मंगलवार, 17 जनवरी 2023

असंतुलित विकास और उदासीनता से जूझता पहाड़

 

कितना आसान है ,हम सब के लिए जोशीमठ के विषय में सर्दी की सुबह चाय की चुस्कियों के संग चर्चाएं करना । कितना आसान है, संभावित आपदा प्रभावितों को उनके जन,जंगल,जमीन छोड़ घर खाली करने के लिए दिए गए सरकारी फरमान पर अनुवर्ती कार्यवाही करना । कितना आसान है, त्रासदी के सामने खड़े होने की स्थिति में जांच समितियों के गठन और रिपोर्ट की प्रतीक्षा करना,लेकिन बहुत मुश्किल है प्राकृतिक आपदाओं के खतरों के निशान पूर्व में ही भांपकर त्वरित नीतिगत निर्णय लेना । बहुत मुश्किल है लोगों के विगत 1 वर्ष से निकल रहे मशाल जुलूसों , मांग जुलूसों पर ध्यान रहना । और बहुत मुश्किल है पहाड़ को पहाड़ बने रहने और धार्मिक यात्राओं को पर्यटन यात्राएं न बना देने की पहलों को समर्थन देना ।

 पूरा हिमालय आज संभावित खतरों से जूझ रहा है । राष्ट्रीय राजमार्ग-6 जोकि मणिपुर,मिजोरम,त्रिपुरा,और दक्षिणी असम को जोड़ता है काफी दिनों तक पिछले वर्ष मुख्यधारा से कटा रहा । रोंटी ग्लेशियर से अलग हुए बर्फ खंड से उत्पन्न बाढ़ की स्थिति ने 70 से ज्यादा लोगों की जिंदगी उत्तराखंड में ली । किन्नौर जिले में भूस्खलन से हुई जनहानि भी इसी कड़ी में एक और उदाहरण है । लोकसभा में एक प्रश्न के प्रतिउत्तर के आधार पर देखें तो इस वर्ष 2021-2022 जुलाई माह तक प्राकृतिक आपदाओं से 1098 जिंदगियों को हमने खोया है । यह स्थिति हिमालयी राज्यों तक ही सीमित न रहकर उत्तरप्रदेश,कर्नाटक,राजस्थान आदि राज्यों तक है ,सभी इससे प्रभावित रहे हैं । अभी हमारे दिमाग से चक्रवात गुलाब, चक्रवात शाहीन और चक्रवात यास आदि से हुए मिलियनों के नुकसान की स्मृति मिटी नहीं हैं कि फिर से हम प्राकृतिक आपदाओं से जूझने लगे हैं। कर्नाटक,महाराष्ट्र और तमिलनाडु में उत्पन्न परिस्थितियों ने हमें हमारे बाढ़ प्रबंधन और प्राकृतिक आपदा के प्रबंधन संबंधी मॉडलों पर विचार करने को बाध्य किया है।

उत्तराखंड की बात करें तो जमीनी धरातल पर, सामरिक महत्व के लिए आवश्यक चार धाम सड़क परियोजनाओं, रोपवे सेवाओं, धार्मिक पर्यटन और ऊर्जा राज्य के लिए जलविद्युत परियोजनाओं जैसी अवधारणाओं ने पहले से ही सेस्मिक जोन पांच में अवस्थित उत्तराखंड की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाया है। बेतरतीब अनियोजित बहु मंजिला होटलों के नियामकों , रेत खनन, हेलंग बाईपास निर्माण कार्य, एनटीपीसी तपोवन विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना,जोशीमठ-औली रोपवे आदि विषयों पर पुनर्चर्चा का अब समय आ गया है । निकासी तंत्र की शिथिल स्थिति और अलकनंदा और धौलीगंगा दोनों ही नदियों द्वारा जोशीमठ शहर के नीचे की मिट्टी का कटान किया जाना भूस्खलन की संभावनाओं को और बढ़ा देता है । उत्तराखंड में यह स्थिति प्रायः अधिकतर पर्वतीय क्षेत्रों की है, ऐसे में अत्यंत आवश्यक है उत्तराखंड के सभी पर्वतीय क्षेत्रों का वैज्ञानिक और शोधपरक अनुसंधान किया जाए।

