भारत के सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों का देश की आर्थिकी में अत्यंत
महत्वपूर्ण योगदान है । आजादी के पहले से लेकर, वर्ष 2008 की आर्थिक मंदियों के दौर से गुजरते हुए , नोटबंदी और कोरोना काल
की स्थितियों में भी सरकारी तंत्र के समर्थन के साथ,भारत की जीडीपी में लगभग 30
प्रतिशत का योगदान देते इन उद्योगों ने
समय समय पर भारत के जनमानस को
आर्थिक उतार चढ़ावों की ऊष्मा को महसूस नहीं होने दिया है । आजादी के बाद एक बहुत
लंबी बहसों का सिलसिला इन सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों के विकास और संरक्षण के लिए चला लेकिन भारी उद्योगों को ही
प्राथमिकता देने के विजन के साथ आगे बढ़ते भारत को यह समझने में बहुत देर लगी की
भारत के ग्रामों से ही भारत का विकास संभव है और इन भारत के ग्रामों के विकास हेतु
सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों के विषय में सोचा जाना आवश्यक है ।
भारत के सूक्ष्म,लघु और
मध्यम उद्योग भारत के बड़े उद्योगों के लिए आधारभूत इकाई का कार्य कर सकते हैं इस
विषय पर सोच के साथ नीतिगत योजना बनाने
में हमें लंबा वक्त लग गया। इस संदर्भ में
विगत वर्षों से किए जा रहे प्रयासों और उनके अनुभवों पर चर्चा अत्यंत आवश्यक हो
जाती है। विनिर्माण क्षेत्र के जीडीपी में 25 प्रतिशत योगदान के साथ पांच ट्रिलियन
डॉलर की अर्थव्यवस्था के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को एमएसएमई क्षेत्र के विकास के
बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता।
पैकेज्ड खाद्य पदार्थ, फल,सब्जी उत्पादन,दुग्ध,मत्स्य उद्योग,मुर्गी
पालन,पशुपालन, रेस्टोरेंट क्षेत्र और फर्नीचर,कॉस्मेटिक, सैलून,
खादी,इलेक्ट्रॉनिक्स आदि लगभग 6000 से अधिक उत्पाद एमएसएमई क्षेत्र के
अंतर्गत आते हैं । इस क्षेत्र का देश के निर्यात में लगभग 50 प्रतिशत और रोजगार प्रदान करने में 45
प्रतिशत योगदान है। भारत की जीडीपी में लगभग
30 प्रतिशत का सहयोग यह क्षेत्र देता है । जर्मनी में देश की जीडीपी में यह
क्षेत्र 55 प्रतिशत और चीन में 60 प्रतिशत योगदान देता है ।ऐसे में इस क्षेत्र की
महत्ता और देश के लिए इस क्षेत्र की आवश्यकता को समझा जा सकता है।
गत वर्ष के बजट सत्र में
संसद में लिखित उत्तर में यह बताया गया है कि एमएसएमई क्षेत्र में 43,37,444 लोगों
ने वित्तीय वर्ष 2020 में रोजगार प्राप्त किया है । वर्ष 2021 में रोजगार
प्राप्त करने वालों की संख्या में 106 प्रतिशत की वृद्धि हुई और वर्ष 2021 में
89,53,149 लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ
हालंकि इस विषय में भी अलग अलग राय है कि थोक विक्रेताओं और फुटकर
विक्रेताओं का भी सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग में समावेशन इन आंकड़ों में बढ़ोतरी
का कारण है ।
सिडबी के अध्यक्ष एवं प्रबंध
निदेशक श्री सिवासुब्रमनियन रामन के अनुसार
वर्तमान में भारत में लगभग 90 लाख सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योग कार्यरत
हैं जिसमें से केवल 15 लाख ही जीएसटी के
अंतर्गत सम्मिलित हैं । शेष को भी संस्थागत रूप से वित्तीय एवं आधारभूत संरचना
सहायता के लिए उद्यम पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करके उद्यम संख्या लेनी अनिवार्य
है। ऐसे में वित्तीय जागरूकता वह सशक्त
माध्यम है जिससे इस ध्येय की प्राप्ति हो सकती है ।
सरकार द्वारा अन्य प्रयासों के अलावा सूक्ष्म,लघु और मध्यम व्यापार
लोन हेतु वर्ष 2018 में 59 मिनट योजना शुरू की गई। जिसमें एमएसएमई क्षेत्र के उद्योगों की स्थापना विषयक प्रस्तावों के लिए कोई व्यक्ति एक करोड़ तक के ऋण को एक से दो सप्ताह
में प्राप्त कर सकते हैं । कच्चे माल की उपलब्धता विदेशों से भी
भलीभांति हों इस संदर्भ में वैश्विक स्तर पर प्रयास किए गए हैं ।एमएसएमई क्षेत्र
मार्केट विकास कार्यक्रमों के तहत अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों, व्यापार मेलों और
रोडशोज आदि के द्वारा संचालित एक इकोसिस्टम विकसित करने की कोशिश सरकार द्वारा की
गई है।
मुद्रा लोन, स्वरोजगार क्रेडिट कार्ड, कृषि और हैंडीक्राफ्ट्स के
