सोमवार, 17 जून 2024

अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

 



युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र  की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है  । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोलन से लेकर सम्पूर्ण क्रांति और समसामयिक अनेक आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार करने और  जनतांत्रिक मूल्यों के संवर्धन में  एक उल्लेखनीय भूमिका निभाई है । बीते वर्ष यही युवा वर्ग उत्तराखंड में पेपर लीक प्रकरणों के विरुद्ध मुखर हुआ था, कुछ माह पूर्व यही युवा वर्ग लखनऊ में उत्तर प्रदेश सब इंस्पेक्टर परीक्षा धांधली के विरोध में अपने अधिकारों के लिए मुखर हो रहा था। ज्यादा समय नहीं बीता है जब यही युवा बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा के लीक प्रश्नपत्र के लिए भी मुखरित हुआ था । व्यापम घोटाले के सामने आने पर भी यही युवा मुखरित हुआ था और आज फिर से भारत में प्रतिवर्ष सबसे ज्यादा उम्मीदवार जिस परीक्षा में बैठते है उस  नीट ( यूजी) के संदर्भ में भी यही परिस्थितियां  निर्मित हो रही  हैं , लेकिन इन सबके बीच एक सकारात्मक बात यह है कि वर्तमान भारत के युवाओं ने प्रतिरोध के रास्तों को बखूबी समझा है  और आज का युवा सड़कों में हल्लाबोल और विरोध प्रदर्शन  से अधिक अदालती कार्यवाही के माध्यम से न्याय की तरफ आगे बढ़ता दिख रहा है।

 नीट (यूजी) परीक्षा 2024 विषयक अनियमितताएं 

 

देश भर के सरकारी और निजी संस्थानों में एमबीबीएस, बीडीएस, आयुष और अन्य संबंधित पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए एनटीए द्वारा एनईईटी-यूजी परीक्षा आयोजित की जाती है। इस वर्ष लगभग 4750 सेंटर्स में 23 लाख बच्चे मेडिकल क्षेत्र में जाने के लिए इस परीक्षा में उपस्थित हुए । इस परीक्षा का परिणाम वैसे तो 14 जून को प्रस्तावित था लेकिन जब पूरा देश चुनावों के रुझानों को देखने में व्यस्त था उसी समय इस परीक्षा का परिणाम घोषित कर दिया गया। परीक्षा परिणामों में अनियमितताएं देखी गई। प्रतिरोध के स्वरों को पहले तो अनुसुना ही कर दिया गया ,लेकिन आज यह मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंच चुका है। विभिन्न उच्च न्यायालयों में अनेक रिट इस संदर्भ में दायर ही चुकी हैं । इस संदर्भ में निम्नलिखित अनियमितताएं देखी जा रही हैं ।

 

1.नीट के प्रश्न पत्र में 180 प्रश्न होते हैं, जिसमें एक प्रश्न के लिए प्रत्येक सही उत्तर का भार 4 अंक होता है, इसलिए कुल अंक 720 होते हैं। गलत उत्तरों के लिए 4 अंक काट लिए जाते हैं।  नीट परीक्षा के  परिणाम आने के बाद यह देखने को मिला कि कुछ बच्चों को 720 में से 718 और 719 नंबर मिले हैं जो कि किसी भी तरह संभव नहीं है और इन्हीं पर सवाल उठने के बाद एनटीए ने ग्रेस मार्क्स देने की बात मानी थी । बिना किसी पूर्व सूचना के ग्रेस मार्क्स देने की यह परंपरा अपने आप में ऐतिहासिक थी । अभी तक प्राप्त सूचना अनुसार नीट परीक्षा में बैठने वाले 1563 छात्रों को इस बार ग्रेस मार्क्स मिले है । एनटीए पर जब सवाल उठे तो उसने यह माना कि इस बार उसने छात्रों को ग्रेस मार्क्स दिए हैं क्योंकि कई जगह एग्जाम देरी से शुरू हुआ था।

जब यह मामला  सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो एनटीए ने यह मान लिया कि ग्रेस मार्क्स देना गलत था ।

 

2. पहले यह विवाद केवल ग्रेस मार्क्स प्रदान करने तक सीमित था लेकिन  बिहार और गुजरात पुलिस ने शानदार कार्य करते हुए एक ऐसे घोटाले का खुलासा किया जिसके कारण आज पेपर लीक की संभावनाओं को भी बल मिला है ।  बीते 5 मई को पटना पुलिस ने एक ऐसा गैंग पकड़ा, जिसने स्वीकारा है कि कई छात्रों को एक रात पहले ही एग्जाम पेपर सॉल्व करवाया था । हाल के दिनों में बिहार पुलिस की  आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) ने छह पोस्ट-डेटेड चेक भी बरामद किए हैं, जिनके बारे में संदेह है कि ये चेक माफिया के पक्ष में जारी किए गए थे । पूछताछ में बच्चों द्वारा यह भी स्वीकारा गया की उनके अभिभावकों ने मोटी कीमत इसके लिए चुकाई है ।

 

3. तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु सेंटर हाईजैकिंग का है । इस वर्ष कुल 67 बच्चों के 720 में से 720 अंक आए हैं । आज तक के मेडिकल परीक्षा के इतिहास में यह पहला ऐसा क्षण है। हरियाणा के बहादुरगढ़ में स्थित हरदयाल पब्लिक स्कूल में 6 बच्चों को  720 में से 720 अंक प्राप्त हुए हैं। ये ऐसे बच्चे हैं जिनको परीक्षा व्यवस्थाओं में कमी के चलते ग्रेस मार्क्स दिए गए । एक ही सेंटर और उसमें भी एक ही कक्षा से इस तरह का परिणाम अप्रत्याशित है वहीं  गुजरात के गोधरा के जलाराम स्कूल में नीट का एग्जामिनेशन सेंटर में  30 छात्रों को गलत तरीके से एग्जाम दिलवाने के आरोप सिद्ध होते जा रहे हैं।  खास बात यह है कि इस सेंटर में गुजरात के लोकल स्टूडेंट्स के अलावा  महाराष्ट्र, उड़ीसा, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों से भी स्टूडेंट्स आए थे । अपने प्रदेश को छोड़कर गुजरात के गोधरा के इस सेंटर में जाकर परीक्षा देने की बात भी संदेह पैदा करने वाली है ।

 

भारत में विगत एक दशक में अनियमितताएं /पेपर लीक प्रकरणों का इतिहास

भारत में ऐसा नहीं है कि इस तरह की  घटनाएं पहली बार सामने आ रही हैं । अतीत के कड़वे अनुभवों ने हमें बताया है कि स्कूली शिक्षा से लेकर, उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में किस तरह अनियमितताएं और विशेषकर पेपर लीक प्रकरण पूरे देश में  घटित हुए हैं। शिथिल कानूनों ने अंतर्राज्यीय गिरोहों को और भी सक्रिय करने में अहम भूमिका निभाई है। विद्यालयी शिक्षा, उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में विगत वर्षों के कुछ कड़वे अनुभव निम्नलिखित हैं।

विद्यालयी शिक्षा और अनियमितताएं

 

अक्टूबर 2014 में, पेपर लीक की रिपोर्ट सामने आने के बाद महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को हायर सेकेंडरी सर्टिफिकेट (एचएससी) परीक्षा का भौतिकी का पेपर रद्द करना पड़ा। बोर्ड ने परीक्षा को बाद की तारीख के लिए पुनर्निर्धारित किया । अप्रैल 2016 में, कर्नाटक माध्यमिक शिक्षा परीक्षा बोर्ड (केएसईईबी) ने पेपर लीक की रिपोर्ट सामने आने के बाद  विज्ञान का पेपर रद्द कर दिया।

मार्च 2017 में, बड़े पैमाने पर नकल और पेपर लीक की रिपोर्ट के बाद बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड ने कला, विज्ञान और वाणिज्य स्ट्रीम के लिए इंटरमीडिएट परीक्षा रद्द कर दी।  वर्ष 2018 में, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की 12वीं कक्षा की अर्थशास्त्र परीक्षा के दौरान एक पेपर लीक की सूचना मिली थी, जिससे देश भर में 15 लाख से अधिक छात्र प्रभावित हुए थे। वर्ष 2019 में, सोशल मीडिया पर प्रश्न पत्र लीक होने के कारण नागालैंड बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन (एनबीएसई) को अंग्रेजी और वैकल्पिक अंग्रेजी के लिए कक्षा 12 की परीक्षा बीच में ही रद्द करनी पड़ी थी।

 

प्रतियोगी परीक्षाएं और अनियमितताएं

प्रतियोगी परीक्षाओं में भी पूरे देश में रिकार्ड अनियमितताएं देखने को मिलती हैं । वर्ष 2013 में एसएससी पेपर लीक प्रकरण के कारण परीक्षा को ही निरस्त कर दिया गया था। वर्ष 2014 में , मध्य प्रदेश पुलिस भर्ती परीक्षा के दौरान बड़े पैमाने पर पेपर लीक की सूचना मिली थी । वर्ष 2015 में, दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड परीक्षा के दौरान  पेपर लीक की सूचना मिली थी, जिसके कारण परीक्षा रद्द कर दी गई और परीक्षा को पुनर्निर्धारित किया गया।  वर्ष 2015 में, असम लोक सेवा आयोग (एपीएससी) पेपर लीक प्रकरण सामने आया था । वर्ष 2016 में, नागालैंड सिविल सेवा परीक्षा के दौरान बड़े पैमाने पर पेपर लीक हुआ, जिसके कारण व्यापक विरोध प्रदर्शन हुआ और दोबारा परीक्षा की मांग की गई।  फरवरी 2018 में, कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) संयुक्त स्नातक स्तर (सीजीएल) परीक्षा में पेपर लीक के आरोपों से हिल गया था,  विवाद के कारण अंततः परीक्षा रद्द कर दी गई और पुनर्निर्धारित की गई । सितंबर 2018 में, पेपर लीक की रिपोर्ट के बाद तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड  ने कांस्टेबल पद के लिए परीक्षा रद्द कर दी।

 दिसंबर 2018 में ही  पेपर लीक की रिपोर्ट के बाद हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग (एचएसएससी) ने कांस्टेबल पद के लिए परीक्षा रद्द कर दी। मार्च 2018 में, कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) ने पेपर लीक और ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली में तकनीकी गड़बड़ियों की रिपोर्ट के बाद संयुक्त स्नातक स्तर (सीजीएल) की टियर- I परीक्षा रद्द कर दी थी।

उत्तराखंड में तो एक पूरी श्रृंखला पेपर लीक प्रकरणों से संबंधित हमारे सामने आई। ऐसे अनेकों उद्धरण शोध करने पर हमको अभी और मिल सकते हैं जिन्होंने युवाओं की मानसिक,आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर  कुठराघात किया है ।

उच्च शिक्षा संबंधी परीक्षाएं और अनियमितताएं

 

अप्रैल 2015 में, राष्ट्रीय स्तर की इंजीनियरिंग संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) मेन, के प्रश्न पत्र लीक करने के आरोप में पांच लोगों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था। मई 2015 में, बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी और पेपर लीक की रिपोर्ट के बाद ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट (एआईपीएमटी) रद्द कर दिया गया था।

 मई 2016 में, तेलंगाना स्टेट इंजीनियरिंग, एग्रीकल्चर और मेडिकल कॉमन एंट्रेंस टेस्ट  पेपर लीक की खबरों से प्रभावित हुआ था, कई छात्रों और अभिभावकों ने आरोप लगाया था कि भौतिकी और रसायन विज्ञान के पेपर पहले ही लीक हो चुके थे। 

 

