बुधवार, 25 जनवरी 2023

गणतंत्र के संकल्प

 


सर्दियों में हर वर्ष हमारा ठिठुरता गणतंत्र अपने मूल कलेवर में नए अनुभवों को जोड़ते हुए एक नई विकास यात्रा का क्रम विकसित करता है । यह विकास का क्रम ही हमारी कूप मंडूक दृष्टि को वैश्विक दृष्टि प्रदान करता है और इस बात को मस्तिष्क में घर करवाता है कि-

 

यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहां से।

अब तक मगर है बाक़ी नामों-निशां हमारा।।

कुछ बात है कि हस्‍ती मिटती नहीं हमारी।

 सदियों रहा है दुश्‍मन दौरे-ज़मां हमारा।।

 

 हर वर्ष  यह उत्सव तब तक भारतीय श्रेष्ठता और वैश्विक मंच में हमारी जगद्गुरु की भूमिका के प्रति भाव को मजबूती प्रदान करता है जब तक कि  भारत से  बाहर जाकर, भारत के नागरिक, होने के महत्व को वीज़ा की प्रतीक्षा में एयरपोर्ट लाइन में वह स्वयं लगकर महसूस न कर लें ।

वस्तुतः  गणतंत्र दिवस के  उत्साह का यह ज्वार भी गणतंत्र दिवस के दो तीन दिन बाद प्रत्येक अखबार में देखी जाने वाली मृत्यु,बलात्कार,प्राकृतिक आपदाओं, घोटालों, और सड़कों पर उठती आवाजों के बीच धीमा पड़ जाता है । दरअसल वर्तमान भारत भूलने की बुरी लत से जूझ रहा है । हमको प्रभावित करने वाली  सबसे ज्वलंत खबरों तक को हम लोग वर्ष के अंत तक पहुंचते पहुंचते भूल जाते हैं ।

 

राष्ट्रीय महत्व के दिनों में हमारे अंदर का देशभक्त, अपनी  प्रोफाइल पिक्चर में तिरंगा लगाने से लेकर,गाल में तिरंगे वाले टैटू के लिए जग जाता है । देशभक्ति गीतों की आवाज से हौले से उठने वाले रौंगटे को महसूस करने के अभ्यस्त हम लोग उन खबरों,उन विषयों पर बात तक करना मुनासिब नहीं सोचते जो हमारे भविष्य के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष  आधार है ।

 

दिवस विशेष,आधारित चिंतन  परंपरा ,भारत में भी अब प्रायः देखने को मिल रही है । कुछ दिनों पहले एक कवि ने कहा था –

 

धूल साफ कर जो तस्वीरें शान से आज सजाई हैं,इससे पहले इनकी याद किसे, कहां और कब आई है ?

 

 आज दिन विशेष को महत्व देने वाली पीढ़ी, फादर्स डे, मदर्स डे, फ्रेंड्स डे,अर्थ डे आदि के बौद्धिक मकड़जाल में फंसकर शाश्वत रूप से इन विषयों में सोचना धीरे धीरे कम कर रही है ।

 

विविधता वाले तथाकथित सपेरों के देश में दैवीय नियतिवाद  का स्थान कर्मवाद ने जरूर लिया है तभी विश्व की सबसे विकसित ताकतों में आज हम शामिल हैं लेकिन अभी भी गांधी जी के तीनों मूल मंत्रों बुरा मत देखो,बुरा मत कहो और बुरा मत सुनो को हम लोग अपने स्वार्थपरक नजरिए से तोड़ते मरोड़ते रहते हैं।

 

भारत की सामासिक संस्कृति में चिंतन प्रक्रिया को सतत मानते हुए ही समाज सुधारकों, देशभक्तों ने स्वर्णिम अतीत से प्रेरणा ग्रहण की थी। चिंतन के आधार पर विमर्शों से प्राप्त बिंदुओं को, ध्यान में रखते हुए  कर्तव्य निर्धारण करने वाले मतवालों,का दौर अब चला गया है । आज चिंतन महज खानापूर्ति का जरिया बन चुका है । हाल ये है कि यदि 15 अगस्त और 26 जनवरी को सरकार द्वारा अवकाश घोषित कर दिया जाए, तो व्यक्ति  उस स्थिति में  गणतांत्रिक भारत का स्वतंत्र नागरिक होने कर अधिक गर्व महसूस कर पाएगा । एक दिन की छुट्टी की उम्मीद, हमेशा राष्ट्रीय चिंतन से ऊपर ही तो रहती है आजकल ।

 

सरकारी दफ्तरों में हमारे राष्ट्रीय पर्व देशभक्ति से मीलों दूर औपचारिकताओं और प्रोटोकॉल से बंधकर रह जाते हैं । अखबारों में, संवादों में, न्यूज में , जनमंचों में,देश के राष्ट्रीय पर्वों पर बातें तो होती हैं लेकिन इस राष्ट्रीय पर्व के निहितार्थ, उसकी दिशा क्या सही दिशा है? इस पर बोलना लिखना और सवालात करना आपको पाकिस्तानी से लेकर देशद्रोही तक बना सकता है । फालतू समय वाला व्यक्तित्व भी आपको घोषित किया जा सकता है ।

