उत्तराखंड में 2017 का चुनावी बिगुल बज चुका
है | जनसंपर्क अभियान तेज हो चुके हैं | जनता के बीच अपने को
मनवाने की कवायद जारी है | जगह-जगह जनसभाओं का आयोजन
शुरू हो चुका है | प्रत्येक चुनाव की तरह उत्तराखंड के ये चुनाव भी
बिजली, पानी, सड़क को लेकर लड़े जायेंगे
इसमें कोई दो राय नहीं | गैरसैण राजधानी का मुद्दा भी इस बीच उछलेगा, यह भी प्रत्याशित ही
है |
इस बीच केंद्र सरकार द्वारा किये गए कार्यों एवं
प्रदेश सरकार को समांनातर रखकर भी तुलना की जाएगी | जनसभाओं में पर्दाफाश करने
की बातें भी की जाएँगी | यह भी मंचों से बताया जाएगा कि हरीश रावत सरकार के
सेनापति सेना को क्यों छोड़ भागे | यह भी बताया जायेगा कि
प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री का नाम किस-किस घोटाले में आया था
| इन सबके बीच जो चीज़ नदारद पायी जायेगी - वह है विज़न | क्या इन जन सभाओं में, रैलियों में जो चीज़ें
बताई जा रही है आज उत्तराखंड को उसी की ही चाहत है? यह सोचनीय विषय है | पिछले 3 वर्षों में जिस तरह गोलीबाजी, हत्या, बलात्कार की घटनाएं सामने आई हैं उनके अभियुक्तों को देखने से यह स्पष्ट है
कि इस हिमालयी पहाड़ी राज्य को भी हिमांचल की तरह अपनी भू नीति को स्पष्ट करने की
जरुरत है | शांति, चैन का हिमायती यह
प्रदेश आज भू माफियाओं, रेत खनन माफियाओं, शराब के व्यवसायियों
द्वारा संचालित हो रहा है | ऐसे में कितना
प्रतियोगी माहौल यहाँ के युवाओं को मिलेगा यह महत्वपूर्ण प्रश्न है ?
“हम कुछ कहेंगे नहीं करके दिखायेंगे ,क्योंकि हम करने में भरोसा रखते हैं”| ये कुछ आम जुमले हैं जो यहाँ के जन प्रतिनिधियों
द्वारा उछाले जाते हैं | उत्तराखंड के लोगों
के लिए अब इन जुमलों के पीछे की असलियत जानने का समय है | उत्तराखंड के 2017 के चुनाव में
युवाओं की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता | यही वो युवा हैं जो सरकारी नौकरी पाने की चाह में
क्या नहीं करते लेकिन मजबूरन सिडकुल में काम करते
हैं| यही वो युवा हैं जो
उत्तराखंड में पर्यटन की राह देखते हैं, लेकिन अवसंरचना की
कमी के चलते फिलहाल होटल खोले बैठे हैं |
मसलन ठेठ पहाड़ी
इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए यह पचाना शायद मुश्किल होगा की उनकी प्रति
व्यक्ति आय 2013-2014 में 1.03 लाख रही है | ये वही ठेठ पहाड़ी लोग हैं जिनको शायद ही कभी अच्छी सड़कें
देखने को मिली हों | उत्तराखंड की
निम्नलिखित ज्वलंत समस्याओं की तरफ हुक्मरानों को ध्यान देना होगा –
रोजगार की समस्या- उत्तराखंड की लगभग 79 प्रतिशत आबादी शिक्षित है | रोजगार के अनुकूल अवसर न होने के कारण यहाँ के युवा पलायन को मजबूर हैं | प्राइवेट कंपनियों में यहाँ
के अधिकाँश इंजीनियरिंग छात्र कार्यरत हैं | इसके अलावा एक बड़ी आबादी खाना बनाने एवं होटल व्यवसाय में जुडी है | दिल्ली के अधिकाँश होटलों
में, विश्वविद्यालय की मेस में ये उत्तराखंडी देखने को मिलते हैं | ऐसे में 2017 का चुनाव इन मुद्दों को अपने
में कितने समेकित करेगा यह देखना दिलचस्प होगा | बहरहाल रोजगार के साधनों में
पर्यटन की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता |लेकिन सवाल फिर वहीँ आकर
रुकता है ...कैसे?
साहसिक पर्यटन के क्षेत्रों
जैसे पैराग्लाइडिंग,पैराज्म्पिंग,रिवर राफ्टिंग,कैम्पिंग सरीखे तरीकों से यहाँ के युवाओं को भी रोजगार के साधन प्राप्त
होंगे वहीँ यह राज्य मात्र आबकारी विभाग के तरफ रेवेन्यू के लिए नहीं ताकेगा| बागवानी,मधुमक्खी पालन,कुक्कुट पालन के लिए
उत्तराखंड एक आदर्श जगह हो सकता है | यहाँ यह ध्यातव्य है कि उत्तराखंड के अनेक सीमान्त जिले जैसे पिथौरागढ़ आदि
में यहाँ के स्थानीय निवासियों द्वारा बुने गए दन, कालीन की नेपाल एवं चीन में
बड़ी मांग है | ऐसे में जब देश में रोजगार के नित नए अवसर खोजे जा रहे हैं युवाओं को इस
तरफ भी आकर्षित किया जा सकता है |
आधारभूत संरचना की समस्या- उत्तराखंड को यदि सैलानी के
चश्मे से हटाकर देखेंगे तो आपको जमीनी हकीकत पता चलेगी | एक ऐसा प्रदेश जिसमे अभी भी निर्वासन का जीवन जीने को लोग अभिशप्त हैं | जहाँ आज भी जानें महज इसलिए
चले जाती है कि उनके यहाँ बेस हॉस्पिटल तक नहीं | पिथौरागढ़ जिले में आई आपदा
इसका प्रमाण है जिसमे सड़कों की पहुँच न होने से एवं आवश्यक चिकित्सकीय सुविधा न
होने से कई साँसे छूट गयी | यह भी विदित हो कि यह वही जिला है जिसमें 1991 से ही ऐसी हवाई पट्टी बन रही
है जो बस बनती रहती है | जन प्रतिनिधियों की संवेदनहीनता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संसद
में शायद ही उत्तराखंड के किसी बुनियादी मुद्दे में बात हुई हो | ऐसे में 2017 के चुनाव में
इन मुद्दों को सुलझाए बिना राजनीतिक पार्टियाँ अपनी दाल गला पाएंगी, यह कहना मुश्किल है | केंद्र द्वारा भी छोटे-छोटे हवाईअड्डों के निर्माण
का विजन दिखाया गया है ऐसे में यह आवश्यक है कि उत्तराखंड के सीमावर्ती जिलों एवं
पर्यटन स्थलों को हवाई मार्ग से अविलम्ब जोड़ा जाए |
समानता आधारित उत्तराखंड
राज्य की स्थापना- आज जो पहाड़ी संस्कृति अपने जड़ों को सहज कर रखने के लिए जानी जाती थी वहां
असमानता आधारित समाज स्थापित हो रहा है | विकास की जमीनी परियोजना जहाँ दून, हरिद्वार तक सिमट कर रह जाती है वहां कुमाऊँ के क्षेत्रों में महज घोषणा से
तुष्टीकरण कराया जाता है | इस बीच लोक संस्कृति के अवयवों का भी क्षरण हुआ है | शहरी क्षेत्रों के बनियादारों
द्वारा जन, जंगल, जमीन पर अपना प्रभुत्व बढाया जा रहा है | ऐसे में असमानता वाले
उत्तराखंड का विकास हो रहा है, इससे वहां के मूल निवासी हाशिए में जा रहे हैं|
ऐसा नहीं है कि ये मुद्दे
उत्तराखंड की समस्त समस्याओं के प्रतिनिधि मुद्दे हैं, हाँ इन मुद्दों को शेष सभी समस्याओं के मूल में देखे जाने की जरुरत है | 2017 में होने वाले विधान सभा चुनावों में इनका समाधान होना चाहिए न कि
जुमलेबाजी| अपने जन प्रतिनिधियों की तरफ
आशा से निगाहें लगाये बैठे पहाड़ी लोगों को अब विज़न की जरूरत है | कैसे होगा और क्या होगा यह बताने की जरुरत है | हालांकि मंचों से अभी विकास का विज़न नदारद है | ऐसे में जनता को जागरूक होना होगा कि दुबारा कहीं जुमलेबाजी में पड़कर गलत चुनाव
न करें जिससे फिर वही दमन का,सामजिक अन्याय का,शोषण का चक्र उनपर चलता रहे |
जयप्रकाश पाण्डेय
real fact
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