उत्तराखंड के सुदूरवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में जनमानस भूगर्भीय संक्रियाओं के कारण आने वाले भूकंपों, भूस्खलनों, भू -धसाव गिरते पहाड़ों ,पत्थरों और पर्यावरणीय संवेदनशील योजनाओं से हमेशा संघर्ष करते आया है । प्राकृतिक आपदाओं के लिए संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में विगत वर्षों में भयावह आपदाएं आई हैं।
उत्तराखंड जन,जंगल, जमीन के आंदोलनों की भूमि रहा है । चिपको आंदोलन से लेकर गंगा बचाओ अभियान तक पर्यावरणीय सरोकारों के लिए यहां विरोध होता रहा है लेकिन मुख्यधारा की नजरों में हमेशा घटनाएं देर से ही पहुंची हैं । वर्तमान में जोशीमठ से भूस्खलन की आ रही विकराल खबरों ने एक बार पुनः विकास बनाम विनाश के विमर्श को जन्म दे दिया है। जोशीमठ में कई मकानों में बड़ी दरारें आ गईं । पानी का रिसाव भी शुरू हो गया। बद्रीनाथ हाईवे पर भी मोटी दरारें आईं हैं । भू-धंसाव से ज्योतेश्वर मंदिर और मंदिर परिसर में दरारें आ गई हैं। लगभग 570 परिवार इससे प्रभावित है। डर और अनिश्चितता के कारण मजबूरन सर्दी में भी अपने घरों को छोड़ने को अभिशप्त इन लोगों की स्थिति पर पूरे देश का ध्यान गया है।
जोशीमठ ,उत्तराखंड के चमोली जनपद में स्थित करोड़ों भारतीयों की आस्था का मुख्य प्रवेश द्वार है जहां से आगे आद्यगुरू शंकराचार्य के द्वारा स्थापित चार धाम में से एक बद्रीनाथ और पवित्र हेमकुंड साहिब अवस्थित है। जोशीमठ में भगवान् विष्णु का एक मंदिर है । सर्दियों में जब बद्रीनाथ के कपाट बंद हो जाते हैं, तब भगवान बद्री की प्रतिष्ठा इसी मंदिर में होती है । किसी समय में कत्यूरी शासकों की लंबे समय तक राजधानी रहा 6150 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित यह जोशीमठ क्षेत्र आज भी पर्वतारोहीयों और ट्रैकर्स की पसंदीदा जगहों में से एक हैं। इसी जोशीमठ से कुछ 15 किलोमीटर दूर रैणी नामक एक गांव में विश्व को पर्यावरणीय जागरूकता का संदेश देने वाली और चिपको आंदोलन की प्रमुख हस्ताक्षर गौरा देवी भी संबंधित हैं। पिछले वर्ष गौरा देवी के इस गांव को भी भूस्खलन के परिणामों से जूझते हुए देखा गया । इसी रैणी गांव में जोशीमठ-मलारी हाइवे का लगभग 40 मीटर हिस्सा भूस्खलन से जमींदोज हो गया था। ऐसे में ऋषिगंगा परियोजना के निर्माण के वक्त जो आशंकाएं व्यक्त की थीं, वे आज सच हो रहीं हैं।
उत्तराखंड के अधिकतर संवेदनशील क्षेत्र मोरेन ( हिमोद) के ऊपर अवस्थित हैं । ऐसे में हल्की हल्की दरारें पहाड़ों के लोगों के जीवन का हिस्सा अतीत में भी रही हैं । लेकिन जोशीमठ में चौतौरफा क्रियाएं बड़ी हैं, और उसका ही नकारात्मक पक्ष सामने आ रहा है ।
उत्तराखंडवासियों ने वर्ष 1990 में आए विनाशकारी भूकंप के घावों से अभी मुक्ति पाई भी नही थी कि कुदरत ने हमें केदारनाथ त्रासदी जैसी घटनाओं से पुनः परिचय कराया । समय समय पर हम सबने समाचार पत्रों में त्रासदी की तस्वीरें देखी हैं । पूरे हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को समझते हुए वर्ष 1976 में 18 सदस्यीय मिश्रा समिति ने अपनी अनुशंसाओ में इस पूरे क्षेत्र और विशेषकर जोशीमठ की संवेदनशीलता के विषय में अनेक बातें कही थी । समिति ने इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार के भारी अवसंरचनात्मक निर्माण पर बैन की मांग की थी।
राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में वर्ष 2021 में आए 4.6 प्रतिशत तीव्रता के भूकंप का केंद्र जोशीमठ ही था । हाल ही में नवंबर 2022 में नेपाल में आए भूकंप का अहसास जोशीमठ तक किया गया था । विगत दस वर्षों में 700 भूकंप के मामले उत्तराखंड में देखे गए हैं । हालांकि यह सब प्रायः कम तीव्रता के ही रहे थे ।
