महाकवि जयशंकर प्रसाद जी ने महाप्रलय के बाद का दृश्य कामायनी में प्रकट करते हुए लिखा था –
“हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर,
बैठ शिला की शीतल छाँह
एक पुरुष, भीगे नयनों से
देख रहा था प्रलय प्रवाह ।
नीचे जल था ऊपर हिम था,
एक तरल था एक सघन,
एक तत्व की ही प्रधानता
कहो उसे जड़ या चेतन “
केन्या के बैरिंगो झील से कुछ समय पूर्व आ रही तस्वीरें जयशंकर प्रसाद जी की कविता के साक्षात चित्र सामने रख देती है। आज बैरिंगों झील का जलस्तर बढ़ता जा रहा है । मलेरिया,टाइफाइड, आदि संक्रामक रोगों से जन,जंगल,जमीन और जानवरों का संघर्ष लगातार जारी है । कमोबेश यही स्थिति ऑस्ट्रेलिया और हवाई द्वीप के बीच स्थित तुवालु समूहों भी देखने को मिल रही है जो लंबे समय से जलवायु परिवर्तन और बढ़ते समुद्र के स्तर के जोखिमों का सामना कर रहे हैं। उच्च ज्वार की स्थिति में तुवाल समूहों के 40% क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं और यह संभावना है कि सदी के अंत तक पूरे देश के पानी के नीचे होने का अनुमान है। तुवालुवासी तटीय क्षेत्रों में रहते हैं, इसलिए पहले से ही कमजोर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाला जा रहा है। इसी प्रकार की स्थिति दक्षिण प्रशांत में लगभग 1,000 द्वीपों और एटोल के एक समूह सोलोमन द्वीप की है जो धीरे-धीरे समुद्र के जलस्तर से काबिज होता जा रहा है।
समुद्रीय जलस्तर में वृद्धि सम्पूर्ण विश्व को अपनी विभीषिका में समेट लेने वाले घटना है । तेजी।से होते जलवायु परिवर्तन से समुद्रीय जलस्तर वृद्धि की घटनाओं में वृद्धि हुई है । समुद्रीय जल स्तर में वृद्धि के स्वरूप तटीय पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण, तूफान की तीव्रता और बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि होती है। इससे भूजल के संदूषण का भी खतरा बना रहता है और खाद्य सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। समुद्रीय जलस्तर में वृद्धि से भारत जैसे लंबी तटरेखा वाले देशों में विपरीत परिस्थितियां जन्म लेंगी इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती । इस संदर्भ में कुछ प्रमुख आंकड़ों पर गौर करना आवश्यक हो जाता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार वर्ष 2000 से वर्ष 2019 की समयावधि में प्राकृतिक त्रासदियों की संख्या लगभग 3500 रही हैं । पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच दशकों में भारतीय तट के आसपास समुद्र का स्तर औसतन 1.7 मिमी प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बंगाल की खाड़ी में समुद्र के स्तर में वृद्धि अरब सागर से अधिक है। समुद्र के स्तर में यह वृद्धि जहां तटीय कटाव और विशाल परिस्थितिकी परिवर्तन को जन्म दे सकती है वहीं संसाधनों में विकृति भी उत्पन्न कर सकती है । बाढ़ और खारे पानी के आक्रमण से मनुष्य के साथ साथ समुद्री जीवन में भी उत्पन्न अस्थिरता , कई जीवों के अस्तित्व पर भी संकट डाल सकती है। संवेदनशील हिंदुकश पर्वत श्रृंखलाओ में वर्ष 1950 से वर्ष 2014 तक 1.3 डिग्री तापमान वृद्धि देखी गई है ।
विश्व मौसम संगठन की हालिया प्रकाशित रिपोर्ट में यह बताया गया है कि वर्ष 2013 से वर्ष 2022 के मध्य समुद्री जल स्तर का विस्तार 4.5 मिलीमीटर तक हुआ है जो कि वर्ष 1900 से वर्ष 1970 के बीच हुए विस्तार से लगभग तीन गुना है । समुद्र के स्तर में वृद्धि की औसत दर वर्ष 1901 और वर्ष 1971 के बीच प्रति वर्ष 1.3 मिमी से बढ़कर वर्ष 1971 और वर्ष 2006 के बीच 1.9 मिमी प्रति वर्ष हो गई। विश्व मौसम संगठन के अनुसार, वर्ष 2013 और वर्ष 2022 के बीच समुद्र के स्तर में प्रति वर्ष 4.5 मिमी की वृद्धि हुई है।
