रविवार, 27 नवंबर 2022

ग्रामीण भारत,और सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग

 

 

भारत के सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों का देश की आर्थिकी में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है । आजादी के पहले से लेकर, वर्ष 2008 की  आर्थिक मंदियों  के दौर से गुजरते हुए , नोटबंदी और कोरोना काल की स्थितियों में भी सरकारी तंत्र के समर्थन के साथ,भारत की जीडीपी में लगभग 30 प्रतिशत का योगदान देते इन उद्योगों ने  समय समय पर  भारत के जनमानस को आर्थिक उतार चढ़ावों की ऊष्मा को महसूस नहीं होने दिया है । आजादी के बाद एक बहुत लंबी बहसों का सिलसिला इन सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों के विकास और संरक्षण  के लिए चला लेकिन भारी उद्योगों को ही प्राथमिकता देने के विजन के साथ आगे बढ़ते भारत को यह समझने में बहुत देर लगी की भारत के ग्रामों से ही भारत का विकास संभव है और इन भारत के ग्रामों के विकास हेतु सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों के विषय में सोचा जाना आवश्यक है ।

 भारत के सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग भारत के बड़े उद्योगों के लिए आधारभूत इकाई का कार्य कर सकते हैं इस विषय पर सोच के साथ  नीतिगत योजना बनाने में हमें लंबा वक्त लग गया।  इस संदर्भ में विगत वर्षों से किए जा रहे प्रयासों और उनके अनुभवों पर चर्चा अत्यंत आवश्यक हो जाती है। विनिर्माण क्षेत्र के जीडीपी में 25 प्रतिशत योगदान के साथ पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को एमएसएमई क्षेत्र के विकास के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता।

 

पैकेज्ड खाद्य पदार्थ, फल,सब्जी उत्पादन,दुग्ध,मत्स्य उद्योग,मुर्गी पालन,पशुपालन, रेस्टोरेंट क्षेत्र और फर्नीचर,कॉस्मेटिक, सैलून, खादी,इलेक्ट्रॉनिक्स  आदि लगभग  6000 से अधिक उत्पाद एमएसएमई क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं । इस क्षेत्र का देश के निर्यात में लगभग  50 प्रतिशत और रोजगार प्रदान करने में 45 प्रतिशत योगदान है।  भारत की जीडीपी में लगभग 30 प्रतिशत का सहयोग यह क्षेत्र देता है । जर्मनी में देश की जीडीपी में यह क्षेत्र 55 प्रतिशत और चीन में 60 प्रतिशत योगदान देता है ।ऐसे में इस क्षेत्र की महत्ता और देश के लिए इस क्षेत्र की आवश्यकता को समझा जा सकता है।

 

 गत वर्ष के बजट सत्र में संसद में लिखित उत्तर में यह बताया गया है कि एमएसएमई क्षेत्र में 43,37,444 लोगों ने  वित्तीय वर्ष 2020 में  रोजगार प्राप्त किया है । वर्ष 2021 में रोजगार प्राप्त करने वालों की संख्या में 106 प्रतिशत की वृद्धि हुई और वर्ष 2021 में 89,53,149 लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ  हालंकि इस विषय में भी अलग अलग राय है कि थोक विक्रेताओं और फुटकर विक्रेताओं का भी सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग में समावेशन इन आंकड़ों में बढ़ोतरी का कारण है ।

 

 सिडबी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री सिवासुब्रमनियन रामन के अनुसार  वर्तमान में भारत में लगभग 90 लाख सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग कार्यरत हैं  जिसमें से केवल 15 लाख ही जीएसटी के अंतर्गत सम्मिलित हैं । शेष को भी संस्थागत रूप से वित्तीय एवं आधारभूत संरचना सहायता के लिए उद्यम पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करके उद्यम संख्या लेनी अनिवार्य है।  ऐसे में वित्तीय जागरूकता वह सशक्त माध्यम है जिससे इस ध्येय की प्राप्ति हो सकती है ।

 

