रविवार, 7 जनवरी 2024

नए भारत का नया कानून : बदलाव और चुनौतियां

 

जय प्रकाश पांडेय

वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी

वर्षों से चुनावी घोषणा पत्रों और विभिन्न मंचों से परिवर्तन हेतु प्रस्तावित भारतीय दंड संहिता 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 और भारतीय आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 को भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता 2023, और भारतीय सुरक्षा (द्वितीय) विधेयक 2023 से हाल ही में प्रतिस्थापित किया गया है, हालांकि नई संहिता के नियमों के लागू होने की तिथि अभी निर्दिष्ट नहीं की गई है। 1834 में थॉमस बबिंगटन मैकाले की अध्यक्षता में गठित समिति की अनुशंसाओं के बाद स्वतंत्र भारत में स्व कानूनों के लिए सशक्त प्रयास के रूप में, गृह मंत्रालय ने वर्ष 2020 में प्रोफेसर (डॉ.) रणबीर सिंह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। समिति की अनुशंसाओं, संसद की प्रक्रियाओं से गुजरता हुआ विधेयक, गृह मंत्रालय की स्थाई समिति की अनुशंसा और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद, भारतीय संस्कृति के सजग प्रहरी , राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख हस्ताक्षर और विश्व को बनारस हिंदू विश्विद्यालय की सौगात देने वाले,भारतरत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी और भारतीय जनता पार्टी के सह- संस्थापक भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्म दिवस के दिन भारत के राजपत्र का हिस्सा बना है जो कि महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक उपलब्धि मानी जा सकती है।

यह माना जा रहा है कि वर्तमान विधेयकों में आम जनमानस की सुविधाओं को केंद्र में रखकर नियम बनाए गए हैं। न्याय प्रणाली के अंतर्गत पीड़ितों, गवाहों और आरोपी व्यक्तियों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना संहिता के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है। इसके तहत त्वरित न्याय की संकल्पना को बल दिया गया है । न्याय की सुधारात्मक भारतीय संकल्पना को बल देते हुए कम्युनिटी सर्विस के प्रावधान को सामने लाया गया है । उत्तरदायी समयबद्ध पुलिस व्यवस्था और ट्रांसपेरेंट प्रक्रिया को नई संहिता सुनिश्चित करती है । नए कानूनों में तकनीक के युग के सापेक्ष इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल प्रमाणों को स्वीकार्य किया गया है। इसके अलावा महिलाओं से संबधित स्नेचिंग, छेड़छाड़ आदि मामलों हेतु पहली बार सख्त सजा के प्रावधान किए गए हैं। बीएनएस विधेयक में साइबर अपराध, आतंकवाद, घृणा अपराध, मॉब लिंचिंग आदि जैसे अपराधों की नई श्रेणियां भी प्रस्तुत की गई है। नई संहिता के अंतर्गत तलाशी और जब्ती प्रक्रिया की वीडियोटेपिंग अनिवार्य कर दी गई है ।

भारत में प्रायः आम जनमानस कानूनी प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ ही रहता है। एफआईआर के संदर्भ में पुलिस प्रशासन के क्षेत्राधिकार, निर्धारित होने के कारण, प्राथमिकी दर्ज करने के लिए पीड़ित पक्ष को भटकना पड़ता है जो पीड़ित पक्ष की परेशानियां ही बढ़ाता है । ऐसे में भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता द्वारा यह स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि आम जनमानस किसी भी नजदीकी थाने में प्राथमिकी दर्ज कर सके । जीरो एफआईआर के सिद्धांत के साथ नई संहिता यह भी सुनिश्चित करती है कि पुलिस प्रशासन वांछित स्टेशनों में ऐसी प्राथमिकी रिपोर्ट को स्वयं हस्तानांतरण करे ।

इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से कार्यवाही की अनुशंसा करती नई भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता सभी मुकदमों,उनकी जांच और कार्यवाही के लिए इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल माध्यमों की आवश्यकता को भी स्वीकार करती है । त्वरित परिणामों के दृष्टिकोण से यह एक सशक्त कदम सिद्ध होगा। यह पीड़ित पक्ष के लिए भी सहायक हो सकता है यदि सभी राज्य सरकारें सक्रियता से कार्य करें । प्रायः घटनाओं के बाद अभियुक्तों द्वारा फरार होने की घटना भारत में एक आम बात है । इस कारण अनेक बार अपराधी की पकड़ ही नही हो पाती है । ऐसे में फरार अभियुक्तों की गैर मौजूदगी में भी उनके ऊपर कार्यवाही का प्रावधान वर्तमान संहिता करती है ।

नई संहिता, न्याय की त्वरित, समयबद्ध व्यवस्था के संदर्भ में भी बात करती है । यह विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए समय सीमाएँ भी निर्धारित करती है। उदाहरण के लिए, नई संहिता के तहत बलात्कार पीड़िताओं की जाँच करने वाले चिकित्सा प्रदाता अपनी रिपोर्ट जांच अधिकारी को सात दिनों के भीतर प्रस्तुत करेंगे।इसके अतिरिक्त 3 साल तक की सजा वाले मामलों में संक्षिप्त विचारण ( समरी ट्रायल) की भी व्यवस्था नई संहिता करती है ताकि अदालतों पर मामलों का बोझ कम किया जा सके। तर्कों की समाप्ति के 30 दिनों के भीतर निर्णय देना (जिसे 60 दिनों तक विस्तारित किया जा सकता है), पीड़ित को 90 दिनों के भीतर जांच की प्रगति की सूचना देना, और सत्र न्यायालय द्वारा पहली सुनवाई के 60 दिनों के भीतर आरोपों की रूपरेखा तैयार करना ये सब कदम नई संहिता के तहत उठाए गए हैं।

पहली बार विवाह, रोजगार, पदोन्नति या झूठी पहचान और झूठे बहानों के द्वारा यौन संबंध बनाना अब एक दंडनीय अपराध माना गया है । 18 वर्ष से कम आयु की बच्चियों के साथ यौन दुराचार के मामलों में मृत्य दंड और मोब लिंचिंग की घटनाओं के मामलों में मृत्य दंड अथवा आजीवन कारावास अथवा 7 साल के सख्त कारावास का भी प्रावधान किया गया है। यह पहला कानून है जो स्पष्ट रूप से बताता है कि सशस्त्र विद्रोह, भारत से अलग होने की कोशिश करना और हमारी एकता, संप्रभुता और अखंडता के साथ खिलवाड़ करना आतंकवाद के रूप में गिना जाएगा । इसके अतिरिक्त आर्थिक आतंकवाद को भी यह चिन्हित करता है ।

चुनौतियां और दिशा :

 अनेक ऐसी संभावनाएं हैं जिनसे आम जनमानस इन नई संहिताओं के विषय में असमंजस में भी है । नई संहिता के तहत कुछ मामलों में पुलिस को एफआईआर करने से पहले प्रारंभिक जांच के अधिकार दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त वर्तमान में, पुलिस हिरासत, गिरफ्तारी के पहले 15 दिनों तक सीमित है। बीएनएसएस सामान्य आपराधिक कानून के तहत पुलिस हिरासत की अधिकतम सीमा का विस्तार 15 दिन की जगह 60 दिन या 90 दिन (अपराध की प्रकृति के आधार पर) करता है ।

पुलिस कस्टडी की सीमा में विस्तार और एफआईआर से पहले प्रारंभिक जांच का विकल्प, पुलिस प्रशासन को अनिर्बाधित अधिकार भी अनायास दे देता है । ऐसे अनिर्बाधित अधिकारो से उनके दुरुपयोग और उल्लंघन की चिंता बनी हुई है । पुलिस कस्टडी में हुई मौतों के लिए कुख्यात रहे भारत में पुलिस कस्टडी की अधिकतम सीमा में अप्रत्याशित विस्तार भी एक विचारणीय बिंदु है ।

जमानत के संदर्भ में नई संहिता यह स्पष्ट करती है कि ऐसे विचाराधीन कैदियों को जमानत दी जाएगी जो पहली बार अपराधी हैं और उन्होंने अधिकतम सजा का एक तिहाई पूरा कर लिया है। हालाँकि आजीवन कारावास वाले दंडनीय अपराध, और ऐसे व्यक्ति जिनके खिलाफ एक से अधिक अपराधों में कार्यवाही लंबित है ऐसे कैदियों को जमानत नहीं दी जाएगी । भारत में आरोपपत्रों में अक्सर कई अपराधों या धाराओं का उल्लेख होता है, इससे कई विचाराधीन कैदी अनिवार्य जमानत के लिए अयोग्य हो सकते हैं।

