संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न शांति अभियानों से लेकर पड़ोसी राज्य बांग्लादेश की आजादी तक और विदेशों में फंसे हमारे भारतीयों को उनके घरों तक ऑपरेशन गंगा ,ऑपरेशन राहत जैसे विभिन्न अभियानों आदि द्वारा वापिस लाने से लेकर पड़ोसी राज्यों नेपाल,
श्रीलंका आदि को संकट में रशद सामग्री पहुंचाने तक भारतीय वायु सेना का एक लंबा गौरवमयी इतिहास रहा है । 90 वर्षों के इस गौरवमयी इतिहास में भारतीय संप्रभुता की रक्षा करते हुए भारतीय वायु सेना ने देश की बाहरी चुनौतियों को मुंहतोड़ जवाब दिया है ।
°नभः स्पृशं दीप्तम ध्येय वाक्य के साथ भारतीय वायु सेना 8 अक्टूबर 1932 के दिन रॉयल भारतीय वायु सेना के नाम से अपना कार्य शुरू करती है । द्वितीय विश्वयुद्ध, भारत पाक युद्ध, ऑपरेशन विजय, ऑपरेशन कैक्टस लिली, ऑपरेशन मेघदूत, कारगिल युद्ध और हाल ही में 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक आदि अनेक घटनाएं भारतीय वायु सेना को विश्व की मजबूत वायु सेना के रूप में स्थापित करती हैं ।
वर्तमान बदलते भू- राजनैतिक परिदृश्यों पर गौर करें तो हम पाते हैं परंपरागत सैन्य युद्धों की जगह अब वायु सेना आधारित युद्ध लेते जा रहे हैं । मिसाइलों के बढ़ते फ़्लीट ने वायु सेनाओं की आवश्यकताओं और महत्ता को व्यापक रूप से हमारे सामने रखा है। सैन्य टुकड़ियों के पहुंचने से पहले उनके लिए वायु सेनाओं द्वारा मार्ग क्लियर करवाने की बात हो या फिर भारी बमबारी की, आधुनिक तकनीकी रूप से सशक्त देश ही अपनी संप्रभुता की रक्षा के साथ साथ विश्व के सम्मुख अपना दबदबा रख पाएंगे इसमें कोई दो राय नहीं है । आज जब विश्व के देश अपनी वायु सेनाओं को आधुनिक तकनीकों से लैस और मजबूत करते जा रहे हैं वहीं भारत भी अपनी सेनाओं को आधुनिकता और तकनीक से सशक्त बनाता जा रहा है । विगत वर्षों में भारतीय सेनाओं को प्राप्त ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, अपाचे हेलीकॉप्टर, फ्रांस से खरीदे गए राफेल हेलीकॉप्टर आदि अनेक रक्षा समझौते इसी बात को पुष्ट करते हैं ।
न केवल आयात द्वारा बल्कि आत्मनिर्भर भारत की पृष्ठभूमि में भी हमारे देश की कंपनियों द्वारा वायु सेनाओं को मजबूती प्रदान की जा रही है । हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड द्वारा स्वदेशी तकनीक आधारित बनाए गए तेजस हेलीकॉप्टर का निर्माण इसी का उत्कर्ष है । डीआरडीओ को पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित करने हेतु 11000 करोड़ रूपये आवंटन करना साथ ही वर्ष 2022 -2023 के लिए भारत सरकार द्वारा रक्षा मंत्रालय को 5.25 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं , जो कि पिछले वर्ष के आवंटन से 10 प्रतिशत अधिक है । साथ ही कैबिनेट ने पिछले वर्ष भारतीय वायु सेना के लिए 56 सी-295एमडब्ल्यू परिवहन विमान की खरीद को भी मंजूरी दी हैं । स्वदेश आधारित तकनीकी उपकरणों के निर्माण में अवसंरचनात्मक गतिरोधों के चलते विलंब होना संभव है परंतु आत्मनिर्भरता के शुरूवाती चरणों में यह भी स्वाभाविक ही माना जायेगा । गत दिनों पूर्व हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा देश में विकसित हल्के लड़ाकू हेलिकॉप्टर भी वायुसेना का हिस्सा बन गए। ऊंचे और दुर्गम क्षेत्रों की जंग में वायु सेना की क्षमता और भी ज्यादा बढ़ाते ये हेलीकॉप्टर वायु सेना के आत्मविश्वास के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं। कुछ माह पूर्व आत्मनिर्भर भारत की इसी संकल्पना को आगे बढ़ाते हुए रक्षा मंत्रालय द्वारा भारत डायनामिक्स लिमिटेड के साथ अस्त्र एमके-1 दृष्टिगत रेंज से बाहर के मिसाइल को खरीदने के समझौते पर हस्ताक्षर हुए ।