अनियमितताओं को रोकने के लिए किए गए प्रयास

 

ऐसा नहीं है कि अतीत की प्रश्नपत्र लीक होने वाली घटनाओं के सीख नहीं ली गई है । पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा केंद्रों में प्रवेश के समय नकल रोकने के लिए कपड़ों की बाहें तक कटवाई गई हैं । केरल में छात्राओं को इनर वियर उतारने के लिए  नीट की परीक्षा के दौरान निर्देशित किया गया । अन्य जगहों पर समय समय पर नाक -कानों की परंपरागत बालियां तक उतरवाई गई हैं । सांस्कृतिक और परंपरागत प्रतीकों जैसेेे रक्षा कवच को परीक्षा केंद्रों में कैंची से काट कर कूड़ेदान में फेंका गया है । ऐसे में इन सभी चीजों को सह रहा वास्तविक युवा यही चाहता है कि ढकोसले में न पड़कर वास्तविक रूप से प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और परीक्षा को परीक्षा जैसे बनाए रखने का काम हो । उपरोक्त बताए गई वास्तविक घटनाएं कितना नकल रोकने में सक्षम हैं यह सोचनीय विषय है । और यदि उपरोक्त के आधार पर नकल रोकने की हम उम्मीद कर रहे हैं तो हम डिजिटल होते भारत की समझ से काफी दूर हैं ।

भारतीय न्याय संहिता में कठोर नियमनों के प्रावधान के जरिए ऐसे माफियाओं को रोकने के सार्थक प्रयास होने चाहिए । आज वह समय आ गया है कि इस विषय पर जन पटल पर परिचर्चा हो कि परीक्षा केंद्रों को किन आधारों पर संबद्ध किया जाता है ?किन आधारों पर ऐसे  परीक्षाकेंद्र संबद्ध हो जाते हैं जहां अलग कमरे में बैठा के पेपर लीक कराया जाता है ? किन आधारों पर एक राज्य में प्रतिबंधित एजेंसी को दूसरे राज्य में परीक्षा आयोजित करने की अनुमति मिल जाती है ?किन आधारों पर ऐसे परीक्षा केंद्रों को संबद्ध किया जाता है जहां बाहर से परीक्षा देने आए छात्रों के बैग रखने और चिलचिलाती गर्मी में पंखे तक की व्यवस्था नहीं होती ?

किन आधारों पर ऐसे केंद्रों को परीक्षा केंद्र बनाया जाता है जहां स्नातक डिग्री के आधार पर परीक्षा दे रहा छात्र कक्षा 5 में पढ़ने वाले बच्चे के टेबल- कुर्सी में बैठकर परीक्षा देता है ? 2 घंटे की परीक्षा में जहां दशमलव का भी महत्व होता है वहां इन भौतिक कमियों को आज के समय में तो हम दरकिनार कर ही नहीं सकते।

 

इस समय शायद ही कोई उन 23 लाख  बच्चों  की मानसिक  स्थिति का आंकलन कर पाए। आज वह समय आ गया है जब इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के क्रम में उत्तरदाई लोगों  पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही हो और सीबीआई जांच द्वारा ऐसे कृत्यों के सच को सामने लाया जाए।

 

 

 

मंगलवार, 2 अप्रैल 2024

वैश्विक वनाग्नि की बढ़ती घटनाएं

 


जय प्रकाश पांडेय

 

 

आंध्रप्रदेश,उड़ीसा तेलंगाना,में वनाग्नि पिछले एक माह में अपने उच्चतम स्तर में देखी जा रही है। भारत के दो हिमालयी राज्य, उत्तराखंड और हिमाचल, उन राज्यों में पहले और दूसरे स्थान पर हैं, जहां 2023-2024 में सबसे अधिक आग की चेतावनी दी गई थी।  उत्तराखंड में वनों का जलना शुरू हो चुका है।  पिछले वर्ष  कनाडा के नोवा स्कोटिया प्रांत के सबसे बड़े शहर हैलिफ़ैक्स, अमेरिका के वेस्टवुड हिल्स आदि  क्षेत्रों में  वनाग्नि की घटनाओं ने हजारों परिवारों को  विस्थापित कर दिया है | हिमाचल प्रदेश की बात करें तो भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) के आंकड़ों के अनुसार,  अक्टूबर, 2023 और  जनवरी, 2024 के बीच जंगल में आग लगने की 2,050 घटनाएं हुई हैं। पिछले साल इसी अवधि में जंगल में आग लगने की सिर्फ 296 घटनाएं हुई थीं । वनाग्नी की घटनाओं में यह बारंबारता तेजी से बढ़ रही है 

 

जन,जंगल,जमीन,जानवर, की कीमत पर  वन संसाधनों और आवश्यकीय कार्बन को खोने का यह सिलसिला  पूरे विश्व में जारी है। कुछ ही वर्ष पूर्व अमेजन के जंगलों में लगी आग के दृश्य हो, वर्ष 2016 में उत्तराखंड की आग के भयावह मंजर, या वर्ष 2021 में हिमाचल प्रदेश, नागालैंड-मणिपुर सीमा,ओडिशा, में जंगलों की आग, वनाग्नि की श्रृंखलाओ  को  बढ़ते हमने  देखा है।

 

पर्यावरण वन एवं जलवायु  मंत्रालय  के अनुसार महाराष्ट्र, दक्षिणी छत्तीसगढ़ और तेलंगाना और आंध्र प्रदेश , मध्य ओडिशा के क्षेत्र वनाग्नि की दृष्टि से अत्यंत प्रवण  हॉटस्पॉट में तेजी से बदल रहे हैं। विगत वर्ष हिमाचल के कुल्लू की उझी घाटी के दुआड़ा गांव से सटे चील के जंगल में आग की खबरों को भी हम सबने देखा है ।

 

 

वनों की उपयोगिता और वनाग्नि का प्रसार

 

 

मनुष्य के जीवन का  अधिकांश भाग  प्रकृति से  संबंधित है। वन इन्हीं संबंधों की  प्राथमिक ईकाई है। सनातन पद्धति की ऐसी  जीवनशैली ने ही वनों को देवता या पवित्र स्थलों के रूप में भी स्थापित किया । हमारी प्राण वायु वनों की कर्जदार है लेकिन मनुष्य ने अपने स्वभावगत विशेषताओं का परिचय देते हुए प्रकृति का जो दोहन किया  है उसका ही खामियाजा वर्तमान शताब्दी में हम भोग रहे हैं। । आज भूतापन ,भू-क्षरण, भू-स्खलन और त्वरित बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। जलवायु परिवर्तन के वीभत्त्स रूपों से विगत वर्षों में  हम सबका सामना हुआ है |

 

 

भारत के वन क्षेत्र  का लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा आज वनाग्नि  की दृष्टि से अत्यधिक सुबेध है। वनाग्नि  न केवल किसी क्षेत्र की जलवायु को प्रभावित करती है बल्कि उस क्षेत्र की जलवायु भी वनाग्नि  की तीव्रता, वनाग्नि  के प्रकार और आकार को प्रभावित करती है । पूरे विश्व में वनाग्नि की घटनाओं की तीव्रता और आवृति में विगत वर्षों में वृद्धि हुई है  । भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) द्वारा उपग्रह आधारित रिपोर्ट के अनुसार,  मार्च के प्रथम चतुर्थांस में देशभर में  लगभग 42,799 वनाग्नि का पता चला है। केवल मार्च माह में ही भारत  में कर्नाटक में 437 प्रमुख वनाग्नि का उल्लेख मिला है । उड़ीसा में 376,महाराष्ट्र में 249 , आंध्र प्रदेश में 180, मध्य प्रदेश में 117 वानग्नि की जानकारी हमें मिली है ।

 

 

वनाग्नि के कारण

 

वनाग्नि सबसे अधिक मार्च और अप्रैल के दौरान दर्ज की जाती है, जब जमीन में बड़ी मात्रा में सूखी लकड़ी, मृत पत्ते, सूखी घास और खरपतवार होते हैं। मानवीय गतिविधियों के अलावा प्राकृतिक परिस्थितियों में, अत्यधिक गर्मी और सूखापन, और शाखाओं की रगड़ से बनाया गया घर्षण भी इस आग का पोषण करता है |

 

दरअसल वनों की बढ़ती आग का एक  प्रमुख कारण पृथ्वी का भू-तापन है । हमारी लापरवाही  और वैश्विक इच्छाशक्ति की कमी ने तमाम संधियों पर हस्ताक्षर करने के बाद भी भूताप को कम करने की दिशा में कोई ठोस कदम अभी नहीं उठाया है।  मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार फरवरी में देश में 7.2 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो 1901 के बाद से इस महीने में छठा सबसे निचला स्तर है। मध्य भारत में इस महीने में 99% बारिश की कमी ; उत्तर पश्चिम भारत में 76%; दक्षिणी प्रायद्वीप में  54%; और पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में 35%,वर्षा में कमी देखी गई।

 

भारतीय वनाग्नि का एक अन्य प्रमुख कारण जाने- अनजाने में  की गई लापरवाही  है । भारत में जंगल की आग के सबसे आम प्रज्वलन स्रोत चराई, पिकनिक की गतिविधियों में की गई लापरवाही, खेती को स्थानांतरित करना, और बांज या चीड़ की पत्तियों को जलाना भी है।

 

वनाग्नि और हिमालयी राज्य

 

उत्तराखंड की हम बात करें तो उत्तराखंड वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच महीनों में राज्य में करीब 99 हेक्टेयर जंगल आग से प्रभावित हुए हैं । आज जलते जंगलों की, पहाड़ों में लगने वाली आग का एक प्रमुख कारण पोपुलस, चीड़ के वृक्षों की अधिकता है । चीड़ और बांज की पत्तियों से  आग की घटनाओं पर चिंतन अत्यंत आवश्यक है | इन पत्तियों का जमीन में फैलाव भी आग लगने के लिए उपयुक्त परिस्थितियां पैदा करता है। ऐसे में कुछ स्वयंसेवी संगठनों के चीड़  से बिजली बनाने जैसे लघु प्रयासों पर गौर करने की आवश्यकता है। कश्मीर में तो चीड़ के पेड़ों से प्राप्त स्प्रूस से बायोफ्यूल तक का निर्माण किया जा रहा है।

 

उत्तराखंड के ही विभागीय आंकड़ों पर गौर करें तो आरक्षित वनों का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा वनाग्नि के लिहाज से आज संवेदनशील है । पिछले एक दशक में वनाग्नि के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। हालांकि आरक्षित वनों में अग्नि के मुकाबले वन पंचायतों के अग्नि के  मामलों में कमी है । मैदानी इलाकों में तो आधुनिक यंत्र काम आ जाते हैं लेकिन पहाड़ों के दूरस्थ इलाकों में तो अभी भी परंपरागत तरीकों से ही वनाग्नि की घटनाओं को नियंत्रित किया जाता है। पहाड़ों में बनाई जाने वाली झापें ऐसी वनग्नि की घटनाओं को नियंत्रित करने का प्रभावी माध्यम है ।

 

इस संदर्भ में उत्तराखंड में, मिट्टी की नमी की कमी भी एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में देखी जा रही है। सूखेपन और सूखी पत्तियों पर  बिजली गिरने या मानवीय गतिविधियों जैसे सूखी पत्तियों पर सिगरेट और बीड़ी के जलते हुए टुकड़े फेंकने से भी वनाग्नि शुरू होती हैं। एक और प्रासंगिक कारण बीते दिनों देखने को आया है । जली हुई पत्तियों से निकलने वाले पोषक तत्व खाद्य कवक के विकास को बढ़ावा देता है। उत्तराखंड  के स्थानीय बाजारों में खाद्य कवक  की मांग अधिक है,ऐसे में यह मांग भी   उत्तराखंड के जंगलों में आग के उपयोग को भी प्रोत्साहित करती है।

 

आज वैश्विक संगठित प्रयासों से नासा और इसरो से एकत्रित उपग्रह जानकारीयों का हम जंगलों की आग रोकने के लिए प्रयोग कर रहे हैं। नवीनतम तकनीक जैसे  मॉडरेट रेजोल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रो-रेडियोमीटर (MODIS)सेंसर का उपयोग करके 52,785 वनाग्नी का पता लगाया गया और   एसएनपीपी- वीआईआईआरएस  (SNPP-VIIRS) का उपयोग करके 3,45,989 वनग्नी का पता लगाया गया ।सैटेलाइट आधारित रिमोट सेंसिंग तकनीक, जीआईएस उपकरण, और कनाडा के फॉरेस्ट फायर डेंजर रेटिंग सिस्टम (सीएफएफडीआरएस) के फायर वेदर इंडेक्स (एफडब्ल्यूआई) पर आधारित फॉरेस्ट फायर डेंजर रेटिंग सिस्टम के माध्यम से प्रभावी कार्य होते दिख रहे हैं। फॉरेस्ट फायर जियोपोर्टल का निर्माण इस संदर्भ में उल्लेखनीय कार्य रहा है । वाच टावरों का निर्माण, अग्नि सूचना   प्रणाली, आदि इसी विकसोन्मुख प्रक्रिया का अगला स्तर है ।

 

 

जन,जंगल,जमीन और जानवर के हकों की लड़ाई में जंगलों की सुरक्षा प्राथमिक सोपान है। अनेक प्रयासों के बाद भी जंगलों की आग पर, प्रभावी समय प्रबंधन की कमी साफ झलकती है।  जंगल बचाओ जैसी योजनाओं के सुचारू क्रियान्वयन के लिए यह आवश्यक है कि गर्मियों के आने से पहले ही प्रभावी तंत्र विकसित किया। यह भी आवश्यक है कि वानग्नि प्रभावित क्षेत्रों में कम्युनिटी सैनिकों की अवधारणा को समुचित साधनों के साथ बढ़ावा दिया जाए। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मदद से ऐसे हॉटस्पॉट्स का चिहनीकरण और मानचित्रण हमारी पहली प्राथमिकता होना चाहिए।  नीतिगत फैसलों में देरी, तेजी से फैलती वनों की आग का एक और कारण है। वन समवर्ती सूची के विषय है लेकिन वनों को बचाने के लिए जिस तरह का प्रशिक्षण  और सामग्री तंत्र हमें नदारद मिलता है वह केंद्र और राज्य दोनों की ज़िम्मेदारी  है। जंगलों की आग को रोकने के लिए किए गए तमाम नागरिक प्रयासों पर गंभीर चिंतन आज वक्त की मांग है। वनाग्नि के प्रबंधन के लिए बजट की कमी को दूर कर जहां नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन में सहायता मिल सकती है वहीं सामुदायिक जागरूकता से काफी हद वनाग्नि को नियंत्रित किया जा सकता है | 

 

 

 

 

 

 

 

गुरुवार, 25 जनवरी 2024

भारत -मालदीव संबंध : अतीत, वर्तमान और भविष्य

 


 


भारत द्वारा कोरोना के समय आर्थिक संकट से उबरने के लिए 250 मिलियन यूएस डॉलर की दी गई मदद हेतु संयुक्त राष्ट्र में धन्यवाद देते मालदीव के विदेश मंत्री के वक्तव्य को अभी तीन वर्ष भी नहीं हुए थे कि मालदीव के जनप्रतिनिधियों, विपक्ष और सरकार की मंशा में चीनी मिलावट होते दिखने लगी है । सत्ता परिवर्तन के साथ संबंधों में परिवर्तन प्रायः दक्षेस (सार्क) के सभी देशों के मध्य देखा गया है  और खासकर जहां के अनुभवों में तख्तापल्ट राजनीति का घालमेल रहा है वहां भारत के लिए और भी कड़वाहट भरे उदाहरण मिल जाते हैं । फिर चाहे वह श्रीलंका हो, नेपाल हो या फिर मालदीव । उदाहरण के लिए वर्ष 2012 में राष्ट्रपति  मोहम्मद वहीद ने भारतीय कंपनी जीएमआर से 51.1 करोड़ डॉलर की लागत से विकसित होने वाले माले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के समझौते  को रद्द कर दिया था और उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि भारत मालदीव के आंतरिक मामलों में दख़ल दे रहा है । 

पड़ोसी देशों के ऐसे आरोपों का भारत  अभ्यस्त रहा है लेकिन आज भारत- मालदीव संबंधों की मधुर दास्तां भी सत्ता परिवर्तन और विपक्ष की राजनीति की भेंट चढ़ती दिख रही है । 

 

वर्ष 2023 में, हिंद महासागर क्षेत्र में सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मालदीव में,इंडिया फर्स्टकी नीति अपनाने वाले राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह को हराकर, निर्वाचित नए राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू की सरकार और जेल से छूटकर आए पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने  उन सभी सकारात्मक पहलों पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है जो इतने वर्षों तक मालदीव के सामाजिक,आर्थिक,शैक्षिक, पर्यावरणीय विकास के लिए भारत द्वारा की गई हैं । हालांकि भारत के लिए यह ऐसा पहला अनुभव नहीं है । इससे पहले भी वर्ष  2008 के  चुनाव में  निर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद

और वर्ष 2013 चुनाव में निर्वाचित राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन भी चीन के प्रति झुकाव को प्राथमिकता देते थे ।

अक्टूबर 2020 में आधिकारिक रूप से पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के नेतृत्व में भारत विरोधी अभियान 'इंडिया आउट' शुरू हुआ जिसका प्रभाव अब दोनों देशों के संबंधों में भी दिख रहा है ।



भारत और मालदीव : प्राचीन इतिहास 

 

 हिंद महासागर में भारत के लक्षद्वीप द्वीप समूह के दक्षिण में स्थित मालदीव आठ डिग्री चैनल द्वारा भारतीय के  मिनिकॉय  से अलग होता है ।

मालदीव और भारत हिंद महासागर रिम एसोसिएशन,और दक्षेज देशों के समूह में भी  है। पश्चिम एशिया में अदन की खाड़ी तथा होर्मुज़ की खाड़ी एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में मलक्का जलसंधि के बीच स्थित मालदीव सामरिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है । भारत और मालदीव के बीच सांस्कृतिक,धार्मिक,आर्थिक और सामाजिक संबंध प्राचीन काल से ही रहे हैं ।  प्राचीन काल में मालदीव, सीलोन (श्रीलंका) पर निर्भर था जिसने दक्षिण भारत के साथ वाणिज्यिक और सांस्कृतिक संपर्क बनाए रखा था। रामायण जैसे शास्त्र ग्रंथों और समय समय पर लिखे गए ग्रंथों जैसे कौटिल्य के अर्थशास्त्र , विदेशी यात्रियों के ग्रंथ आदि द्वारा दोनों देशों के बीच सकारात्मक संबंधों का हमें बोध होता है ।

 

बंगाल में स्थित  मौर्य साम्राज्य के मुख्य समुद्री बंदरगाह ताम्रलिप्ती से  सीलोन और दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य देशों के लिए भी जहाज जाते थे। मौर्य राजा अशोक के एक शिलालेख में सीलोन में धार्मिक मिशनों का उल्लेख है जिसने उस देश में बौद्ध धर्म की शुरुआत की। मालदीव में भी पुरातन बौद्ध स्थलों के अवशेष पाए गए हैं । अनेक विद्वानों का यह भी मत है कि बहुसंख्यक मुस्लिम धर्म से पहले यहां बौद्ध और उससे पहले सनातन  धर्म मौजूद था। 

 

एक लंबे समय तक मालदीव में श्री विजया साम्राज्य इनका ही शासन था । दक्षिण भारत के चोल राजाओं राजराजा चोल और राजेंद्र चोल के समय विजया साम्राज्य को हराने के लिए सेनाओं को भी भेजा गया। यह कहा जाता है कि उत्तरी सीलोन पर विजय प्राप्त करने के बाद, राजराजा चोल ने 12,000 पुराने द्वीपों, मालदीव पर विजय प्राप्त की हालांकि यह ऐसी नौसैनिक विजय थी, जिसका कोई वर्णन या साक्ष्य प्राप्त नहीं होता है । यात्री अब्दुल रज्जाक और फ़्रांसिस बर्नियर ने भी अपने यात्रा पुस्तकों में दोनों देशों के मध्य संबंधों पर प्रकाश डाला है । 

 

इस प्रकार भारत के मालदीव के संबंधों के प्राचीन साक्ष्य हमें मिलते हैं जो बताते हैं कि साझी धार्मिक,सांस्कृतिक,व्यापारिक एकता दोनों देशों में व्याप्त थी ।

 

स्वतंत्रता के बाद भारत- मालदीव संबंध 

 

वर्ष 1965 में मालदीव की ब्रिटेन से  आजादी के बाद से ही भारत और मालदीव के बीच  वाणिज्यिक, सांस्कृतिक आर्थिक, संबंधों का दूसरा दौर शुरू होता होता है । भारत उन आरंभिक देशों में से एक है जिसने मालदीव के मुक्ति संघर्ष और स्वतंत्र मालदीव को सर्वप्रथम मान्यता प्रदान की। 

 

औपनिवेशिक शासन के अधीन रहे भारत और मालदीव दोनों के ही बीच प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान संबंधों में प्रगाढ़ता आयी । वर्ष 1974 में मालदीव के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अहमद जैकी की भारत यात्रा इस संदर्भ में प्रासंगिक है । इसी बैठक के बाद  "भारत और मालदीव ने हिंद महासागर क्षेत्र को शांति क्षेत्र के रूप में स्वीकृत करते हुए इस क्षेत्र को बड़ी महा शक्तियों और सैन्य गतिविधियों से मुक्त  रखने का संकल्प लिया था।  शिक्षा, मत्स्य पालन, वायु और समुद्री संचार के क्षेत्र में अपने द्विपक्षीय सहयोग को बेहतर बनाने  की आवश्यकता पर दोनों पक्ष सहमत हुए। इसी क्रम में  भारत द्वारा शिक्षा के प्रचार प्रसार हेतु मालदीव के 19 एटोल में 19 विद्यालयों की स्थापना,और मत्स्य के  डिब्बाबंद उद्योग को बढ़ावा देने की समुचित व्यवस्था भारत द्वारा की गई। 

 

वर्ष 1975 में ही प्रधानमंत्री जैकी को  सत्ता से निष्कासित कर दिया गया।  वर्ष 1977 वह समय था जब समुद्री सीमाओं के त्रिपक्षीय समझौते को भी बल प्राप्त हुआ।  दोनों  देशों के बीच समुद्री सीमा संधि वर्ष 1976 में हस्ताक्षरित की गई  जहां मालदीव ने मिनिकॉय को भारत के अभिन्न अंग के रूप में मान्यता दी । वर्ष 1978 में मालदीव के एयरपोर्ट निर्माण के लिए भारत के एयरपोर्ट अथॉरिटी को मालदीव सरकार द्वारा निवेदित किया गया था। 

 

