बीते दिनों जब पूरा विश्व अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण दिवस ( 13 अक्टूबर) को मना रहा था उसी से 3 दिन पहले उत्तराखंड के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में जनमानस अत्यधिक बारिश के कारण होने वाले भूस्खलन, गिरते पहाड़ ,पत्थरों और इनके कारण बंद होने की स्थिति में पहुंची सड़कों से संघर्ष कर रहा था । न केवल उत्तराखंड बल्कि विगत वर्षों के कुछ अनुभव हमें पूरे हिमालयी राज्यों में मौसमी दशाओं के बदलते ट्रेंड और उससे आने वाली आपदाओं को हमारे सामने रखते हैं , और यह स्थिति कमोबेश अनेक वर्षों से जारी है ।
अत्यधिक वर्षा के कारण उत्तराखंड,हिमाचल के साथ साथ पूर्वोत्तर के राज्यों को भी इस स्थिति का सामना करना पड़ा है । विगत वर्ष राष्ट्रीय राजमार्ग-6 जोकि मणिपुर,मिजोरम,त्रिपुरा,और दक्षिणी असम को जोड़ता है
काफी दिनों तक मुख्यधारा से कटा रहा । रोंटी ग्लेशियर से अलग हुए बर्फ खंड से उत्पन्न बाढ़ की स्थिति ने 70 से ज्यादा लोगों की जिंदगी उत्तराखंड में ली । किन्नौर जिले में भूस्खलन से हुई जनहानि भी इसी कड़ी में एक और उदाहरण है । लोकसभा में एक प्रश्न के प्रतिउत्तर के आधार पर देखें तो इस वर्ष 2021-2022 जुलाई माह तक प्राकृतिक आपदाओं से 1098 जिंदगियों को हमने खोया है । यह स्थिति हिमालयी राज्यों तक ही सीमित न रहकर उत्तरप्रदेश,कर्नाटक,राजस्थान आदि राज्यों तक है ,सभी इससे प्रभावित रहे हैं । अभी हमारे दिमाग से चक्रवात गुलाब, चक्रवात शाहीन और चक्रवात यास आदि से हुए मिलियनों के नुकसान की स्मृति मिटी नहीं हैं कि फिर से हम प्राकृतिक आपदाओं से जूझने लगे हैं। कर्नाटक,महाराष्ट्र और तमिलनाडु में जन्मी परिस्थितियों ने हमें हमारे बाढ़ प्रबंधन और प्राकृतिक आपदा के प्रबंधन संबंधी मॉडलों पर विचार करने को बाध्य किया है।
जन,जंगल,जमीन और जानवर को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारणों की लंबी फेहरिस्त में मानवीय क्रियाकलापों और उसमें भी विशेषतः इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास (अवसंरचनात्मक विकास) के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी महत्ती भूमिका हमें देखने को मिल रही है । सड़क विस्तार परियोजनांओ से लेकर पर्यटन स्थलों के ऊपर जनसांख्यकीय आधिक्य , पनबिजली योजनाओं तक और जंगलों के जलने से लेकर कंक्रीट के विस्तार ने
क्षेत्रों में पारिस्थितिकी संवेदनशीलतता को प्रभावित किया है। मौजूद चेतावनियों की अनदेखी भी इस संदर्भ में की गई है ।
जिन पर्यावरणविदों को हम विकास का विरोधी घोषित करते हैं उनके द्वारा दी गई संकल्पनाएं आज सही साबित होते दिख रही हैं। हिमालयी राज्यों में देश की ऊर्जा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाए जा रहे बांधों के निर्माण से होने वाले नुकसानों और फायदों के विषय में विस्तृत और विश्वसनीय सूचनाओं का विस्तार आम जन तक सुलभ होने पर ही तुलनात्मक अध्ययन किया जाना संभव है ।
प्राकृतिक आपदाओं में बाढ़,भूकंप,और भूस्खलन,जंगलों की आग की समस्या का सामना करते ये हिमालयी पहाड़ी राज्य आज एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और सामाजिक सहयोग से कोशिशें तो कर रहे हैं लेकिन पूर्व चेतावनी प्रणाली को और भी तकनीक सम्मत करने की आज आवश्यकता है । साथ ही राज्य सरकारों द्वारा लैंडस्लाइड की संभावना वाले इलाकों में स्थाई मजबूत टनलों के आधार से सीधे खाई में भू पदार्थ जाएं ऐसी व्यवस्था के साथ कदम तेजी से बढ़ाए जाने की आवश्यकता है । आपदा के मानचित्र में पहले से संकेतित स्थलों में आपदा आने के बाद वांछित सामग्रियों जैसे फंसे पर्यटकों, वाहनों, यात्रियों के लिए आवश्यक सामग्रियों के संग्रहण संबधी क्रियान्वयन स्थानीय जनता और पंचायतों के सहयोग से किया जा सकता है । ये प्रयास जान माल की हानि को कम करने में अवश्य सक्षम होंगे । आपदा से पहले , आपदा के दौरान और आपदा के बाद इन तीन विषयों की समझ, योजनाओं के क्रियान्वयन और राज्य की नई नीतियों में इनका स्थान हो तो परिणाम सकारात्मक आयेंगे;इसमें कोई दो राय नहीं।
13 अक्टूबर को मनाए गए ,वर्ष 2022 के अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण दिवस की थीम पूर्व चेतावनी प्रणाली और सूचनाओं तक पहुंच के आग्रह के साथ हमारे सामने थी । देश के पास मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली के सकारात्मक परिणाम हमने विगत वर्षों में बाढ़,चक्रवात आदि घटनाओं के दौरान कुशल आपदा प्रबंधन के रूप में देखें है जिसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों में भी सराहना मिली है । सेंदई फ्रेमवर्क के अंतर्गत घोषित लक्ष्यों को ध्यान कर पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति को पांच साल के भीतर प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली द्वारा संरक्षित किया जाने की योजना की तरफ बढ़ते संयुक्त राष्ट्र के प्रावधान कब भारत के हिमालयी राज्यों के अंतिम छोर में संघर्षरत व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन लाएंगे यह देखना दिलचस्प होगा।
उम्मीद है भूमंडलीय ऊष्मीकरण (ग्लोबल वार्मिंग)अंधाधुंध वृक्षों की कटाई, मिट्टी का क्षरण, प्रदूषण, हमारे वजूद को खतरे में डाल रहे विषयों के साथ केंद्रित होकर आपदाओं को कम करने के सार्थक प्रयासों पर चर्चा जमीन पर भी क्रियान्वित होकर हमारे सामने आएगी। प्राकृतिक आपदाएं रोकी नहीं जा सकती हैं। मगर ठोस प्रबंधन व तकनीकी प्रयोगों से आपदा न्यूनीकरण के प्रयास किए जा सकते हैं। आपदा में जान-माल की क्षति के साथ ही आपदा का पहाड़ उन पर टूटता है जिनकी जान तो बच जाती है, किंतु वो अपने घर, जीविका गंवा देते हैं। मुआवजों को राह तकती आंखें भी तभी सुकून पाएंगी जब किन घटनाओं को प्राकृतिक आपदा माना जायेगा इस पर गहन मंथन के बाद मापदंडों को स्पष्ट बनाया जाए। इन पहाड़ी राज्यों में पीड़ितों के विस्थापन, पुनर्वास व जीवन-यापन के लिए अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता है जिसे अनुच्छेद २१ के तहत जीवन के अधिकार में भी सम्मिलित किया गया है।
जय प्रकाश पाण्डेय
लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।
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