शनिवार, 20 अगस्त 2016

बचपन के तारों से...




अच्छा हुआ मैं नहीं बन पाया उनलोगों की तरह जिनकी मिसालें तुम बचपन में दिया करती थी माँ..
वो जिन्होंने मेरी हर छोटी खुशियों, उपलब्धियों  के सामने बड़ी खुशियाँ, उपलब्धियां, समानांतर रख दी थी ..
जिससे तुम आंक न पायी शायद मुझे 

लेकिन अब मैं बड़ा हो गया हूँ 



सोचता हूँ नहीं बन पाया उनके जैसा जो बस नाम से रिश्ता निभाते हैं, 

नहीं  बन पाया उन जैसा जो बस जिन्दा मुर्दे बन बैठे हैं, 

नहीं बन पाया उन जैसा जो तटस्थ रहते हैं प्रत्येक मुद्दों में
,
फिर वो मुद्दे देश से  जुड़े हों या  तुझको वृद्धाश्रम भेजने से माँ  
बस उनकी मूक स्वीकृति नहीं अपना पाया मैं 
सोचता रहता था अक्सर सर्द ठंडी रातों में रजाई के दरमियाँ 
कैसे उन जैसा बन पाऊँ  मैं ....

 आज जान समझ पाया हूँ बचपन के उस दौर में क्यों विधाता ने उन जैसा नहीं बनाया मुझे ?

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