80 के दशक के दौरान मालदीव की सत्ता पर आसीन मोमून अब्दुल गयूम के ख़िलाफ़ तख़्तापलट की कोशिशों को निरस्त करने के लिए 'ऑपरेशन कैक्टस' चलाया गया । इसके बाद के वर्षों में  तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी ने भारत की प्रतिबद्धताओं को आगे बढ़ाने का कार्य किया।  भारत की मालदीव के प्रति विदेश नीति में क्रांतिकारी परिवर्तन श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में आया । लगभग एक दशक के बाद  भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी जी का मालदीव दौरा दोनों देशों के बीच रिश्तों की प्रगाढ़ता को स्थापित करने में सहायक सिद्ध हुआ । वर्ष 1995 के बाद इतने वर्षों के अंतराल के बाद अटल जी की यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण रही ।

 

वस्तुत: यदि हम देखें तो मालदीव को सर्वप्रथम आधुनिक बैंकिंग सेवाएं भारत  ने ही प्रदान की हैं  । कोल्ड स्टोरेज प्लांट से लेकर जलपोत निर्माण आदि कार्य भारत द्वारा ही सर्वप्रथम मालदीव में कराए गए ।  संचार के क्षेत्र में, यह भारत ही था जिसने त्रिवेन्द्रम (दक्षिण भारत) और माले के बीच हवाई सेवा और टेलीप्रिंटर से 80 के दशक में ही  प्रत्यक्ष  संपर्क स्थापित किया था। मालदीव के छात्रों और प्रशिक्षुओं को भारत में चिकित्सा, नर्सिंग, इंजीनियरिंग, संचार और शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों में उन्नत अध्ययन की सुविधाएं भी भारत द्वारा प्रदान की गई   

 

वर्ष 2014 के बाद भारत-मालदीव संबंध 

 

वर्ष 2016 में मालदीव ने चीन को अपना एक द्वीप महज 40 लाख डॉलर में 50 सालों के लिए लीज़ पर दे दिया था । वर्ष 2017 में चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता भी मालदीव ने किया।  चीन के वन बेल्ट वन रोड योजना का भी खुल कर समर्थन करने वाले मालदीव में चीन की यह  उपस्थिति सामरिक दृष्टिकोण से सही नहीं है । न केवल हिंद महासागर बल्कि भारत के निकटवर्ती राष्ट्रों में चीन की बढ़ती उपस्थिति चिंता का कारण है । इसी बात को समझते हुए हमारे नीतिगत निर्णयों में शानदार प्रयास विगत वर्षों में होते दिखाई दिए हैं । 

 

 अवसंरचना,स्वास्थ्य सेवाएं,कनेक्टिविटी के संबंध में भारत के प्रधानमंत्री ने मालदीव को समय समय पर न सिर्फ आश्वस्त किया बल्कि सक्रियता से कार्य भी किया है।  वर्ष 2018 में  भारत पहुंचे राष्ट्रपति मोहम्मद सोलह ने 1.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वित्तीय मदद भारत से प्राप्त की । करेंसी स्वैप समझौते से लेकर आडू विकास प्रोजेक्ट, हनिमधू अंतराष्ट्रीय एयरपोर्ट,मालदीव औद्योगिक मत्स्य कंपनी लिमिटेड के विस्तार, फेलिवारु, जेमनाफुशी, जेन इंटरनेशनल एयरपोर्ट, आदि के विकास के लिए भारत ने प्रतिबद्धता जाहिर की थी और इस प्रकार मालदीव के विकास मॉडल में भारत ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की ।

 

भारत की विदेश नीति वर्तमान में महज हस्ताक्षरों तक सीमित नहीं है । प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा  हस्ताक्षरित अनुबंधों के अनुपालन की दिशा में कार्य करते हुए 

हाइड्रोग्राफी के क्षेत्र में तो सर्वे तक पूरे कर लिए गए। 700 से भी अधिक प्रशासनिक अधिकारियों को भारत में प्रशिक्षण दिया गया । 200 से भी अधिक कस्टम अधिकारियों को भारत में प्रशिक्षण दिया गया। वर्ष 2020 में ही तूतीकोरिन, कोच्चि, कुलधुफ़ुशी और माले को जोड़ने वाली कार्गो सेवा का प्रारंभ हुआ । अप्रैल 2021 से ही माले में हुकुरू मिस्की के जीर्णोधार का कार्य भी चल रहा है। रुपे कार्ड, के साथ साथ मत्स्य आधारित उद्योग को बढ़ावा देने के लिए मत्स्य प्रसंस्करण यूनिटों की बात हो या फिर सामुदायिक विकास कार्यक्रमों की विगत वर्षों में उल्लेखनीय गतिशीलता कोभारत ने दिखाया है । 

 

विदेश मंत्री डॉ.एस जयशंकर की उत्तरी एटोल की यात्रा भी  इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है जिसमें  सामुदायिक विकास कार्यक्रमों हेतु 100 मिलियन मालदीवीयन रूपये की आर्थिक मदद दी गई । इसके साथ ही इसी यात्रा में मालदीव विश्वविद्यालय और कोचीन विज्ञान एवं तकनीकी विश्विद्यालयों के बीच क्षमता निर्माण या वृद्धि के लिए समझौतों को भी अंतिम रूप दिया गया । 

 

मार्च 2022 में मालदीव को भारत द्वारा विभिन्न सामाजिक,आर्थिक विकासात्मक कार्यों हेतु सबसे बड़ी लगभग 223 करोड़ की वित्तीय मदद प्राप्त हुई । 

 

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि विभिन्न विकास प्रोजेक्ट से लेकर कैंसर हॉस्पिटल निर्माण तक भारत ने एक अच्छे पड़ोसी और समावेशी विकास की नीति के चलते मालदीव को हर संभव मदद की है । बंदरगाहों के निर्माण से लेकर, मजबूत कनेक्टिविटी तक, सामरिक दृष्टि से महत्त्वूर्ण इस राष्ट्र के लिए भरसक प्रयास किए गए हैं । वर्तमान हालातों में केवल मालदीव का विरोध नहीं बल्कि सार्थक चर्चाओं और कूटनीति के आधार पर इसका समाधान होना चाहिए । लक्षद्वीप के विकास में पर्यटन, इस मॉडल को मालदीव के मॉडल से भलीभांति अध्ययन कर,  वहां से काफी कुछ सीखा जा सकता है । भाववेश में विरोध की राजनीति के इतर हमें बातचीत द्वारा इसे सुलझाने का प्रयास करना चाहिए । आर्थिक और सामरिक दृष्टिकोण से मालदीव से खराब रिश्ते किसी भी प्रकार से स्वीकार्य नहीं किए जा सकते ।

 

 





रविवार, 7 जनवरी 2024

नए भारत का नया कानून : बदलाव और चुनौतियां

 

जय प्रकाश पांडेय

वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी

वर्षों से चुनावी घोषणा पत्रों और विभिन्न मंचों से परिवर्तन हेतु प्रस्तावित भारतीय दंड संहिता 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 और भारतीय आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 को भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता 2023, और भारतीय सुरक्षा (द्वितीय) विधेयक 2023 से हाल ही में प्रतिस्थापित किया गया है, हालांकि नई संहिता के नियमों के लागू होने की तिथि अभी निर्दिष्ट नहीं की गई है। 1834 में थॉमस बबिंगटन मैकाले की अध्यक्षता में गठित समिति की अनुशंसाओं के बाद स्वतंत्र भारत में स्व कानूनों के लिए सशक्त प्रयास के रूप में, गृह मंत्रालय ने वर्ष 2020 में प्रोफेसर (डॉ.) रणबीर सिंह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। समिति की अनुशंसाओं, संसद की प्रक्रियाओं से गुजरता हुआ विधेयक, गृह मंत्रालय की स्थाई समिति की अनुशंसा और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद, भारतीय संस्कृति के सजग प्रहरी , राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख हस्ताक्षर और विश्व को बनारस हिंदू विश्विद्यालय की सौगात देने वाले,भारतरत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी और भारतीय जनता पार्टी के सह- संस्थापक भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्म दिवस के दिन भारत के राजपत्र का हिस्सा बना है जो कि महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक उपलब्धि मानी जा सकती है।

यह माना जा रहा है कि वर्तमान विधेयकों में आम जनमानस की सुविधाओं को केंद्र में रखकर नियम बनाए गए हैं। न्याय प्रणाली के अंतर्गत पीड़ितों, गवाहों और आरोपी व्यक्तियों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना संहिता के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है। इसके तहत त्वरित न्याय की संकल्पना को बल दिया गया है । न्याय की सुधारात्मक भारतीय संकल्पना को बल देते हुए कम्युनिटी सर्विस के प्रावधान को सामने लाया गया है । उत्तरदायी समयबद्ध पुलिस व्यवस्था और ट्रांसपेरेंट प्रक्रिया को नई संहिता सुनिश्चित करती है । नए कानूनों में तकनीक के युग के सापेक्ष इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल प्रमाणों को स्वीकार्य किया गया है। इसके अलावा महिलाओं से संबधित स्नेचिंग, छेड़छाड़ आदि मामलों हेतु पहली बार सख्त सजा के प्रावधान किए गए हैं। बीएनएस विधेयक में साइबर अपराध, आतंकवाद, घृणा अपराध, मॉब लिंचिंग आदि जैसे अपराधों की नई श्रेणियां भी प्रस्तुत की गई है। नई संहिता के अंतर्गत तलाशी और जब्ती प्रक्रिया की वीडियोटेपिंग अनिवार्य कर दी गई है ।

भारत में प्रायः आम जनमानस कानूनी प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ ही रहता है। एफआईआर के संदर्भ में पुलिस प्रशासन के क्षेत्राधिकार, निर्धारित होने के कारण, प्राथमिकी दर्ज करने के लिए पीड़ित पक्ष को भटकना पड़ता है जो पीड़ित पक्ष की परेशानियां ही बढ़ाता है । ऐसे में भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता द्वारा यह स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि आम जनमानस किसी भी नजदीकी थाने में प्राथमिकी दर्ज कर सके । जीरो एफआईआर के सिद्धांत के साथ नई संहिता यह भी सुनिश्चित करती है कि पुलिस प्रशासन वांछित स्टेशनों में ऐसी प्राथमिकी रिपोर्ट को स्वयं हस्तानांतरण करे ।

इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से कार्यवाही की अनुशंसा करती नई भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता सभी मुकदमों,उनकी जांच और कार्यवाही के लिए इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल माध्यमों की आवश्यकता को भी स्वीकार करती है । त्वरित परिणामों के दृष्टिकोण से यह एक सशक्त कदम सिद्ध होगा। यह पीड़ित पक्ष के लिए भी सहायक हो सकता है यदि सभी राज्य सरकारें सक्रियता से कार्य करें । प्रायः घटनाओं के बाद अभियुक्तों द्वारा फरार होने की घटना भारत में एक आम बात है । इस कारण अनेक बार अपराधी की पकड़ ही नही हो पाती है । ऐसे में फरार अभियुक्तों की गैर मौजूदगी में भी उनके ऊपर कार्यवाही का प्रावधान वर्तमान संहिता करती है ।

नई संहिता, न्याय की त्वरित, समयबद्ध व्यवस्था के संदर्भ में भी बात करती है । यह विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए समय सीमाएँ भी निर्धारित करती है। उदाहरण के लिए, नई संहिता के तहत बलात्कार पीड़िताओं की जाँच करने वाले चिकित्सा प्रदाता अपनी रिपोर्ट जांच अधिकारी को सात दिनों के भीतर प्रस्तुत करेंगे।इसके अतिरिक्त 3 साल तक की सजा वाले मामलों में संक्षिप्त विचारण ( समरी ट्रायल) की भी व्यवस्था नई संहिता करती है ताकि अदालतों पर मामलों का बोझ कम किया जा सके। तर्कों की समाप्ति के 30 दिनों के भीतर निर्णय देना (जिसे 60 दिनों तक विस्तारित किया जा सकता है), पीड़ित को 90 दिनों के भीतर जांच की प्रगति की सूचना देना, और सत्र न्यायालय द्वारा पहली सुनवाई के 60 दिनों के भीतर आरोपों की रूपरेखा तैयार करना ये सब कदम नई संहिता के तहत उठाए गए हैं।