जन,जंगल,जमीन और जानवर को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारणों की लंबी फेहरिस्त में मानवीय क्रियाकलापों और उसमें भी विशेषतः इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास (अवसंरचनात्मक विकास) के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी महत्ती भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता । सड़क विस्तार परियोजनाओं से लेकर पर्यटन स्थलों के ऊपर जनसांख्यकीय आधिक्य , जलविद्युत परियोजनाओं तक और जंगलों के जलने से लेकर होटलों के लिए कंक्रीट के विस्तार तक सभी ने केवल जोशीमठ ही नहीं बल्कि पूरे उत्तराखंड को प्रभावित किया है। जमीनी धरातल पर सामरिक महत्व के लिए आवश्यक चार धाम सड़क परियोजनाओं, रोपवे सेवाओं, धार्मिक पर्यटन और ऊर्जा राज्य के लिए जलविद्युत परियोजनाओं जैसी अवधारणाओं ने पहले से ही सेस्मिक जोन पांच में अवस्थित उत्तराखंड की परिस्थतिकी को नुकसान पहुंचाया है।
बेतरतीब अनियोजित चार पांच मंजिला होटलो के नियामकों , रेत खनन, हेलंग बाईपास निर्माण कार्य, एनटीपीसी तपोवन विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना,जोशीमठ-औली रोपवे आदि विषयों पर पुनर्चर्चा का अब समय आ गया है । निकासी तंत्र की शिथिल स्थिति और अलकनंदा और धौलीगंगा दोनों ही नदियों द्वारा जोशीमठ शहर के नीचे की मिट्टी का कटान किया जाना भूस्खलन की संभावनाओं को और बढ़ा देता है ।
आज यह सवाल भी पूछे जाना वक्त की मांग है कि आपदा के संबध में नीतिगत निर्णयों को क्या आपदा होने का इंतजार करना चाहिए ? क्या पुनर्वास की नीतियों का निर्धारण घटना होने के बाद ही किया जाना चाहिए ? क्या श्रद्धालुओं की सुविधा के नाम पर धार्मिक जगहों को पिकनिक स्पॉटो में बदला जाना चाहिए ? क्या धार्मिक पर्यटन स्थलों के विकास के नाम पर पारिस्थितिकी संतुलन से समझौता किया जा सकता है ? क्या हैली सेवाओं से हमारे धामों के दर्शन कर रहे श्रद्धालुओं में एक उम्र की सीमा लागू की जा सकती है? क्या पर्यटन का दबाव झेल रहे हिमालय क्षेत्र में दैनिक आधार पर पर्यटकों की संख्या सीमित कर देनी चाहिए आधारित ये सब प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हैं?
जाहिर है संविधान से चलने वाले इस देश में उपरोक्त बातें आपको संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों और विशेषकर अबाधित रूप से देश के अंदर चलने फिरने में बाधक लगें लेकिन सच यह है कि हिमालयी राज्यों में पर्यटन के दबाव को अब महसूस किया जाने लगा है और उसी संविधान के अपवादों का भी उपयोग करने का यह सही वक्त है । उत्तराखंड के जिन निवासियों को विकास के इन मॉडलों का दंश झेलना पड़ रहा है उनके पुनर्वास के लिए त्वरित नीतिगत निर्णय लेना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है ।
जोशीमठ की घटना में उत्तराखंड सरकार ने हालांकि त्वरित कार्यवाही करते हुए इस संबध में उच्च स्तरीय जांच समिति बनाई है और जांच समिति की रिपोर्ट आने तक सारे कार्य रोक दिए हैं लेकिन इतने समय से संघर्षशील जोशीमठ के लोगों की अभी तक सुनवाई न होना प्रशासन का जनता से विलगाव ही दिखाता है ।
हिमालयी राज्यों में देश की ऊर्जा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाए जा रहे बांधों के निर्माण से होने वाले नुकसानों और फायदों के विषय में विस्तृत और विश्वसनीय सूचनाओं का विस्तार आम जन तक सुलभ होने पर ही तुलनात्मक अध्ययन किया जाना संभव है लेकिन यह बात स्पष्ट है कि पहाड़ी राज्यों की भौगोलिक स्थितियों और पर्यावरणविदो की सलाहों और विरोधों के स्वर को तिलांजलि देकर ग्लेशियरों से घिरे धार्मिक स्थलों और संवेदनशील क्षेत्रों के नजदीक पर्यटन के दबाव को कम करना आज आवश्यक है । सरकारी तंत्र में कार्यरत वैज्ञानिकों के साथ साथ स्वतंत्र वैज्ञानिकों के मतों को साथ में देखकर ही निष्पक्ष रूप से संवेदनशील इलाकों में विकासात्मक अप्रोच की तरफ आगे बढ़ना आज आवश्यक है । हाल ही में सम्मेद शिखरजी पर्वत क्षेत्र को पर्यटन स्थल में बदले जाने के विरोध ने भी पूरे देश का ध्यान खींचा है । केंद्रीय सरकार ने जैनियों की आस्था को समझते हुए झारखंड सरकार के फैसले पर रोक लगा दी हैं। ऐसे मुहिमों की आज आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि हमारे तीर्थ और धार्मिक संकल्पनाए अपनी केंद्रीय धुरी से उत्तर कर नाचते गाते पिकनिक, स्पोटों और मौज मस्ती तक सीमित न रह जाए ।
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