सर्दियों में हर वर्ष हमारा
ठिठुरता गणतंत्र अपने मूल कलेवर में नए अनुभवों को जोड़ते हुए एक नई विकास यात्रा का
क्रम विकसित करता है । यह विकास का क्रम ही हमारी कूप मंडूक दृष्टि को वैश्विक दृष्टि
प्रदान करता है और इस बात को मस्तिष्क में घर करवाता है कि-
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहां से।
अब तक मगर है बाक़ी नामों-निशां हमारा।।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।
सदियों
रहा है दुश्मन दौरे-ज़मां हमारा।।
हर वर्ष
यह उत्सव तब तक भारतीय श्रेष्ठता और वैश्विक मंच में हमारी जगद्गुरु की भूमिका
के प्रति भाव को मजबूती प्रदान करता है जब तक कि
भारत से बाहर जाकर, भारत के नागरिक,
होने के महत्व को वीज़ा की प्रतीक्षा में एयरपोर्ट लाइन में वह स्वयं लगकर महसूस न
कर लें ।
वस्तुतः गणतंत्र दिवस के उत्साह का यह ज्वार भी गणतंत्र दिवस के दो तीन दिन
बाद प्रत्येक अखबार में देखी जाने वाली मृत्यु,बलात्कार,प्राकृतिक आपदाओं, घोटालों,
और सड़कों पर उठती आवाजों के बीच धीमा पड़ जाता है । दरअसल वर्तमान भारत भूलने की बुरी
लत से जूझ रहा है । हमको प्रभावित करने वाली
सबसे ज्वलंत खबरों तक को हम लोग वर्ष के अंत तक पहुंचते पहुंचते भूल जाते हैं
।
राष्ट्रीय महत्व के दिनों
में हमारे अंदर का देशभक्त, अपनी प्रोफाइल
पिक्चर में तिरंगा लगाने से लेकर,गाल में तिरंगे वाले टैटू के लिए जग जाता है । देशभक्ति
गीतों की आवाज से हौले से उठने वाले रौंगटे को महसूस करने के अभ्यस्त हम लोग उन खबरों,उन
विषयों पर बात तक करना मुनासिब नहीं सोचते जो हमारे भविष्य के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आधार है ।
दिवस विशेष,आधारित चिंतन परंपरा ,भारत में भी अब प्रायः देखने को मिल रही
है । कुछ दिनों पहले एक कवि ने कहा था –
धूल साफ कर जो तस्वीरें शान
से आज सजाई हैं,इससे पहले इनकी याद किसे, कहां और कब आई है ?
आज दिन विशेष को महत्व देने वाली पीढ़ी, फादर्स डे,
मदर्स डे, फ्रेंड्स डे,अर्थ डे आदि के बौद्धिक मकड़जाल में फंसकर शाश्वत रूप से इन
विषयों में सोचना धीरे धीरे कम कर रही है ।
विविधता वाले तथाकथित सपेरों
के देश में दैवीय नियतिवाद का स्थान कर्मवाद
ने जरूर लिया है तभी विश्व की सबसे विकसित ताकतों में आज हम शामिल हैं लेकिन अभी भी
गांधी जी के तीनों मूल मंत्रों बुरा मत देखो,बुरा मत कहो और बुरा मत सुनो को हम लोग
अपने स्वार्थपरक नजरिए से तोड़ते मरोड़ते रहते हैं।
भारत की सामासिक संस्कृति
में चिंतन प्रक्रिया को सतत मानते हुए ही समाज सुधारकों, देशभक्तों ने स्वर्णिम अतीत
से प्रेरणा ग्रहण की थी। चिंतन के आधार पर विमर्शों से प्राप्त बिंदुओं को, ध्यान में
रखते हुए कर्तव्य निर्धारण करने वाले मतवालों,का
दौर अब चला गया है । आज चिंतन महज खानापूर्ति का जरिया बन चुका है । हाल ये है कि यदि
15 अगस्त और 26 जनवरी को सरकार द्वारा अवकाश घोषित कर दिया जाए, तो व्यक्ति उस स्थिति में
गणतांत्रिक भारत का स्वतंत्र नागरिक होने कर अधिक गर्व महसूस कर पाएगा । एक
दिन की छुट्टी की उम्मीद, हमेशा राष्ट्रीय चिंतन से ऊपर ही तो रहती है आजकल ।
सरकारी दफ्तरों में हमारे
राष्ट्रीय पर्व देशभक्ति से मीलों दूर औपचारिकताओं और प्रोटोकॉल से बंधकर रह जाते हैं
। अखबारों में, संवादों में, न्यूज में , जनमंचों में,देश के राष्ट्रीय पर्वों पर बातें