सरकार द्वारा अन्य प्रयासों के अलावा सूक्ष्म,लघु और मध्यम व्यापार लोन हेतु वर्ष 2018 में 59 मिनट योजना शुरू की गई। जिसमें एमएसएमई क्षेत्र के  उद्योगों की स्थापना विषयक प्रस्तावों के लिए कोई  व्यक्ति एक करोड़ तक के ऋण को एक से दो सप्ताह में  प्राप्त कर सकते हैं  । कच्चे माल की उपलब्धता विदेशों से भी भलीभांति हों इस संदर्भ में वैश्विक स्तर पर प्रयास किए गए हैं ।एमएसएमई क्षेत्र मार्केट विकास कार्यक्रमों के तहत अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों, व्यापार मेलों और रोडशोज आदि के द्वारा संचालित एक इकोसिस्टम विकसित करने की कोशिश सरकार द्वारा की गई है।

मुद्रा लोन, स्वरोजगार क्रेडिट कार्ड, कृषि और हैंडीक्राफ्ट्स के क्षेत्र में नाबार्ड द्वारा प्रदान किए जा रहे समर्थन यकीन मानिए कम से कम मानसिक धरातल पर आपको  सक्रिय कर देने के लिए काफी हैं।

 

एमएसएमई भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ है।  विनिर्माण निष्पादन में लगभग 45 प्रतिशत का सहयोग देते इस क्षेत्र ने भारत में कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार प्रदान किए हैं। 59 मिनट लोन स्कीम के तहत अस्वीकृत ऋणों की संख्या स्वीकृत ऋणों से काफी ज्यादा है । भारत में किसी भी ऋण की सुविधा इतनी सरल है ही नहीं जितनी वह दिखाई देती है ऐसे में दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों का इन तमाम सरकारी प्रयासों से विलग हो जाना स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त एनपीए का दंश झेल रहे हमारे सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों के समक्ष भी ऋण आवंटन की व्यवहारिक समस्या है ऐसे में कैसे एमएसएमई क्षेत्र में सुधार किए जा सकते हैं यह प्रश्न हमारे सामने है।  जीएसटी के बाद उत्पन्न परिस्थितियों में हमारे इन उद्योगों के सामने विदेशों से सस्ते दाम में आयातित सामग्रियों ने भी चुनौतियां पेश की हैं।

 

 सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय की 2021-2022 रिपोर्ट में उल्लेखित आंकड़ों अनुसार भारत के कुल क्षेत्र के सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों में से लगभग 51 प्रतिशत इकाइयां ग्रामीण भारत में हैं लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि ग्रामीण और पहाड़ी अंचल का एमएसएमई   क्षेत्र  आज उत्पादन और सप्लाई चेन में अनियमितता , तकनीकी जागरूकता की कमी, प्रशिक्षण , औद्योगिक प्रशिक्षण और प्रबंधन की दक्षता में कमी से जूझ रहा है। वित्तीय समर्थन में कमी  और सीमित संसाधनों के बावजूद आज भी यह हमारी महत्वपूर्ण परिसंप्पतियां हैं जिनपर भारत का स्वर्णिम भविष्य निर्भर करेगा ।

 

पहाड़ी और ग्रामीण भारत में वित्तीय जागरूकता की कमी आज इस क्षेत्र के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती है । टियर 2 और टियर 3 शहरों में वित्तीय जागरूकता महज एक दो दिनों के प्रचार तक सीमित रह गई है।  वित्तीय जागरूकता न होने के कारण ग्रामीण भारत के व्यवसायियों द्वारा बहुत सीमित स्तर पर योजनाओं का लाभ उठाया जाता है । सीमित वित्तीय जानकारियों के अभाव ने भ्रष्टाचार को भी पनपने का मौका दिया है। जहां भी प्रदेश सरकारों ने वित्तीय जागरूकता को अपने राज्य में अच्छे से प्रसारित किया है वहां के सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग  क्षेत्र अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।   

आधारभूत संरचना और व्यवसाय के आरंभिक स्तर के लिए ऋण की व्यवस्था आज भी प्रमुख चुनौती है ।अभी भी ग्रामीण और पहाड़ी अंचल में सुगमता से ऋण उपलब्ध होना टेडी खीर है।  सरकार की विभिन्न नीतियों के क्रियान्वयन से कार्य बोझ तले दबे बैंक कर्मियों से ऐसे में मार्गदर्शन की उम्मीद शायद ही की जा सकती है ।

 

 बाधित विद्युत आपूर्ति, संग्रहण और वेयरहाउस सुविधाओं की कमी,परिवहन के साधनों की कमी और संचार के माध्यम और इंटरनेट की सीमित उपलब्धता ने पहाड़ी राज्यों और ग्रामीण भारत के एमएसएमई के सामने नई चुनौतियां पेश की हैं। सरकार की परिभाषा बदलने के बाद से बड़े उद्योगों से लगातार मिलती चुनतियों और मार्केट सेंटरों की अनुपलब्धता ने भी ग्रामीण भारत के और पहाड़ी अंचल के एमएसएमई क्षेत्र में कार्यरत लोगों को प्रभावित किया है। इस क्षेत्र के लिए  एक स्वतंत्र नियामक  और व्यापार करने में सुगमता आज  अपरिहार्य है। 

  आज हमें आवश्यकता है कि ग्रामीण भारत  और पहाड़ी अंचल के उद्यमी कृषि और कृषि से संबद्ध उद्योगों की तरफ भी कदम आगे बढ़ाए ऐसे में वित्तीय जागरूकता के अभियान को विकेंद्रीकृत करते हुए हमें अधिकाधिक प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है ।भारत का स्वर्णिम भविष्य भारत के गांवों में बसता है और सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग  क्षेत्र को यदि वांछित समर्थन हम दे पाएं तो भारत के   स्वर्णिम भविष्य का मार्ग प्रशस्त होगा इसमें कोई दो राय नहीं ।

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

बाड़ी मडुवा खायेंगे,उत्तराखंड बनाएंगे ।

 


देवभूमि उत्तराखंड , एक ऐसा प्रदेश जिसके निर्माण के पीछे के सपने को समझना चाहें तो हिमालय की गोद में बसे पहाड़ी राज्य की संकल्पना सामने आती है जिसके जन जंगल जमीन पर पहाड़ी समाज के लोगों का प्रभुत्व है लेकिन यह संकल्पना महज कोरी कल्पना रह गई है । देहरादून और पड़ोसी मैदानी इलाकों के साथ मिलाकर स्थापित यह पहाड़ी कम,ज्यादा शहरी राज्य आज पहाड़ी राज्य की संकल्पना की सिद्धि पर प्रश्न खड़ा जरूर करता हैं । पहाड़ी राज्य की इस कोरी कल्पना के लिए केंद्र में दशकों तक सत्ता में रही पार्टियां तो वहीं राजनैतिक प्रतिबद्धता की कमी से भरे हमारे जनप्रतिनिधि जिम्मेदार रहे। सन 1938 में श्रीनगर के विशेष अधिवेशन और सन 1938 में दिल्ली में ही श्रीदेवसुमन द्वारा गढ़देश सेवा संघ की स्थापना के साथ ही उत्तराखंड राज्य के पृथकता संबंधी विचारों को बल मिला। मुगलकालीन समय में मुगलाई संस्कृति से कोसों दूर रहने और स्थानीय शासकों के सानिध्य में आगे बढ़ने वाली उत्तराखंडी संस्कृति और पहाड़ी क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि के सपनों के साथ उत्तरप्रदेश से 9 नवंबर 2000 को यह राज्य एक लंबी लड़ाई और बलिदानों की लंबी श्रृंखलाओ के बाद अलग होता है।

आज हमारे साथ ही बने छत्तीसगढ़ और झारखंड दोनों से मजबूत स्थिति में हम हैं। खनिज प्रदेश होने के बाद भी इन दोनों प्रदेशों की प्रति व्यक्ति आय उत्तराखंड से कम है। सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स में भी उत्तराखंड आगे बढ़ रहा है।

ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स मामले में उतराखंड की रैंक लगातार सुधरी है । नीति आयोग के समावेशी विकास लक्ष्य इंडिया इंडेक्स में हमने शीर्षस्थ 5 में स्थान बनाया हैं ।

उत्तरप्रदेश से अलग होने के क्रम में वर्ष 2001- 2002 में लगभग 1061.03 करोड़ रुपए के शुद्ध ऋण से हम लोग दबे हुए थे । आज हमारी प्रति व्यक्ति आय एक लाख 96 हजार के आसपास हो चुकी है। आज हमारा सकल राज्य घरेलू उत्पाद वर्ष 2022 -2023 के लिए 2,76,677 करोड़ रूपये होने का अनुमान है। उद्योग सेक्टर के बाद सर्विस सेक्टर की तरफ से हमारी जीडीपी का सर्वाधिक हिस्सा आता है। यहां यह ध्यात्व्य तथ्य है कि महाराष्ट्र की जीडीपी में इंडस्ट्री या उद्योगों का योगदान महज 10 प्रतिशत है और कृषि का लगभग 51 प्रतिशत । इस तथ्य के आलोक में हमने अपनी कृषि आर्थिकी की ओर और मजबूत कदम बढ़ाने की आवश्यकता है । पड़ोसी राज्य हिमांचल के सार्वजनिक यातायात (ट्रांसपोर्ट) और लॉजिस्टिक्स मॉडल पर अध्ययन कर हमें भी कार्य करना चाहिए । हिमांचल सरकार ने अपने यहां पर्यटन के अलावा स्थानीय उत्पादों के उत्पादन,संग्रहण और मार्केट लिंकिंग और कृषि के सीमा विस्तार में वृद्धि सरीखी अभूतपूर्व पहले की हैं, उत्तराखंड के भी अनाज, दालें और स्थानीय उत्पाद जैसे मडुए, भट्ट, झंगौर, माल्टा, अखरोट, भांग के रेशे, नीबू,काला घी आदि को भी उद्यान विभागों की सक्रीयता से बढ़ाया जा सकता है । मोटे अनाज की जिस आवश्यकता को संयुक्त राष्ट्र आज घोषित कर रहा है, मडुए के रूप में विश्व को हम एक बड़ी सौगात दे सकते हैं। हिमाचल के राजनैतिक नेतृत्व ने संगठित होकर बंदरों,को जिस प्रकार वर्मन घोषित किया वैसे स्टैंड आज उत्तराखंडवासियों के लिए लेने की आवश्यकता है।

उत्तराखंड राज्य सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में पद संभालते ही लाचार व्यवस्था से वर्तमान मुख्यमंत्री को भी गुजरना पड़ा होगा इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती । कोरोना समय की त्रासदी से शुरू मुख्यमंत्री का सफर आज पेपर लीक प्रकरणों से उत्पन्न स्थितियों तक जा पहुचा है । इस दौर में अनेक सकारात्मक उपलब्धियां भी हमें प्राप्त हुई हैं लेकिन लीक प्रकरणों ने अतीत की अनियमितताओं को तो दिखाया ही है साथ ही इस और भी इशारा किया है कि न जाने कितने ऐसे कृत्य सत्ता के गढ़जोड़ के साथ नाक के नीचे से किए जाते हैं। इन्हीं सबके बीच विधानसभा सचिवालय की समूह नियुक्तियों में बैकडोर एंट्री से संबंधित मामलों से आज का उत्तराखंड जूझ रहा है ।

 नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन और समान नागरिक संहिता की दिशा में पूरे भारत में प्रथम राज्य के रूप में स्थापित होकर तो वहीं हिंदी माध्यम से इंजिनियरिंग करने और अब चिकित्सा क्षेत्र में भी हिंदी माध्यम को बढ़ावा देने वाली पहलों से चर्चा का केंद्र बने उत्तराखंड राज्य के कदम स्वागत योग्य हैं, लेकिन जरूरत इस बात की भी है कि वर्तमान इंजीनियरिंग कॉलेज और मेडिकल कॉलेजों की अन्य आधरभूत अवसंरचना का भी विकास करें । स्टार्टअप और स्टैंड अप इकोसिस्टम के लिए जरूरी है द्वाराहाट,पौड़ी,पंतनगर,रुड़की और अन्य इंजीनियरिंग कॉलेज तक में अवसंरचनात्मक विकास की । जरूरी यह भी है सीमांत क्षेत्रों में खोलें गए इंजीनियरिंग कॉलेजों की वैधता पर स्पष्टता हो ।

अभी भी मुख्यमंत्री स्व-रोजगार योजना के क्रियान्वयन में राष्ट्रीयकृत बैंकों की संदिग्ध भूमिका आम जनमानस को परेशान किए हुए है । जिला स्तर के सर्वोच्च अधिकारी द्वारा चयनित अभ्यर्थियों को भी ऋण उपलब्ध नहीं हो पाना इस ध्येय की प्राप्ति में आने वाली क्रियान्वयन संबंधी बाधाएं हैं । अभी भी पहाड़ी अंचल गुलदारों के आतंक से जूझ रहा है जहां अनुदानों से प्राप्त सोलर लाइटें चोरी हुई बैटरीयों की राह तकती हैं। अभी भी प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के दायरे से बाहर रह गए कई गांवों को सड़क से जोड़े जाना आवश्यक है ताकि नवजात बच्चे को जन्म देते हुए किसी प्रसूता की जिंदगी न जाए।

 आज मेडिकल सीट्स वृद्धि के लिए और मेडिकल सीट्स में डोमिसाइल की परिभाषा में राज्य के निवासियों को प्राथमिकता दिए जाने वाले पक्ष तो वहीं हवाई सेवा के लिए संयुक्त आवाजों के भी स्वर अब सांस्कृतिक उत्सवों की थाप में धीमे हो चुके हैं । मुक्त विश्वविद्यालयों के परिणाम आज समय पर नहीं आ रहे और बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में अर्हता न होने से बाहर होते जा रहे हैं । प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रदेश के युवाओं को अग्निवीर योजना से एक बहुत बड़ा झटका महसूस हुआ है, रही सही कसर प्रदेश सरकार के खाली होते खज़ानों और हाल ही में प्रकाशित जिसमें उत्तराखंड को सबसे अंतिम पायदान पर रखा गया है ।

दरअसल उत्तराखंड की मूल लड़ाई पहाड़ी राज्यों के अस्तित्व की है । यह लड़ाई औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ सक्रियता से लड़ने वाले और आजादी के बाद मुख्यधारा से विलग चारे के लिए खाइयों से जूझती और शराबबंदी के लिए मुखरित होती मातृशक्ति की आवाजों की है । यह लड़ाई जन,जंगल,जमीन और जानवरों की है । यह लड़ाई बदलते पिकनिक स्पोटों के बीच सांस्कृतिक और प्राकृतिक संरक्षण की है। यह लड़ाई स्पष्ट भू कानून नीति और इनर लाइन परमिट की है। और इनको समझने के क्रम में 22 वर्षों में हमने देश को विशेष सौगात के रूप में 10 मुख्यमंत्री दिए हैं । आज राजनैतिक क्षरणता के उस बिंदु पर हम पहुंच गए हैं जहां योजनाएं महज घोषणाओं तक सीमित रह गई है और हम राजनैतिक स्थिरता ही नहीं बना पाए हैं।

लेकिन ऐसा नहीं है कि घने अंधकार में , उजाले के स्रोत कहीं नहीं हैं ।

 उत्तराखंड के नव निर्माण तभी संभव है जब हम लोग पहले उत्तराखंडी बनें और शेष सब बाद में । जब हम लोग अपनी सांस्कृतिक चेतना के वाहक बनें और चाय की प्याली के साथ अपने राज्य की असफलताओं पर चर्चा छोड़कर उत्तराखंड के विकास में हमारा क्या योगदान हो सकता है इसपर मंथन करें, उत्तराखंड दिवस की सच्चे अर्थों में सिद्धि तभी होगी।

अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

  युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र   की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है   । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोल...