भावी ऊर्जा संकट और सामरिक तेल रिज़र्व की आवश्यकता
अक्सर भरी दोपहरी में मैं ये सोचता हूँ की 2050 तक अगर भारत विश्व को विकास का पाठ पढ़ाने लगे तो कैसी स्थितियां होंगी | कैसा होगा वह
समय जब हमारी अर्थव्यवस्था के आंकड़े भी द्विअंकीय होंगे | जब भारत पूरे वैश्विक
समुदाय को लामबंद कर सामाजिक आर्थिक विकास
की तरफ कदम बडायेगा| मेरे इस बिम्ब को
अचानक ही देश का भावी ऊर्जा संकट नष्ट कर देता है | एक डर सा दिमाग में घर करने
लगता है – अगर कोई युद्ध हो गया तो | अगर इन 35 वर्षों
में चीन, पाक ने अपनी कोई गतिविधियाँ बडाई तो, विश्व में तेल के दामों में अगर
काफी उछाल आया तो क्या ऐसी स्थिति में भी हम विकास की धारा के साथ बह पायेंगे ?
इसमें
कोई दो राय नहीं कि ऊर्जा किसी भी देश के सतत एवं स्थायी विकास में एक प्रमुख तत्व
है | जैसे जैसे कोई देश विकास के पथ पर अग्रसर होता जाता है उसके सामने ऊर्जा संसाधनों
के और बेहतर उपयोग की आवश्यकता होनी शुरू हो जाती है | विकास के पथ पर बढता भारत विश्व की जितनी ऊर्जा का वार्षिक उत्पादन करता है उससे ज्यादा ही अपने
उपभोग के लिए ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है | और इस उपभोग संतुलन को बनाये रखने हेतु
आयात करना पड़ता है | बढ़ती आबादी और तीव्र शहरीकरण के फलस्वरूप हमारी ऊर्जा की
आवश्यकता में तेजी से वृद्धि होती जा रही
है |
ऊर्जा के संसाधनों में पेट्रो उत्पादों या यूँ
कहे तेल का अलग ही महत्व है | वर्ष 2000 के बाद अमेरिका द्वारा इसी तेल नीति के तहत न जाने कितने देशो को
निशाना बनाया गया था | भारत की
अर्थव्यवस्था को विनिर्माण में सफलता दिलाने के लिए जिस तरह मेक इन इंडिया , स्किल
इंडिया जैसे विनिर्माण आधारित कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं उनके भी सफलतापूर्ण
क्रियान्वयन हेतु ऊर्जा की ही आवश्यकता है| क्योंकि कोई भी उद्योग बिना ऊर्जा के
स्थापित नही हो सकता | ऐसे में यह हमारी सरकार का प्राथमिक कर्तव्य हो जाता है की
ऊर्जा के स्तरीकरण को बनायें रखें | मोदी सरकार द्वारा यह कार्य करने की पूरी
कोशिश की जा रही है जिससे निवेशकों को भी यहाँ कोई दिक्कत न हो और भारत एक
विनिर्माण हब के रूप में स्थापित हो | 2006 में योजना आयोग ने “समेकित ऊर्जा योजना” में
भविष्य के खतरों की तरफ चेताया भी था | जिसमे यह कहा गया था कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए उसकी आपूर्ति
,बाजार एवं तकनीक सबसे बड़ी चुनोती है | और
यही कारण था योजना आयोग ने सरकार को 90 दिनों में जितना तेल आयातित होता है उतना ही रिजर्व देश में स्थापित
करने का सुझाव दिया था | लेकिन योजना आयोग महज योजना की कल्पना ही करता रह गया | कांग्रेस सरकार द्वारा जिस तरह
सुझावों को दरकिनार कर दिया गया उसका ही प्रतिफल था की आने वाले समय में योजना
आयोग अपना अस्तित्व खोता चला गया | लेकिन भले ही मोदी सरकार ने योजना आयोग को नीति
आयोग से प्रतिस्थापित कर दिया हो लेकिन उसकी नीतियों को मोदी सरकार द्वारा पूरा करने की पूरी कोशिश की
जा रही है|
आज भी भारत अपने नवीनीकरणीय ऊर्जा के एक बहुत ही कम हिस्से का ही उपयोग कर पाया है |
हमारे पास अपने कोई सामरिक रिज़र्व नही हैं | सामरिक रिजर्वों से तात्पर्य ऐसे
रिजर्वों से हैं जो कि किसी भी देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को आपातकालीन परिस्थितियों
में पूरा करते हैं | वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेजी से बढते तेल के दामों से देश की आम जनता को सुरक्षा देते
हुए आर्थिक संकट से निकालने का काम ये सामरिक रिज़र्व करते हैं | इन रिजर्वों में तेल आदि ऊर्जा संसाधनों को स्टोर करके रखा
जाता है जिससे युद्ध , अकाल ,प्राकृतिक आपदा, महंगाई के दौरान स्थितियों को
अनुकूलित किया जा सके |
अभी तक हम अपने अवसादी बेसिनों का पूर्णतः दोहन नही कर पायें हैं | आज हम हमारे
पेट्रोलियम उत्पादों की मांग का एक तिहाई
भी खुद से पूरा नही कर पा रहे हैं | अपनी ऊर्जा की अतिरिक्त मांग के लिए मध्य एशिया, पश्चिम एशिया
के देशों पर हम पूर्णतः निर्भर हैं | भारत विश्व से जितने तेल का आयात
करता है उसका 70 प्रतिशत से भी ज्यादा
हिस्सा पश्चिमी एशिया क्षेत्र से आता है |
जिस तरह के हालत आज पश्चिमी एशिया के देशों में देखने को मिल रहे हैं ऐसे में उनपर
पूर्ण निर्भरता एक संकट के रूप में सामने आ सकता है | अगर हम एक ऐसी स्थिति
की कल्पना करें जब पाक जैसे देशों से हम
युद्ध में रत हों ऐसे में क्या इस्लामिक
संघ के रूप में विश्व में अपनी पहचान बना रहे पश्चिमी एशिया के देश हमारे साथ
मित्रवत व्यवहार करेंगे ?