जोशीमठ की घटना के बाद से पहाड़ों के अलग क्षेत्रों से अनियोजित शहरीकरण, बांधों से उत्पन्न संकट , और बड़ती होटल संस्कृति के कारण उत्पन्न स्थितियों पर चर्चाएं होना शुरू हुई हैं। उत्तराखंड के संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्रों में मानवीय क्रियाकलापों के समुच्चय ने आपदाओं को न्यौता देने का कार्य किया हैं । दरअसल पर्वतीय प्रदेश में राज्य गठन के बाद से ही मैदान में बसे देहरादून के विपरीत पहाड़ों में स्थित गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग क्रमशः उठती आई है । शासन,प्रशासन और यहां के जनप्रतिनिधि पहाड़ में जब रहेंगे, तब पहाड़ के दुख,तकलीफ और यहां की शाश्वत चिंताओं के विषय में चिंतन कर पाएंगे इसी आधारबिंदु पर अतीत से हो रही मांगे आज उत्तराखंड के दरकते पहाड़ों और पहाड़ों में आ रही त्रासदी के रूपों को देखकर जायज लगती हैं ।

 मसलन राजधानी देहरादून से जोशीमठ पहुंचने पर लगभग पहाड़ी सफर के 8- 9 घंटे लगते हैं । प्रशासन और सक्षम प्राधिकारियों की इस दुरूह सफर में जाने की इच्छाशक्ति में कमी भी कहीं न कहीं इतने भयावह रूप के लिए उत्तरदाई है वरना क्षेत्र के लोगों द्वारा तो विभिन्न अवसरों पर जोशीमठ की स्थिति की जांच की मांग उठाई ही गई है । हास्यास्पद स्थिति तब पैदा होती है जब देश के प्रतिष्ठित भू- विज्ञान से संबधित संस्थान देहरादून में ही हैं और देश के प्रतिष्ठित उच्च क्षमता वाले सबसे पुराने इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी रूड़की भी उत्तराखंड में अवस्थित है लेकिन इसके बाद भी जोशीमठ की खबरों के मीडिया द्वारा सामने आने से पहले ऐसी कोई भी टीम गठित नहीं की गई। ऐसे विशेषज्ञों के तकनीकी ज्ञान,अनुभव का उपयोग पहले से किया जाता तो स्थिति को भयावह होने से पहले रोका जा सकता था ।

कोरोना के बाद की विषम स्थितियों में लोगों ने कहीं मुख्यमंत्री स्वरोजगार से तो कहीं बैंको से ऋण प्राप्त कर छोटे छोटे स्वरोजगार विकसित करने की कोशिश की । कहीं बकरी पालन,मवेशीपालन तो कहीं दुकानदारी से पैसा जमा कर जीवन निर्वाह करते लोगों के सम्मुख विस्थापन के बाद जीविका का प्रमुख प्रश्न है ।

अपने जानवरों को परिवार का अंश मानने वाले इन देवभूमि के निवासियों को उनके मवेशियों के साथ विस्थापित करने की योजना बनाई जानी चाहिए । कोविड काल में अनेकों साथियों ने स्वरोजगार के अवसर को विकसित करने की पहलें की । इसके एवज में उन्होंने बैंकों से ऋण भी लिए था । अब ऐसी स्थिति में सरकार को बैंकों को समझना होगा कि आपदा प्रभावित क्षेत्र के लोगों द्वारा लिए गए ऋणों की वसूली में कुछ समय के लिए छूट दी जाए ।

आपदा से प्रभावित होने वाले बच्चों की भी बोर्ड परीक्षाओं का यह समय है । ऐसे में इस आपदा से हमारे बच्चों के ऊपर पड़ने वाले मानसिक दबाव को महसूस करते हुए हमें परीक्षा की तैयारी के विषय में प्रावधान करने होंगे । दरकते पहाड़ों के संभावित खतरों ने नैनिहालों की शिक्षा संबधी व्यवस्थाओं पर भी सोचने की स्थिति पैदा कर दी है ।

जिन सक्षम प्राधिकारियों के कानों में स्थानीय आंदोलन की आवाज नहीं पहुंची वही लोग अब सक्रियता से संभावित आपदा स्थलों का चिन्हीकरण करने में व्यस्त हैं । इसके अलावा लोगों को जागरूक भी किए जाने की आवश्यकता आज दिखती है । अभी भी स्थानीय निवासियों का एक बड़ा वर्ग जोशीमठ छोडके जाना नहीं चाहता है । प्रशासन को सहानुभूतिपरक पुनर्वास योजनाएं बनाने की आज आवश्यकता है । यह सही वक्त है जब बेतरतीब दबाव झेलते पहाड़ों के लिए लंबे समय से मांगी जा रही इनर लाइन परमिट संबंधी मांगों पर गौर किया जाए । जोशीमठ के साथ साथ पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों का पारदर्शी वैज्ञानिक सर्वे आज उत्तराखंड की आवश्यकता है ।


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