकताओं और महत्ता को व्यापक रूप से हमारे सामने रखा है। सैन्य टुकड़ियों के पहुंचने से पहले उनके लिए वायु सेनाओं द्वारा मार्ग क्लियर करवाने की बात हो या फिर भारी बमबारी की, आधुनिक तकनीकी रूप से सशक्त देश ही अपनी संप्रभुता की रक्षा के साथ साथ विश्व के सम्मुख अपना दबदबा रख पाएंगे इसमें कोई दो राय नहीं है । आज जब विश्व के देश अपनी वायु सेनाओं को आधुनिक तकनीकों से लैस और मजबूत करते जा रहे हैं वहीं भारत भी अपनी सेनाओं को आधुनिकता और तकनीक से सशक्त बनाता जा रहा है । विगत वर्षों में भारतीय सेनाओं को प्राप्त ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, अपाचे हेलीकॉप्टर, फ्रांस से खरीदे गए राफेल हेलीकॉप्टर आदि अनेक रक्षा समझौते इसी बात को पुष्ट करते हैं । 


न केवल आयात द्वारा बल्कि आत्मनिर्भर भारत की पृष्ठभूमि में भी हमारे देश की कंपनियों द्वारा वायु सेनाओं को मजबूती प्रदान की जा रही है । हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड द्वारा स्वदेशी तकनीक आधारित बनाए गए तेजस हेलीकॉप्टर का निर्माण इसी का उत्कर्ष है । डीआरडीओ को पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित करने हेतु 11000 करोड़ रूपये आवंटन करना साथ ही वर्ष 2022 -2023 के लिए भारत सरकार द्वारा रक्षा मंत्रालय को 5.25 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं , जो कि पिछले वर्ष के आवंटन से 10 प्रतिशत अधिक है । साथ ही कैबिनेट ने पिछले वर्ष भारतीय वायु सेना के लिए 56 सी-295एमडब्ल्यू परिवहन विमान की खरीद को भी मंजूरी दी हैं । स्वदेश आधारित तकनीकी उपकरणों के निर्माण में अवसंरचनात्मक गतिरोधों के चलते विलंब होना संभव है परंतु आत्मनिर्भरता के शुरूवाती चरणों में यह भी स्वाभाविक ही माना जायेगा । गत दिनों पूर्व हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा देश में विकसित हल्के लड़ाकू हेलिकॉप्टर भी वायुसेना का हिस्सा बन गए। ऊंचे और दुर्गम क्षेत्रों की जंग में वायु सेना की क्षमता और भी ज्यादा बढ़ाते ये हेलीकॉप्टर वायु सेना के आत्मविश्वास के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं। कुछ माह पूर्व आत्मनिर्भर भारत की इसी संकल्पना को आगे बढ़ाते हुए रक्षा मंत्रालय द्वारा भारत डायनामिक्स लिमिटेड के साथ अस्त्र एमके-1 दृष्टिगत रेंज से बाहर के मिसाइल को खरीदने के समझौते पर हस्ताक्षर हुए ।  


21 सदी के भारत को युद्ध की स्थिति में 1970 के उपकरणों से जीत नहीं मिल सकती यह बात तय है । यही कारण है कि सेनाओं के आधुनिकीकरण की बात समय समय पर उठती है । सेनाओं के आधुनिकीकरण की तरफ बढ़ते भारत के कदम एचएएल तेजस दसौल्ट रफेल, सुखोई, जैगुआर, मिग 29, मिराज,सुखोई सु -30 से आगे बढ़कर एचएएल तेजस मार्क 1A,मिराज- 2000, मिग 21, मिग 24, दसाल्ट रफेल के साथ साथ एमएमआरसीए 2.2 , एमडब्ल्यूएफ ,ओरसीए, एएमसीए (पांचवी जेनरेशन ) संबंधी समझौतों तक आज पहुंच चुके हैं । 




भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती हैं आजादी के बाद 90 के दशक से सेवा में लगे विदेशी वायुयानों का प्रबंधन, उसका अनुरक्षण और वांछित स्पेयर पार्ट की उपलब्धता सुनिश्चित करना । इसी संदर्भ में आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को लागू करने का प्रयास किया गया है। आज भारत की खरीद प्रणाली में सुधार के संबंध में कैग द्वारा भी अनुशंसाएं दी गई हैं । मसलन भारत की किसी खरीद को पूरा होने में 8 से 10 वर्षों तक का समय लगता है जिससे वायु सेना की क्षमताएं भी प्रभावित होती हैं । धन, समय और आवश्यकताओं के नजर से यह देरी प्रतिकूल होती है यह निष्कर्ष स्वाभाविक रूप से निकाला जा सकता है। 


वस्तुतः आजादी के बाद से ही भारत ने अलग अलग देशों के युद्ध वायुयानों की खरीद भारत के लिए की है । इसमें कई ऐसे वायुयान हैं जिनकी उत्पादन इकाईयां ही आज बंद हो चुकी हैं । कई वायुयानों का उत्पादन ही बंद हो चुका है ऐसे में अतिरिक्त पार्ट की आवश्यकता और तकनीकी अनुपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन जाती है । हाल ही में हमारे मिग विमान और मिराज के अनुरक्षण के लिए हमें फ्रांस से उनके उपयोग किए गए सेकंड हैंड वायुयान खरीदने की आवश्यकता हुई ऐसे में खरीद की वर्तमान समय सीमा को देखते हुए खरीद के साथ ही उनकी प्रतिस्थापना के प्रस्ताव भी साथ ही सरकारी तंत्र में आगे बढ़ जाने चाहिए।  


हमें आज स्क्वॉड्रन् , पायलटों और अन्य प्रभागों की संख्या में अपेक्षित वृद्धि करने की आवश्यकता है । कई ऐसे मामले आया हैं जहां सेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर जाबांज प्राइवेट एयरलाइंस के साथ कार्य कर रहे हैं। अतः ऐसे में आवश्यकता है वेतनमान और अन्य सुविधाओं को बढ़ाए जाने की ताकि युवाओं और अनुभवी जाबांजों के मनोबल में कोई कमी न आए । इग्नू, आदि दूरस्थ शिक्षा के माध्यमों तक इन जाबांजों की पहुंच बढ़ाए जाना एक अच्छा कदम सिद्ध होगा।  


हमें आवश्यकता है आज तजिकिस्तान सरीखे हमारे बेस बढ़ाने की ताकि विपरीत परिस्थितियों में भी हम उच्च प्रदर्शन कर पाएं । मलक्का जलसंधि क्षेत्र, चीन और विशेषकर हिंद महासागर के संदर्भ में विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है । आर्टिफिशियल इंटीलीजेंस से युक्त नवोन्मेषों के लिए , युवा मस्तिष्कों को आकर्षित किया जाना चाहिए । इस संदर्भ में पर्याप्त फंड की व्यवस्था,उसका नियमन और अनुसंधान में वह फंड लगे, ऐसे व्यवस्था की जानी अपेक्षित है ।  


जय प्रकाश पाण्डेय 

लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।


अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

  युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र   की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है   । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोल...