मंगलवार, 8 नवंबर 2022

बाड़ी मडुवा खायेंगे,उत्तराखंड बनाएंगे ।

 


देवभूमि उत्तराखंड , एक ऐसा प्रदेश जिसके निर्माण के पीछे के सपने को समझना चाहें तो हिमालय की गोद में बसे पहाड़ी राज्य की संकल्पना सामने आती है जिसके जन जंगल जमीन पर पहाड़ी समाज के लोगों का प्रभुत्व है लेकिन यह संकल्पना महज कोरी कल्पना रह गई है । देहरादून और पड़ोसी मैदानी इलाकों के साथ मिलाकर स्थापित यह पहाड़ी कम,ज्यादा शहरी राज्य आज पहाड़ी राज्य की संकल्पना की सिद्धि पर प्रश्न खड़ा जरूर करता हैं । पहाड़ी राज्य की इस कोरी कल्पना के लिए केंद्र में दशकों तक सत्ता में रही पार्टियां तो वहीं राजनैतिक प्रतिबद्धता की कमी से भरे हमारे जनप्रतिनिधि जिम्मेदार रहे। सन 1938 में श्रीनगर के विशेष अधिवेशन और सन 1938 में दिल्ली में ही श्रीदेवसुमन द्वारा गढ़देश सेवा संघ की स्थापना के साथ ही उत्तराखंड राज्य के पृथकता संबंधी विचारों को बल मिला। मुगलकालीन समय में मुगलाई संस्कृति से कोसों दूर रहने और स्थानीय शासकों के सानिध्य में आगे बढ़ने वाली उत्तराखंडी संस्कृति और पहाड़ी क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि के सपनों के साथ उत्तरप्रदेश से 9 नवंबर 2000 को यह राज्य एक लंबी लड़ाई और बलिदानों की लंबी श्रृंखलाओ के बाद अलग होता है।

आज हमारे साथ ही बने छत्तीसगढ़ और झारखंड दोनों से मजबूत स्थिति में हम हैं। खनिज प्रदेश होने के बाद भी इन दोनों प्रदेशों की प्रति व्यक्ति आय उत्तराखंड से कम है। सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स में भी उत्तराखंड आगे बढ़ रहा है।

ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स मामले में उतराखंड की रैंक लगातार सुधरी है । नीति आयोग के समावेशी विकास लक्ष्य इंडिया इंडेक्स में हमने शीर्षस्थ 5 में स्थान बनाया हैं ।

उत्तरप्रदेश से अलग होने के क्रम में वर्ष 2001- 2002 में लगभग 1061.03 करोड़ रुपए के शुद्ध ऋण से हम लोग दबे हुए थे । आज हमारी प्रति व्यक्ति आय एक लाख 96 हजार के आसपास हो चुकी है। आज हमारा सकल राज्य घरेलू उत्पाद वर्ष 2022 -2023 के लिए 2,76,677 करोड़ रूपये होने का अनुमान है। उद्योग सेक्टर के बाद सर्विस सेक्टर की तरफ से हमारी जीडीपी का सर्वाधिक हिस्सा आता है। यहां यह ध्यात्व्य तथ्य है कि महाराष्ट्र की जीडीपी में इंडस्ट्री या उद्योगों का योगदान महज 10 प्रतिशत है और कृषि का लगभग 51 प्रतिशत । इस तथ्य के आलोक में हमने अपनी कृषि आर्थिकी की ओर और मजबूत कदम बढ़ाने की आवश्यकता है । पड़ोसी राज्य हिमांचल के सार्वजनिक यातायात (ट्रांसपोर्ट) और लॉजिस्टिक्स मॉडल पर अध्ययन कर हमें भी कार्य करना चाहिए । हिमांचल सरकार ने अपने यहां पर्यटन के अलावा स्थानीय उत्पादों के उत्पादन,संग्रहण और मार्केट लिंकिंग और कृषि के सीमा विस्तार में वृद्धि सरीखी अभूतपूर्व पहले की हैं, उत्तराखंड के भी अनाज, दालें और स्थानीय उत्पाद जैसे मडुए, भट्ट, झंगौर, माल्टा, अखरोट, भांग के रेशे, नीबू,काला घी आदि को भी उद्यान विभागों की सक्रीयता से बढ़ाया जा सकता है । मोटे अनाज की जिस आवश्यकता को संयुक्त राष्ट्र आज घोषित कर रहा है, मडुए के रूप में विश्व को हम एक बड़ी सौगात दे सकते हैं। हिमाचल के राजनैतिक नेतृत्व ने संगठित होकर बंदरों,को जिस प्रकार वर्मन घोषित किया वैसे स्टैंड आज उत्तराखंडवासियों के लिए लेने की आवश्यकता है।

उत्तराखंड राज्य सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में पद संभालते ही लाचार व्यवस्था से वर्तमान मुख्यमंत्री को भी गुजरना पड़ा होगा इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती । कोरोना समय की त्रासदी से शुरू मुख्यमंत्री का सफर आज पेपर लीक प्रकरणों से उत्पन्न स्थितियों तक जा पहुचा है । इस दौर में अनेक सकारात्मक उपलब्धियां भी हमें प्राप्त हुई हैं लेकिन लीक प्रकरणों ने अतीत की अनियमितताओं को तो दिखाया ही है साथ ही इस और भी इशारा किया है कि न जाने कितने ऐसे कृत्य सत्ता के गढ़जोड़ के साथ नाक के नीचे से किए जाते हैं। इन्हीं सबके बीच विधानसभा सचिवालय की समूह नियुक्तियों में बैकडोर एंट्री से संबंधित मामलों से आज का उत्तराखंड जूझ रहा है ।

 नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन और समान नागरिक संहिता की दिशा में पूरे भारत में प्रथम राज्य के रूप में स्थापित होकर तो वहीं हिंदी माध्यम से इंजिनियरिंग करने और अब चिकित्सा क्षेत्र में भी हिंदी माध्यम को बढ़ावा देने वाली पहलों से चर्चा का केंद्र बने उत्तराखंड राज्य के कदम स्वागत योग्य हैं, लेकिन जरूरत इस बात की भी है कि वर्तमान इंजीनियरिंग कॉलेज और मेडिकल कॉलेजों की अन्य आधरभूत अवसंरचना का भी विकास करें । स्टार्टअप और स्टैंड अप इकोसिस्टम के लिए जरूरी है द्वाराहाट,पौड़ी,पंतनगर,रुड़की और अन्य इंजीनियरिंग कॉलेज तक में अवसंरचनात्मक विकास की । जरूरी यह भी है सीमांत क्षेत्रों में खोलें गए इंजीनियरिंग कॉलेजों की वैधता पर स्पष्टता हो ।

अभी भी मुख्यमंत्री स्व-रोजगार योजना के क्रियान्वयन में राष्ट्रीयकृत बैंकों की संदिग्ध भूमिका आम जनमानस को परेशान किए हुए है । जिला स्तर के सर्वोच्च अधिकारी द्वारा चयनित अभ्यर्थियों को भी ऋण उपलब्ध नहीं हो पाना इस ध्येय की प्राप्ति में आने वाली क्रियान्वयन संबंधी बाधाएं हैं । अभी भी पहाड़ी अंचल गुलदारों के आतंक से जूझ रहा है जहां अनुदानों से प्राप्त सोलर लाइटें चोरी हुई बैटरीयों की राह तकती हैं। अभी भी प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के दायरे से बाहर रह गए कई गांवों को सड़क से जोड़े जाना आवश्यक है ताकि नवजात बच्चे को जन्म देते हुए किसी प्रसूता की जिंदगी न जाए।

 आज मेडिकल सीट्स वृद्धि के लिए और मेडिकल सीट्स में डोमिसाइल की परिभाषा में राज्य के निवासियों को प्राथमिकता दिए जाने वाले पक्ष तो वहीं हवाई सेवा के लिए संयुक्त आवाजों के भी स्वर अब सांस्कृतिक उत्सवों की थाप में धीमे हो चुके हैं । मुक्त विश्वविद्यालयों के परिणाम आज समय पर नहीं आ रहे और बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में अर्हता न होने से बाहर होते जा रहे हैं । प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रदेश के युवाओं को अग्निवीर योजना से एक बहुत बड़ा झटका महसूस हुआ है, रही सही कसर प्रदेश सरकार के खाली होते खज़ानों और हाल ही में प्रकाशित जिसमें उत्तराखंड को सबसे अंतिम पायदान पर रखा गया है ।

दरअसल उत्तराखंड की मूल लड़ाई पहाड़ी राज्यों के अस्तित्व की है । यह लड़ाई औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ सक्रियता से लड़ने वाले और आजादी के बाद मुख्यधारा से विलग चारे के लिए खाइयों से जूझती और शराबबंदी के लिए मुखरित होती मातृशक्ति की आवाजों की है । यह लड़ाई जन,जंगल,जमीन और जानवरों की है । यह लड़ाई बदलते पिकनिक स्पोटों के बीच सांस्कृतिक और प्राकृतिक संरक्षण की है। यह लड़ाई स्पष्ट भू कानून नीति और इनर लाइन परमिट की है। और इनको समझने के क्रम में 22 वर्षों में हमने देश को विशेष सौगात के रूप में 10 मुख्यमंत्री दिए हैं । आज राजनैतिक क्षरणता के उस बिंदु पर हम पहुंच गए हैं जहां योजनाएं महज घोषणाओं तक सीमित रह गई है और हम राजनैतिक स्थिरता ही नहीं बना पाए हैं।

लेकिन ऐसा नहीं है कि घने अंधकार में , उजाले के स्रोत कहीं नहीं हैं ।

 उत्तराखंड के नव निर्माण तभी संभव है जब हम लोग पहले उत्तराखंडी बनें और शेष सब बाद में । जब हम लोग अपनी सांस्कृतिक चेतना के वाहक बनें और चाय की प्याली के साथ अपने राज्य की असफलताओं पर चर्चा छोड़कर उत्तराखंड के विकास में हमारा क्या योगदान हो सकता है इसपर मंथन करें, उत्तराखंड दिवस की सच्चे अर्थों में सिद्धि तभी होगी।

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