तकनीक के महत्व को स्वीकार्य करते हुए भारतीय साक्ष्य बिल के अंतर्गत स्वीकार्य दस्तावेजों की श्रेणी में, डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक संचार साधनों के समावेश ने अब कॉल रिकॉर्डिंग्स,ईमेल, आदि के साथ साथ मोबाइल,लैपटॉप,आदि के जरिए प्राप्त सुबूतों को भी प्राथमिक दस्तावेज मानने की तरफ मार्ग प्रशस्त किया है। लेकिन निजी सूचनाओं के संग्रहण और ऐसी व्यवस्था जिसमें डिजिटल सुबूत या सूचनाएं से बिना छेडछाड़ किए संग्रहित रखा जाए यह एक बड़ी चुनौती होगा । निजता के अधिकार को ध्यान में रखते हुए देखें तो निजता के अधिकार के साथ कॉल रिकॉर्डिंग, वॉइस रिकॉर्डिंग आदि को प्राथमिक सुबूतों की श्रेणी में रखना आगे चलकर द्वंद की ही स्थिति पैदा करेगा। वर्तमान समय में जब मोबाइल और लैपटॉप व्यक्ति के निजी जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं ऐसे में नयी संहिता के प्रावधान न्यायालय को जांच हेतु डिजिटल साधनों की भी जब्ती की असीमित शक्ति प्रदान करते हैं । ऐसे व्यक्तियों के भी डिजिटल/ इलेक्ट्रॉनिक जांच के आदेश जिनका ट्रायल से प्रत्यक्ष संबध भी नहीं है, यह निजता के अधिकार के उल्लंघन संबंधी मामलों को बढ़ाएगा।

निजता का अधिकार यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति अपने जीवन के कुछ पहलुओं को निजी रख सकें और सरकार या अन्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप से मुक्त रह सकें।

अतः यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि प्रगतिशील संहिता के साथ व्यक्तियों के गोपनीयता अधिकारों की रक्षा भी समुचित ढंग से की जाए। कानून के शासन के लिए यह अत्यंत आवश्यक कदम है।

बलात्कार के संबंध में लिंग समानता की बात यह संहिता नहीं करती है जो की आश्चर्यजनक बात है। बलात्कार की घटना को महज स्त्री के संबंध में ही देखा गया है । वैवाहिक बलात्कार पर भी संहिता में प्रत्यक्ष रूप से ज्यादा कुछ देखने को नहीं मिलता है । राजद्रोह को देशद्रोह नाम से प्रतिस्थापित जरूर किया गया है लेकिन अभी भी अस्पष्टता बनी हुई है । प्रस्ताव में सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों से अलग देश के खिलाफ विध्वंसक, अलगाववादी और सशस्त्र विद्रोह वाली गतिविधियों को देशद्रोह के अंतर्गत रखा गया है।

ऐसे अपराध जिनके लिए सजा 7 वर्ष से अधिक की है उन मामलों में फोरेंसिक जांच की अनिवार्यता यह संहिता निर्धारित करती है लेकिन अभी भी फोरेंसिक सुविधाओं के संबंध में देश की स्थिति सही नहीं है । ऐसे में नई संहिताओं के अनुसार इकोसिस्टम की व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है ।

वस्तुत: कानून प्रवर्तन और जांच एजेंसियों को प्रदान किए गए बढ़े हुए प्राधिकारों के संभावित दुरुपयोग के बारे में भी आशंकाएं हैं। इसमें कोई दो राय नहीं की वर्तमान संहिताओं ने भारतीयकरण की अच्छी कोशिश की है लेकिन आधारभूत सुविधाओं का विकास और समयबद्ध तरीके से नई संहिताओं का प्रवर्तन अत्यंत आवश्यक है । इसके साथ ही संभावित नकारात्मक पक्षों पर भी सार्थक संवाद से भारतीयता के इन प्रतीकों को व्यापक सहमति प्राप्त हो सकती है । त्वरित न्याय के लिए उपरोक्त प्रयास शानदार हैं परंतु न्यायाधीशों के पदों को सृजित करने, रिक्त पदों को भरने की अत्यंत आवश्यकता है । भारत में प्रति दस लाख की जनसंख्या में वर्तमान में 21 न्यायाधीश मौजूद हैं। एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विधि आयोग की 1987 की रिपोर्ट में प्रति दस लाख में इस संख्या को 50 करने की सिफारिश की गई थी प्रति है । ऐसे में वर्तमान जनसांख्यकीय आधार पर त्वरित रूप से इस दिशा में कार्य करना नई संहिताओं के उद्देश्य प्राप्ति में सहायक सिद्ध होगा ।


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