क्षेत्र में नाबार्ड द्वारा प्रदान किए जा रहे समर्थन यकीन मानिए कम से कम मानसिक
धरातल पर आपको सक्रिय कर देने के लिए काफी
हैं।
एमएसएमई भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ है। विनिर्माण निष्पादन में लगभग 45 प्रतिशत का
सहयोग देते इस क्षेत्र ने भारत में कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार प्रदान किए
हैं। 59 मिनट लोन स्कीम के तहत अस्वीकृत ऋणों की संख्या स्वीकृत ऋणों से काफी
ज्यादा है । भारत में किसी भी ऋण की सुविधा इतनी सरल है ही नहीं जितनी वह दिखाई
देती है ऐसे में दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों का इन तमाम सरकारी प्रयासों से विलग हो
जाना स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त एनपीए का दंश झेल रहे हमारे सार्वजनिक क्षेत्रों
के बैंकों के समक्ष भी ऋण आवंटन की व्यवहारिक समस्या है ऐसे में कैसे एमएसएमई
क्षेत्र में सुधार किए जा सकते हैं यह प्रश्न हमारे सामने है। जीएसटी के बाद उत्पन्न परिस्थितियों में हमारे
इन उद्योगों के सामने विदेशों से सस्ते दाम में आयातित सामग्रियों ने भी चुनौतियां
पेश की हैं।
सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्यम
मंत्रालय की 2021-2022 रिपोर्ट में उल्लेखित आंकड़ों अनुसार भारत के कुल क्षेत्र
के सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों में से लगभग 51 प्रतिशत इकाइयां ग्रामीण भारत
में हैं लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि ग्रामीण और पहाड़ी अंचल का एमएसएमई क्षेत्र
आज उत्पादन और सप्लाई चेन में अनियमितता , तकनीकी जागरूकता की कमी,
प्रशिक्षण , औद्योगिक प्रशिक्षण और प्रबंधन की दक्षता में कमी से जूझ रहा है।
वित्तीय समर्थन में कमी और सीमित संसाधनों
के बावजूद आज भी यह हमारी महत्वपूर्ण परिसंप्पतियां हैं जिनपर भारत का स्वर्णिम
भविष्य निर्भर करेगा ।
पहाड़ी और ग्रामीण भारत में वित्तीय जागरूकता की कमी आज इस क्षेत्र
के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती है । टियर 2 और टियर 3 शहरों में वित्तीय जागरूकता महज
एक दो दिनों के प्रचार तक सीमित रह गई है।
वित्तीय जागरूकता न होने के कारण ग्रामीण भारत के व्यवसायियों द्वारा बहुत
सीमित स्तर पर योजनाओं का लाभ उठाया जाता है । सीमित वित्तीय जानकारियों के अभाव
ने भ्रष्टाचार को भी पनपने का मौका दिया है। जहां भी प्रदेश सरकारों ने वित्तीय
जागरूकता को अपने राज्य में अच्छे से प्रसारित किया है वहां के सूक्ष्म,लघु और
मध्यम उद्योग क्षेत्र अच्छा प्रदर्शन कर
रहे हैं।
आधारभूत संरचना और व्यवसाय के आरंभिक स्तर के लिए ऋण की व्यवस्था आज
भी प्रमुख चुनौती है ।अभी भी ग्रामीण और पहाड़ी अंचल में सुगमता से ऋण उपलब्ध होना
टेडी खीर है। सरकार की विभिन्न नीतियों के
क्रियान्वयन से कार्य बोझ तले दबे बैंक कर्मियों से ऐसे में मार्गदर्शन की उम्मीद
शायद ही की जा सकती है ।
बाधित विद्युत आपूर्ति,
संग्रहण और वेयरहाउस सुविधाओं की कमी,परिवहन के साधनों की कमी और संचार के माध्यम
और इंटरनेट की सीमित उपलब्धता ने पहाड़ी राज्यों और ग्रामीण भारत के एमएसएमई के
सामने नई चुनौतियां पेश की हैं। सरकार की परिभाषा बदलने के बाद से बड़े उद्योगों
से लगातार मिलती चुनतियों और मार्केट सेंटरों की अनुपलब्धता ने भी ग्रामीण भारत के
और पहाड़ी अंचल के एमएसएमई क्षेत्र में कार्यरत लोगों को प्रभावित किया है। इस
क्षेत्र के लिए एक स्वतंत्र नियामक और व्यापार करने में सुगमता आज अपरिहार्य है।
आज हमें आवश्यकता है कि
ग्रामीण भारत और पहाड़ी अंचल के उद्यमी
कृषि और कृषि से संबद्ध उद्योगों की तरफ भी कदम आगे बढ़ाए ऐसे में वित्तीय
जागरूकता के अभियान को विकेंद्रीकृत करते हुए हमें अधिकाधिक प्रोत्साहन देने की
आवश्यकता है ।भारत का स्वर्णिम भविष्य भारत के गांवों में बसता है और सूक्ष्म,लघु
और मध्यम उद्योग क्षेत्र को यदि वांछित
समर्थन हम दे पाएं तो भारत के स्वर्णिम
भविष्य का मार्ग प्रशस्त होगा इसमें कोई दो राय नहीं ।
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