इस रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित न रखा गया तो अगले 2000 वर्षों में वैश्विक औसत समुद्र-स्तर 2 से 3 मीटर तक बढ़ जाएगा । यहां यह तथ्य ध्यातव्य है कि वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्यों के साथ चलने पर सुमद्रजल स्तर में 2 से 6 मीटर की वृद्धि की संभावना है जोकि विलोपन का प्रमुख खतरा है । अतः ऐसे में हमारा ध्यान वैश्विक भू ताप को 1.5 डिग्री तक सीमित करना चाहिए । वैश्विक समुद्रीय जल स्तर वृद्धि और परिणाम रिपोर्ट के अनुसार लंबी तटीय संरचना एवं तटीय जनसंख्या वाले देश भारत, नीदरलैंड, बांग्लादेश, चीन आदि के साथ साथ निचले स्तर के छोटे छोटे द्वीपों पर समुद्री जलस्तर बढ़ने का सर्वाधिक खतरा रहेगा । यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब पेरिस जलवायु समझौते के अंतर्गत
पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से कम करने और अधिमानतः इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लक्ष्य के साथ विश्व के अलग अलग देश साथ चल रहे हैं। जिसे वर्ष 2030 तक प्राप्त किया जाना हैं
आईपीसीसी की जलवायु परिवर्तन 2021 की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि हिंद महासागर के दक्षिण पश्चिमी हिस्से में वैश्विक अनुपात से भी ज्यादा जलस्तर वृद्धि की घटनाएं सामने आ रही हैं ।
बढ़ते समुद्र का स्तर तटीय पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण का कारण बनता है, तूफान की तीव्रता और बाढ़ की तीव्रता बिगड़ती है। वे मिट्टी और भूजल के संदूषण का कारण भी बन सकते हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा पर और नकरात्मक प्रभाव पड़ सकता है । जलस्तर वृद्धि से उत्पन्न लवणता मत्स्य उत्पादन को भी प्रभावित कर सकती है ।
भारत सरकार ने समुद्र के स्तर में वृद्धि के मुद्दे से निपटने के लिए कई पहल की हैं, जिसमें जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना का विकास, तटीय क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम का निर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना शामिल है। हालाँकि, भारत में समुद्र के स्तर में वृद्धि के प्रभावों को कम करने के लिए और अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
भारत ने जलवायु परिवर्तन पर एक व्यापक राष्ट्रीय कार्य योजना विकसित की है, जिसमें आठ राष्ट्रीय मिशन शामिल हैं, जिनमें से एक टिकाऊ आवास और तटीय प्रबंधन पर केंद्रित है।
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2019 में तटीय क्षेत्रों के सतत विकास और प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए तटीय क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम का उद्देश्य तटीय समुदायों के लचीलेपन में सुधार करना, आजीविका के अवसरों में वृद्धि करना और तटीय पर्यावरण की रक्षा करना है। भारत सरकार ने 2030 तक 450 गीगावाट अक्षय ऊर्जा पैदा करने का लक्ष्य भी इसी संदर्भ में रखा है। अक्षय ऊर्जा की ओर यह बदलाव जीवाश्म ईंधन पर भारत की निर्भरता को कम करेगा और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी कम करेगा।
भारत सरकार ने समुद्र तट को कटाव से बचाने और बड़ते जलस्तर से मीठे पानी के स्रोतों में खारे पानी की मिलावट को रोकने के लिए मैंग्रोव संरक्षण परियोजनाएं भी शुरू की हैं। सरकार ने कमजोर तटीय क्षेत्रों को कटाव और बाढ़ से बचाने के लिए समुद्र की दीवारों, घाटियों और ब्रेकवाटर के निर्माण सहित कई तटीय संरक्षण और बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाओ की भी तरफ कदम बढ़ाने शुरू किए हैं।
वस्तुतः इतने संवेदनशील वैश्विक विषय पर सभी देशों को अपने यहां किए जा रहे अनुसंधानों,प्रयोगों को दूसरे देशों के साथ भी साझा करने की आवश्यकता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जर्नल नेचर में हाल ही में ज्कोशवन ( ग्रीनलैंड) में 100 मी. लंबे बांध निर्माण संबंधी प्रस्ताव भी सामने रखे हैं । आर्कटिक के गलते हिमनदों के जल से बनी कृत्रिम झीलों की योजना पर यूके, जर्मनी आदि राष्ट्र कार्य कर रहे हैं । वैश्विक भू तापन को रोकने के लिए कृत्रिम स्नो कवर, एरोसोल छिड़काव,और जियोइंजीनियरिंग के नवोन्मेषी प्रयोगों के लिए एक मंच पर आने की आज आवश्यकता है ।
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