जय प्रकाश पाण्डेय
प्रोपेगेंडा' भारतीय राजनीति की वर्तमान आधारशिला बनता जा रहा है और भारतीय राजनीति अफवाहों के कलेवर में सड़कों में लग रहे जाम और नारों के बीच आगे बढ़ रही है जबकि भारत का लोकतंत्र अंतिम छोर में विकास और उत्थान के लिए संकल्पित जीवन अर्पण करने वाले व्यक्तियों को राष्ट्रपति के रूप में स्थापित करते हुए आगे बढ़ रहा है । दोनों के बीच बुनियादी फर्क साफ है । भारत का विपक्ष आज महज अफवाहों के ब्रांड अंबेडसर के रूप में स्थापित होते जा रहे हैं और सत्ता पक्ष लोकतंत्र को उसके गंतव्य तक पहुंचाने वाले साधन के रूप में ।
आज वर्ष 2022 में पहुंचकर , अतीत के 8 सालों को देखते हैं और भ्रष्टाचारियों,अर्बन नक्सलियों और असामाजिक तत्वों की खबरों को देखते हैं तो समझ आता है क्यों एक पूरा कुनबा इस विचारधारा को हराने के पीछे लग गया । विदेशी फंडिंग प्राप्त एनजीओ की कार्यशैली के नियमन संबंधी कानून हों ,भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कार्यवाही हो या फिर नक्सल प्रभावित राज्यों में अमन के साथ विकास के उपाय या फिर राष्ट्र विकास के कार्य , जिनके सरोकार प्रभावित होने वाले थे, अग्रिम पंक्ति में खड़े नारेबाज और आलोचक यही थे । शायद ये प्राध्यापकों, बुद्धिजीवियों, भ्रष्ट नेताओं का वर्ग इतना दूरगामी था कि इनको पता था देश में भारतीय जनता पार्टी के शासन का अर्थ । आज फेसबुकिया क्रांति करते ये लोग अभी भी पाए जाते हैं और अपनी असफल योजनाओं, प्रशासनिक अक्षमताओं को छुपाने में अनवरत रूप से संलग्न हैं ।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुख्यधारा के सभी मीडिया चैनलों ने वर्ष 2013 के उत्तरार्ध से ही जिसका प्रमुखता से मीडिया ट्रायल किया और प्रबुद्ध विचारकों ने जिसके विपक्ष में कहानियां,उपन्यास लिख डाले , बड़े बड़े शायरों ने शेर बना डाले ऐसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विशेष जांच दल द्वारा क्लीन चिट दी गई थी । उसके विपक्ष में दायर याचिका को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभी हाल में खारिज कर दिया गया है लेकिन जिस फर्जीवाड़े और नकारात्मकता का माहौल तथाकथित मुख्यधारा के चैनलों,बुद्धिजीवियों,विपक्ष के नेताओं द्वारा पहले बनाया गया था उसकी क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती ।
आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही नहीं,देश के गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा अन्य राष्ट्रवादी नेताओं की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया गया। इस प्रयास में सूचना के सभी तंत्र संलग्न रहे । यह पूरी प्रक्रिया पूर्व निर्धारित योजना से चलती । पहले मानव हत्यारे,और मानवीय संवेदनाओं को स्पर्श करने वाले नाम घोषित किये जाते और फिर पूरे देश में नकारात्मकता का और डर का माहौल तैयार किया जाता ।
देश के गृह मंत्री श्री अमित शाह के लिए तो आम जनता के सम्मुख नकारात्मकता का वह अंबार लगाया गया जो तब ध्वस्त हुआ जब गृहमंत्री ने वर्ष 2017 में संसद में अपनी बातों को रखना शुरू किया । जिस तार्किकता, स्पष्टता और दृढ़ता से राष्ट्रीय महत्व के सभी विषयों पर उन्होंने स्टैंड लिया है वह काबिले तारीफ है ।
उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के संदर्भ में भी ऐसे दुष्प्रचारों को जो हवा दी गई वह भी तब स्पष्ट हुई जब स्वयं गोरखधाम के मुस्लिम समुदाय ने योगी आदित्यनाथ के समर्थन में वास्तविक तथ्यों को रखना शुरू किया ।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि क्योंकि नागरिकों को यह समझना होगा कानूनी लंबित वादों के संबंध में मीडिया ट्रायल और तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा बयान, विचार तो दिए जा सकते हैं लेकिन कानूनी प्रक्रिया में फंसे व्यक्ति के सामने कानूनी प्रक्रिया का हवाला देना ही विकल्प बचता है क्योंकि यह कानूनी और संवैधानिक बाध्यता बन जाती है । इसी का फायदा पत्रकारिता से लेकर विश्विद्यालयों के प्राध्यापकों ने जमकर उठाया । और मानवीयता के उस क्षरण बिंदु पर लाके खड़ा किया जहां अफवाहों,मनगढ़ंत तथ्यों के आधार पर मीडिया ट्रायल किया जाने लगा ।
वर्ष 2013 के उत्तरार्ध से अभी तक राष्ट्रीय नीतियों के मामलों पर विपक्ष को आप दुष्प्रचार में ज्यादा लगा हुआ पाते हैं । इसी दुष्प्रचार के तहत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रति वैचारिक वैमनस्य के बीज आम छात्रों और आम जनमानस के बीच भरने शुरू हुए । मसलन बंगाल हिंसा और केरल में स्वयंसेवकों की हत्या करने वाली सरकारों के हिमायती और अवसरों पर अपनी सुविधा से मुंह खोलने वाले प्राध्यापकों,लेखकों और बुद्धिजीवीयों द्वारा आजादी के आंदोलन और अतिवादियों के साथ संघ के तार जोड़ने की कोशिश हुई । सब बिना तथ्यों,और प्रमाणों के । संघ के विचारों को मनमाफिक इन मीडिया चैनलों ने परोसा और एक बड़ा वर्ग इस साजिश को समझ नहीं पाया ।
अवार्ड वापसी गैंग, मॉब लिंचिंग,कलबुर्गी सरीखे विद्वानों की हत्या, गोकशी, नागरिकता अधिनियम, धारा 370 , रोहिंग्या विवाद और कृषि विधेयक इन सभी घटनाओं के आलोक में वर्ष 2014 से अभी तक के भारत को देखेंगे तो हम पाएंगे देश में संसद को छोड़कर हर जगह जनता को बरगलाने का, विरोध का और अधूरी जानकारियों को फैलाने का माहौल तैयार किया जा रहा है ।
संसद में यह स्थिति पैदा करने के लिए विपक्ष के पास जनादेश नहीं है और स्वस्थ विमर्श तो विपक्ष की सोच से परे है। ऐसे में माहौल के निर्माणकर्ताओं का चरित्र और व्यक्तित्व दोनों धीरे धीरे बाहर आ रहा है । गत दिनों पूर्व हुई कुछ गिरफ्तारियों को भी इन अफवाहों के सृजनकर्ता की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है । ऐसे माहौल के सृजनकर्ताओं ने मानों मन में ठाना है कि इफ यू कांट कन्वींस दैन कन्फ्यूज् ( यदि आप भरोसे में नही ले सकते तो असमंजस में डाल दें) और देश के नागरिक अपने जीवन की आपाधापी के बाद इन्हीं विषयों में विमर्श में लगे हैं जबकि यह ऐसा दशक होने जा रहा है जो भारत के गौरवमयी इतिहास और स्वर्णिम भविष्य को विश्वमंच में स्थापित करता दिख रहा है। । शेष बचे विमर्श को संसद में बैठे विपक्ष के वकील सांसद पूरा कर देते हैं जिनको तोड़ने मरोड़ने और जोड़ने की विशेषज्ञता होती है । खाली खजानों के बाद भी देश में हो रहे अनगिनत विकास के कार्यों को प्रिंट मीडिया और सोशल साइट्स में विरले ही जगह मिली है । मिर्च मसालेदार आधे अधूरे तथ्यों को ही खबर बनाने की होड़ ने भारत को नुकसान पहुंचाया है जिस पर विवेचना अत्यंत आवश्यक है।
भारत ने विश्व के अन्य प्रमुख देशों के सामने भी खुद को सशक्तता के साथ आज स्थापित किया है लेकिन राजनीतिक अखाड़े ने भारत में आए बदलाव पर विमर्शों को मौन कर दिया क्योंकि भले ही सरकार भारतीय जनता पार्टी की हो अभी भी ऐसी कई दीमकें प्रणाली में विद्यमान हैं जो प्रजातंत्र की सफलता में बाधक हैं। ये वहीं दीमकें हैं जिन्होंने न समय पर आतंकवाद के निस्तारण के लिए प्रायोगिक योजनाएं बनाई न ही समय से प्रतियोगी परीक्षाएं करवाई । न ही सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास कार्य किया न ही लक्षद्वीप सरीखे संभावनाओं के द्वारों में पर्यटन संभावनाओं को खोज की । न ही नक्सलवाद को नियंत्रित करने के लिए नीतियां बनाई और न ही पूर्वोत्तर भारत को मुख्यधारा में लाने के प्रयास किए । कोशिशें अब ऐसे दीमकों से बचने की होने चाहिए ।
इस तरह दुस्प्रचारों के दौर से निकलकर, अफवाहों के बाजार से हम धीरे धीरे बाहर आ रहे हैं लेकिन सिस्टम को खोखला बनाने वाली दीमकों का चिन्हीकरण आवश्यक है । वर्ष 2014 से अभी तक के भारत के स्वर्णमयी यात्रा को प्रत्येक नागरिक ने अपने स्वतंत्र इंद्रियों से ग्रहण करना होगा।
दरअसल अफवाहें, दुष्प्रचार अपने साथ सत्य को दबाए रखते हैं और हम यह तब समझ पाते हैं जब ऐसी अफवाहें और दुष्प्रचार अपना कारनामा कर चुकी होती हैं ।
आज देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और स्वयं आदरणीय सर संघचालक जी द्वारा भी इन अफवाहों को विभिन्न माध्यमों से नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है और सकारात्मकता की तरफ समाज को ले जाने के प्रयास किए गए हैं लेकिन फेसबुकिया क्रांतिकारियों को इन विचारों को सुनने समझने और देखने की फुरसत नहीं ।
कश्मीर समस्या हल, नागरिकता अधिनियम,नोटबंदी,जीएसटी,आतंक निरोधी अधिनियम,और असामाजिक तत्वों से निपटान करती यह सरकार दृढ़ता के उस स्तर को दिखाती है जो लोकतंत्र का आधार है । जनतंत्र में सामाजिक जागरूकता लाना भी आदर्श नागरिक का कर्तव्य है और ऐसी सामाजिक जागरूकता राजनैतिक जागरूकता का मार्ग प्रशस्त करेगी इसी उम्मीद के साथ हमें जागरूकता के दूत बनने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा ।
लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं ।
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