केवल रक्षा के दृष्टिकोण से ही नही बल्कि तेजी से
विकास को बढते किसी भी देश के लिए इन रिजर्वों की अत्यंत आवश्यकता है | विदेश
व्यापार नीति 2015 में संभवतः इसी लिए
मध्य एशिया , ऑस्ट्रेलिया , न्यूज़ीलैण्ड
जैसे देशों से सम्बन्ध बढ़ाने की बात कही गयी है | ऐसे देश जहाँ से हमे बाजार और कच्चा माल दोनों प्राप्त हो |
प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम मंत्रालय के द्वारा
दिए गए आकड़ों पर गौर करें तो -2014-2015 में भारत अपनी कुल जरुरत का 83 % तेल आयत करेगा | तेल के अलावा ऊर्जा के अन्य स्रोतों का भी हम समुचित
दोहन नही कर पायें हैं| वैश्विक जगत में ऊर्जा के साधन जुगाड़ने की जुगत में हमे
निराशा ही देखने को मिली है | तापी परियोजना ईरान पर अमेरिका के लगाये प्रतिबंधों
के कारण तो वही पाक के सऊदी अरब के साथ
सामरिक संबंधों के चलते अधर में ही लटकी पड़ी है | आईपीआई परियोजना से भी भारत बचता
दिख रहा है क्योंकि इसमें पाकिस्तान
के बलूचिस्तान प्रान्त से गैस पाइपलाइन
गुजरेगी जो की आतंकी गतिविधियों के लिए
कुख्यात है | रूस भारत पाइपलाइन से कुछ आशाएं दिख रही हैं लेकिन फिलहाल यह भी अपनी
गति नही आ पाई है | आज पूरा वैश्विक
समुदाय नवीन तकनीक के लिए पश्चिमी देशों की तरफ मुह तांक कर देखता है | और उसमें भी अमेरिका तो मानो जगतगुरु की भूमिका निभाता
है | और संभवतः यही कारण है कि
जबसे अमेरिका से शैल गैस मिली है , नवीनीकरणीय ऊर्जा के शोध
कार्य की गति में भारी मंदी आई है |तकनीक के इसी पिछड़ेपन के कारण ही विकासशील और अल्पविकसित देश
अपने संसाधनों का पूर्णतः दोहन नही कर पा रहे हैं |
भारत में
ऊर्जा एक ऐसा मुद्दा है जो वोटों को लामबंद करने के नजरिये से अभी काफी पिछड़ा है
और इसीलिए आम जन इस मुद्दे पर सार्थक सोच तो दूर सामान्य समझ तक नहीं रखता | आने
वाले 50 वर्षों में पूरा विश्व ऊर्जा के संकट को झेलेगा | और उस दौर में
भी वही देश अपने को अनुकूलित कर पायेगा जो की उस संकट को झेलने के पृष्ठभूमि अभी
तैयार कर लेगा |
आजादी के 60 साल से भी ऊपर हो चुके हैं और अभी
भी हम महज योजनाओं के पुलंदे बनाने में लगे हैं | संसद में आकड़ों में खेलकर अपनी
जिम्मेदारियों से सालों से बचा जा रहा है लेकिन स्थिति अभी भी ज्यादा सकारात्मक
नही है | 2004 में तत्कालीन एनडीए
सरकार द्वारा ऊर्जा संरक्षण की ही दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हुए मंगलौर, पुदुर,
विशाखापत्तनम में तेल के सामरिक रिज़र्व
बनाने की घोषणा की गयी | 5 मिलियन टन के इन सामरिक रिजर्वों से संकटकाल में हमरे देश की 2 हफ्ते तक की जरुरत को पूरा किया जा सकता था |
लेकिन 2004 के अंत में सत्ता बदलाव के बाद कांग्रेस सरकार द्वारा इस योजना को ठन्डे
बस्ते में डाल दिया गया |
ऐसे समय में जबकि विश्व के सभी देश ऊर्जा के
सामरिक रिज़र्व बनाने, नए रिज़र्व खोजने में लगे थे भारत में हम मीलों हम आ गए का