21 सदी के भारत को युद्ध की स्थिति में 1970 के उपकरणों से जीत नहीं मिल सकती यह बात तय है । यही कारण है कि सेनाओं के आधुनिकीकरण की बात समय समय पर उठती है । सेनाओं के आधुनिकीकरण की तरफ बढ़ते भारत के कदम एचएएल तेजस दसौल्ट रफेल, सुखोई, जैगुआर, मिग 29, मिराज,सुखोई सु -30 से आगे बढ़कर एचएएल तेजस मार्क 1A,मिराज- 2000, मिग 21, मिग 24, दसाल्ट रफेल के साथ साथ एमएमआरसीए 2.2 , एमडब्ल्यूएफ ,ओरसीए, एएमसीए (पांचवी जेनरेशन ) संबंधी समझौतों तक आज पहुंच चुके हैं ।
भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती हैं आजादी के बाद 90 के दशक से सेवा में लगे विदेशी वायुयानों का प्रबंधन, उसका अनुरक्षण और वांछित स्पेयर पार्ट की उपलब्धता सुनिश्चित करना । इसी संदर्भ में आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को लागू करने का प्रयास किया गया है। आज भारत की खरीद प्रणाली में सुधार के संबंध में कैग द्वारा भी अनुशंसाएं दी गई हैं । मसलन भारत की किसी खरीद को पूरा होने में 8 से 10 वर्षों तक का समय लगता है जिससे वायु सेना की क्षमताएं भी प्रभावित होती हैं । धन, समय और आवश्यकताओं के नजर से यह देरी प्रतिकूल होती है यह निष्कर्ष स्वाभाविक रूप से निकाला जा सकता है।
वस्तुतः आजादी के बाद से ही भारत ने अलग अलग देशों के युद्ध वायुयानों की खरीद भारत के लिए की है । इसमें कई ऐसे वायुयान हैं जिनकी उत्पादन इकाईयां ही आज बंद हो चुकी हैं । कई वायुयानों का उत्पादन ही बंद हो चुका है ऐसे में अतिरिक्त पार्ट की आवश्यकता और तकनीकी अनुपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन जाती है । हाल ही में हमारे मिग विमान और मिराज के अनुरक्षण के लिए हमें फ्रांस से उनके उपयोग किए गए सेकंड हैंड वायुयान खरीदने की आवश्यकता हुई ऐसे में खरीद की वर्तमान समय सीमा को देखते हुए खरीद के साथ ही उनकी प्रतिस्थापना के प्रस्ताव भी साथ ही सरकारी तंत्र में आगे बढ़ जाने चाहिए।
हमें आज स्क्वॉड्रन् , पायलटों और अन्य प्रभागों की संख्या में अपेक्षित वृद्धि करने की आवश्यकता है । कई ऐसे मामले आया हैं जहां सेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर जाबांज प्राइवेट एयरलाइंस के साथ कार्य कर रहे हैं। अतः ऐसे में आवश्यकता है वेतनमान और अन्य सुविधाओं को बढ़ाए जाने की ताकि युवाओं और अनुभवी जाबांजों के मनोबल में कोई कमी न आए । इग्नू, आदि दूरस्थ शिक्षा के माध्यमों तक इन जाबांजों की पहुंच बढ़ाए जाना एक अच्छा कदम सिद्ध होगा।
हमें आवश्यकता है आज तजिकिस्तान सरीखे हमारे बेस बढ़ाने की ताकि विपरीत परिस्थितियों में भी हम उच्च प्रदर्शन कर पाएं । मलक्का जलसंधि क्षेत्र, चीन और विशेषकर हिंद महासागर के संदर्भ में विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है । आर्टिफिशियल इंटीलीजेंस से युक्त नवोन्मेषों के लिए , युवा मस्तिष्कों को आकर्षित किया जाना चाहिए । इस संदर्भ में पर्याप्त फंड की व्यवस्था,उसका नियमन और अनुसंधान में वह फंड लगे, ऐसे व्यवस्था की जानी अपेक्षित है ।
जय प्रकाश पाण्डेय
लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।
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