पहली बार विवाह, रोजगार, पदोन्नति या झूठी पहचान और झूठे बहानों के द्वारा यौन संबंध बनाना अब एक दंडनीय अपराध माना गया है । 18 वर्ष से कम आयु की बच्चियों के साथ यौन दुराचार के मामलों में मृत्य दंड और मोब लिंचिंग की घटनाओं के मामलों में मृत्य दंड अथवा आजीवन कारावास अथवा 7 साल के सख्त कारावास का भी प्रावधान किया गया है। यह पहला कानून है जो स्पष्ट रूप से बताता है कि सशस्त्र विद्रोह, भारत से अलग होने की कोशिश करना और हमारी एकता, संप्रभुता और अखंडता के साथ खिलवाड़ करना आतंकवाद के रूप में गिना जाएगा । इसके अतिरिक्त आर्थिक आतंकवाद को भी यह चिन्हित करता है ।

चुनौतियां और दिशा :

 अनेक ऐसी संभावनाएं हैं जिनसे आम जनमानस इन नई संहिताओं के विषय में असमंजस में भी है । नई संहिता के तहत कुछ मामलों में पुलिस को एफआईआर करने से पहले प्रारंभिक जांच के अधिकार दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त वर्तमान में, पुलिस हिरासत, गिरफ्तारी के पहले 15 दिनों तक सीमित है। बीएनएसएस सामान्य आपराधिक कानून के तहत पुलिस हिरासत की अधिकतम सीमा का विस्तार 15 दिन की जगह 60 दिन या 90 दिन (अपराध की प्रकृति के आधार पर) करता है ।

पुलिस कस्टडी की सीमा में विस्तार और एफआईआर से पहले प्रारंभिक जांच का विकल्प, पुलिस प्रशासन को अनिर्बाधित अधिकार भी अनायास दे देता है । ऐसे अनिर्बाधित अधिकारो से उनके दुरुपयोग और उल्लंघन की चिंता बनी हुई है । पुलिस कस्टडी में हुई मौतों के लिए कुख्यात रहे भारत में पुलिस कस्टडी की अधिकतम सीमा में अप्रत्याशित विस्तार भी एक विचारणीय बिंदु है ।

जमानत के संदर्भ में नई संहिता यह स्पष्ट करती है कि ऐसे विचाराधीन कैदियों को जमानत दी जाएगी जो पहली बार अपराधी हैं और उन्होंने अधिकतम सजा का एक तिहाई पूरा कर लिया है। हालाँकि आजीवन कारावास वाले दंडनीय अपराध, और ऐसे व्यक्ति जिनके खिलाफ एक से अधिक अपराधों में कार्यवाही लंबित है ऐसे कैदियों को जमानत नहीं दी जाएगी । भारत में आरोपपत्रों में अक्सर कई अपराधों या धाराओं का उल्लेख होता है, इससे कई विचाराधीन कैदी अनिवार्य जमानत के लिए अयोग्य हो सकते हैं।

तकनीक के महत्व को स्वीकार्य करते हुए भारतीय साक्ष्य बिल के अंतर्गत स्वीकार्य दस्तावेजों की श्रेणी में, डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक संचार साधनों के समावेश ने अब कॉल रिकॉर्डिंग्स,ईमेल, आदि के साथ साथ मोबाइल,लैपटॉप,आदि के जरिए प्राप्त सुबूतों को भी प्राथमिक दस्तावेज मानने की तरफ मार्ग प्रशस्त किया है। लेकिन निजी सूचनाओं के संग्रहण और ऐसी व्यवस्था जिसमें डिजिटल सुबूत या सूचनाएं से बिना छेडछाड़ किए संग्रहित रखा जाए यह एक बड़ी चुनौती होगा । निजता के अधिकार को ध्यान में रखते हुए देखें तो निजता के अधिकार के साथ कॉल रिकॉर्डिंग, वॉइस रिकॉर्डिंग आदि को प्राथमिक सुबूतों की श्रेणी में रखना आगे चलकर द्वंद की ही स्थिति पैदा करेगा। वर्तमान समय में जब मोबाइल और लैपटॉप व्यक्ति के निजी जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं ऐसे में नयी संहिता के प्रावधान न्यायालय को जांच हेतु डिजिटल साधनों की भी जब्ती की असीमित शक्ति प्रदान करते हैं । ऐसे व्यक्तियों के भी डिजिटल/ इलेक्ट्रॉनिक जांच के आदेश जिनका ट्रायल से प्रत्यक्ष संबध भी नहीं है, यह निजता के अधिकार के उल्लंघन संबंधी मामलों को बढ़ाएगा।

निजता का अधिकार यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति अपने जीवन के कुछ पहलुओं को निजी रख सकें और सरकार या अन्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप से मुक्त रह सकें।

अतः यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि प्रगतिशील संहिता के साथ व्यक्तियों के गोपनीयता अधिकारों की रक्षा भी समुचित ढंग से की जाए। कानून के शासन के लिए यह अत्यंत आवश्यक कदम है।

बलात्कार के संबंध में लिंग समानता की बात यह संहिता नहीं करती है जो की आश्चर्यजनक बात है। बलात्कार की घटना को महज स्त्री के संबंध में ही देखा गया है । वैवाहिक बलात्कार पर भी संहिता में प्रत्यक्ष रूप से ज्यादा कुछ देखने को नहीं मिलता है । राजद्रोह को देशद्रोह नाम से प्रतिस्थापित जरूर किया गया है लेकिन अभी भी अस्पष्टता बनी हुई है । प्रस्ताव में सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों से अलग देश के खिलाफ विध्वंसक, अलगाववादी और सशस्त्र विद्रोह वाली गतिविधियों को देशद्रोह के अंतर्गत रखा गया है।

ऐसे अपराध जिनके लिए सजा 7 वर्ष से अधिक की है उन मामलों में फोरेंसिक जांच की अनिवार्यता यह संहिता निर्धारित करती है लेकिन अभी भी फोरेंसिक सुविधाओं के संबंध में देश की स्थिति सही नहीं है । ऐसे में नई संहिताओं के अनुसार इकोसिस्टम की व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है ।

वस्तुत: कानून प्रवर्तन और जांच एजेंसियों को प्रदान किए गए बढ़े हुए प्राधिकारों के संभावित दुरुपयोग के बारे में भी आशंकाएं हैं। इसमें कोई दो राय नहीं की वर्तमान संहिताओं ने भारतीयकरण की अच्छी कोशिश की है लेकिन आधारभूत सुविधाओं का विकास और समयबद्ध तरीके से नई संहिताओं का प्रवर्तन अत्यंत आवश्यक है । इसके साथ ही संभावित नकारात्मक पक्षों पर भी सार्थक संवाद से भारतीयता के इन प्रतीकों को व्यापक सहमति प्राप्त हो सकती है । त्वरित न्याय के लिए उपरोक्त प्रयास शानदार हैं परंतु न्यायाधीशों के पदों को सृजित करने, रिक्त पदों को भरने की अत्यंत आवश्यकता है । भारत में प्रति दस लाख की जनसंख्या में वर्तमान में 21 न्यायाधीश मौजूद हैं। एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विधि आयोग की 1987 की रिपोर्ट में प्रति दस लाख में इस संख्या को 50 करने की सिफारिश की गई थी प्रति है । ऐसे में वर्तमान जनसांख्यकीय आधार पर त्वरित रूप से इस दिशा में कार्य करना नई संहिताओं के उद्देश्य प्राप्ति में सहायक सिद्ध होगा ।


रविवार, 5 नवंबर 2023

सौर जियोइंजीनियरिंग पर वैश्विक नियमन की आवश्यकता

 

जय प्रकाश पांडेय

वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी

जलवायु परिवर्तन पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता ने वैज्ञानिकों को सौर जियोइंजीनियरिंग जैसे नवीन दृष्टिकोण तलाशने के लिए प्रेरित किया है। पेरिस जलवायु समझौते (वर्ष 2015) के अंतर्गत ग्रीन हाउस गैस को कम किए जाने के लिए निर्धारित किए गए उत्सर्जन संबधी लक्ष्यों को प्राप्त करने में वर्तमान वैश्विक जगत असफल सिद्ध हो रहा है । भूतापन से, अन्य जलवायुवीय दशाओं के अतिरिक्त बढ़ते मूसलाधार बारिश के पैटर्न, अधिक शक्तिशाली तूफानों की बारंबारता और समुद्र के स्तर में वृद्धि जैसी दशाओं को जोड़ा जा सकता है । पश्चिम के विद्वानों का एक बड़ा वर्ग इस संदर्भ में पहले ही इंगित कर चुका है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए 2030 के दशक तक वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने के लिए बड़े पैमाने पर परियोजनाओं की आवश्यकता होगी। कहना न होगा यह अप्रत्यक्ष रूप से सौर जियोइंजीनियरिंग और उससे संबंधित तकनीक की ही तरफ इशारा है ।

 सौर जियोइंजीनियरिंग में पृथ्वी की सतह तक पहुँचने वाले सौर विकिरण की मात्रा को कम करने के लिए वैज्ञानिक विषयों जैसे स्ट्रैटोस्फेरिक एरोसोल इंजेक्शन, अंतरिक्ष-आधारित रिफ्लेक्टर आदि का इस्तेमाल किया जाता है । दूसरे शब्दों में कहें तो

सौर जियोइंजीनियरिंग पृथ्वी पर आने वाली सूरज की रोशनी को कम करने, यानी “सूर्य को मंद” करने के लिए काल्पनिक प्रौद्योगिकियों के एक सेट का वर्णन करती है (राष्ट्रीय विज्ञान, इंजीनियरिंग और चिकित्सा अकादमी, 2021) हालाँकि जियोइंजीनियरिंग की ये प्रौद्योगिकियाँ जलवायु संशोधन के संदर्भ में संभावित लाभ प्रस्तुत कर सकती हैं, लेकिन वे अपने सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक प्रभावों के संबंध में चिंताएँ भी बढ़ाती हैं। मुख्य रूप से उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी यूरोप द्वारा किए जा रहे जियोइंजीनियरिंग संबंधी अनुसंधान, विशेष रूप से सौर जियोइंजीनियरिंग पर हावी है। वहीं चीन के प्रयोगों ने भी आशंका की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है । भारत की विषम भौगोलिक परिस्थितियां भी इस क्षेत्र में विस्तृत शोध की संभावनाओं के द्वार खोलती है जिसके लिए बजटीय माध्यमों के साथ साथ वैज्ञानिकों को नियत लक्ष्यों के साथ प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है ।

वर्ष 2019 में, सौर जियोइंजीनियरिंग सहित जियोइंजीनियरिंग विकल्पों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करने के लिए प्रस्तावित यूएनईपी प्रस्ताव को संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील और सऊदी अरब द्वारा अवरुद्ध कर दिया गया था। ऐसे में यह आशंका कि विनियमन और संयुक्त शोध के बिना, एक देश के प्रयास दूसरे देशों को प्रभावित कर सकते हैं, को गलत नहीं ठहराया जा सकता है। सौर जियोइंजीनियरिंग प्रौद्योगिकियों की तैनाती पर उचित, न्यायसंगत और प्रभावी बहुपक्षीय नियंत्रण की गारंटी दे सकने में सक्षम संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन में भी संस्थागत बल का अभाव वर्तमान में दिखता है ।

अनियंत्रित जियोइंजीनियरिंग पर नियमों की कमी के विनाशकारी प्रभाव भी हो सकते हैं, खासकर विकासशील देशों के लिए जिनके पास गहन अनुसंधान और विकास (आर एंड डी) करने, ऐसी योजनाओं को व्यापक रूप से लागू करने या उनके अनपेक्षित परिणामों को संभालने के लिए संसाधनों की कमी है।

उदाहरण के लिए, कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों ने सुझाव दिया है कि ऊपरी वायुमंडल में सूरज की रोशनी कम करने वाले रसायनों का छिड़काव करने से वैश्विक मौसम पैटर्न प्रभावित हो सकता है और पूरे एशिया और अफ्रीका में मानसून के पैटर्न में बदलाव हो सकता है । एक अन्य प्रसंग में वर्ष 2021 में बिल गेट्स ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में एक शोध का समर्थन किया, जिसमें उत्तरी स्कैंडिनेविया के वातावरण में कैल्शियम कार्बोनेट के छिड़काव की धारणा का परीक्षण किया गया था। हालाँकि, स्थानीय स्वदेशी समुदायों और पर्यावरणविदों के विरोध के कारण परियोजना को रोक दिया गया था।

जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे संवेदनशील देशों में से एक भारत की निर्भरता यहां की मानसूनी जलवायु में प्रमुखता से है । लू, सूखा और मानसूनी व्यवधान जैसे गंभीर प्रभावों का सामना करते भारत को सौर जियोइंजीनियरिंग के संभावित लाभों और जोखिमों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है । अमेरिका,चीन और यूरोप तथा विश्व के अन्य देशों द्वारा किए जा रहे सौर जियोइंजीनियरिंग संबधी नवोन्मेषों को समझना और उसमें बराबर भागीदारी करना भारत में नीति निर्माताओं और शोधकर्ताओं के लिए के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत अपनी अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि पर बहुत अधिक निर्भर है। जहां सौर जियोइंजीनियरिंग कृषि उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन के कुछ नकारात्मक प्रभावों को कम करने में मदद कर सकती है,जिससे संभावित रूप से किसानों और देश में खाद्य उत्पादन को लाभ होगा वहीं दूसरी तरफ आज भारत जलसंकट के मुद्दों का सामना कर रहा है, और सौर जियोइंजीनियरिंग का जल संसाधनों की उपलब्धता और वितरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। भविष्य की जल संसाधन प्रबंधन रणनीतियों के लिए सतही जल अपवाह, भूजल पुनर्भरण और मानसून पैटर्न पर संभावित प्रभाव को समझना महत्वपूर्ण है ।

वर्तमान में चीन द्वारा मेगा-बांध परियोजनाओं (जैसे थ्री गोरजेस) सहित अन्य बड़े इंजीनियरिंग परियोजनाओं के संभावित दुष्परिणामों से यह तो स्पष्ट है कि किसी प्रकार के वैश्विक मत के बिना भी चीन जियोइंजीनियरिंग परियोजनाओं पर कार्य जारी रख सकता है और इस कार्य का सम्पूर्ण एशिया विशेषकर भारत में प्रभाव पड़ेगा इसमें कोई दो राय नहीं है । चीन की बड़े पैमाने की मौसम संशोधन परियोजना, तियान्हे, या स्काई रिवर जोकि एक क्लाउड सीडिंग जियोइंजीनियरिंग परियोजना है इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है जिसमें भारत और अन्य दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों सहित पड़ोसी देशों के लिए संभावित सुरक्षा निहितार्थ भी व्याप्त हैं। तियान्हे के जलवायु जियोइंजीनियरिंग उद्यम का लक्ष्य चीन के उत्तरी हिस्सों में जहां कम वर्षा होती है और इसकी नदियों में जलस्तर में गिरावट देखी जा रही है वहां सूखे जैसी स्थितियों का प्रबंधन करना है। वायुमंडल में सिल्वर आयोडाइड कणों को लॉन्च करके ईंधन कक्षों की सहायता से यांग्त्ज़ी नदी बेसिन के अतिरिक्त जल को येलो नदी तक हस्तांतरण की योजना के जलवायुवीय पहलुओं पर भी गौर करना भारत के लिए अत्यंत आवश्यक है।

आज बड़े बड़े उद्योगपतियों और संस्थानों आदि द्वारा भी जहां सुपरकंप्यूटर क्षमताओं का इस्तेमाल कर वातावरण में भारी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) को इंजेक्ट करने की योजना बन रही है वही सौर जियोइंजीनियरिंग के संभावित प्रभावों का अध्ययन करने के लिए माली, ब्राजील, थाईलैंड और अन्य देशों के वैज्ञानिकों के लिए भी वित्तीय मदद भी दी जा रही है। अमेरिका के नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंजीनियरिंग और मेडिसिन में तो , जिन्होंने , पांच वर्षों में $ 100 मिलियन से $ 200 मिलियन के शुरुआती निवेश के साथ एक अमेरिकी सौर जियोइंजीनियरिंग अनुसंधान कार्यक्रम स्थापित करने की सिफारिश भी की गई हैं ।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दीर्घकालिक टिकाऊ समाधानों में एक व्यापक दृष्टिकोण शामिल होना चाहिए जो भारत और वैश्विक समुदाय के लिए अधिक लचीला और पर्यावरणीय रूप से सतत समावेशी भविष्य बनाने के लिए शमन, अनुकूलन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर जोर देता है। वस्तुत: सौर जियोइंजीनियरिंग को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के विकल्प के रूप में नहीं बल्कि एक पूरक उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत को इस संबंध में सबसे कमजोर देशों की जरूरतों और प्राथमिकताओं को भी संबोधित करते हुए उनकी न्यायसंगत भागीदारी सुनिश्चित करते हुए , जलवायु न्याय के सिद्धांतों पर विचार करना चाहिए और वैश्विक समुदाय को संगठित करने के उद्यम करने चाहिए।


रविवार, 30 अप्रैल 2023

मजदूर दिवस और भारत के श्रम कानून

 

राष्ट्र के विकास में सत्यमेव जयते और श्रमेव जयते दोनों का होना आवश्यक है। दिवस विशेष आधारित चिंतन पद्धतियों की परंपरा भारत की संस्कृति का हिस्सा नहीं है । यही कारण है कि वर्तमान संदर्भों के अनेक आंदोलनों जैसे नारीवादी आंदोलनों,श्रमिक आंदोलनों,आदि के जनक के रूप में सर्वमान्य पश्चिमी देशों से ज्यादा व्यापक , प्रभावी कदम भारतीयता का हिस्सा रहे हैं । यह अलग बात है कि इस तरफ सार्थक और तथ्यात्मक संवाद कम हुए हैं ।

 भारत में “कर्मिका दिनचारणे”, कर्मिका दिनोत्सवम, “उझाईपलार दिनम” और “थोझीलाली दिनम” के रूप में जाने जाने वाले “अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस”,की जड़ें वर्ष 1886 में शिकागो के "हे-मार्केट "दंगों से जुड़ी हैं। कार्य के घंटे पुनर्निर्धारण करने की मांग से शुरू यह संघर्ष पुलिस और श्रमिक प्रदर्शनकारियों के बीच हुए एक हिंसक टकराव में बदल गया जिसमें अनेक प्राण अपने हकों के लिए लड़ते हुए पुलिस की बेरहमी का शिकार हुए। इस घटना ने पूरे विश्व को, श्रमिकों के अधिकारों पर चिंतन के लिए बाध्य किया और विश्व के प्रत्येक देश ने खासकर औपनिवेशिक सत्ताओं से शासित राष्ट्रों ने तो और भी मुखरता से श्रमिकों के विषयों को उठाना शुरू किया । इस आंदोलन के तीन साल बाद 1889 में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन की बैठक हुई। जिसमें तय हुआ कि हर मजदूर से केवल दिन के 8 घंटे ही काम लिया जाएगा। इस सम्मेलन में ही 1 मई को मजदूर दिवस मनाने का प्रस्ताव भी रखा गया।

भारत के संदर्भ में देखे तो इस घटना से पूर्व ही श्रमिकों के हितार्थ कदम उठने शुरू हो चुके थे । समाज-सुधारक, शशिपद बनर्जी ने कलकत्ता में वर्ष 1870 में एक मजदूर क्लब स्थापित किया , और मजदूरों को शिक्षित करने के लिए वर्ष 1874 में ‘भारत श्रमजीवी’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया । मजदूर संघर्ष के इतिहास में वर्ष 1877 में नागपुर के एंप्रेस मिल्स में हुई हड़ताल का जिक्र प्रासंगिक है । यह भी एक सर्वविदित तथ्य है कि वर्ष 1882 और 1890 के बीच बंबई और मद्रास में लगभग 20 से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हड़तालें दर्ज की गई थीं।

वर्ष 1878 में सोराबजी शपूर्जी बंगाली ने मजदूरों को कार्य की बेहतर दशाएँ उपलब्ध कराने के लिए बंबई की विधान परिषद् में एक विधेयक रखने का प्रयास भी किया। यह ध्यातव्य है कि तब तक शिकागो की घटना नहीं हुई थी । वर्ष 1880 के दशक में द्वारकानाथ गांगुली ने चाय बागानों के दास-श्रमिकों जैसी दशाओं के विरुद्ध आंदोलन चलाया। बंबई में इसी नारायण मेघाजी लोखंडे, ने ‘दीनबंधु’ नामक एक अंग्रेजी-मराठी साप्ताहिक पत्रिका द्वारा वर्ष 1884 में श्रम के घंटों में कमी की माँग के लिए मजदूरों की सभाओं का आयोजन किया । भारत में यह सब उसी स्वाभाविक चिंतन प्रक्रिया का हिस्सा था जिसका अंतिम लक्ष्य अंत्योदय है ।

 आजादी के आंदोलन में श्रमिक वर्गों का योगदान और श्रमिक संघों (ट्रेड यूनियन) की भूमिका जगजाहिर है। औपनिवेशिक शासन और विदेशी एवं भारतीय पूँजीपतियों के शोषण का सामना करते मजदूर वर्ग को आरंभ में नरमपंथी आंदोलनकारियों से भी सक्रिय सहयोग नहीं मिला। "देश के सारे प्रांतों में मजदूरों के सारे संगठनों के कार्यों को समन्वित करने और आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मसलों पर भारतीय मजदूर के हितों को प्रश्रय देने के लिए" वर्ष 1920 में बंबई में एन.एम. जोशी, लाला लाजपतराय, जोसेफ बप्तिस्ता और दीवान चमनलाल के प्रयास से ‘आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ (ए.आई.टी.यू.सी) की स्थापना भारतीय मजदूर संघ के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना थी । वस्तूतः इसके बाद ही विभिन्न श्रमिक संघों (ट्रेड यूनियनों) विभिन्न विचारधाराओं की पोषक बनकर सामने आई । स्वतंत्रता के बाद तो देश में श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले श्रमिक संघों में कई गुना वृद्धि हुई । मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले देश में इन संघों की बहुलता ने मज़दूर वर्ग को खंडित करने का ही ज्यादा कार्य किया । निजी स्वार्थों की बलिवेदी पर मज़दूर वर्ग के मुद्दे भेंट चढ़ गए।