 

गणतंत्र दिवस का दिन हमारी आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का दिन है।  यह दिन यह विचारने का है कि 150 वर्षों की औपनिवेशिक सत्ता के वो क्या बीज तत्व आज भी मौजूद हैं जो भारत के लोगों की प्रगति में बाधक हैं।  यह दिन यह विचारने का है कि संविधान के किन किन विषयों को वक्त की जरूरत के हिसाब से बदला जा सकता है । यह दिन यह विचारने का है कि राष्ट्रविकास की प्रक्रिया में संविधान में और क्या बेहतर परिवर्तन किए जा सकते हैं जिससे अंतिम पंक्ति में बैठा व्यक्ति भी राष्ट्र विकास में सहायक हो सके । यह दिन उन विमर्शों  को केंद्र बिंदु में लाने का दिन है जिन विमर्शों को हमारी  संविधान सभा में किया गया था   हालांकि जो बाद में संविधान का भाग भी न बन पाए थे ।

 

यह दिन ऐसे विषयों पर  सार्थक जन संवाद का दिन है जिन विषयों  पर हमारे संविधानवेताओं के अलग अलग मत रहे और इस कारण तत्कालीन परिस्थितियों में उनको संविधान में महत्व न देना ही वांछित समझा गया  आज फिर 21 सदी के भारत के सामने वो विषय प्रमुखता से सामने आ रहे हैं। यह दिन  इस चिंतन का भी मौका देता है कि राष्ट्र निर्माण में हमारे किन मूल भारतीय तत्वों का लोप हो गया और कौन से तत्वों का लबादा हमें भूमंडलीकरण और छवि निर्माण के चलते छोड़ना पड़ा ।

 

 

लेकिन अपनी अपनी गुहा में रहने के अभ्यस्त हम लोग भूलने की बीमारी से ऐसे ग्रसित हो चुके हैं कि सरकारों द्वारा, हमारे लिए किए गए कार्यों के विषय में  विज्ञापनों में  करोड़ों- करोड़ों खर्च करके  उनको बताना पड़ता है । विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में खुद को देखते हम लोगों की लगभग 35 प्रतिशत आबादी तो वोट ही करना भूल जाती है । जनता का, जनता द्वारा ,और जनता के लिए शासन हो ऐसी आदर्श लोकतंत्र की परिभाषाएं भी

जनमानस के स्मृति पटल से निकल जाती है । और इस प्रकार लोकतंत्र में मसलन चुनावों से चंद दिनों पूर्व रातों में  सबकुछ भूलजाने की प्रवृति वाली जनता को ऐतिहासिक  सामाजिक, धार्मिक ,राजनैतिक और लैंगिक विषयों को समझाने का दौर चलता है ।

  गणतंत्र दिवस की पूर्वपीठिका में ,भगवत कृपा को प्राप्त राष्ट्र में ,संविधान में वर्णित हमारी विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका को संविधान प्रदत्त शक्तियों के दायरे में रहने और एक दूसरे के कार्यों में दखल न देने की प्रेरणा मिले, हमारी राज्य सरकारें अपनी अपनी डफली अपना अपना राग छोड़कर केंद्र की योजनाओं में सक्रियता से कार्य कर सहकारी संघवाद को बढ़ावा दें और देश का आम नागरिक अपने नागरिक कर्तव्यों को समझकर तदनुसार कार्य करे, इस गणतंत्र दिवस  कम से कम यह उम्मीद तो कर ही सकते हैं ।

 

हिंदी साहित्य में आधुनिक युग के प्रमुख हस्ताक्षर मैथिलीशरण गुप्त जी की बातें इस गणतंत्र दिवस का ध्येय बने तो संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा  निभाने में हम सक्षम होंगे ,इसमें दो मत नहीं ।

 

हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी,

आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी।

मंगलवार, 17 जनवरी 2023

असंतुलित विकास और उदासीनता से जूझता पहाड़

 

कितना आसान है ,हम सब के लिए जोशीमठ के विषय में सर्दी की सुबह चाय की चुस्कियों के संग चर्चाएं करना । कितना आसान है, संभावित आपदा प्रभावितों को उनके जन,जंगल,जमीन छोड़ घर खाली करने के लिए दिए गए सरकारी फरमान पर अनुवर्ती कार्यवाही करना । कितना आसान है, त्रासदी के सामने खड़े होने की स्थिति में जांच समितियों के गठन और रिपोर्ट की प्रतीक्षा करना,लेकिन बहुत मुश्किल है प्राकृतिक आपदाओं के खतरों के निशान पूर्व में ही भांपकर त्वरित नीतिगत निर्णय लेना । बहुत मुश्किल है लोगों के विगत 1 वर्ष से निकल रहे मशाल जुलूसों , मांग जुलूसों पर ध्यान रहना । और बहुत मुश्किल है पहाड़ को पहाड़ बने रहने और धार्मिक यात्राओं को पर्यटन यात्राएं न बना देने की पहलों को समर्थन देना ।

