शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

“माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या”




 

“माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या” सूत्र वाक्य को भारतीय संस्कृति अपने में समेटे हुए है | भारतीय वैदिक ग्रन्थों की परंपरा से लेकर वर्तमान भारत की हाइड्रोजन नीति तक अंतिम उद्देश्य के रूप में समता का वह धरातल है जहां चर- अचर अवयव एक साथ बिना एक दूसरे को नुकसान पहुंचाए जीवन चक्र में अपना सहयोग देते हैं | औद्योगिक क्रांति के बाद जलवायुवी समस्याओं की शुरूवात का प्रस्थान बिंदु ओज़ोन क्षरण के रूप में हमें देखने को मिलता है | संभवतः यही वह बिन्दु भी है जहां विश्व के सभी देश मिलकर अपनी मानवीय भूलों को सुधारने का प्रण करते हैं | हालांकि ओजोन क्षरण से शुरू प्रकृति का यह कहर आज जलवायु परिवर्तन, विपरीत एवं विकराल मौसमी दशाओं और ग्लोबल वार्मिंग तक जा पहुंचा है | इन सब दशाओं के बीच भारत द्वारा किए जा रहे प्रयास प्रशंसनीय हैं फिर चाहे वो और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन फेज आउट मैनेजमेंट प्लान से संबन्धित हों या अंतर्राष्ट्रीय सौर ऊर्जा समझौते से संबन्धित या फिर कूलिंग एक्शन योजना से संबन्धित हों । 

    

ओजोन परत के ह्रास के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाने और इसे संरक्षित करने, संरक्षण हेतु किए गए प्रयासों पर चर्चा एवं भविष्य की कार्ययोजनाओं के गठन आदि मंतव्यों को दृष्टिगत रखते हुए 16 सितम्बर 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल संधि हस्ताक्षरित हुई | संयुक्त राष्ट्रसंघ की सामान्य सभा ( जनरल असेंबली ) द्वारा वर्ष 1994 में 16 सितम्बर के दिन को अंतर्राष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस के रूप में घोषित किया | ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए हस्ताक्षरित यह अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि विश्व की सबसे सफलतम संधियों में से एक मानी जाती है |  


1992 से ही भारत मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के विभिन्न दिशानिर्देशों को चरणबद्ध तरीके से कार्यान्वित कर रहा है। भारत ने क्लोरोफ्लोरोकार्बन, कार्बन टेट्राक्लोराइड, हैलोन्स को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया है। वर्तमान में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के त्वरित कार्यक्रम के अनुसार हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जा रहा है। हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन फेज आउट मैनेजमेंट प्लान (HPMP) स्टेज- I को 2012 से 2016 तक सफलतापूर्वक लागू किया गया है और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन फेज आउट मैनेजमेंट प्लान (HPMP) स्टेज- II वर्तमान में 2017 से लागू किया जा रहा है और 2023 तक पूरा हो जाएगा यह उम्मीद की जा सकती है | 

भारत में ओजोन क्षयकारी रसायनों में से एक सबसे शक्तिशाली एचसीएफसी- 141बी को भी पूर्ण तरीके से समाप्त करके विकासशील देशों के सम्मुख एक उदाहरण पेश किया है भारत सरकार ने हाल ही में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अगले चरण किगाली संशोधन की पुष्टि करने का निर्णय लिया है जो एक बार फिर वैश्विक समुदाय के लिए जलवायु और पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है |


आज विश्व के प्रायः सभी देशों द्वारा ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्सर्जन में कमी हेतु नीतिगत फैसले लिए जा रहे हैं | इनके प्रतिस्थापन से भी नई समस्याओं को हम जन्म लेते देख रहे हैं | कई क्षेत्रों जैसे रेफ्रिजरेशन और एयर कंडीशनिंग अनुप्रयोगों में ओडीएस के विकल्प के रूप में फ्लोरिनेटेड गैसों (एफ-गैसों) जैसे हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (एचएफसी), पेराफ्लूरोकार्बन (पीएफसी) और सल्फर हेक्साफ्लोराइड (एसएफ 6 ) को पेश किया गया है। ये गैसें ओजोन परत को तो नष्ट नहीं करती हैं, परंतु जलवायु परिवर्तन में ग्रीनहाउस गैसों के रूप में योगदान करती हैं। कुछ एफ –गैसों में ग्रीनहाउस प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड की समान मात्रा की तुलना में 23 000 गुना अधिक शक्तिशाली होता है। 1990 के दशक से एफ-गैसों का उपयोग और वातावरण में उनकी उपस्थिति में वृद्धि हुई है। हमें वैश्विक स्तर पर इस तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि ओज़ोन परत के संरक्षण

के कदम हमें विपरीत स्थितियों में न डाल दें |


आज जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण , ग्लोबल वार्मिंग और ओजोन संरक्षण के मामलों को अलग अलग करके नहीं देखा जा सकता है | इसी लिए नवीनीकरणीय स्रोतों से प्राप्त हाइड्रोजन, ग्रीन हाइड्रोजन की तरफ बढ़ते हमारे कदमों को भी वर्तमान शोधों के आधार पर हमें आगे बढ़ाना चाहिए | भारत की वर्तमान हाइड्रोजन नीति के अनुसार हमने वर्ष 2030 तक 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन बढ़ाना है | भारतवर्ष की ऊर्जा जरूरतों और वर्तमान जलवायवी दशाओं को देखते हुए ईधन के रूप में हाइड्रोजन के उपयोग संबंधी ऐसी सकारात्मक पहलें उत्साहवर्धक हैं | हालांकि अभी भी उच्च लागत, तकनीक एवं आधारभूत अवसंरचना की न्यूनता, हाइड्रोजन ऊर्जा परिवहन में नुकसान आदि चुनौतियाँ बरकरार हैं जिस तरफ समन्वित होके प्रयास करने की आवश्यकता है | तेल रिफ़ाइनरीयों, स्टील सेक्टर में भी अनवीनीकर्णीय ऊर्जा से प्राप्त ग्रे-हाइड्रोजन के स्थान पर ग्रीन-हाइड्रोजन को प्रतिस्थापित करने की तरफ हमको कदम बढ़ाने की आवश्यकता है | इलेक्ट्रिक वाहनों की संकल्पना को जिस तरह भारत ने अपने विभिन्न नीतिगत फैसलों में समावेशित किया है वैसे ही कदम इस संदर्भ में भी लिए जाने चाहिए तभी सच्चे अर्थों में हमारी संस्कृति के बीज वाक्यों को अमलीजामा पहनाने में हम सफल होंगे |    

लेखक जय प्रकाश स्वतंत्र स्तंभाकार,पूर्व बैंक अधिकारी एवं किरोड़ीमल महाविद्यालय,दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व महासचिव रहे हैं । वर्तमान में भारत सरकार के उपक्रम में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी हैं।

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