मंगलवार, 13 सितंबर 2022

अपनी भाषा ,अपना देश

 



कह दो दुनियावालों से गांधी अंग्रेजी भूल चुका है ”... आजादी के बाद बीबीसी में दिए गए वक्तव्य में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा कहे ये शब्द आजादी के बाद गांधी जी के मानस पुत्रों ने विस्मृत कर दिए | गांधी जी के संदेशों को पूरे भारत में प्रचारित-प्रसारित किया गया लेकिन राष्ट्रपिता की हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने की इच्छा राजनीतिक गलियारों तक सीमित रह गयी | आजाद भारत में अपने ही लोगों में हिंदी भाषा गुलाम बनकर रह गयी | आजादी के बाद राजभाषा हिंदी के विकास के लिए और राष्ट्रभाषा बनाने के लिए जो प्रयास होने चाहिए थे वो प्रयास राजनीति की भेंट चढ़ गए ।



हिंदी हमारी अस्मिता की प्रतीक है | हिन्दी 150 वर्षों के औपनिवेशक शासन के विरोध में उदयमान भारत को स्वाधीनता दिलाने में अपना प्राणोत्सर्ग करने वाले उन करोड़ों व्यक्तित्वों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का माध्यम है जिन्होंने हिंदी को ही स्वाधीनता आन्दोलन की भाषा बनाया था | यह भी सत्य है कि हमारे दैनिक जीवन में अंग्रेजी पिछले दरवाजे से बहुत पहले ही घुसपैठ कर चुकी है | आज कई उदाहरण ऐसे देखे जा सकते हैं जहाँ समाज का एक तबका अंग्रेजी की इन्द्रधनुषीय सीढी इसलिए चढ़ता है कि उसको अंग्रेजी को अंगीकार करने में अपना सामाजिक स्टेटस बढता हुआ दिखाई देता है| यदि यह तबका हिंदी के महत्व को अपने स्टेटस से जोड़ने की कोशिश करे तो वह समझ जाएगा कि हिंदी भाषा एक पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है जिसमें जैसा उच्चारण है वैसा ही लिखा जाता है | ढाई से तीन लाख शब्दों के भण्डार को हिंदी भाषा अपने में समेटे हुए है | विश्वभाषा होते हुए भी आज हिंदी भाषा हीन भावना से ग्रसित है | आज विश्व के सभी देशों में हिंदी बोली जाती है | हिंदी में प्रकाशित होने वाली पत्र पत्रिकाओं की संख्या सर्वाधिक है | 


अंग्रेज कवि स्पेंडर ने कहा था– दुनिया की सबसे समृद्ध भाषा होते हुए भी भारत के लोग अंग्रेजी के पीछे क्यों पड़े हैं ? इसका एक जवाब था– रोजगार | भूमंडलीकरण के बाद हवाहवाई बातों का जो दौर चला उसमे एक प्रमुख हवाहवाई बात थी रोजगार के लिए अंग्रेजी की आवश्यकता और कहीं न कहीं इसके लिए पाश्चात्य देशों की वह सोच काम कर रही थी जिन्हें यहाँ आकर व्यापार करना था | उन्होंने अपनी सुविधानुसार देश की सोच को बदलने का प्रयास किया | भूमंडलीकरण के इतने साल बाद भी इस अंग्रेजी ने वास्तव में क्या हमको रोजगार दिया ? क्या किसान को मजदूर में तब्दील होने से रोक पाया ? क्या अंग्रेजी का वह स्तर वास्तव में हम पा पाए जिसके लिए हमने इतनी मेहनत की । हां यह जरूर है इसने इस देश के भीतर इंडिया और भारत दो वर्गों की स्थापना करने में जरूर योगदान दिया । देखिये, बात स्पष्ट है पूर्वाग्रह के आधार पर बातें करने का जमाना लद गया है और शायद भारत सरकार द्वारा प्रकाशित आर्थिक सर्वेक्षण भी इसकी ही एक बानगी प्रस्तुत करता है, इसमें उल्लेखित है कि वर्तमान भारत को दो भागों में देखा जा सकता है | प्रथम ऐसे राज्य जहाँ विकास का उच्च स्तर प्राप्त किया जा चूका है लेकिन जहाँ युवा जनसंख्या तेजी से कम हो रही है | इन राज्यों में तमिलनाडु,कर्नाटक,बंगाल आदि शामिल हैं | वहीँ दूसरे वो राज्य जहाँ विकास का अभी पदार्पण हुआ है और जहाँ की अधिकाँश जनसँख्या युवा है | यह हिंदी के लिए एक अच्छा संकेत है क्योंकि हिंदी भाषी राज्य दूसरी श्रेणी में आते हैं | 