 पूरा हिमालय आज संभावित खतरों से जूझ रहा है । राष्ट्रीय राजमार्ग-6 जोकि मणिपुर,मिजोरम,त्रिपुरा,और दक्षिणी असम को जोड़ता है काफी दिनों तक पिछले वर्ष मुख्यधारा से कटा रहा । रोंटी ग्लेशियर से अलग हुए बर्फ खंड से उत्पन्न बाढ़ की स्थिति ने 70 से ज्यादा लोगों की जिंदगी उत्तराखंड में ली । किन्नौर जिले में भूस्खलन से हुई जनहानि भी इसी कड़ी में एक और उदाहरण है । लोकसभा में एक प्रश्न के प्रतिउत्तर के आधार पर देखें तो इस वर्ष 2021-2022 जुलाई माह तक प्राकृतिक आपदाओं से 1098 जिंदगियों को हमने खोया है । यह स्थिति हिमालयी राज्यों तक ही सीमित न रहकर उत्तरप्रदेश,कर्नाटक,राजस्थान आदि राज्यों तक है ,सभी इससे प्रभावित रहे हैं । अभी हमारे दिमाग से चक्रवात गुलाब, चक्रवात शाहीन और चक्रवात यास आदि से हुए मिलियनों के नुकसान की स्मृति मिटी नहीं हैं कि फिर से हम प्राकृतिक आपदाओं से जूझने लगे हैं। कर्नाटक,महाराष्ट्र और तमिलनाडु में उत्पन्न परिस्थितियों ने हमें हमारे बाढ़ प्रबंधन और प्राकृतिक आपदा के प्रबंधन संबंधी मॉडलों पर विचार करने को बाध्य किया है।

उत्तराखंड की बात करें तो जमीनी धरातल पर, सामरिक महत्व के लिए आवश्यक चार धाम सड़क परियोजनाओं, रोपवे सेवाओं, धार्मिक पर्यटन और ऊर्जा राज्य के लिए जलविद्युत परियोजनाओं जैसी अवधारणाओं ने पहले से ही सेस्मिक जोन पांच में अवस्थित उत्तराखंड की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाया है। बेतरतीब अनियोजित बहु मंजिला होटलों के नियामकों , रेत खनन, हेलंग बाईपास निर्माण कार्य, एनटीपीसी तपोवन विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना,जोशीमठ-औली रोपवे आदि विषयों पर पुनर्चर्चा का अब समय आ गया है । निकासी तंत्र की शिथिल स्थिति और अलकनंदा और धौलीगंगा दोनों ही नदियों द्वारा जोशीमठ शहर के नीचे की मिट्टी का कटान किया जाना भूस्खलन की संभावनाओं को और बढ़ा देता है । उत्तराखंड में यह स्थिति प्रायः अधिकतर पर्वतीय क्षेत्रों की है, ऐसे में अत्यंत आवश्यक है उत्तराखंड के सभी पर्वतीय क्षेत्रों का वैज्ञानिक और शोधपरक अनुसंधान किया जाए।

जोशीमठ की घटना के बाद से पहाड़ों के अलग क्षेत्रों से अनियोजित शहरीकरण, बांधों से उत्पन्न संकट , और बड़ती होटल संस्कृति के कारण उत्पन्न स्थितियों पर चर्चाएं होना शुरू हुई हैं। उत्तराखंड के संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्रों में मानवीय क्रियाकलापों के समुच्चय ने आपदाओं को न्यौता देने का कार्य किया हैं । दरअसल पर्वतीय प्रदेश में राज्य गठन के बाद से ही मैदान में बसे देहरादून के विपरीत पहाड़ों में स्थित गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग क्रमशः उठती आई है । शासन,प्रशासन और यहां के जनप्रतिनिधि पहाड़ में जब रहेंगे, तब पहाड़ के दुख,तकलीफ और यहां की शाश्वत चिंताओं के विषय में चिंतन कर पाएंगे इसी आधारबिंदु पर अतीत से हो रही मांगे आज उत्तराखंड के दरकते पहाड़ों और पहाड़ों में आ रही त्रासदी के रूपों को देखकर जायज लगती हैं ।

 मसलन राजधानी देहरादून से जोशीमठ पहुंचने पर लगभग पहाड़ी सफर के 8- 9 घंटे लगते हैं । प्रशासन और सक्षम प्राधिकारियों की इस दुरूह सफर में जाने की इच्छाशक्ति में कमी भी कहीं न कहीं इतने भयावह रूप के लिए उत्तरदाई है वरना क्षेत्र के लोगों द्वारा तो विभिन्न अवसरों पर जोशीमठ की स्थिति की जांच की मांग उठाई ही गई है । हास्यास्पद स्थिति तब पैदा होती है जब देश के प्रतिष्ठित भू- विज्ञान से संबधित संस्थान देहरादून में ही हैं और देश के प्रतिष्ठित उच्च क्षमता वाले सबसे पुराने इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी रूड़की भी उत्तराखंड में अवस्थित है लेकिन इसके बाद भी जोशीमठ की खबरों के मीडिया द्वारा सामने आने से पहले ऐसी कोई भी टीम गठित नहीं की गई। ऐसे विशेषज्ञों के तकनीकी ज्ञान,अनुभव का उपयोग पहले से किया जाता तो स्थिति को भयावह होने से पहले रोका जा सकता था ।

कोरोना के बाद की विषम स्थितियों में लोगों ने कहीं मुख्यमंत्री स्वरोजगार से तो कहीं बैंको से ऋण प्राप्त कर छोटे छोटे स्वरोजगार विकसित करने की कोशिश की । कहीं बकरी पालन,मवेशीपालन तो कहीं दुकानदारी से पैसा जमा कर जीवन निर्वाह करते लोगों के सम्मुख विस्थापन के बाद जीविका का प्रमुख प्रश्न है ।

अपने जानवरों को परिवार का अंश मानने वाले इन देवभूमि के निवासियों को उनके मवेशियों के साथ विस्थापित करने की योजना बनाई जानी चाहिए । कोविड काल में अनेकों साथियों ने स्वरोजगार के अवसर को विकसित करने की पहलें की । इसके एवज में उन्होंने बैंकों से ऋण भी लिए था । अब ऐसी स्थिति में सरकार को बैंकों को समझना होगा कि आपदा प्रभावित क्षेत्र के लोगों द्वारा लिए गए ऋणों की वसूली में कुछ समय के लिए छूट दी जाए ।

आपदा से प्रभावित होने वाले बच्चों की भी बोर्ड परीक्षाओं का यह समय है । ऐसे में इस आपदा से हमारे बच्चों के ऊपर पड़ने वाले मानसिक दबाव को महसूस करते हुए हमें परीक्षा की तैयारी के विषय में प्रावधान करने होंगे । दरकते पहाड़ों के संभावित खतरों ने नैनिहालों की शिक्षा संबधी व्यवस्थाओं पर भी सोचने की स्थिति पैदा कर दी है ।

जिन सक्षम प्राधिकारियों के कानों में स्थानीय आंदोलन की आवाज नहीं पहुंची वही लोग अब सक्रियता से संभावित आपदा स्थलों का चिन्हीकरण करने में व्यस्त हैं । इसके अलावा लोगों को जागरूक भी किए जाने की आवश्यकता आज दिखती है । अभी भी स्थानीय निवासियों का एक बड़ा वर्ग जोशीमठ छोडके जाना नहीं चाहता है । प्रशासन को सहानुभूतिपरक पुनर्वास योजनाएं बनाने की आज आवश्यकता है । यह सही वक्त है जब बेतरतीब दबाव झेलते पहाड़ों के लिए लंबे समय से मांगी जा रही इनर लाइन परमिट संबंधी मांगों पर गौर किया जाए । जोशीमठ के साथ साथ पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों का पारदर्शी वैज्ञानिक सर्वे आज उत्तराखंड की आवश्यकता है ।


रविवार, 8 जनवरी 2023

प्राकृतिक आपदाओं के पीछे मानवीय क्रियाकलाप

 

उत्तराखंड के सुदूरवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में जनमानस भूगर्भीय संक्रियाओं के कारण आने वाले भूकंपों, भूस्खलनों, भू -धसाव गिरते पहाड़ों ,पत्थरों और पर्यावरणीय संवेदनशील योजनाओं से हमेशा संघर्ष करते आया है । प्राकृतिक आपदाओं के लिए संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में विगत वर्षों में भयावह आपदाएं आई हैं। 


उत्तराखंड जन,जंगल, जमीन के आंदोलनों की भूमि रहा है । चिपको आंदोलन से लेकर गंगा बचाओ अभियान तक पर्यावरणीय सरोकारों के लिए यहां विरोध होता रहा है लेकिन मुख्यधारा की नजरों में हमेशा घटनाएं देर से ही पहुंची हैं । वर्तमान में जोशीमठ से भूस्खलन की आ रही विकराल खबरों ने एक बार पुनः विकास बनाम विनाश के विमर्श को जन्म दे दिया है। जोशीमठ में कई मकानों में बड़ी दरारें आ गईं । पानी का रिसाव भी शुरू हो गया। बद्रीनाथ हाईवे पर भी मोटी दरारें आईं हैं । भू-धंसाव से ज्योतेश्वर मंदिर और मंदिर परिसर में दरारें आ गई हैं। लगभग 570 परिवार इससे प्रभावित है। डर और अनिश्चितता के कारण मजबूरन सर्दी में भी अपने घरों को छोड़ने को अभिशप्त इन लोगों की स्थिति पर पूरे देश का ध्यान गया है। 