आजाद भारत में आज भी लगभग 90 फीसदी मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं जिनको अभी भी सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं । इन्हीं को लक्षित करते हुए संगठित व असंगठित क्षेत्र में लगभग 50 करोड़ से ज्यादा श्रमिकों को प्रभावित करने वाले विभिन्न श्रम कानूनों को अब सिर्फ चार संहिताओं में समाहित कर सरल करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया गया है । इससे श्रमिकों को सम्मान, सुरक्षा और अच्छी सेहत प्राप्त होगी। वेतन संहिता, 2019, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता, 2020 के निर्माण के पीछे वर्ष 2002 में द्वितीय राष्ट्रीय श्रम आयोग रिपोर्ट की अनुशंसाएं भी है जिसमें विभिन्न कानूनों को 4 या 5 संहिताओं में बदलने की अनुशंसा की गई। उपरोक्त श्रम संहिताओं में वैधानिक न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिकों की स्वास्थ्य देखभाल के संदर्भ में प्रयास किए गए हैं । इन संहिताओं के सकारात्मक बिंदुओं की प्राप्ति आपको हर जगह हो सकती है लेकिन इनकी कुछ कमियों की तरफ इंगित करते हुए अनेक सामाजिक संगठनों,ट्रेड यूनियनों, और बुद्धिजीवी वर्ग के असंतोष वाले कुछ प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान देना अपरिहार्य है।

सबसे बड़ा असंतोष श्रमिक संघों (ट्रेड यूनियंस)द्वारा अपने बातों को प्रभावी ढंग से रखने और दबाव बनाने के लिए

प्रयुक्त हड़ताल की पद्धति से संबंधित है । नई संहिता में यह प्रावधान है कि ट्रेड यूनियन और दबाव समूहों को वैध हड़ताल के लिए न्यूनतम 60 दिनों की पूर्वसूचना देनी होगी जो इससे पहले 14 दिन निर्धारित थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह श्रमिक संघों की प्रचलित प्रभावी पद्धतियों पर प्रहार ही है। बदले नियमों के अनुसार श्रम कानूनों का अनुपालन करने के लिए ऐसे नियोक्ता, बाध्य होंगे जिनके यहां 300 या 300 से अधिक लोग कार्यरत है । पहले यह सीमा 100 थी । ऐसे में ऐसे संस्थान जहां कार्यरत लोगों की संख्या 100 से कम है वहां श्रम कानूनों का क्या होगा यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने है। नौकरी से अवसान के संदर्भ में भी अपीलीय ट्रिब्यूनल प्राधिकरण के अंतिम फैसले को नई नियमों के तहत केंद्र सरकार बदल सकती है । यह बदलाव एक तरह से शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत के विपक्ष में दिखता है ।

सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020, में सामाजिक सुरक्षा कोष का दायरा बढ़ाया गया है। सामाजिक सुरक्षा पात्रता के लिए ,सरकार, नियमों को व्यक्ति की आय और कार्यरत उद्योग के आकार के आधार पर निर्धारण करेगी, ऐसे में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है । संशोधित नियम, इस दृष्टि से सार्वजनिक सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम के विपक्ष में ही दिखता है । खानपान की व्यवस्था से लेकर सॉफ्टवेयर विकास तक, हर चीज में प्रति घंटा या अंशकालिक नौकरियों में लगे गिग श्रमिकों और व्यक्तियों या संगठनों को सीधे ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करके विशिष्ट सेवाएँ प्रदान करने वाले प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स जैसे उबेर ड्राइवर, ज़ोमैटो डिलीवरी एजेंट आदि को भी सामाजिक सुरक्षा कोष में शामिल तो किया गया है लेकिन किसको असंगठित क्षेत्र का, गिग या प्लेटफार्म क्षेत्र का माना जायेगा इन परिभाषाओ में अभी भी स्पष्टता की मांग है।

व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति सहिंता विधेयक, 2020 यह नियमन करता है कि सुरक्षा के प्रावधान वहां लागू होंगे जहां न्यूनतम 20 लोग (विद्युत उपभोग) और 40 लोग ( गैर विद्युत उपभोग) कार्यरत हों । सुरक्षा एक ऐसा विषय है जिसका प्रभाव व्यापक और दूरगामी होता है । ऐसे में सुरक्षा स्वास्थ्य और कार्यरत दशाओं के भी प्रावधानो के क्रियान्वयन के लिए न्यूनतम अपेक्षित संख्या का दायरा होना भविष्य में चुनौती पेश कर सकता है ।

 भारतीय संविधान के तहत श्रम विषय को समवर्ती सूची में रखा गया है और इसलिये केंद्र और राज्य दोनों सरकारें (केंद्र के लिये आरक्षित कुछ मामलों को छोड़कर) इस विषय पर विधि बना सकती हैं।एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड, आयुष्मान भारत, श्रमिक पोर्टल , आदि विभिन्न पहलें आज सक्रियता से कार्य कर रही हैं। अतः ऐसे में संहिताओं के ऐसे प्रसंग जिनपर विरोध है सार्थक संवादों का सृजन कर और राज्य सरकारों को प्रोत्साहित कर श्रम कानूनों के ध्येय को पाया जा सकता है।


गुरुवार, 23 मार्च 2023

प्रतिबद्धता और योजनाओं के क्रियान्वयन से हारेगा टीबी

 


दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक, बैसीलस माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक (बैक्टीरिया )से होने वाली संक्रामक बीमारी टीबी, आज वैश्विक चिंता का कारण बनते जा रही है । यह माना जाता है कि विश्व की एक चौथाई आबादी आज टीबी से संक्रमित है जिसमें पुरुषों में संक्रमण महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा है।आमतौर पर फेफड़ों (फुफ्फुसीय टीबी) को प्रभावित करने वाली यह संक्रामक व्याधि अन्य अंगों (अतिरिक्त-फुफ्फुसीय टीबी) को भी प्रभावित कर सकती है। टीबी के प्रसार के आरंभिक चरण फेफड़ों से यह प्रसार पेट और जननांगों तक भी पहुंच सकता है जिससे अन्य समस्याओं के अतिरिक्त गर्भधारण में समस्याओं से स्त्री शक्ति को जूझना पड़ सकता है । सामान्यतः लगातार 5-6 महीने की दवा के साथ टीबी का नियंत्रण हो जाता है लेकिन जब टीबी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं को नियमित नही लिया जाता तो कभी-कभी दवा प्रतिरोधी टीबी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। टीबी की यह स्थिति सबसे खराब स्थिति है ।

टीबी हवा के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलती है। जब फेफड़ों या गले के टीबी रोग से ग्रसित व्यक्ति खांसता, छींकता, बोलता या गाता है तो टीबी के जीवाणु हवा में फैल जाते हैं। आस-पास के लोग इन जीवाणुओं में सांस ले सकते हैं और संक्रमित हो सकते हैं।

अनेक वैश्विक,राष्ट्रीय,और स्थानीय प्रयासों के बाद भी टीबी के सर्वाधिक मामले विकासशील देशों से आ रहे हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन, द्वारा जारी वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2022, के अनुसार वैश्विक स्तर पर तपेदिक (टीबी) और दवा प्रतिरोधी तपेदिक (टीबी) (एमडीआर, एक्सडीआर और टीडीआर टीबी ) से संक्रमित व्यक्तियों की संख्या में वर्ष 2020 के मुकाबले वर्ष 2021 में लगभग 4.5 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है । दवा प्रतिरोधी तपेदिक( टीबी) के भी मामलों में वर्ष 2020 व वर्ष 2021 के बीच 3 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है । इस रिपोर्ट के अनुसार इलाज तक पहुंच न होने के कारण ही टीबी से होने वाली वैश्विक मौतों की संख्या में वृद्धि हुई है । आज भारत विश्व के उन प्रमुख 10 देशों में शामिल हैं जहां विश्व के लगभग 65 प्रतिशत तपेदिक के मरीज पाए जाते हैं। भारत में टीबी के मरीजों की यह संख्या चीन, इंडोनेशिया,पाकिस्तान,बांग्लादेश और कोंगो से भी उच्च है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2022 में यह भी बताया गया है कि भारत में वर्ष 2020 के मुकाबले वर्ष 2021 में लगभग 18 प्रतिशत ज्यादा टीबी के मामले सामने आए हैं । वर्ष 2020 में आई गिरावटों के पीछे दरअसल कोविड काल में टीबी के रोगियों की रिपोर्टिंग में आई कमी थी ।भारत में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की भारत क्षय रोग रिपोर्ट 2022 (इंडिया टीबी रिपोर्ट 2022) में भारत में टीबी के मामलों में वर्ष 2020 के मुकाबले वर्ष 2021 में 19 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है । टीबी के किसी भी प्रकार से होने वाली मृत्युओं के मामले में भी लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है ।

भारत द्वारा वर्ष 1997 से ही किए जा रहे वैश्विक और देशज प्रयासों के बाद भी दवा प्रतिरोधी ड्रग रेसिस्टेंट तपेदिक(एमडीआर टीबी) मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। भारत द्वारा क्षयरोग (टी.बी.) को नियंत्रित करने के लिए किए जा रहे प्रयास गौरतलब हैं । टीबी की लड़ाई में पहला सशक्त चरण, कुपोषण से मरीज को सुरक्षित करना है । इस तथ्य को समझते हुए वर्ष 2018 से निक्षय पोषण योजना के तहत मरीजों को पोषण युक्त आहार हेतु वित्तीय सहायता दी जाती है ताकि कुपोषण जैसे रोग से पहले से ही पीड़ित व्यक्ति को और दिक्कतों का सामना न करना पड़ जाए। वर्ष 2020 और वर्ष 2021 के दौरान, भारत ने प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण कार्यक्रम के माध्यम से टीबी रोगियों को 89 मिलियन डॉलर (670 करोड़ रुपये) का नकद हस्तांतरण भी किया है । पूरे देश में वर्ष 2021 में लगभग 22 करोड़ से अधिक लोगों की टीबी की जांच की गई। प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत, 40,000 से अधिक निक्षय मित्र पूरे देश में 10.45 लाख से अधिक टीबी रोगियों की आज लगातार मदद कर रहे हैं। अभी हाल ही में उत्तराखंड के एम्स ऋषिकेश द्वारा सुदूरवर्ती टिहरी गढ़वाल में ड्रोन के माध्यम से टीबी की दवाइयां संफलतापूर्वक भेजी गई हैं ।निजी क्षेत्रों के भी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के सहयोग से काफी हद तक स्थितियां सुधरने का क्रम आज बना हुआ है लेकिन अभी भी चुनौतियां विकराल हैं। सामाजिक जागरूकता के अभाव से अभी भी टीबी और विशेषकर एमडीआर टीबी के मामले कम दर्ज कराए जाते हैं।

टीबी उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय नीति को वर्ष 2017 में इस संकल्प के साथ लाया गया कि वर्ष 2025 तक हमने इसे पूरी तरह से भारत से खत्म करना है । एमडीआर टीबी को भी नियंत्रित करने, गुणवत्तापूर्ण चिकित्सकीय परीक्षण एवं इलाज को प्रभावी ढंग से फैलाने और स्वास्थ्य क्षेत्रों में संक्रमण के प्रसार को नियंत्रित करने की दिशा में ,संकल्पित होने की दिशा में ये हमारे प्रभावी कदम हैं । पोषणीय समर्थन, यात्रा व्यय समर्थन और सामाजिक एवम मानसिक समर्थन आज टीबी से ग्रस्त नागरिकों को सशक्त कर रहा है । भारत टीबी और एमडीआर टीबी के प्रभावी अंत के लिए अपने अनुसंधान कार्यक्रमों में भी विशेष प्रयास कर रहा है । टीबी के मरीजों की आर्थिक सहायता के लिए राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के तहत अप्रैल-2018 से निक्षय पोषण योजना भी देश में संचालित है । इसके तहत टीबी मरीज को पौष्टिक आहार के लिए 6 महीने तक 500 रुपए प्रतिमाह सहायता दी जाती है।निक्षय इकोसिस्टम, टीबी हारेगा देश जीतेगा सरीखे कैंपेन प्रभावी नीतियों के निर्माण एवं क्रियान्वयन में आज मील का पत्थर साबित हो रही हैं। वर्ष 2016 में भारत एमडीआर-टीबी के उपचार के लिए बेडाक्यूलिन और वर्ष 2019 से डिलामेनिड ड्रग्स को भी अपने तपेदिक नियंत्रित कार्यक्रम में शामिल करने वाला पहला देश बन गया है ।