नारा लगा रहे थे | नयी सरकार फिर से वाजपयी जी की प्रतिबद्धता को साथ लिए आगे बढती
दिख रही है |
केलकर
पैनल के सिफारिशों पर गौर करें तो उन्होंने देशी तेल और गैस के उत्पादन बढ़ाने पर
जोर दिया है | आयात पर निर्भरता कम करने के लिए 2030 तक की समयसीमा निर्धारित की | इसके साथ ही
उन्होंने तेल और गैस को डी- रेगुलेट करने की भी अनुशंसा की थी | नयी सरकार द्वारा
इस एक्सपर्ट सलाह को ध्यान में रखकर आगामी नीतियां बनायीं जा रही हैं | 12.5 मिलियन टन का सामरिक रिज़र्व बनाने की घोषणा नयी सरकार द्वारा की गयी
है जो भारत की ऊर्जा खपत को संकटकाल में 90 दिनों तक संभल सकेगा | विशाखापत्तनम, बीकानेर , पद्दुर ,राजकूट में इन रिजर्वों की स्थापना के कार्य प्रारंभ भी हो गए हैं | आज
जहाँ चीन पहले से ही 170 मिलियन टन का रिज़र्व बनाये हुए है और अमेरिका का रिज़र्व 727 मिलयन टन को भी पार कर गया है ऐसे में भारत का 12.5
मिलियन टन का यह रिज़र्व एक शुरुवाती कदम के रूप में देखा जा सकता है | नयी सरकार
द्वारा सौर ऊर्जा को सम्पूर्ण देश में चरणबद्ध तरीके से लागू करने के लिए जिस तरह के कार्य शुरू हो चुके हैं वो प्रशनसनीय कदम हैं |
तेल के दामों में पिछले कुछ माह से जो मंदी आई है
भारत को इसका समुचित फायदा उठाते हुए अपने सामरिक रिसर्वों को स्थापित करना चाहिए
| कल्पना करें उस समय की जब यही तेल के बैरेल 190 डॉलर प्रति बैरल में मिलेंगे वैसे समय के लिए
पहले से ही हमे तैयारी करनी होगी | लेकिन एक साथ इन रिसर्वों में तेल संरक्षित
करने के लिए हमे काफी मात्र में धन की आवश्यकता है | मोदी सरकार द्वारा इस दिशा
में भी कई प्रयास किये जा रहे हैं और कई किये भी जा सकते हैं |जिस तेजी से अभी तेल
के दामों में कमी आ रही है उतनी ही तेजी से हमे सामरिक रिसर्वों को भरना चाहिए| यह
किया जा सकता है पहले चरण में सरकार द्वारा कोष से यह राशि भुगतान की जाये लेकिन
फिर वही हमे वित्तीय घाटे का आंकड़ा याद आ जाता है जिस भी हमे संतुलित रखना है |
ऐसे में हम तेल निर्यातक कंपनीज एवं तेल रिफायनरी
कंपनीज से भी हाथ मिला सकते हैं | अबुधाबी नेशनल आयल कंपनी के साथ भी सरकार
द्वारा इसी तरह के प्रयास किये जा रहे हैं जिसे और बढाये जाने की जरुरत है | ईरान के मॉडल को भी पायलट
प्रोजेक्ट की तरह अपनाया जा सकता है जिसमे निजी कंपनियों को यह काम दे दिया जाता
है |
एक सुनहरे भविष्य के लिए हमे आज से ही तयारी करनी
होगी | आज विश्व के सभी विकशित देश भारत के साथ सम्बन्ध बढ़ाने को उत्सुक हैं | ऊर्जा
के प्रमुख साधन तेल के भी कीमतों में काफी मंदी आई है | ऐसा लगने लगा है मानो ये
सभी स्थितियां भारत को ही विकास की राह में आगे ले जाने के लिए पैदा हुयी हैं | ऐसे में यह हमारी सरकार का और हम सब का
दायित्व है कि तेल के सामरिक रिजर्वों की वकालत करते हुए ऊर्जा के नए साधनों की
खोंज में लगे |
जय प्रकाश पाण्डेय
शोधार्थी
दिल्ली विश्वविद्यालय