तो होती हैं लेकिन इस राष्ट्रीय पर्व के निहितार्थ, उसकी दिशा क्या सही दिशा है? इस
पर बोलना लिखना और सवालात करना आपको पाकिस्तानी से लेकर देशद्रोही तक बना सकता है ।
फालतू समय वाला व्यक्तित्व भी आपको घोषित किया जा सकता है ।
गणतंत्र दिवस का दिन हमारी
आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का दिन है। यह दिन
यह विचारने का है कि 150 वर्षों की औपनिवेशिक सत्ता के वो क्या बीज तत्व आज भी मौजूद
हैं जो भारत के लोगों की प्रगति में बाधक हैं।
यह दिन यह विचारने का है कि संविधान के किन किन विषयों को वक्त की जरूरत के
हिसाब से बदला जा सकता है । यह दिन यह विचारने का है कि राष्ट्रविकास की प्रक्रिया
में संविधान में और क्या बेहतर परिवर्तन किए जा सकते हैं जिससे अंतिम पंक्ति में बैठा
व्यक्ति भी राष्ट्र विकास में सहायक हो सके । यह दिन उन विमर्शों को केंद्र बिंदु में लाने का दिन है जिन विमर्शों
को हमारी संविधान सभा में किया गया था हालांकि जो बाद में संविधान का भाग भी न बन पाए
थे ।
यह दिन ऐसे विषयों पर सार्थक जन संवाद का दिन है जिन विषयों पर हमारे संविधानवेताओं के अलग अलग मत रहे और इस
कारण तत्कालीन परिस्थितियों में उनको संविधान में महत्व न देना ही वांछित समझा गया आज फिर 21 सदी के भारत के सामने वो विषय प्रमुखता
से सामने आ रहे हैं। यह दिन इस चिंतन का भी
मौका देता है कि राष्ट्र निर्माण में हमारे किन मूल भारतीय तत्वों का लोप हो गया और
कौन से तत्वों का लबादा हमें भूमंडलीकरण और छवि निर्माण के चलते छोड़ना पड़ा ।
लेकिन अपनी अपनी गुहा में
रहने के अभ्यस्त हम लोग भूलने की बीमारी से ऐसे ग्रसित हो चुके हैं कि सरकारों द्वारा,
हमारे लिए किए गए कार्यों के विषय में विज्ञापनों
में करोड़ों- करोड़ों खर्च करके उनको बताना पड़ता है । विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र
के रूप में खुद को देखते हम लोगों की लगभग 35 प्रतिशत आबादी तो वोट ही करना भूल जाती
है । जनता का, जनता द्वारा ,और जनता के लिए शासन हो ऐसी आदर्श लोकतंत्र की परिभाषाएं
भी
जनमानस के स्मृति पटल से
निकल जाती है । और इस प्रकार लोकतंत्र में मसलन चुनावों से चंद दिनों पूर्व रातों में सबकुछ भूलजाने की प्रवृति वाली जनता को ऐतिहासिक सामाजिक, धार्मिक ,राजनैतिक और लैंगिक विषयों को
समझाने का दौर चलता है ।
गणतंत्र दिवस की पूर्वपीठिका में ,भगवत कृपा को
प्राप्त राष्ट्र में ,संविधान में वर्णित हमारी विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका
को संविधान प्रदत्त शक्तियों के दायरे में रहने और एक दूसरे के कार्यों में दखल न देने
की प्रेरणा मिले, हमारी राज्य सरकारें अपनी
अपनी डफली अपना अपना राग छोड़कर केंद्र की योजनाओं में सक्रियता से कार्य कर सहकारी
संघवाद को बढ़ावा दें और देश का आम नागरिक अपने नागरिक कर्तव्यों को समझकर तदनुसार
कार्य करे, इस गणतंत्र दिवस कम से कम यह उम्मीद
तो कर ही सकते हैं ।
हिंदी साहित्य में आधुनिक
युग के प्रमुख हस्ताक्षर मैथिलीशरण गुप्त जी की बातें इस गणतंत्र दिवस का ध्येय बने
तो संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा निभाने में
हम सक्षम होंगे ,इसमें दो मत नहीं ।
हम कौन थे, क्या हो गये हैं,
और क्या होंगे अभी,
आओ विचारें आज मिल कर, यह
समस्याएं सभी।