शुक्रवार, 30 मई 2014

एक छलावा और ?


मीलों हम आ गये, मीलों अभी जाना है...- कांग्रेस के उम्मीदवारों ने चुनावों में यदि किसी पहाड़ी क्षेत्र का दौरा किया हो तो वे जरूर इस गीत के अर्थ को समझ गये होगें। जहां आज भी तमाम गुड-फील कराने वाले सरकारी आकड़ों के बाद भी यातायात के साधनों की कमी है, जहां आज भी महिलाओं को ईधन, पानी आदि सामग्री हेतु तीन तीन  किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है, जहां विद्या बालन के निर्मल-अभियान के बाद भी स्त्रियों को शौच हेतु खुले में जाना पड़ता है।
क्या ऐसा इसलिए है कि लोकसभा में पहाड़ी क्षेत्रों का, कश्मीर, उत्तराखण्ड, हिमाचल तथा उत्तरपूर्वी क्षेत्रों को मिलाकर मात्र सात प्रतिशत प्रतिनिधित्व है? या फिर कुछ अन्य कारण है यह अभी स्पष्ट नहीं.  जनता ने भाजपा पर इस बार भरोसा जताया है। पहाड़ी क्षेत्रों ने भी इसमें अपनी अहम भूमिका निभायीं है। कांग्रेस द्वारा और भी गहरी कर दी गई इस खाई को पाटने में, ये ‘‘टेक्नोक्रेटस’’ कितने सपफल होंगें, यह देखने लायक होगा।

पहाड़ों में विकास की बात उठते है दावेदारी शुरू हो जाती है कि हमने इतनी सड़कों की मरम्मतें करवाई, इतनी सड़कें बनवाई, इतना शहरी-सौंदर्यीकरण किया। आपने तीन महीने चलने वाली सड़के तो दी, पर उनमें चलने के लिए ढंग की गाडि़या तो नहीं दी. बैलगाड़ी की याद दिलाने वाली गाडि़यां और हर तीन महीने में अपना दम तोड़ने वाली सड़कें। ये आपके द्वारा किया गया विकास है? पहाड़ों का जो रूप दिखाया जा रहा है उसके अलावा भी एक जिदंगी है। उत्तराखण्ड का विकास तब माना जायेगा, जब सुदूरवर्ती पिथौरागढ से लेकर अल्मोड़ा रानीखेत सबका विकास होगा। यह नहीं कि आप मसूरी,  देहरादून को चमकाने की एवज में मूल पहाड़ों को ही विस्मृत कर दें। यह बात हिमालय के सान्निध्य में स्थित सभी पहाड़ी क्षेत्रों में लागू है।

पहाड़ों में ज्यादा कृषि की संभावना नहीं है लेकिन वहां पैदा होने वाले संसाधनों जैसे सूखे मेवे, फल, आदि का संरक्षण कर, वैल्यू एडीशन करके उत्पाद बनाने का मैकनिज्म विकसित करें, तो इन क्षेत्रों को आर्थिक रूप से सशक्त करने का यह भी एक जरिया हो सकता है। इन क्षेत्रों में माल के सीधे निर्यात की व्यवस्था की जा सकती है, जिससे दिल्ली तक इनको लाने की जरूरत न हो. इस तरह वैल्यू एडिशन करके उद्योगों के साथ,  रोजगार भी सृजित किये जा सकते हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों को और उसमें भी प्राकृतिक जीवंतता से भरे दुर्गम क्षेत्रों को अतिशीघ्र ही हवाई-व्यवस्था से जोड़ने की कवायद शुरू की जानी चाहिये.  मोदी जी से यही उम्मीदें है कि सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक भी हवाई-जहाज की सुविधएं मिलेंगी, क्योकि पर्यटको के लिए बीस-बीस घंटे का सफर और वह भी दम तोड़ती हुई सड़कों में, बैलगाड़ी सी गाडि़यों में संभव नहीं. पहाड़ी क्षेत्रों के लोग उम्मीद कर रहे है कि उनके दुर्गम क्षेत्रों से किसी को यदि एम्स रेफर किया हो,  तो घंटों सफ़र के बीच वह दम न तोड़ दे।
आज भी पहाड़ो में महिलाओं को मीलों दूर जाकर पानी लाना पड़ता है। घास काटके लानी पड़ती है। ऐसे में पहाड़ी लोगों की यह उम्मीद की कम से कम तीन किलोमीटर की परिधि में  महिला शौचालयों की व्यवस्था हो, कोई नाजायज उम्मीद नहीं। पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी रोजगार की समस्या बनी हुई है, अपनी मेहनतकशी और लगन के लिए ज्ञात लोगों के रोजगार हेतु हार्टिकल्चर सरीखी क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जा सकता है। उत्तर पूर्वी क्षेत्रों के लोगों को उनके अंग्रेजी ज्ञान का अच्छा पफायदा उनके ही घर में दिलाया जा सकता है।

वैसे तो पूरे भारत की ही शिक्षा व्यवस्था चरमराई है किंतु पहाड़ी क्षेत्रों का हाल और भी बुरा है। आज भी शिक्षक वर्ग दुर्गम क्षेत्रों में जाने से कतराते हैं। विश्वविद्यालयों को केंद्र द्वारा समुचित सहायता नहीं दी जाती। गिने-चुने केंद्रीय विश्वविद्यालय है, ऐसे में नई सरकार से यह उम्मीदें हैं कि इन समस्याओं का वह निराकरण करने में सफल होगी। कड़े कानूनों के अनुप्रयोगों की भी जरूरत है ताकि दुर्गम क्षेत्रों में न जाने वाले ऐसे शिक्षकों वर्गों पर कड़ी कारवाही हो।
पहाड़ी क्षेत्रा के लोगों की नई सरकार से उम्मीदें हैं कि बेस हॉस्पिटल की स्थापना उनके क्षेत्रों में हो, दुर्गम क्षेत्रों के कारण किसी को हॉस्पिटल आते हुए रास्ते में ही मौत का कोपभाजन न बनना पड़े। डॉक्टर भी दुर्गम क्षेत्रों में जाने से कतराएं नहीं। जिस तरह पल्स पोलियो अभियान को सफल बनाया गया, इसी तरह के प्रयास इन क्षेत्रों के लिए भी होने चाहिए।
आजादी के बाद सपने बेचने के इस दौर में सबसे ज्यादा नुकसान पहाड़ी क्षेत्रों का ही हुआ है, ऐसे में अगर नई सरकार से भी उसे नाउम्मीदी हासिल होगी तो फिर शायद ही वह कभी भरोसा कर पायेगा- स्वतंत्रता पर...., समानता पर....., और समावेशी विकास पर।
     
  

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपने सही कहा जय कि शायद सही पहाड़ी राज्‍यों की सात प्रतिशत लोकतान्त्रिक भागीदारी ही उसकी अनदेखी का कारण है। इससे तो यही लगता है कि वहां के लोगों को वहां छोड़ना ही नहीं चाहिए था। शहरों की व्‍यवस्‍था बनाते-बनाते पहाड़ी अपने ही क्षेत्र की अनदेखी से वाकई बहुत परेशान है। आपने अच्‍छे विषय पर समयोचित आलेख लिखा है। आज जनसत्‍ता के समांतर कॉलम में आपका आलेख पढ़ा। अच्‍छा लगा। यूं ही लिखते रहिए।

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