जून 23 को विश्व विधवा दिवस का आयोजन किया जाता है | यह दिवस
विश्व की उन करोड़ों विधवाओं के गरीबी और अन्याय के पोषक कारणों को दूर करने कि
दिशा में साझा प्रयास का द्योतक है |23 जून के इस अवसर पर, विश्व के कई लोग यह
मानते हैं कि विधवा होने के बाद की सामाजिक व आर्थिक चुनौतियाँ विकासशील तथा अल्पविकसित देशों में एक अदृश्य
आपदा सरीखी स्थिति का निर्माण करती हैं |
2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में भी तक़रीबन 5.6 करोड़ महिलाएं वैधव्य का जीवन व्यतीत कर रही हैं| माना जाता है कि, भारत में
औसत आयु प्रत्याशा में वृद्धि ,इसका एक प्रमुख कारण है | तथा चूंकि आम तौर पर
विवाह के दौरान स्त्री पुरुष में 4-5 वर्ष का अंतराल होता है अतः इस कारण से भी
विधवाओं की संख्या में इजाफा हो रहा है | भारत में यह संख्या दक्षिण भारतीय
राज्यों में तुलनात्मक रूप से ज्यादा है जिन्होंने मृत्यु दर को कम करने में अच्छी
सफलता पायी है |
आज भारत के कई गावों में
जीवन यापन कर रही विधवा महिलाएं सामजिक एवं आर्थिक मोर्चे पर जूझ रही है | मुझे
ध्यान में आती हैं पंक्तियाँ जो इनकी स्थिति का चित्र खींचती है |
“जिंदगी की शतरंज पर हर मोहरे से
पिट जायेगी वो ?हाय कैसी ये दुर्गति
ये कैसा अभिशाप है
हाय रे विधवा गरीबी ही तेरा श्राप है “...!!
सामजिक क्रियाकलापों में
उनकी सहभागिता एक विवाहित महिला की सहभागिता से भिन्न होती है | विधवा महिला को विवाहित
महिला के अपेक्षा सामाजिक व धार्मिक कार्यक्रमों
के कई सारे अनुष्ठानों से वंचित रहना पड़ता है. विधवा होने के कारण उनके सम्मान में भी कमी आती है क्योंकि दुर्भाग्य है कि कई गाँव में जीवित पति के सम्मान से महिला का सम्मान जोड़ा जाता
है.
विधवा होने की मार आर्थिक
मोर्चे पर भी पड़ती है . यहाँ परिवार की रोजी रोटी चलाने की मुख्य जिम्मेदारी
उन्हीं पर आ जाती है | ऐसे में आश्रितों की संख्या ज्यादा होने से उन्हें कृषक,
खेतिहर मजदूर या मजदूर के रूप में दीर्घावधि समय तक काम करना पड़ता है | पुरुष के न
होने के कारण सरकार प्रदत्त कई सामजिक योजनाओं जनधन, पेंशन आदि के लिए गावं से 5-6 किमी. पैदल जाने में उन्हें बहुत समस्या आती है
| नतीजतन कई बार तो इन सबसे वंचित भी रहती हैं | ये महिलाएं, प्राक्रतिक संसाधनों-
जल, जंगल आदि पर भी अपने अधिकारों से वंचित रहती हैं|
ऐसे में हैरत नहीं कि कई
विधवा महिलाएं मंदिरों की सीडियों के किनारे बैठ हाथ पसारे दिन भर भीख मांगती हैं
और उसी से अपना पेट भरती हैं| इसके बाद नयी सुबह से फिर जिन्दगी जीने के लिए जदोजेहद
शुरू हो जाती है |
आमदनी का दूसरा जरिया सरकार
द्वारा दी जा रही 2000 रुपये की पेंशन के रूप में है लेकिन इसका लाभ न के बराबर
महिलाओं को मिल पता है |
इन विधवाओं को आश्रमों में सुबह सांझ कीर्तन करने के एवज में
भी सुबह शाम को कुछ खाने को मिल जाता है |
गरीबी बुढ़ापा व विधवापन का दुःख किसी भी जीते जागते
इंसान को तोड़ने के लिए बहुत है. ऐसे में परिवार व समाज की जिम्मेदारी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है.
आज आवश्यकता इस बात कि है
कि विधवाओं की समस्याओं पर विशेष ध्यान दिया जाए | सरकारी योजनाओं में उनके हितों
का ध्यान रखने हेतु ग्राम पंचायतों को विशेष रूप से स्वास्थ्य,पेयजल,बैंकिंग,पेंशन
आदि सेवाएँ समय पर उनके दरवाजे पर उपलब्ध हों |
इनके आवास व सम्मानजनक जीवन
के लिए सी.एस.आर के कोष से सरकारी व निजी कंपनियां भी मदद कर सकती हैं |
नियमित स्वास्थ्य चेकअप, राशन व्यवस्था में वृद्ध विधवा महिलाओं के लिए
कैल्शियम युक्त आटा, उनके इलाज के लिए सस्ते सब्सिडाइज्ड फूड
कार्ड की व्यवस्था जरूरी है क्योंकि ऐसी विधवाओं के लिए किसी प्रकार की स्वास्थ्य
बीमा उपलब्ध नहीं है। ये आज एक सामाजिक समस्या बन चुकी है. एक अच्छे समाज और देश के लिए उसकी
नींव अर्थात परिवार का अच्छा और मजबूत होना बहुत आवश्यक है. आज यही नींव खोखली ली और कमजोर होती जा रही है | ऐसे में महज इस दिन तक न सिमटकर हमें
व्यापक रूप से इस समस्या का अध्यन और समाधान खोजने की जरुरत है ताकि
वृन्दावन के कृष्ण भजनों की गूँज में विधवा महिलाओं और उनके आश्रितों की दयनीय
स्थिति की गूँज न दब जाए|
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