जोशीमठ ,उत्तराखंड के चमोली जनपद में स्थित करोड़ों भारतीयों की आस्था का मुख्य प्रवेश द्वार है जहां से आगे आद्यगुरू शंकराचार्य के द्वारा स्थापित चार धाम में से एक बद्रीनाथ और पवित्र हेमकुंड साहिब अवस्थित है। जोशीमठ में भगवान् विष्णु का एक मंदिर है । सर्दियों में जब बद्रीनाथ के कपाट बंद हो जाते हैं, तब भगवान बद्री की प्रतिष्ठा इसी मंदिर में होती है । किसी समय में कत्यूरी शासकों की लंबे समय तक राजधानी रहा 6150 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित यह जोशीमठ क्षेत्र आज भी पर्वतारोहीयों और ट्रैकर्स की पसंदीदा जगहों में से एक हैं। इसी जोशीमठ से कुछ 15 किलोमीटर दूर रैणी नामक एक गांव में विश्व को पर्यावरणीय जागरूकता का संदेश देने वाली और चिपको आंदोलन की प्रमुख हस्ताक्षर गौरा देवी भी संबंधित हैं। पिछले वर्ष गौरा देवी के इस गांव को भी भूस्खलन के परिणामों से जूझते हुए देखा गया । इसी रैणी गांव में जोशीमठ-मलारी हाइवे का लगभग 40 मीटर हिस्सा भूस्खलन से जमींदोज हो गया था। ऐसे में ऋषिगंगा परियोजना के निर्माण के वक्त जो आशंकाएं व्यक्त की थीं, वे आज सच हो रहीं हैं।


उत्तराखंड के अधिकतर संवेदनशील क्षेत्र मोरेन ( हिमोद) के ऊपर अवस्थित हैं । ऐसे में हल्की हल्की दरारें पहाड़ों के लोगों के जीवन का हिस्सा अतीत में भी रही हैं । लेकिन जोशीमठ में चौतौरफा क्रियाएं बड़ी हैं, और उसका ही नकारात्मक पक्ष सामने आ रहा है ।


उत्तराखंडवासियों ने वर्ष 1990 में आए विनाशकारी भूकंप के घावों से अभी मुक्ति पाई भी नही थी कि कुदरत ने हमें केदारनाथ त्रासदी जैसी घटनाओं से पुनः परिचय कराया । समय समय पर हम सबने समाचार पत्रों में त्रासदी की तस्वीरें देखी हैं । पूरे हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को समझते हुए वर्ष 1976 में 18 सदस्यीय मिश्रा समिति ने अपनी अनुशंसाओ में इस पूरे क्षेत्र और विशेषकर जोशीमठ की संवेदनशीलता के विषय में अनेक बातें कही थी । समिति ने इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार के भारी अवसंरचनात्मक निर्माण पर बैन की मांग की थी। 



राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में वर्ष 2021 में आए 4.6 प्रतिशत तीव्रता के भूकंप का केंद्र जोशीमठ ही था । हाल ही में नवंबर 2022 में नेपाल में आए भूकंप का अहसास जोशीमठ तक किया गया था । विगत दस वर्षों में 700 भूकंप के मामले उत्तराखंड में देखे गए हैं । हालांकि यह सब प्रायः कम तीव्रता के ही रहे थे ।


जन,जंगल,जमीन और जानवर को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारणों की लंबी फेहरिस्त में मानवीय क्रियाकलापों और उसमें भी विशेषतः इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास (अवसंरचनात्मक विकास) के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी महत्ती भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता । सड़क विस्तार परियोजनाओं से लेकर पर्यटन स्थलों के ऊपर जनसांख्यकीय आधिक्य , जलविद्युत परियोजनाओं तक और जंगलों के जलने से लेकर होटलों के लिए कंक्रीट के विस्तार तक सभी ने केवल जोशीमठ ही नहीं बल्कि पूरे उत्तराखंड को प्रभावित किया है। जमीनी धरातल पर सामरिक महत्व के लिए आवश्यक चार धाम सड़क परियोजनाओं, रोपवे सेवाओं, धार्मिक पर्यटन और ऊर्जा राज्य के लिए जलविद्युत परियोजनाओं जैसी अवधारणाओं ने पहले से ही सेस्मिक जोन पांच में अवस्थित उत्तराखंड की परिस्थतिकी को नुकसान पहुंचाया है। 


बेतरतीब अनियोजित चार पांच मंजिला होटलो के नियामकों , रेत खनन, हेलंग बाईपास निर्माण कार्य, एनटीपीसी तपोवन विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना,जोशीमठ-औली रोपवे आदि विषयों पर पुनर्चर्चा का अब समय आ गया है । निकासी तंत्र की शिथिल स्थिति और अलकनंदा और धौलीगंगा दोनों ही नदियों द्वारा जोशीमठ शहर के नीचे की मिट्टी का कटान किया जाना भूस्खलन की संभावनाओं को और बढ़ा देता है । 