आज भारत में आने वाला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रायः दक्कन क्षेत्र तक प्राथमिकता पाता है | ऐसे में बदलते भारत के तस्वीर हिंदी भाषी राज्यों पर निर्भर करेगी, इसमें कोई दो मत नहीं | ध्यातव्य है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का नाममात्र इन हिंदी भाषी राज्यों में आता है लेकिन जिस तरह की जनसांख्यकी लाभ इन राज्यों को भविष्य में मिलने वाला है ऐसे में हिंदी भाषा को व्यापार की भाषा के रूप में अपनाकर ये राज्य समावेशी विकास की अवधारणा में खरे उतर सकते हैं | 


अगर हम विदेश की भाषा अंग्रेजी से इतने प्रेरित है, तो क्यों हम चीन, जापान जैसे विकसित और अत्यंत संपन्न देशों से प्रेरणा नहीं लेते हैं? जहाँ लोग केवल और केवल अपनी भाषा में बात करते हैं, कार्य करते हैं जरूरत पड़ने पर अनुवादकों का उपयोग करते हैं और किसी भी मामले में किसी अन्य देश से अपने आपको पिछड़ा महसूस नहीं करते| इन देशों में ना केवल लोग बल्कि इनके जन प्रतिनिधि भी विश्व के किसी भी मंच से अपनी भाषा में ही बात करते हैं तथा अन्य देशों से संवाद करते हैं| अन्य देशों से चीन, जापान में जाकर रोजगार पाने वाले लोगों के लिए इन देशों की भाषा सीखना अनिवार्य होता है, क्यूंकि वे लोग अंगेजी को बैसाखी बनाकर नहीं जी रहे हैं| जिसे इन देशों से व्यापार, व्यवसाय या अन्य सम्बन्ध रखने हों, वो स्वयं द्विभाषक व्यक्तियों या अन्य यंत्रों के माध्यम से इनकी भाषा समझकर अपना अर्थ सिद्ध करते हैं| आज भारत विश्व पटल पर निवेश और व्यापार के प्रयोजन से अत्यंत महत्वपूर्ण देश बन चुका है| गुणवत्ता, मूल्य, और उपलब्धता का संगम जब हिंदी भाषा के साथ होगा और यदि हम भी यही सोच और नीति अपनाएंगे तो हम ना केवल अपने देश बल्कि अन्य देशों के लोगों को भी हिन्दी सीखने, समझने के लिए बाध्य कर सकते हैं|


यदि अभी से विधि सम्बन्धी दस्तावेजों, पाठ्य पुस्तकों,तकनीकी पुस्तकों, विज्ञान की पुस्तकों के अनुवाद से लेकर पुस्तकों की उपलब्धता की तरफ प्रयास करें तो आने वाले 5-10 वर्षों में हम उस स्थिति में पहुंच पाएंगे जहां व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता अनुसार कम से कम अध्ययन की सुविधा हेतु स्वतंत्त्रापूर्वक भाषा का चयन कर सकेगा । विगत वर्षों में तकनीकी शिक्षा,अभियांत्रिकी शिक्षा को भी हिंदी में प्रदान करने के उद्देश्य से अखिल भारत स्तर पर कुछ अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) महाविद्यालयों में हिंदी माध्यम में पढ़ाई करवाने की प्रशंसनीय पहल की जा रही है । हमें सम्मिलित रूप से यह प्रयास करने चाहिए कि देश की विभिन्न भाषाओं को हम रोजगार की भाषा बना पाएं और अनुवादकों के लिए भी उस जगह का सृजन करें जो जगह आज विकसित देशों में, स्वाभिमानी देशों में देखने को मिलती हैं ।


भारत की विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के समृद्ध साहित्य, समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए हिंदी भाषा एक कड़ी का काम कर सकती है । संगम साहित्य से लेकर असम के संत शंकरदेव वाणी को सामने लाने में हिंदी भाषा महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है और इस हेतु हमें प्रयासरत भी होना चाहिए तभी अपनी भाषा- अपना देश के सिद्धांत को हम वास्तविकता में अनुभव करने में सक्षम होंगे ।


लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।

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