बुधवार, 4 जनवरी 2023

सर्वाइकल कैंसर की स्वदेशी वैक्सीन : जागरूक होकर ही जीतेंगे जंग ।


भारत में महिलाओं को होने वाले कैंसर में सर्वाइकल कैंसर या बच्चेदानी के मुंह का कैंसर दूसरे क्रम में आता है । भारत में स्तन कैंसर के बाद ह्यूमन पैपिलोमा वायरस, के संक्रमण से होने वाले सर्वाइकल कैंसर से हमारी आधी धुरी, ये स्त्री शक्तियां आज सर्वाधिक प्रभावित होती हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष लगभग तीन लाख स्त्रियों की मृत्यु सर्वाइकल कैंसर से होती है।

नेशनल कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के आंकड़ों के अनुसार भारत में महिलाओं को होने वाले कैंसर में से 6-29 प्रतिशत कैंसर के मामले सर्वाइकल कैंसर के होते हैं । भारत में स्वास्थ्य नीतियों को वर्ष 1983, वर्ष 2002 और वर्ष 2017 में संशोधित किया गया लेकिन किसी में भी सर्वाइकल कैंसर की दिशा में कोई ठोस कदम देखने को नहीं मिलते । सस्ते स्वदेशी टीके की अनुपलब्धता, जानकारियों का अभाव, बड़ी संख्या में वैक्सीन की सरकारी खरीद न होना और बच्चों के पाठ्यक्रमों में ऐसी सूचनाओं के नदारद होने का परिणाम यह है कि आज भी महिलाओं का एक बड़ा वर्ग, एक बड़ी लंबी आयु तक, इससे ग्रसित होने के बावजूद भी यह नहीं जान पाता कि उसको यह बीमारी है ।

 विगत वर्षों में हमारे राष्ट्र ने स्वास्थ्य संबंधी क्षेत्रों में और विशेषकर टीकाकरण अभियानों (इम्यूनाइजेशन कार्यक्रमों )में उल्लेखनीय प्रगति की है । सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा सर्वाइकल कैंसर के लिए हाल ही में वैक्सीन जारी करने की घोषणा इसी प्रगति का एक हिस्सा है । स्वदेशी वैक्सीन को विकसित करने की सूचना भारत समेत पूरे विश्व और विशेषकर अफ्रीकी देशों के लिए और सार्क देशों के लिए वैसी ही शुभ है जैसी कोरोन्ना के समय में स्वदेशी कोरोना वैक्सीन के विकसित होने के बाद की थी। ह्यूमन पैपिलोमा वायरस की वैक्सीन को सार्वभौमिक टीकाकरण अभियान में शामिल किए जाने की मांग लंबे समय से मेडिकल कॉलेजों,प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में कार्यरत चिकित्सकों और विभिन्न बुद्धिजीवियों द्वारा भी दोहराई गई है । सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह की अनुशंसाओं ने सर्वाइकल कैंसर के संबंध में अपने नीतिगत निर्णयों में इसको अमलीजामा पहनाने में आज प्रमुखता से काम किया है । हालांकि अभी इस संदर्भ में सकारात्मक परिणाम आने में 1 -2 वर्ष का समय लगेगा ।

इससे जहां अन्य वैक्सीन के विकल्प हमें प्राप्त होंगे वहीं हमारी सस्ती दवाइयों को अफ्रीकी और अन्य राष्ट्रों में भी अतीत की तरह स्वीकृति मिलेगी यह कहा जा सकता है । भारत सरकार ने अन्य वैश्विक समुदाय को भी वैक्सीन मदद करने के उद्देश्य से कोरोना समय में वैक्सीन मैत्री नामक पहल जारी की । विगत 3 वर्षों से विश्व के लाखों लोगों को फायदा दे रही यह एक प्रशंसनीय पहल है ।

 ह्यूमन पैपीलोमा वायरस के कारण होने वाले सर्वाइकल कैंसर के इस संक्रमण को कैंसर में बदलने में सात से पंद्रह साल लगते हैं , अतः प्रारंभिक चरणों में इसकी पहचान और प्रभावी रोकथाम की जा सकती है । टीकाकरण के लिए सरकारी सुझावों की समिति की अनुशंसा के बाद इस वैक्सीन को भारतीय ड्रग महानियंत्रक से अनुमति भी मिल चुकी है । भारत में वर्ष 2023 के मध्य से इस स्वदेशी वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित रहेगी । 9 से 14 वर्ष तक की आयु वर्ग की बच्चियों को विद्यालयों,और स्वास्थ्य केंद्रों में यह सुविधा सरकार की तरफ से प्राप्त होगी । ऐसे में टीचर -पैरेंट्स मीटिंग्स में ऐसे जागरूकता संबधी विषयों पर चर्चा भी आज आवश्यक हो जाती है। वर्तमान में यही सबसे बड़ी चुनौती है । आज हमें जागरूकता के नए माध्यमों को भी अपनाने की आवश्यकता है ।

ऐसी स्त्रियां जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) कम हो ,हाइजीन का उचित ध्यान न हो, गर्भाशय के बार बार प्रभावित होने की स्थिति में हों और असुरक्षित यौन संबंधों के कारण,

बच्चेदानी के कैंसर या सर्वाइकल कैंसर की संभावना उनमें होती है। असामान्य रक्त स्राव,महीने के बीच में रक्त स्राव होना,यौन संबंधों के बाद रक्त स्राव होना ये प्रायः इसके प्रमुख लक्षण हैं । इन लक्षणों को सामान्यतः आम लक्षण समझे जाने और लापरवाही के कारण पहली स्टेज में परीक्षण (डायग्नोस) होने के मामलों में काफी कमी वर्तमान में देखी जा सकती है ।

 कैंसर बनने से पहले प्री कैंसर / डिस्प्लेशिया के स्तर पर पहचान हो जाने से इसका इलाज बहुत ही समान्य तरीके से संभव है और बच्चेदानी निकालने,कीमोथेरेपी और रेडिएशन से भी बचा जा सकता है । पैप स्मीयर परीक्षण, ह्यूमन पैपिलोमावायरस के परीक्षण से महिला को कैंसर होने या न होने की संभावना का परीक्षण डॉक्टर बच्चेदानी से पानी लेकर लगा सकते हैं । पैप स्मीयर परीक्षण रिपोर्ट ठीक आने पर अगले तीन से पांच साल तक किसी जांच की आवश्यकता नहीं होती ।

 बायोप्सी टेस्ट के माध्यम से कैंसर होने या न होने की जांच की जा सकती है । एमआरआई,अल्ट्रासाउंड आदि के द्वारा शरीर में हुए कैंसर के प्रसार को समझा जा सकता है। शुरुवाती चरणों में यदि डायग्नोस कर लिया गया तो सर्जरी से बच्चेदानी निकाल कर इसको पूरी तरह ठीक भी किया जा सकता है । यदि किसी व्यक्ति के शरीर में दूसरे और तीसरे चरण तक यह कैंसर फैल जाता है तो हल्की कीमोथेरेपी और रेडिएशन की मदद से इसका उपचार संभव है।

वर्तमान में विदेशी वैक्सीनों की उपलब्धता तो भारत में है लेकिन यह आर्थिक दृष्टि से अभी भी कई परिवारों की सीमा से बाहर है । भारतीय स्वदेशी वैक्सीन के निर्माण की , और नौ से पंद्रह आयु वर्ग की बच्चियों हेतु उसे इम्यूनाइजेशन कार्यक्रम में डाले जाने की घोषणा के बाद इस आधे पहिए की युवा पीढ़ी के साथी आर्थिक कारणों से इन वैक्सिनों से दूर नहीं रह पाएंगे यह निश्चित है ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसी संदर्भ में एक वैश्विक अभियान चलाया है । 90-70- 90 लक्ष्य । इन लक्ष्यों की प्राप्ति वर्ष 2030 तक करने के उद्देश्य से सभी राष्ट्रों को अपने देश की 15 वर्ष तक की लड़कियों की 90 प्रतिशत आबादी को सर्वाइकल कैंसर की प्रतिरक्षा प्रदान करनी है । सरकारों को यह ध्यान देना है कि 70 प्रतिशत महिलाओं को कम से कम दो परीक्षणों की उच्च सुविधा उपलब्ध हो पाए और 90 प्रतिशत महिलाओं में किसी भी प्रकार के कैंसर और विशेषतः सर्वाइकल कैंसर की जांच और इलाज को संपन्न करवाना है।

 इन महत्त्वपूर्ण संकल्प आधारित लक्ष्यों की तरफ विश्व के अलग अलग देश अपने अपने नीतिगत निर्णय और योजनाओं में लगे हैं। ऐसे में स्वदेशी वैक्सीन के आने बाद सार्वभौमिक प्रतिरक्षा कार्यक्रम के तहत यदि इसको लाया जाएगा तो भारत विश्व के सामने प्रभावी उदाहरण पेश कर सकता है । भारत में शुरुवाती उम्र में इस वैक्सीन को पुरुष और महिला दोनों पर लगवाने की आवश्यकता हैं क्योंकि सर्वाइकल कैंसर के मामलों में कमी लाने के लिए पुरुषों का भी प्रतिरक्षित रहना आवश्यक है । विश्व के अनेक देशों में इस संबंध में लिंग विभेद को दरकिनार करते हुए प्रतिरक्षा कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

भारत द्वारा विगत वर्षों में स्वास्थ्य क्षेत्र में विपरीत परिस्थितियों में भी पूरे विश्व के कल्याण की भरसक कोशिश की की गई । इन विपरीत परिस्थितियों में भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं का एक इकोसिस्टम विकसित करने की कोशिश की है । हालांकि केंद्र- राज्य विषय की टकराहट के चलते कहीं कहीं स्थितियां आज भी भयावह हैं । हमारे पुराने अनुभवों ने अतीत में वैक्सीनेशन कार्यक्रमों में हमारी आगनबाड़ियों और एएनएम शक्तियों की मजबूत भूमिका को सबके सामने स्थापित किया है।

हमने यह ध्यान देना होगा कि ये प्रोत्साहन महज संवाद के प्रोत्साहन न हों और ऐसे निष्ठावान कार्मिकों को सम्मानजनक कार्य की दशाओं और वेतनमान को भी हम प्रदान करेंगे । ओडिशा राज्य में हाल ही में वेतनमान के लिए आंदोलनरत आंगनबाड़ी कार्मिक महिलाओं का दृष्टांत इस संदर्भ में समीचीन है। भारत में अनुसंधान पर और भी सक्रियता से और मूल भाषाओं में होने वाले अनुसंधानों को बजटीय प्रावधानों से और भी प्रोत्साहित किया जाने की आवश्यकता है। केंद्र सरकार के प्रयासों को राज्यों की इच्छाशक्तियों से बल मिलता है, ऐसे में लोकतंत्र की वाहक राज्य सरकारें भारत की इस स्त्री शक्तियों के संबंध में, लिए जा रहे नीतिगत निर्णयों में सक्रिय सहभागिता निभाएंगी यह उम्मीद की जा सकती है ।


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