आज यह सवाल भी पूछे जाना वक्त की मांग है कि आपदा के संबध में नीतिगत निर्णयों को क्या आपदा होने का इंतजार करना चाहिए ? क्या पुनर्वास की नीतियों का निर्धारण घटना होने के बाद ही किया जाना चाहिए ? क्या श्रद्धालुओं की सुविधा के नाम पर धार्मिक जगहों को पिकनिक स्पॉटो में बदला जाना चाहिए ? क्या धार्मिक पर्यटन स्थलों के विकास के नाम पर पारिस्थितिकी संतुलन से समझौता किया जा सकता है ? क्या हैली सेवाओं से हमारे धामों के दर्शन कर रहे श्रद्धालुओं में एक उम्र की सीमा लागू की जा सकती है? क्या पर्यटन का दबाव झेल रहे हिमालय क्षेत्र में दैनिक आधार पर पर्यटकों की संख्या सीमित कर देनी चाहिए आधारित ये सब प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हैं? 


जाहिर है संविधान से चलने वाले इस देश में उपरोक्त बातें आपको संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों और विशेषकर अबाधित रूप से देश के अंदर चलने फिरने में बाधक लगें लेकिन सच यह है कि हिमालयी राज्यों में पर्यटन के दबाव को अब महसूस किया जाने लगा है और उसी संविधान के अपवादों का भी उपयोग करने का यह सही वक्त है । उत्तराखंड के जिन निवासियों को विकास के इन मॉडलों का दंश झेलना पड़ रहा है उनके पुनर्वास के लिए त्वरित नीतिगत निर्णय लेना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है ।


जोशीमठ की घटना में उत्तराखंड सरकार ने हालांकि त्वरित कार्यवाही करते हुए इस संबध में उच्च स्तरीय जांच समिति बनाई है और जांच समिति की रिपोर्ट आने तक सारे कार्य रोक दिए हैं लेकिन इतने समय से संघर्षशील जोशीमठ के लोगों की अभी तक सुनवाई न होना प्रशासन का जनता से विलगाव ही दिखाता है । 


 हिमालयी राज्यों में देश की ऊर्जा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाए जा रहे बांधों के निर्माण से होने वाले नुकसानों और फायदों के विषय में विस्तृत और विश्वसनीय सूचनाओं का विस्तार आम जन तक सुलभ होने पर ही तुलनात्मक अध्ययन किया जाना संभव है लेकिन यह बात स्पष्ट है कि पहाड़ी राज्यों की भौगोलिक स्थितियों और पर्यावरणविदो की सलाहों और विरोधों के स्वर को तिलांजलि देकर ग्लेशियरों से घिरे धार्मिक स्थलों और संवेदनशील क्षेत्रों के नजदीक पर्यटन के दबाव को कम करना आज आवश्यक है । सरकारी तंत्र में कार्यरत वैज्ञानिकों के साथ साथ स्वतंत्र वैज्ञानिकों के मतों को साथ में देखकर ही निष्पक्ष रूप से संवेदनशील इलाकों में विकासात्मक अप्रोच की तरफ आगे बढ़ना आज आवश्यक है । हाल ही में सम्मेद शिखरजी पर्वत क्षेत्र को पर्यटन स्थल में बदले जाने के विरोध ने भी पूरे देश का ध्यान खींचा है । केंद्रीय सरकार ने जैनियों की आस्था को समझते हुए झारखंड सरकार के फैसले पर रोक लगा दी हैं। ऐसे मुहिमों की आज आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि हमारे तीर्थ और धार्मिक संकल्पनाए अपनी केंद्रीय धुरी से उत्तर कर नाचते गाते पिकनिक, स्पोटों और मौज मस्ती तक सीमित न रह जाए ।

बुधवार, 4 जनवरी 2023

सर्वाइकल कैंसर की स्वदेशी वैक्सीन : जागरूक होकर ही जीतेंगे जंग ।


भारत में महिलाओं को होने वाले कैंसर में सर्वाइकल कैंसर या बच्चेदानी के मुंह का कैंसर दूसरे क्रम में आता है । भारत में स्तन कैंसर के बाद ह्यूमन पैपिलोमा वायरस, के संक्रमण से होने वाले सर्वाइकल कैंसर से हमारी आधी धुरी, ये स्त्री शक्तियां आज सर्वाधिक प्रभावित होती हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष लगभग तीन लाख स्त्रियों की मृत्यु सर्वाइकल कैंसर से होती है।

नेशनल कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के आंकड़ों के अनुसार भारत में महिलाओं को होने वाले कैंसर में से 6-29 प्रतिशत कैंसर के मामले सर्वाइकल कैंसर के होते हैं । भारत में स्वास्थ्य नीतियों को वर्ष 1983, वर्ष 2002 और वर्ष 2017 में संशोधित किया गया लेकिन किसी में भी सर्वाइकल कैंसर की दिशा में कोई ठोस कदम देखने को नहीं मिलते । सस्ते स्वदेशी टीके की अनुपलब्धता, जानकारियों का अभाव, बड़ी संख्या में वैक्सीन की सरकारी खरीद न होना और बच्चों के पाठ्यक्रमों में ऐसी सूचनाओं के नदारद होने का परिणाम यह है कि आज भी महिलाओं का एक बड़ा वर्ग, एक बड़ी लंबी आयु तक, इससे ग्रसित होने के बावजूद भी यह नहीं जान पाता कि उसको यह बीमारी है ।