उच्च गुणवत्ता वाली दवाइयों की समुचित उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वर्ष 2001 वह आधारभूमि हैं जहां वैश्विक ड्रग सुविधा (ग्लोबल ड्रग फैसिलिटी) का गठन किया गया । एमडीआर-टीबी वाले रोगियों के लिए दूसरी-पंक्ति की टीबी दवाओं तक पहुंच की सुविधा सुनिश्चित करने ,दवाओं की खरीद के लिए देशों के मध्य सहमति स्थापित करने और देशों को उनके एमडीआर-टीबी प्रबंधन कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन में सहयोग देने के उद्देश्य से वर्ष 2010 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ग्रीनलाइट समिति की स्थापना की गई । इसके अतिरिक्त टीबी के वैश्विक भार को वर्ष 2035 तक 90 प्रतिशत तक कम करने तथा टीबी से होने वाली मृत्युओं की संख्या को वर्ष 2035 तक 95 प्रतिशत तक कम करने के संकल्प के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष 2015 से ही टीबी की समाप्ति हेतु कार्यक्रम चलाया जा रहा है।

टीबी के बढ़ते मामलों के देखते हुए आज जिला स्तर से एक कदम और आगे बढ़कर ग्राम पंचायतों के माध्यम से गांवों के क्लस्टर बनाकर वहां अधिकाधिक परीक्षण प्रयोगशालाओं को स्थापित करने की आवश्यकता है । सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम महज दिवस विशेष तक सीमित न होकर व्यापक आधार पाएं इस लिए भी योजनाओं के क्रियान्वयन में उर्ध्वगामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

टीबी को हराने के लिए सामाजिक जागरूकता और प्रतिबद्धता ही प्रभावी माध्यम है, अतः योजनाओं के प्रचार,प्रसार और प्रस्तावित अभियानों में पंचायती राज संस्थाओं की महत्ती भूमिका स्थापित कर टीबी मुक्त भारत की तरफ हम कदम बढ़ाने में सफल होंगे।


रविवार, 5 मार्च 2023

समुद्रीय जलस्तर वृद्धि के विकराल चित्र

 

महाकवि जयशंकर प्रसाद जी ने महाप्रलय के बाद का दृश्य कामायनी में प्रकट करते हुए लिखा था –

“हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर,

बैठ शिला की शीतल छाँह

एक पुरुष, भीगे नयनों से

देख रहा था प्रलय प्रवाह ।

नीचे जल था ऊपर हिम था,

एक तरल था एक सघन,

एक तत्व की ही प्रधानता

कहो उसे जड़ या चेतन “

 केन्या के बैरिंगो झील से कुछ समय पूर्व आ रही तस्वीरें जयशंकर प्रसाद जी की कविता के साक्षात चित्र सामने रख देती है। आज बैरिंगों झील का जलस्तर बढ़ता जा रहा है । मलेरिया,टाइफाइड, आदि संक्रामक रोगों से जन,जंगल,जमीन और जानवरों का संघर्ष लगातार जारी है । कमोबेश यही स्थिति ऑस्ट्रेलिया और हवाई द्वीप के बीच स्थित तुवालु समूहों भी देखने को मिल रही है जो लंबे समय से जलवायु परिवर्तन और बढ़ते समुद्र के स्तर के जोखिमों का सामना कर रहे हैं। उच्च ज्वार की स्थिति में तुवाल समूहों के 40% क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं और यह संभावना है कि सदी के अंत तक पूरे देश के पानी के नीचे होने का अनुमान है। तुवालुवासी तटीय क्षेत्रों में रहते हैं, इसलिए पहले से ही कमजोर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाला जा रहा है। इसी प्रकार की स्थिति दक्षिण प्रशांत में लगभग 1,000 द्वीपों और एटोल के एक समूह सोलोमन द्वीप की है जो धीरे-धीरे समुद्र के जलस्तर से काबिज होता जा रहा है।

समुद्रीय जलस्तर में वृद्धि सम्पूर्ण विश्व को अपनी विभीषिका में समेट लेने वाले घटना है । तेजी।से होते जलवायु परिवर्तन से समुद्रीय जलस्तर वृद्धि की घटनाओं में वृद्धि हुई है । समुद्रीय जल स्तर में वृद्धि के स्वरूप तटीय पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण, तूफान की तीव्रता और बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि होती है। इससे भूजल के संदूषण का भी खतरा बना रहता है और खाद्य सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। समुद्रीय जलस्तर में वृद्धि से भारत जैसे लंबी तटरेखा वाले देशों में विपरीत परिस्थितियां जन्म लेंगी इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती । इस संदर्भ में कुछ प्रमुख आंकड़ों पर गौर करना आवश्यक हो जाता है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार वर्ष 2000 से वर्ष 2019 की समयावधि में प्राकृतिक त्रासदियों की संख्या लगभग 3500 रही हैं । पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच दशकों में भारतीय तट के आसपास समुद्र का स्तर औसतन 1.7 मिमी प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बंगाल की खाड़ी में समुद्र के स्तर में वृद्धि अरब सागर से अधिक है। समुद्र के स्तर में यह वृद्धि जहां तटीय कटाव और विशाल परिस्थितिकी परिवर्तन को जन्म दे सकती है वहीं संसाधनों में विकृति भी उत्पन्न कर सकती है । बाढ़ और खारे पानी के आक्रमण से मनुष्य के साथ साथ समुद्री जीवन में भी उत्पन्न अस्थिरता , कई जीवों के अस्तित्व पर भी संकट डाल सकती है। संवेदनशील हिंदुकश पर्वत श्रृंखलाओ में वर्ष 1950 से वर्ष 2014 तक 1.3 डिग्री तापमान वृद्धि देखी गई है ।

 विश्व मौसम संगठन की हालिया प्रकाशित रिपोर्ट में यह बताया गया है कि वर्ष 2013 से वर्ष 2022 के मध्य समुद्री जल स्तर का विस्तार 4.5 मिलीमीटर तक हुआ है जो कि वर्ष 1900 से वर्ष 1970 के बीच हुए विस्तार से लगभग तीन गुना है । समुद्र के स्तर में वृद्धि की औसत दर वर्ष 1901 और वर्ष 1971 के बीच प्रति वर्ष 1.3 मिमी से बढ़कर वर्ष 1971 और वर्ष 2006 के बीच 1.9 मिमी प्रति वर्ष हो गई। विश्व मौसम संगठन के अनुसार, वर्ष 2013 और वर्ष 2022 के बीच समुद्र के स्तर में प्रति वर्ष 4.5 मिमी की वृद्धि हुई है।

इस रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित न रखा गया तो अगले 2000 वर्षों में वैश्विक औसत समुद्र-स्तर 2 से 3 मीटर तक बढ़ जाएगा । यहां यह तथ्य ध्यातव्य है कि वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्यों के साथ चलने पर सुमद्रजल स्तर में 2 से 6 मीटर की वृद्धि की संभावना है जोकि विलोपन का प्रमुख खतरा है । अतः ऐसे में हमारा ध्यान वैश्विक भू ताप को 1.5 डिग्री तक सीमित करना चाहिए । वैश्विक समुद्रीय जल स्तर वृद्धि और परिणाम रिपोर्ट के अनुसार लंबी तटीय संरचना एवं तटीय जनसंख्या वाले देश भारत, नीदरलैंड, बांग्लादेश, चीन आदि के साथ साथ निचले स्तर के छोटे छोटे द्वीपों पर समुद्री जलस्तर बढ़ने का सर्वाधिक खतरा रहेगा । यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब पेरिस जलवायु समझौते के अंतर्गत

पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से कम करने और अधिमानतः इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लक्ष्य के साथ विश्व के अलग अलग देश साथ चल रहे हैं। जिसे वर्ष 2030 तक प्राप्त किया जाना हैं

आईपीसीसी की जलवायु परिवर्तन 2021 की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि हिंद महासागर के दक्षिण पश्चिमी हिस्से में वैश्विक अनुपात से भी ज्यादा जलस्तर वृद्धि की घटनाएं सामने आ रही हैं ।

बढ़ते समुद्र का स्तर तटीय पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण का कारण बनता है, तूफान की तीव्रता और बाढ़ की तीव्रता बिगड़ती है। वे मिट्टी और भूजल के संदूषण का कारण भी बन सकते हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा पर और नकरात्मक प्रभाव पड़ सकता है । जलस्तर वृद्धि से उत्पन्न लवणता मत्स्य उत्पादन को भी प्रभावित कर सकती है ।

भारत सरकार ने समुद्र के स्तर में वृद्धि के मुद्दे से निपटने के लिए कई पहल की हैं, जिसमें जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना का विकास, तटीय क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम का निर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना शामिल है। हालाँकि, भारत में समुद्र के स्तर में वृद्धि के प्रभावों को कम करने के लिए और अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

भारत ने जलवायु परिवर्तन पर एक व्यापक राष्ट्रीय कार्य योजना विकसित की है, जिसमें आठ राष्ट्रीय मिशन शामिल हैं, जिनमें से एक टिकाऊ आवास और तटीय प्रबंधन पर केंद्रित है।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2019 में तटीय क्षेत्रों के सतत विकास और प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए तटीय क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम का उद्देश्य तटीय समुदायों के लचीलेपन में सुधार करना, आजीविका के अवसरों में वृद्धि करना और तटीय पर्यावरण की रक्षा करना है। भारत सरकार ने 2030 तक 450 गीगावाट अक्षय ऊर्जा पैदा करने का लक्ष्य भी इसी संदर्भ में रखा है। अक्षय ऊर्जा की ओर यह बदलाव जीवाश्म ईंधन पर भारत की निर्भरता को कम करेगा और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी कम करेगा।

 भारत सरकार ने समुद्र तट को कटाव से बचाने और बड़ते जलस्तर से मीठे पानी के स्रोतों में खारे पानी की मिलावट को रोकने के लिए मैंग्रोव संरक्षण परियोजनाएं भी शुरू की हैं। सरकार ने कमजोर तटीय क्षेत्रों को कटाव और बाढ़ से बचाने के लिए समुद्र की दीवारों, घाटियों और ब्रेकवाटर के निर्माण सहित कई तटीय संरक्षण और बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाओ की भी तरफ कदम बढ़ाने शुरू किए हैं।

 वस्तुतः इतने संवेदनशील वैश्विक विषय पर सभी देशों को अपने यहां किए जा रहे अनुसंधानों,प्रयोगों को दूसरे देशों के साथ भी साझा करने की आवश्यकता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जर्नल नेचर में हाल ही में ज्कोशवन ( ग्रीनलैंड) में 100 मी. लंबे बांध निर्माण संबंधी प्रस्ताव भी सामने रखे हैं । आर्कटिक के गलते हिमनदों के जल से बनी कृत्रिम झीलों की योजना पर यूके, जर्मनी आदि राष्ट्र कार्य कर रहे हैं । वैश्विक भू तापन को रोकने के लिए कृत्रिम स्नो कवर, एरोसोल छिड़काव,और जियोइंजीनियरिंग के नवोन्मेषी प्रयोगों के लिए एक मंच पर आने की आज आवश्यकता है ।


अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

  युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र   की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है   । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोल...