सोमवार, 12 सितंबर 2022

इफ यू कांट कन्वींस दैन कन्फ्यूज्

 

जय प्रकाश पांडेय 




अवार्ड वापसी गैंग, मॉब लिंचिंग,कलबुर्गी सरीखे विद्वानों की हत्या, गोकशी, नागरिकता अधिनियम, धारा 370 , रोहिंग्या विवाद और कृषि विधेयक इन सभी घटनाओं के आलोक में वर्ष 2014 से अभी तक के भारत को देखेंगे तो हम पाएंगे देश में संसद को छोड़कर हर जगह जनता को बरगलाने का, असमंजस में डालने का माहौल तैयार किया जा रहा है । संसद में विपक्ष के पास यह स्थिति पैदा करने के लिए जनादेश नहीं है और स्वस्थ विमर्श तो विपक्ष की सोच से भी परे है। ऐसे में माहौल के निर्माणकर्ताओं का चरित्र और व्यक्तित्व दोनों धीरे धीरे बाहर आ रहा है । गत दिनों पूर्व हुई कुछ गिरफ्तारियों को भी इन अफवाहों के सृजनकर्ता की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है । ऐसे माहौल के सृजनकर्ताओं ने मानों मन में ठाना है कि इफ यू कांट कन्वींस दैन कन्फ्यूज् ( यदि आप भरोसे में नही ले सकते तो असमंजस में डाल दें) और देश के नागरिक अपने जीवन की आपाधापी के बाद इन्हीं विषयों में विमर्श में लगे हैं जबकि यह ऐसा दशक होने जा रहा है जो भारत के गौरवमयी इतिहास और स्वर्णिम भविष्य को विश्वमंच में स्थापित करता दिख रहा है । खाली खजानों के बाद भी देश में हो रहे अनगिनत विकास के कार्यों को प्रिंट मीडिया और सोशल साइट्स में विरले ही जगह मिली है । मिर्च मसालेदार आधे अधूरे तथ्यों को ही खबर बनाने की होड़ ने भारत को नुकसान पहुंचाया है जिस पर विवेचना अत्यंत आवश्यक है। 


 वर्ष 2014 के बाद विभिन्न राष्ट्रीय पुरस्कारों से लेकर प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कारों में समाज के आखिरी छोर में खड़े निस्वार्थ , कर्तव्यबद्धता से कार्य करते अनसुने नाम,अनदेखे चेहरों जैसी पहचान इन विगत 8 वर्षों में दी गई क्या वह आजाद भारत के नागरिकों को कभी इतने व्यापक ढंग से मिली थी ? क्या अंत्योदय की अवधारणा का जो जमीनी खाका वर्तमान सरकार ने प्रस्तुत किया वह इससे पहले कभी हुआ था ?


 वर्ष 2014 के बाद देश के शीर्ष नेतृत्व ने निर्णयों को मजबूती और दृढ़ता से लेने का जो क्रम विकसित किया , उसकी उपस्थिति का एहसास भारतवासियों ने ही नहीं बल्कि विदेशों के जनसमुदाय ने भी किया है । आज भारत ने विश्व के अन्य प्रमुख देशों के सामने भी खुद को सशक्तता के साथ स्थापित किया है लेकिन राजनीतिक अखाड़े ने भारत में आए बदलाव पर विमर्शों को मौन कर दिया क्योंकि भले ही सरकार भारतीय जनता पार्टी की हो अभी भी ऐसी कई दीमकें प्रणाली में विद्यमान हैं जो प्रजातंत्र की सफलता में बाधक हैं। ये वहीं दीमकें हैं जिन्होंने न समय पर आतंकवाद के निस्तारण के लिए प्रायोगिक योजनाएं बनाई न ही समय से प्रतियोगी परीक्षाएं करवाई । न ही जहां प्रतियोगी परीक्षाएं करवाई वहां पर्चे लीक होने की संभावना रखी । न ही पूर्वोत्तर में विकास का कार्य किया न ही लक्षद्वीप में पर्यटन संभावनाओं को खोज । कोशिशें अब ऐसे दीमकों से बचने की होने चाहिए 