 विगत वर्षों में हमारे राष्ट्र ने स्वास्थ्य संबंधी क्षेत्रों में और विशेषकर टीकाकरण अभियानों (इम्यूनाइजेशन कार्यक्रमों )में उल्लेखनीय प्रगति की है । सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा सर्वाइकल कैंसर के लिए हाल ही में वैक्सीन जारी करने की घोषणा इसी प्रगति का एक हिस्सा है । स्वदेशी वैक्सीन को विकसित करने की सूचना भारत समेत पूरे विश्व और विशेषकर अफ्रीकी देशों के लिए और सार्क देशों के लिए वैसी ही शुभ है जैसी कोरोन्ना के समय में स्वदेशी कोरोना वैक्सीन के विकसित होने के बाद की थी। ह्यूमन पैपिलोमा वायरस की वैक्सीन को सार्वभौमिक टीकाकरण अभियान में शामिल किए जाने की मांग लंबे समय से मेडिकल कॉलेजों,प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में कार्यरत चिकित्सकों और विभिन्न बुद्धिजीवियों द्वारा भी दोहराई गई है । सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह की अनुशंसाओं ने सर्वाइकल कैंसर के संबंध में अपने नीतिगत निर्णयों में इसको अमलीजामा पहनाने में आज प्रमुखता से काम किया है । हालांकि अभी इस संदर्भ में सकारात्मक परिणाम आने में 1 -2 वर्ष का समय लगेगा ।

इससे जहां अन्य वैक्सीन के विकल्प हमें प्राप्त होंगे वहीं हमारी सस्ती दवाइयों को अफ्रीकी और अन्य राष्ट्रों में भी अतीत की तरह स्वीकृति मिलेगी यह कहा जा सकता है । भारत सरकार ने अन्य वैश्विक समुदाय को भी वैक्सीन मदद करने के उद्देश्य से कोरोना समय में वैक्सीन मैत्री नामक पहल जारी की । विगत 3 वर्षों से विश्व के लाखों लोगों को फायदा दे रही यह एक प्रशंसनीय पहल है ।

 ह्यूमन पैपीलोमा वायरस के कारण होने वाले सर्वाइकल कैंसर के इस संक्रमण को कैंसर में बदलने में सात से पंद्रह साल लगते हैं , अतः प्रारंभिक चरणों में इसकी पहचान और प्रभावी रोकथाम की जा सकती है । टीकाकरण के लिए सरकारी सुझावों की समिति की अनुशंसा के बाद इस वैक्सीन को भारतीय ड्रग महानियंत्रक से अनुमति भी मिल चुकी है । भारत में वर्ष 2023 के मध्य से इस स्वदेशी वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित रहेगी । 9 से 14 वर्ष तक की आयु वर्ग की बच्चियों को विद्यालयों,और स्वास्थ्य केंद्रों में यह सुविधा सरकार की तरफ से प्राप्त होगी । ऐसे में टीचर -पैरेंट्स मीटिंग्स में ऐसे जागरूकता संबधी विषयों पर चर्चा भी आज आवश्यक हो जाती है। वर्तमान में यही सबसे बड़ी चुनौती है । आज हमें जागरूकता के नए माध्यमों को भी अपनाने की आवश्यकता है ।

ऐसी स्त्रियां जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) कम हो ,हाइजीन का उचित ध्यान न हो, गर्भाशय के बार बार प्रभावित होने की स्थिति में हों और असुरक्षित यौन संबंधों के कारण,

बच्चेदानी के कैंसर या सर्वाइकल कैंसर की संभावना उनमें होती है। असामान्य रक्त स्राव,महीने के बीच में रक्त स्राव होना,यौन संबंधों के बाद रक्त स्राव होना ये प्रायः इसके प्रमुख लक्षण हैं । इन लक्षणों को सामान्यतः आम लक्षण समझे जाने और लापरवाही के कारण पहली स्टेज में परीक्षण (डायग्नोस) होने के मामलों में काफी कमी वर्तमान में देखी जा सकती है ।

 कैंसर बनने से पहले प्री कैंसर / डिस्प्लेशिया के स्तर पर पहचान हो जाने से इसका इलाज बहुत ही समान्य तरीके से संभव है और बच्चेदानी निकालने,कीमोथेरेपी और रेडिएशन से भी बचा जा सकता है । पैप स्मीयर परीक्षण, ह्यूमन पैपिलोमावायरस के परीक्षण से महिला को कैंसर होने या न होने की संभावना का परीक्षण डॉक्टर बच्चेदानी से पानी लेकर लगा सकते हैं । पैप स्मीयर परीक्षण रिपोर्ट ठीक आने पर अगले तीन से पांच साल तक किसी जांच की आवश्यकता नहीं होती ।

 बायोप्सी टेस्ट के माध्यम से कैंसर होने या न होने की जांच की जा सकती है । एमआरआई,अल्ट्रासाउंड आदि के द्वारा शरीर में हुए कैंसर के प्रसार को समझा जा सकता है। शुरुवाती चरणों में यदि डायग्नोस कर लिया गया तो सर्जरी से बच्चेदानी निकाल कर इसको पूरी तरह ठीक भी किया जा सकता है । यदि किसी व्यक्ति के शरीर में दूसरे और तीसरे चरण तक यह कैंसर फैल जाता है तो हल्की कीमोथेरेपी और रेडिएशन की मदद से इसका उपचार संभव है।

वर्तमान में विदेशी वैक्सीनों की उपलब्धता तो भारत में है लेकिन यह आर्थिक दृष्टि से अभी भी कई परिवारों की सीमा से बाहर है । भारतीय स्वदेशी वैक्सीन के निर्माण की , और नौ से पंद्रह आयु वर्ग की बच्चियों हेतु उसे इम्यूनाइजेशन कार्यक्रम में डाले जाने की घोषणा के बाद इस आधे पहिए की युवा पीढ़ी के साथी आर्थिक कारणों से इन वैक्सिनों से दूर नहीं रह पाएंगे यह निश्चित है ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसी संदर्भ में एक वैश्विक अभियान चलाया है । 90-70- 90 लक्ष्य । इन लक्ष्यों की प्राप्ति वर्ष 2030 तक करने के उद्देश्य से सभी राष्ट्रों को अपने देश की 15 वर्ष तक की लड़कियों की 90 प्रतिशत आबादी को सर्वाइकल कैंसर की प्रतिरक्षा प्रदान करनी है । सरकारों को यह ध्यान देना है कि 70 प्रतिशत महिलाओं को कम से कम दो परीक्षणों की उच्च सुविधा उपलब्ध हो पाए और 90 प्रतिशत महिलाओं में किसी भी प्रकार के कैंसर और विशेषतः सर्वाइकल कैंसर की जांच और इलाज को संपन्न करवाना है।

 इन महत्त्वपूर्ण संकल्प आधारित लक्ष्यों की तरफ विश्व के अलग अलग देश अपने अपने नीतिगत निर्णय और योजनाओं में लगे हैं। ऐसे में स्वदेशी वैक्सीन के आने बाद सार्वभौमिक प्रतिरक्षा कार्यक्रम के तहत यदि इसको लाया जाएगा तो भारत विश्व के सामने प्रभावी उदाहरण पेश कर सकता है । भारत में शुरुवाती उम्र में इस वैक्सीन को पुरुष और महिला दोनों पर लगवाने की आवश्यकता हैं क्योंकि सर्वाइकल कैंसर के मामलों में कमी लाने के लिए पुरुषों का भी प्रतिरक्षित रहना आवश्यक है । विश्व के अनेक देशों में इस संबंध में लिंग विभेद को दरकिनार करते हुए प्रतिरक्षा कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

भारत द्वारा विगत वर्षों में स्वास्थ्य क्षेत्र में विपरीत परिस्थितियों में भी पूरे विश्व के कल्याण की भरसक कोशिश की की गई । इन विपरीत परिस्थितियों में भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं का एक इकोसिस्टम विकसित करने की कोशिश की है । हालांकि केंद्र- राज्य विषय की टकराहट के चलते कहीं कहीं स्थितियां आज भी भयावह हैं । हमारे पुराने अनुभवों ने अतीत में वैक्सीनेशन कार्यक्रमों में हमारी आगनबाड़ियों और एएनएम शक्तियों की मजबूत भूमिका को सबके सामने स्थापित किया है।

हमने यह ध्यान देना होगा कि ये प्रोत्साहन महज संवाद के प्रोत्साहन न हों और ऐसे निष्ठावान कार्मिकों को सम्मानजनक कार्य की दशाओं और वेतनमान को भी हम प्रदान करेंगे । ओडिशा राज्य में हाल ही में वेतनमान के लिए आंदोलनरत आंगनबाड़ी कार्मिक महिलाओं का दृष्टांत इस संदर्भ में समीचीन है। भारत में अनुसंधान पर और भी सक्रियता से और मूल भाषाओं में होने वाले अनुसंधानों को बजटीय प्रावधानों से और भी प्रोत्साहित किया जाने की आवश्यकता है। केंद्र सरकार के प्रयासों को राज्यों की इच्छाशक्तियों से बल मिलता है, ऐसे में लोकतंत्र की वाहक राज्य सरकारें भारत की इस स्त्री शक्तियों के संबंध में, लिए जा रहे नीतिगत निर्णयों में सक्रिय सहभागिता निभाएंगी यह उम्मीद की जा सकती है ।


अनियमितताओं की वेदी पर युवाओं का भविष्य

  युवा राष्ट्र के मेरुदंड हैं । राष्ट्र   की समृद्धि में युवाओं की ही महत्ती भूमिका है   । युवाओं की सक्रिय सहभागिता ने आजादी के आंदोल...