भारत का लोकतंत्र अंतिम छोर में विकास और उत्थान के लिए संकल्पित जीवन अर्पण करने वाले व्यक्तियों को राष्ट्रपति के रूप में स्थापित करते हुए आगे बढ़ रहा है ।  


मुझे अच्छे से याद है वर्ष 2014 के जनवरी के ठंड के दिन थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट्स फैकल्टी में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के नीचे खड़े होकर प्राध्यापक, रिसर्च स्कॉलर, भविष्य के अस्थाई सहायक प्राध्यापक नरेंद्र दामोदरदास मोदी नामक शख्स को गुजरात नरसंहार का करता घोषित कर रहे थे । इस बात से बेखबर की प्रोपेगेंडा की ताबूत में अंतिम कील ठोकने यही नरेंद्र दामोदरदास मोदी आ रहा है जिसे पूरे भारतीय जनमानस ने अपना सर्वाधिक लोकप्रिय नेता चुनकर 2014 में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित किया न सिर्फ स्थापित किया बल्कि उसके कार्यों और संकल्पों को दृष्टिगत करते हुए 2019 में पुनः जनादेश दिया । मानवतावाद के छद्म प्रहरीयों द्वारा मानवता के आलोक में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री न बनाए जाने देने की अपील बस भीड़ की अपील बन गई । 


आदरणीय नरेंद्र मोदी ही नहीं,अमित शाह, योगी आदित्यनाथ तथा अन्य राष्ट्रवादी नेताओं की छवि को धूमिल करने का सुनियोजित प्रयास किया गया। इस प्रयास में सूचना के सभी तंत्र संलग्न रहे । यह पूरी प्रक्रिया पूर्व निर्धारित योजना से चलती । पहले मानव हत्यारे,और मानवीय संवेदनाओं को स्पर्श करने वाले नाम घोषित किये जाते और फिर पूरे देश में नकारात्मकता का और डर का माहौल तैयार किया जाता । इन बातों को भोले भाले आम लोग और छात्र सच मानते । उनके परम आदरणीयों द्वारा जो हाथों में तख्ती लेकर यह प्रोपोगैंडा चलाया गया । दिल्ली विश्वविद्यालय में एनडीटीएफ ( दक्षिणपंथी ) के अग्रिम पंक्तियों के प्राध्यापकों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर प्राध्यापक भी अपनी विचारधारा अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त नहीं कर सकते थे ,मजबूरी थी 12 सालों से शोषणकारी तंत्र का भाग जो बन गए थे । मजबूरी थी और मजबूरी तो क्या-क्या करा देती है फिर यह तो स्थाई नौकरी से जुड़ा मसला था। लेकिन एनडीटीएफ के अग्रिम पंक्ति के उपरोक्त प्राध्यापकों ने जरूर एक स्वस्थ विमर्श को आकार दिया और ऐसे में स्वामी विवेकानंद की स्मारक के नीचे उपरोक्त जमावड़े के समानांतर ही नारों और विरोधों की आवाजें बुलंद होने लगी जो विकास के विजन पर बात कर रही थी । 


गुजरता दंगों का जिक्र होना और गोधरा ट्रेन को विषय से ही हटा देना , गुजरात की समृद्धता के ऐतिहासिक आधार खोजना और तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने की कोशिशों को ऐसे नारों और विमर्शों से कुछ विराम मिला । ठंड के उन दिनों में कुछेक लोग इन तथाकथिक समाज सुधारकों से प्रश्न पूछने का साहस भी करते थे यह वो लोग थे जो जानते थे कि तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर विचारधाराओं को कुचलने और निरीह जनता को भ्रामक स्थिति में डालने के लिए यह सब किया जा रहा है । वैसे भी अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद यह निरीह वर्ग भी अनजाने में ही राजनीतिक विचारों का वाहक बन गया था । सॉफ्ट टारगेट की इस नीति को कमोबेश पूरे भारत में पैदा करने का प्रयत्न किया गया लेकिन पूर्ववर्ती सत्ताधारी कांग्रेस को पता था उनका जमीनी आधार कुछ नहीं रहा है और युवाओं के अंदर एक नये शख्स का नाम घर कर चुका है और वह है नरेंद्र मोदी । इन युवाओं की चर्चा के केंद्र में गुजरात मॉडल, कॉमनवेल्थ घोटाले कॉल घोटाला,कश्मीर से आतंकवाद और विकास मुख्य विषय थे।  

 

वर्ष 2014 से अभी तक राष्ट्रीय नीतियों के मामलों पर विपक्ष को आप दुष्प्रचार में ज्यादा लगा हुआ पाते हैं । इसी दुष्प्रचार के तहत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रति वैचारिक वैमनस्य के बीज आम छात्रों के बीच भरने भरने शुरू हुए । मसलन बंगाल हिंसा और केरल में स्वयंसेवकों की हत्या करने वाली सरकारों के हिमायती और अवसरों पर अपनी सुविधा से मुंह खोलने वाले प्राध्यापकों,लेखकों और बुद्धिजीवीयों द्वारा आजादी के आंदोलन और अतिवादियों के साथ संघ के तार जोड़ने की कोशिश हुई । सब बिना तथ्यों,और प्रमाणों के । संघ के विचारों को मनमाफिक इन मीडिया चैनलों ने परोसा और एक बड़ा वर्ग इस साजिश को समझ नहीं पाया । इसी वैचारिक अधीनता के साथ विश्विद्यालय में शिक्षा का प्रचार प्रसार होता था । 



मीडिया चैनलों, पत्र पत्रिकाओं में चयनित आधार पर पत्रकारिता का कार्य होता रहा और तमाम विषयों को छोड़ दिया जाता जो अन्य राज्यों में हो रही हों फिर चाहे वह केरल में बेरहमी से मारे जा रहे स्वयंसेवकों के संबंध में हो या गुड़गांव , मुंबई में लाउडस्पीकरों के संबंध में या मॉब लांचिंग ,या फिर बंगाल,यूपी या दिल्ली दंगों में हुई हिंसा। 


देश के गृह मंत्री श्री अमित शाह भी इससे अछूते नहीं रहे । उनके लिए तो आम जनता के सम्मुख नकारात्मकता का वह अंबार लगाया गया जो तब ध्वस्त हुआ जब गृहमंत्री ने वर्ष 2017 में संसद में अपनी बातों को रखना शुरू किया । जिस तार्किकता और दृढ़ता से राष्ट्रीय महत्व के सभी विषयों पर उन्होंने स्टैंड लिया है वह काबिले तारीफ है । योगी आदित्यनाथ के संदर्भ में भी ऐसे दुष्प्रचारों को जो हवा दी गई वह भी तब स्पष्ट हुई जब स्वयं गोरखधाम के मुस्लिम समुदाय ने योगी आदित्यनाथ के समर्थन में वास्तविक तथ्यों को रखना शुरू किया ।


इस तरह दुस्प्रचारों के दौर से निकलकर, अफवाहों के बाजार से हम धीरे धीरे बाहर आ रहे हैं लेकिन सिस्टम को खोखला बनाने वाली दीमकों का चिन्हीकरण आवश्यक है । वर्ष 2014 से अभी तक के भारत के स्वर्णमयी यात्रा को प्रत्येक नागरिक ने अपने स्वतंत्र इंद्रियों से ग्रहण करना होगा। कश्मीर समस्या हल, नागरिकता अधिनियम,नोटबंदी,जीएसटी,आतंक निरोधी अधिनियम,और असामाजिक तत्वों से निपटान करती यह सरकार दृढ़ता के उस स्तर को दिखाती है जो लोकतंत्र का आधार है । जनतंत्र में सामाजिक जागरूकता लाना भी आदर्श नागरिक का कर्तव्य है और ऐसी सामाजिक जागरूकता राजनैतिक जागरूकता का मार्ग प्रशस्त करेगी वो दिन दूर नहीं ।


जय प्रकाश , सामाजिक कार्यकर्ता,और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं । वर्तमान में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं । इससे पूर्व बैंक अधिकारी एवं पूर्व महासचिव, किरोड़ीमल महाविद्यालय -दिल्ली विश्वविद्यालय रहे हैं ।

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